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पद्य

लक्ष्मण ने खींची मर्यादा की रेखा
कविता

लक्ष्मण ने खींची मर्यादा की रेखा

डॉ. कोशी सिन्हा अलीगंज (लखनऊ) ******************** लक्ष्मण ने खींची मर्यादा की रेखा थी यह अपनत्व भरी सुरक्षा की रेखा सीता साध्वी सुलक्षिणी गुणखानी कुल वंश मर्यादा उससे ही थी जानी था चित्त व्याकुल, अशांत व आकुल चिन्ताओं के उठ गिर रहे थे बुलबुल धर साधु वेश कपटी रावण आया भिक्षानंदेहि, की गुहार है लगाया सतवन्ती कर्त्तव्यनिष्ठ प्रिया रघुवर लेकर भिक्षा आयी, देने को सत्वर जान मर्म रेख की, छली ने बाहर बुलाया किंचित रुकी, पुन: भिक्षा देने, कदम बढाया असुर विनाशन हित कैकेयी बनी ज्यों कारण सीता भी, दु:ख सहने हित, बढ चली अभगन यह लक्ष्मण रेख, रामकथा का है शिलालेख संपूर्ण कथा की संरचना का भी है आलेख। परिचय :- डॉ. कोशी सिन्हा पूरा नाम : डॉ. कौशलेश कुमारी सिन्हा निवासी : अलीगंज लखनऊ शिक्षा : एम.ए.,पी एच डी, बी.एड., स्नातक कक्षा और उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं में अध्यापन साहित्य स...
काश मेरा भी एक …
कविता

काश मेरा भी एक …

सुभाष बालकृष्ण सप्रे भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** काश मेरा भी एक घर होता, इस छांह में, मेरा सर होता, राह में भटकनें पर भी, यहां, मेरा भी यार एक, दर होता, मायूस थे दुश्वारियों, से हम, अदावट का फिर, ड़र होता, इल्म की राह, कभी चले नहीं, सफे पर हमारा, अक्षर होता, देखी, दुनिया की खुशनसीबी, काश, अपना भी मुकद्दर होता, जेहन में है गजब का जज़्बा, काश, जोश का, समंदर होता" परिचय :- सुभाष बालकृष्ण सप्रे शिक्षा :- एम॰कॉम, सी.ए.आई.आई.बी, पार्ट वन प्रकाशित कृतियां :- लघु कथायें, कहानियां, मुक्तक, कविता, व्यंग लेख, आदि हिन्दी एवं, मराठी दोनों भाषा की पत्रीकाओं में, तथा, फेस बूक के अन्य हिन्दी ग्रूप्स में प्रकाशित, दोहे, मुक्तक लोक की, तन दोहा, मन मुक्तिका (दोहा-मुक्तक संकलन) में प्रकाशित, ३ गीत॰ मुक्तक लोक व्दारा, प्रकाशित पुस्तक गीत सिंदुरी हुये (गीत सँकलन) मेँ प्रकाशित हुय...
उद्वेग
कविता

उद्वेग

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** अछूते मन को छू गया कोई अछूते मन को छू गया कोई समीर का झोका बन दिल किसी का चहक गया हैं कहीं अकुलाहट सी कहीं दामिनी ने रोक दिया कहीं पवन आने थाम लिया उलझनों के साये में क्यों तिमिर डोल गया भावों के उद्वेग मैं लिख दूं सोपानों पर चढ़ते-चढ़ते कहीं भावो का ज्वार कम न हो शब्दों की माला पिरो लूं परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ीआप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं व वर्तमान में इंदौर लेखिका संघ से जुड़ी हैं...
गाँव
कविता

