हम भूल रहें संस्कृतियां
गौरव श्रीवास्तव
अमावा (लखनऊ)
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हिमगिरी भी मौन वेश में था,
पक्षी का कलरव व्याकुल था।
वीरान पङी थी वे राहें,
जिससे गुजरा सेना दल था।
कुछ भी न बचा है मन में,
है बची शेष स्मृतियाँ।
ऐ देश में रहने वालों,
हम भूल रहें संस्कृतियां।।
रो रही माओं की आँखे,
जो पुत्र की राहें तकती।
ना रहा पुत्र अब उनका,
बहना भी मन में व्यथित थी।
क्यों नहीं समाप्त है होती,
इस देश में है जो त्रुटियाँ।
ऐ देश में रहने वालों,
हम भूल रहें संस्कृतियां।।
पुलवामा हमला हुआ जब,
वीरों ने प्राण गँवाए।
ठुकराके शहादत उनकी,
वैलेंटाइन डे सभी मनाए।
पुलवामा के दृश्य याद कर,
गौरव ने लिखी कुछ कृतियाँ।
ऐ देश में रहने वालों,
हम भूल रहें संस्कृतियां।।
परिचय :- गौरव श्रीवास्तव
निवासी - अमावा (लखनऊ)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, ...























