न जाने कब वो
कीर्ति सिंह गौड़
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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न जाने कब मेरी बोली सुनकर
वो बोलना सीख गया।
न जाने कब मेरी उँगली पकड़कर
वो चलना सीख गया।
उसके बचपन में, मैं अपनी
ममता को जीती रही।
मेरा चेहरा देखकर न जाने कब
वो हँसना भी सीख गया।
मेरी अमावस की रात सी ज़िंदगी में,
वो चाँद की चाँदनी सा
बिखरना सीख गया।
न जाने कब उसका कांधा
मेरे कांधे तक आ गया
फिर वो अपनी ज़िदों पर
मचलना भी सीख गया।
कभी-कभी छुपा लेती हूँ
अपने जज़्बात उससे-२
पर न जाने कब वो मेरी
आँखों को पढ़ना सीख गया।
जगाता था जो कभी
रात भर मुझे रो-रो कर
आज वो मेरी खैरियत में
रातभर जागना सीख गया।
परिचय :- कीर्ति सिंह गौड़
निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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