गाँव

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** सुन्दर शोभित शीतल गाँव हमारे हैं। उनपर मोहित सूरज-चाँद-सितारे हैं। हरे-भरे हैं वहाँ खेत-खलिहान सभी। श्रम करते हैं कृषक आलसी नहीं कभी। हरियाली के कारण भू पर न्यारे हैं। सुन्दर शोभित शीतल गाँव हमारे हैं। सजती है चौपाल नीम के वृक्ष तले। वहाँ प्रश्न हल करते हैं कुछ लोग भले। वहाँ स्नेह बन्धन है, भाईचारे हैं। सुन्दर शोभित शीतल गाँव हमारे हैं। पर्यावरण प्रदूषण पीड़ित गाँव नहीं। कहाँ बताओ वहाँ मनोहर छाँव नही। वहाँ शुद्धता के पग-पग उजियारे हैं। सुन्दर शोभित शीतल गाँव हमारे हैं। परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम• ए• (हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य), बी• एससी•, बी• एड•, ...
गुनगुना
कविता

गुनगुना

धैर्यशील येवले इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन ये गीत है जीवन संगीत है बिसार सारे गम ,कर कड़वी बाते अनसुना गुनगुना गुनगुना जीवनगीत गुनगुना ।। देख बहारे फूलों की सावन के झूलो की खुशियों से भरे चेहरे जीवन के रंग गहरे पलके उठा के देख जरा जीवन मे है रस भरा मीठा मीठा कुनकुना गुनगुना गुनगुना जीवनगीत गुनगुना ।। बादलों की छांव में मेरे अपने गांव में है चहरे पे भोलापन लोगो मे है अपनापन ये घट नही है रीते प्रेम स्नेह है सब पीते रह नही सकता यहां कोई भी अनमना गुनगुना गुनगुना जीवनगीत गुनगुना ।। प्राची के सूरज को वंदन है इस रज को मेरे अपने देश मे देवता मिले दरवेश में बात नही चिंतावाली है सभी और खुशहाली छुपा मत सुना सुना गुनगुना गुनगुना जीवनगीत गुनगुना ।। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म....
घुंघट काड ले रे गुजरिया
कविता

घुंघट काड ले रे गुजरिया

अलका जैन इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** घुंघट काड ले रे गुजरिया घुंघट काड ले रै घुंघट में मेरा जिया घबराय रे सांवरे मे ना लूं घुंघट मेरा जियो धडके रे सावरे जा गांवों की सारी लुगाई घुंघट डाले गुजरिया रे लोग थारे भला बुरा बोलेंगे गुजरिया रे कहनो मान लें रे गुजरिया कहा मान रै घुंघट काड ले रे गुजरिया घुंघट डाल लें गांव की सारी लुगाई घुंघट डाले लम्बो-लम्बो रे गुजरिया रिवाज ना छोड़ गुजरिया रे औ गुजरिया कहनो मान लें रे गांव की सारी लुगाई काली-काली से ले जा मारे वो लम्बो-लम्बो घुंघट काढ़े ये सांवरिया रे मेरा रूप रंग चांद सा सुंदर में काहे डालूं घुंघट डालूं सारा गांव में मेरे प्यार में पागल से ले सांवरिया रे दिवाना रे घुंघट काड ले रे गुजरिया घुंघट डाल लें रे मैं रूप की रानी काहे डालूं घुंघट रे सांवरिया घुंघट काड ले रे गुजरिया घुंघट डाल रे परिचय :- इ...
जन्मदिन
हास्य

जन्मदिन

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** अच्छा है बुरा है फिर भी जन्मदिन तो है, मगर आप सब कहेंगे इसमें नया क्या है? जब जन्म हुआ है तो जन्मदिन होगा ही। आपका कहना सही है, बस औपचारिक चाशनी की केवल कमी है। उसे भी पूरा कर लीजिए बधाइयों, शुभकामनाओं का पूरा बगीचा सौंप दीजिये, दिल से नहीं होंगी आपकी बधाइयां, शुभकामनाएं मुझे ही नहीं आपको भी पता है, मगर इससे क्या फर्क पड़ता है? कम से कम मेरे सुंदर, सुखद जीवन और लंबी उम्र की खूबसूरत औपचारिकता तो निभा लीजिये। मेरे जीवन यात्रा में एक वर्ष और कम हो गया यारों, जन्मदिन की आड़ में मौका भी है, दस्तूर भी, जीवन के घट चुके एक और वर्ष की आड़ में मन की भड़ास निकाल लीजिए, बिना संकोच नमक मिर्च लगाकर शुभकामनाओं की चाशनी में लपेट मेरे जन्मदिन का उत्साह दुगना तिगुना तो कर ही दीजिए। कम से दुनिया को द...
ज्योतिपुंज
कविता

