सच के उजाले
मित्रा शर्मा
महू, इंदौर (मध्य प्रदेश)
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मुझे अब किसी की
अनुमति लेना नहीं।
मुझे अब किसी को
साबित भी करना नहीं।
मुझे दुनिया के लिए
मुखौटे पहनने नहीं
सच-सी ख़ूबसूरती
और किसी चीज में नहीं।
मेरे ज़िंदगी के अंधेरे सायों!
मुझे डराओ नहीं
ग़लतियों को अपनी
बार -बार दोहराओ नहीं।
मुझे अपने इस टूटे
आईने को जोड़ना नहीं
कुछ पाने के लिए,
किसी को तोड़ना नहीं।
मैं जैसी हूँ वैसी ठीक हूँ,
ख़ुद को छुपाकर रखना नहीं
दिखावे के ढकोसला में
मुझे अब पड़ना नहीं।
परिचय :- मित्रा शर्मा
निवासी : महू (मूल निवासी नेपाल)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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