ज़िन्दगी के नाटक मे
आयुषी दाधीच
भीलवाड़ा (राजस्थान)
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ज़िन्दगी के नाटक मे...
हर कोई इस तरह रम गया है,
मानो उसे भी ना पता कि वो कौन है।
बस दिखावे के चक्कर मे,
दिखावटीपन की ज़िन्दगी जी रहा है।
असल ज़िन्दगी से वो खफा है,
क्योकि अभी वो ज़िन्दगी के नाटक मे रमा है।
यहा किसी को नही पता की,
कौन अपना है कौन पराया है।
हर कोई यहां अपनी मंजिल को पाने मे लगा है,
असल ज़िन्दगी का तो उसे पता ही नही।
ज़िन्दगी के नाटक मे...
सभी ने झूठ का मुखौटा बेखुभी पहना है।
हर कोई अपनी ज़िन्दगी से बेख़बर है,
इस ज़िन्दगी के नाटक मे।
परिचय :- आयुषी दाधीच
शिक्षा : बी.एड, एम.ए. हिन्दी
निवास : भीलवाड़ा (राजस्थान)
उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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