ज्योतिपुंज

महेन्द्र सिंह कटारिया 'विजेता' सीकर, (राजस्थान) ******************** महा ज्योतिपुंज को कर नमन, आओं मिल हम संकल्प धरें। शोषित निराश्रितों के बन मसीहा, पुरज़ोर शिक्षा की अलख जगाएं। दलितोत्थान के बन प्रबल समर्थक, मिल जाति धर्म का भेद मिटाएं। हो ज्ञान-विज्ञान से साक्षात, अज्ञान तमस को दूर भगाएं। सामाजिक कुरीतियों को कर दूर, फुले दम्पत्ति के आदर्श अपनाएं। क्रांति सूर्य के विचारों को आत्मसात करें, महा ज्योतिपुंज को कर नमन....। नारी शिक्षा को दे बढ़ावा, आदिकाल से कितने कष्ट सहे। जब बनें आत्मनिर्भर व स्वालंबी, तब कैसे? करूणा के अश्रु बहे। विद्यार्जन कर नारी बनें विदुषी, जीवन विपदाओं से न घिरे। बनें अनुशासित कुटुम्ब समाज, परिवार एक से दो तरे। अनगिनत यातना अत्याचार हरे, महा ज्योतिपुंज को कर नमन....। कर दीनहीन निराश्रितों की मदद, निज सा उभारने की कोशिश करें। हर मानव धरा...
बरसात की बूंदें
गीत

बरसात की बूंदें

कु. आरती सिरसाट बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) ******************** हमसे पूँछ रही है बरसात की बूंदें पता तुम्हारा..... रहते हो मुझमें तुम और पता बता दिया दिल है हमारा..... सावन की पहली बरसात जो तुम से मिलने आएं....... बूंदों में मुझे तुम देख लेना....... पीकर तुम उन बूंदों को मन अपना भर लेना..... फिर भी अगर तन्हाई न जाएं........ ख्वाबों में मुझे तुम बुला लेना...... अपनी नींदों में मुझे तुम सुला देना....... हमसे पूँछ रही है बरसात की बूंदें पता तुम्हारा..... रहते हो मुझमें तुम और पता बता दिया दिल है हमारा..... देखों बारिश तुम से मिलने आई है..... हवाओं में भी मदहोशी छाईं है..... एक अलग खूशबू फूलों में समाई है..... धरा की खूबसूरती मन को भाई है..... नदियों ने भी अपने किनारों से छलांग लगाई है..... फिर भी मौहब्बत में ये कैसी तन्हाई है..... हमसे पूँछ रही है बरसात की...
तरस रही हूँ
कविता

तरस रही हूँ

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** मोम की तरह पूरी रात दिल रोशनी से पिघलता रहा। पर वो इस हसीन रात को नहीं आये मेरे दिल में। मैं जलती रही और नीचे फिर से जमती रही। फिर से उनके लिए जलने और उनके दिल में जमाने के लिए।। हर रात का अब यही आलम है वो निगाहें और वो दरवाजा है। देखती रहते है निगाहें दरवाजे को शायद वो आज की रात आ जाए। इसलिए सज सबरकर बैठी हूँ चाँद के दीदार करने के लिए। और कब उनके स्पर्श से अपने आपको इस रात में महका सकू।। इस सुंदर यौवन शरीर का क्या करू जो उन्हें आकर्षित नहीं कर सका। लाख मुझे लोग रूप की रानी और स्वर की कोकिला कहे पर। ये सब अब मेरे किस काम का है जो उन्हें अपनी तरफ लगा न सका। इसलिए हर शाम से रात तक और फिर पूरी रात जलती और जमती हूँ।। ये मोहब्बत है या वियोग या और कुछ हम आप इसे कहेंगे।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के...
हम कबीर के वंशज
गीत

