फागुन आयो रे ….
कीर्ति मेहता "कोमल"
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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पीली चुनर ओढ़े धरती,
पुष्पों का श्रृंगार किये
हर्ष और उल्लास का,
मौसम आयो रे
फागुन आयो रे।
रंग-बिरंगी फूली सरसों,
पिया बिन तरसी जो बरसों
प्रेम रंग अब रँगेगी गौरी
फागुन आयो रे।
गौरी घूँघट में शरमाये,
पिया देख मन को हर्षाये
दोनों संग-संग भीगेंगे अब
फागुन आयो रे।
टेसू के हैं फूल घुले,
रंग उड़े गुलाल
अखियाँ ढूंढे साजन को,
रंग हो गया लाल
प्रेम रस की चली फुहारें
फागुन आये रे।
कोयल छेड़े मीठी तान,
गौरी मन हर्षाये
पिया मिलन की आस में
तन को है तरसाये
संग-संग भीगेंगे तन-मन
फागुन आयो रे।
रचा महोत्सव पीत का,
फागुन खेले श्याम,
रंगों में भीगी राधा
भागी गोपी धाम
कृष्ण मुरारी ढूंढे श्यामा
फागुन आयो रे।
राधा-राधा रटे श्याम की,
बंसी की मीठी तान
सारा जग जाने श्यामा
मोहन की है जान
युगल जोड़ी देखो...
























