वो वीरानी वो तन्हाई वो गुमनामी
अनन्या राय पराशर
संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश)
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हिज्र तक़दीर नहीं वस्ल का वा'दा भी नहीं
हम ने खोया भी नहीं आप को पाया भी नहीं
अब वो वीरानी वो तन्हाई वो गुमनामी है
अब कोई मुझ से है वाबस्ता तमाशा भी नहीं
कभी मुस्काए कभी रोए तिरी यादों में
बिन तिरे मैं ने कोई लम्हा गुज़ारा भी नहीं
वो न जाने क्यों मोहब्बत का गुमाँ रखने लगा
मेरी जानिब से अभी ऐसा इशारा भी नहीं
ख़ुद को दीवाना मिरा सब को बताता है मगर
मेरा दीवाना मिरे नख़रे उठाता भी नहीं
मेरी तन्हाई मुझे और दिखाएगी भी क्या
अब मिरे आसमाँ में एक सितारा भी नहीं
डूब जाना ही मुक़द्दर हुआ जाता है क्या
अब मयस्सर मुझे तिनके का सहारा भी नहीं
चारागर फिर तू बने क्यों है मसीहा सब का
मेरे ज़ख़्मों का तिरे पास मुदावा भी नहीं
दिल के सहरा को 'अनन्या' जो बनाए गुलशन
ख़ुश्क आँखों में वो शादाब नज़ारा भी नही...






