हम कबीर के वंशज

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** कलम हाथ में है हमको ये, नाविक पार उतारेगा। हम कबीर के वंशज हमको, वक्त भला क्या मारेगा।। हिन्दू मुसलमान दोनों को, जो उठकर ललकार सके। अंधकार को नूर के कपड़े, पहना कर तम मार सके।। नहीं दुश्मनी किसी से पाली, मित्र सभी के कहलाये। क्या करते वे आईना थे, सब के दाग नजर आये।। हम भी उनके पथ अनुगामी, लोक हमें स्वीकारेगा। हम कबीर के वंशज हमको, वक्त भला क्या मारेगा।। अपनी प्रतिभा और गति को, अपनी जिद से चमकाई। राम नाम का मंत्र सीखकर, निर्गुण की महिमा गाई।। मंदिर मस्जिद काबा काशी, छाप तिलक या हो माला। सब को दूर रखा चाहत को, अपना खुदा बना डाला।। यही सिखाया कर्म सभी के, पथ के खार बुहारेगा। हम कबीर के वंशज हमको, वक्त भला क्या मारेगा।। जिस पथ चले "अनन्त" कबीरा, पथ कबीर का कहलाया। सुविधा स...
अपना पराया
कविता

अपना पराया

योगेश पंथी भोपाल (भोजपाल) मध्यप्रदेश ******************** पड़ोसी सारे अपने है और घर के है गैर पड़ोसी सांथ है निभा रहे घर को में बैर पड़ोसियों से हो रहा अपनेपन का भान घर में भाई रह रहे जैसे हो अनजान आज घरो से मिट रहा सारा शिष्टाचार भाई भाई के बीच में बनी रहे तकरार मांत पिता से कर रहे बच्चे ऐसे बात बात बात में मारते जैसे जूते लात बाहर के सब लोग तो देते है सम्मान लेकिन घर के भीतर हीं क्षीर्ण हुआ है ज्ञान भीतर भीतर ढूंढ़ते है खुद का सम्मान किसको आदर भाव कब स्वयं नही है ज्ञान छोटो को तो क्षमां नही बढ़ो को न सम्मान आप ही नें बना लिया केसा ये अभिमान बड़ा समझता है खुदको तो झुक कर रहना सीख अभिमानी को तो कभी मांगे मिले न भीख छोटा बन कर देखले हे छोटी सी बात झुकजाने से न कभी घटती अपनी जात पेड़ आम का देखलो देखो पेड़ गुलाब भरे हो फल और फूल से झूटे जा...
जिंदगी का ये सच
कविता

जिंदगी का ये सच

डॉ. तेजसिंह किराड़ 'तेज' नागपुर (महाराष्ट्र) ******************** अपनों के बीच संबंधों का आईना देखा हैं बहुत करीब से। बनते तो ये व्यवहार करने से पर बिगड़ जाते हैं कर्कश शब्दों से। रिश्तों के नाम पर ये कैसी वफा हैं उम्मीदें मन की सब लगाए बैठे हैं झूकना पसंद नहीं हर किसी को यहां झूठे अहं में वे जिंदगी गवां बैठे हैं। अकेलेपन का नासूर रोज निगल रहा अपनों से दूर हो रहा नाजुक ये रिश्ता कमबख्त जिंदगी का ये कैसा सच हैं जी कर रोज दफन हो रहा ये रिश्ता । ना चेहरों पर खुशी हैं ना रिश्तों में प्रेम नकली मुस्कान का ये कैसा दर्द। एहसास हो जाता हैं नकली बनावट से रिश्तों के संबंधों से टूटकर बिखर गया अपनों से अपनों का वो अपना दर्द । सरल नहीं इतना आसान जीने का जितना जीने को जीने के लिए चाहिए। समय व्यर्थ गवां बैठे हम इस जहां में अब जिंदगी को सबकी परीक्षा चाहिए करोड़ों जन्म क...
बदला रूप बादल दिखाया
कविता

