मन का मैदान
शकुन्तला दुबे
देवास (मध्य प्रदेश)
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मैदान तो
मैदान होता है
धरा का हो
या मन का।
मार लिया जिसने
मनका मैदान।
जीत लिया उसने
सारा जहान।
मन का मैदान
नहीं औरसे चौरस
वो तो निरा गोल है।
कोना नहीं है कोई,
ना कोई छोर।
इसलिए नहीं पकड़
पाते मन की डोर।
विचारों का अंधड़
कोई बीज बो जाता है
वो मानस के पावस
से हरा हो जाता है।
तब मन का मैदान
बनता है बगीचा।
जैसे सुन्दर
फूलों का गलीचा।
किन्तु
जब होती है ईर्ष्या, द्वेष,
छल, कपट की अतिवृष्टि।
दल-दल में बदल
जाती समुची सृष्टि।
मानस मैदान को
कीच से बचाना है।
मन को दोष रहित,
विमल बनाना है।
तो बोते रहिए
बीज विश्वास के,
गाते रहिए प्रेम के गान।
अखिल सृष्टि खिल उठे,
हरियाता रहे।
मन का मैदान।
परिचय :- शकुन्तला दुबे
निवासी : देवास (मध्य प्रदेश)
शिक्षा : एम.ए. हिन्दी, समाज शास्त्र, दर्शन शास्त्र।
सम्प...


















