तो उपकार हमारा होता …
बृजेश आनन्द राय
जौनपुर (उत्तर प्रदेश)
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कुछ हम कहते, कुछ तुम सुनती,
कितना सरल सहारा होता...
प्रिये, कभी जो बात पूछती,
तो उपकार हमारा होता।।
तीसो दिन जो साथ कभी था,
अब इक-दिन भी पास न आए,
कहाँ गया वह निष्ठुर होकर,
कहाँ भाग्य ने खेल दिखाए,
कभी-कभी जो दर्शन होता,
तो संसार हमारा होता...!
प्रिये, कभी जो बात पूछती,
तो उपकार हमारा होता।।
जब से मुझसे दूर हुई तुम,
मैं एकांत से निकल न पाया,
तेरे दर्शन को उर तरसे,
मन व्याकुल होकर बौराया,
संग व्यतीत की याद न आती,
तो भी गुजर हमारा होता...!
प्रिये, कभी जो बात पूछती,
तो उपकार हमारा होता।।
सावन-बरसा, कजरी आयी,
तुमको कब मेरी सुधि आयी
हम तो जरे-बरे भादौ में,
तुझे क्वार की बात न भायी,
चौमासे की बूंँद बिसारी,
तन-मन जाए प्यासा-रोता...!
प्रिये, कभी जो बात पूछती,
तो उपकार हमारा होता।।
कतकी-पूनो,...

