बदला रूप बादल दिखाया

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** जेठ निकले तो आषाढ़ आया, उमड़-घुमड़ कर बादल आया। बदला रूप बादल दिखाया, झमाझम रिमझिम पानी बरसाया।। धरती माता कर रही पुकार, बिल से निकलो दौड़ो पार। साँप बिच्छू सब जीव अपार, मेंढक टर्र टर्र किया जोरदार।। मेघ देख जल बरसाया, बदला रूप बादल ... बैसाख की घमोरियां मिटाई, गरमी की तो उमस भगाई। पुरवैय्या,पछुआ से जग सरसाई, धरती की सौंधी खुशबू आई।। पेड़-पौधे,फूल-पत्ती मौज मनाया, बदला रूप बादल ... किसान खेती में लग गये भाई, हल चलावत करे बुआई। आगे महिना आषाढ़ जुलाई, मदरसा खुल गई करें पढ़ाई।। गुरूजी ने तो खूब पढ़ाया, बदला रूप बादल ... भारत भूंईया हरियाली छाई, मौसम देख कर मुस्कराई। देखो देखो घटा अब आई, मोर पपिहा सब चिल्लाई।। मनोरम दृश्य श्रवण को भाया; बदला रूप बादल ... परिचय :- धर्मेन्द्र कुम...
ओम प्रीत की जोड़ी
कविता

ओम प्रीत की जोड़ी

ओमप्रकाश श्रीवास्तव 'ओम' तिलसहरी (कानपुर नगर) ******************** निजस्वप्न में सोचा था मैंने एक सुंदर सा मेरा हमसफ़र होगा। जीवन पथ में बढ़ने को बेहद ही खूबसूरत सा सफर होगा। मिला आशीष जब माता का इक्कीस जून नव को मैं प्रीति से मिला। परिणय बंधन में बंधकर एक दूजे को जीने का शुभआलम्ब मिला। मिथिला अरुण की कली को वेद अश्वनी के पुष्प ने जीवन साथी बनाया। दोनों परिवारों ने देखो कितना सुंदर पुष्पों का यह एक हार बनाया। हर पल हर क्षण तेरा मेरा दिल से दिल का खूबसूरत साथ रहता है। जुबाँ कुछ कहे या ना कहे पर, जज्बात हर बात अपनी एकदूजे से कहता है। विचारों का टकराव तो कभी कभार जीवन में होता ही रहता है। पर अंतर्मन की नदी से प्रतिपल प्रेम का बहाव सदा बहता रहता है। ओम प्रीत के उपवन में मान्यता उपलब्धि देवी रूप में आई, श्रीवास्तव परिवार को देखो असीम उपलब्धियाँ हैं दिलाई...
मूक क्रांति हो
कविता

मूक क्रांति हो

अर्चना अनुपम जबलपुर मध्यप्रदेश ******************** भार ज्यों धरा उठा रही पवित्र पातकी। क्लेश ना ही द्वेष हिय समान भाव मातृ सी। हो सशक्त नारी तो ना बंदिनी वो वंदनीय। अवनि के आलोक से करे प्रभा आकाश की।। बन कुमुद है शोभती जो दामनी सी कौंधती। रोड़ो को स्वयं वधे वैधव्यता को बांधती। कर दमन आडंबरों का शांत व्यंग्य रागिनी। भेदभाव भस्म यूँ करे कोई दावाग्नि।। निश्चयों को दृढ़ करे सुमार्ग पथ स्वयं वरे। लक्ष्य पक्ष में करे वो दिव्यता को धारती। तर्क भेदी शूल कुप्रथाएं सारी धूल हों चित्त शांति व्यक्त तृप्त आत्माभिमान की।। सूर्य के समान तेज वायु सा प्रचंड वेग। फूल सी खिली हो फिर भी अग्नि में तपी हो जो। झेलती चली हो रूढ़ि और सारे बंधनो को। उठ खड़ी बेबाक उनको रौंदती बढ़ी हो वो।। राह में हों कितने कष्ट लोग हो चले हों रुष्ट । हों अनन्य दुष्ट एक क्षण भी ना डिगी हो जो। इस धरा ...
आंखें थकती नहीं
कविता

