बिखरती पंखुड़ियों की आह!
रजनी झा
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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कली-सी कोमल कन्या थी वो,
खिल भी अभी ना पाई थी,
हाय रे! तेरा पापी मन
जिसमें हैवानियत छाई थी,
कैसे तेरे हाथ ना कापें,
उस कोमल कपोल को तोड़ने में,
हैवानियत की हद पार कर दी तूने,
अपने चित्त को भरने में,
था कसूर उस किशोरी का क्या,
ये आज बड़ा सवाल है,
क्या बेटी बनकर जन्मी थी
इसलिए हुआ उसका ये हाल है?
क्यों हिय पे वश नही था तेरे,
क्यों राक्षस बन उजाड़ा,
उस कन्या का उज्ज्वल सवेरा,
दिया है जख्म उसे जो तूने,
कभी ना भर पाएगी,
दुनिया की कोई दवा
उस पे असर ना दिखलाएगी,
तुझको फांसी मिलने पर भी
हमें तरस ना आएगी,
उस बाला की बदहाली पर ये,
उठता बड़ा सवाल है,
क्या बेटी बनकर जन्मी थी
इसलिए हुआ उसका ये हाल है....???
परिचय : रजनी झा
निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करती हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलि...
