आंखें थकती नहीं

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** सजग प्रहरी बन गई, सीमा पर टकटकी, दुश्मनों को ढूंढती, देखे जो सोचती सही, नींद भरे नयन है, पर मजाल क्या छिपते, अनवरत देखती रहे, ये आंखें थकती नहीं। पहाड़ों पर बर्फ जमी, दूर तक वर्षा कहीं, फूलों की खुशबू में लगे, आंखें वहीं टिकी, पेड़ों के आलिंगन में, चूम लेती नभ दूरियां, ये आंखें थकती नहीं, माथे पर पड़े झूरियां। आंखें थकती नहीं, देखती व्योम के नजारे, अपना कोई मिल रहा, लग रहे सुंदर प्यारे, टकटकी लगा देखती, नृत्य करते राजदुलारे, दूर कोई अपना होता, ये आंखें उसे पुकारे। सुबह होती भोर देखे, शाम के सुंदर नजारे, वादियों में दूर तक, बिखरे पड़े कई नजारे, प्रेमी युगल देखती, करती तब आंखें इशारे, आंसुओं से भीगती, दर्द में जब दिल पुकारे। जीवन से मृत्यु तक, नयन क्या क्या देखती, अच्छी बातें याद रखती, बुरी को वो फेंक...
बरिश की बूदें
कविता

बरिश की बूदें

रीमा ठाकुर झाबुआ (मध्यप्रदेश) ******************** अबकी ये सावन भीगे रात सुहानी हो जाये! तेरे मेरे अश्रु मिलन की एक कहानी हो जाये!! बादल हो फिर मूक यहाँ पर, हृदय वेदना ऐसी हो! क्षितिज जहाँ पर मिल कर, मिले न, एक जवानी ऐसी हो!! न कोई विकल्प बचा हो, न क्षणभंगुर परिभाषा,! लिपटी हो आलिंगन मे, एक रवानी ऐसी हो!! टूट सके न बंधन अपना, न ही कोई वादा हो! बूदें फिर से नदियाँ बन, सागर में समायी ऐसी हो!! मिलकर जो मिल न सके, जीवंत कहानी ऐसी हो!!! परिचय :- रीमा महेंद्र सिंह ठाकुर निवासी : झाबुआ (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी ...
कलुष-कल्मष हृदय से
गीतिका

कलुष-कल्मष हृदय से

रामकिशोर श्रीवास्तव 'रवि कोलार रोड, भोपाल (म.प्र.) ******************** यदि कलुष-कल्मष हृदय से त्यागना है. हो अगर संकल्प दृढ़ सम्भावना है. राष्ट्र का गौरव बढ़े हो नाम जग में, मन-हृदय में शुभ्र मंगल कामना है. स्वर्ण चिड़िया था कभी भारत हमारा, चमचमायेगा पुन: प्रस्तावना है. मोह-मत्सर दम्भ-लालच त्यागकर अब, सत्य का दामन सभी को थामना है. नित्य कर चिंतन-मनन निज दोष देखें, इंद्रियाँ संयम-नियम से माँजना है. पाठ पूजा हो न हो सेवा जरूरी, कर्मनिष्ठा प्रेम ही तो साधना है. देश में हो एकता मिलकर रहें हम, 'रवि' परम प्रभु से यही बस प्रार्थना है. परिचय :- रामकिशोर श्रीवास्तव 'रवि' निवासी : कोलार रोड, भोपाल (म•प्र•) * २००५ से सक्रिय लेखन। * २०१० से फेसबुक पर विभिन्न साहित्यिक मंचों पर प्रतिदिन लेखन। * विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित। * लगभग १० साझा संकलनों मे...
वो जमाना
कविता

वो जमाना

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** छंद मुक्त कविता आज जब अपने पिताजी की उस जमाने की बातें याद आती हैं, तो सिर शर्म से झुक जाता है। माँ बाप और अपने बड़ों से आँख मिलाने में ही डर लगता था, उनकी किसी बात को नकारने की बात सोचना भी सपना लगता था। घर में भी अपने बड़ों के बराबर बैठना सिर्फ़ सोचना भर था, अपने लिए कुछ कहना भी कहाँ हो पाता था। बस चुपके से धीरे से अपनी बात दादी, बड़ी माँ या माँ से कहकर भी खिसकना पड़ता था। रिश्तों के अनुरूप ही सबका सम्मान था, परंतु हर किसी के लिए हर किसी के मन खुद से ज्यादा प्यार था। उस समय दूश्वारियां भी आज से बहुत ज्यादा थीं, परंतु प्यार, लगाव, सबकी चिंता हर किसी के ही मन में हजार गुना ज्यादा थीं। आज भी मुझे इसका अहसास है क्योंकि मैंने भी ऐसा ही काफी कुछ देखा है, अपने बाप को बड़े ...
एक कोशिश और
कविता

एक कोशिश और

अशोक शर्मा कुशीनगर, (उत्तर प्रदेश) ******************** आओ एक कोशिश फिर से करते हैं, टूटी हुई शिला को फिर से गढ़ते हैं। आओ एक कोशिश फिर से करते हैं... हाँ, मैं मानता हूँ इरादे खो गए, हौसले बिखर गए, उम्मीद टूट चुकी, सपनों ने साथ छोड़ दिया, हमने कई अपनों को गवाया, अपनों से खूब छलावा पाया, तो क्या हुआ? अभी तक जिंदगी ने हार नहीं मानी है, कोशिश करने की फिर से ठानी है, आओ एक कोशिश फिर से करते हैं... हौसलों में बुलंद जान भरते हैं, उम्मीदों को नई रोशनी देते हैं, सपनों को फिर निखारते हैं, इरादों को जोड़ते हैं, हार का मुंह तोड़ते हैं, आओ एक कोशिश फिर से करते हैं... जीवन में इंद्रधनुष लाते हैं, दुनिया को खुशियाँ दे जाते हैं, आओ फिर सपनों की उड़ान भरते हैं, आओ एक कोशिश फिर से करते हैं....। परिचय :- अशोक शर्मा निवासी : लक्ष्मीगंज, कुशीनगर, (उत्तर प्रद...
मैं अभी हारा नहीं
कविता

मैं अभी हारा नहीं

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* इतना भी नकारा नहीं हूँ, दीन बेचारा नहीँ हूँ, मै धधकती एक ज्वाला, भोर का तारा नहीँ हूँ, सोच लो, समझ लो, मै अभी हारा नहीँ हूई। तुम कहाँ पहचान पाएँ, हम कई बार आये, कभी ईसा तो कभी सुकरात बनकर बिष पिया और मुस्कराए, राख हो जायें जो जलकर, मै वो अंगारा नहीँ हूँ, सोच लो समझ लो, मै अभी हारा नहीँ हूई। मै महाराणा की हिम्मत, मै शिवाजी की वसीयत, मै भगतसिंह की हूँ छाया, बुद्ध गौतम की नसीहत, मै गर्जता एक सागर, रेंगती धारा नहीँ हूँ, सोच लो समझ लो, मै अभी हारा नही हूँ। फिर उठी गम की घटाएँ, फिर हुई बोझिल दिशाये, आसमां सर पर उठायें, फिर चली पागल हवाएँ, मै जीवन की इक हकीकत, व्यर्थ का नारा नहीँ हूँ, सोच लो, समझ लों मै अभी हारा नहीँ हूँ। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगर...
मनवा काहे को घबराय
कविता

मनवा काहे को घबराय

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** मनवा काहे को घबराय ये दुनिया एक सराय खुशियाँ बिखेर ले प्राणी, जहाँ आयु घटे ना आय। निज' भाव' गिराना मत, 'भाव' भाव से कहता है आप आपसे मिलकर, आप आपसे सुनता है आपाधापी साथ चलेगी, जीवन जंग तू लड़ता जाये मानव काहे को घबराय... 'ताज' साक्षी प्रेम का, 'ताज' तख़्त न भूल कभी प्रेम पेज 'दो बेर' मिले, या 'दो बेर' का संग सभी 'हार' न तू अपनी बाजी, पग पग 'हार' मिलेंगे आय मनवा काहे को घबराय.... 'मांग' भरी जब तूने, अब 'मांग' रहा ये अंश है, शह 'मात' का खेल सयाना, 'मात' पिता का वंश है 'घराना' रहता याद तभी, जब घर आना तू कहता जाय मनवा काहे को घबराय.... 'बाज' आएं उन करतूतों से, जहाँ 'बाज' झपट्टा चलता है कन्धों में दम हो तब ही कन्धों पे दुपट्टा रहता है विजय विशालतम बना रहे, विजय पताका फहराता जाय मनवा काहे को घबराय ये दुनिया...
मूक शब्दों को समझाना
कविता

मूक शब्दों को समझाना

कीर्ति दिल्ली विश्वविद्यालय ******************* वफादारी के चर्चों में कई सदियां गुजर गई जब मानव ने होश सम्भाला समाज में अपना स्थान पाया उसे अपने पालतू के रूप में युगों-युगों से अपने साथ ही पाया थोड़ा सा अपनापन थोड़ा सा प्रेम और थोड़ी सी सहानभूति उसे तुम्हारा कर्जदार बना जाती हैं उसे चुकाते-चुकाते उसकी अंतिम सास भी तुम पर कुर्बान हो जाती हैं चिलचिलाती धूप, भारी वर्षा, या हो कडकडाती ठंड दृढसंकल्प प्रदान करने का सुरक्षा तुम्हे और अधिक हो जाता हैं उसका प्रबल उसका मेहताना बस दो रोटी ही तो होता हैं परंतु तुमसे उसका लगाव तुम्हारी भुख से कही अधिक होता हैं कौन कहता है पशुओं में भाव नही होते वह परेशान होते है वह रोते है वह दुखी भी होते है परंतु मानव की भांति वह औरो को दोषी नही कहते हैं साथ तुम्हारे खेलना उसका तुम्हे बच्चे जैसा आनंद कराता है जीवन के क...
हवा बहती जाए रे
गीत

हवा बहती जाए रे

मईनुदीन कोहरी बीकानेर (राजस्थान) ******************** मन्द-मन्द, ठंडी-ठंडी। हवा बहती जाए रे ... मन मन्दिर में मिलन की घण्टी बजती जाए रे ....! तेरे मन की भाषा को कब से पढ़ते-पढ़ते अब जुदाई को भी सहा नहीं जाए रे ......! मेरे मन की कलियां खिल-खिल जाए रे... उनकी प्यारी प्यारी यादें मन में बहती जाए रे........! कब तक तड़पाओगे प्रीत की डोरी से बांध के..... प्यार के मौसम में मिलन की प्यास बढ़ती जाए रे.........! प्रेम के सागर में मन की बातें करते-करते.... कल-कल यौवन की नदियां थर्र-थर्र मचलती जाए रे.....! मेरे मन का गीत कब सुनोगे तुम ... गाते-गाते आंसुओ से आंखें छलकी जाए रे.....! रूप सागर को कब आ कर निहारो-गे..... मेरे अल्हड़पन की अब तो मुस्कान थमती जाए रे.....! मुझे नैनों में बसा कर घूंघट के पट कब खोलोगे..... भरी गगरिया यौवन की अब छलकी जाए रे.......!!! परिचय ...