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कविता

अजातशत्रु
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अजातशत्रु

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** पुराने शहर के बगीचे में सजावट के लिए वह तोप रखी है, पता नही उसे अपने इतिहास पर गर्व है या शर्मिंदगी। पास की क्यारियों में उगे फूलों के पौधे तोप से डरते नही है, कई बार वे अपनी सुखी पत्तियों को तोप पर उछाल देते है, हवा के साथ शरारत करते हुए। एक बालक रोज आकर खेलता है तोप के साथ उसे तोप को घोड़ा बना कर उसकी सवारी करना अच्छा लगता है। उसने अपनी चॉक से कई कपोत बना दिये है, तोप पर। कभी कभी वह गाते गुनगुनाते फूल तोड़ कर भर देता है, तोप के मुँह में। फिर दूर खड़ा होकर मुस्कुराते निहारता है तोप को, उसे पिता की कही बात याद आती है, ये तोप उगलती थी आग के गोले शत्रुओं पर। वो सोचता है अब ये कैसे उगलेगी आग के गोले, मैंने तो इसका मुँह भर दिया है फूलों से। एक प्रश्न उसे बेचैन किये हुए है। क्या होता है ??? शत्रु। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९...
बाप के बारे में
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बाप के बारे में

आकाश प्रजापति अरवल्ली (गुजरात) ******************** आज मां बाप के बारे में कुछ कहना है। सब कुछ मां बाप ने दिया तो आज उनसे क्यों दूर रहना है। चिलचिलाती धूप में पसीना बहाते देखा है पिताजी को, दूसरो के घर में गंदे बरतन साफ करते देखा है मां को, इन दोनों की छाँह में तू बढ़ा हुआ है, तो फिर आज तू उनसे क्यों दूर है।। आज मां बाप के बारे में……. बचपन में तुझे आंसू न आए इसका वो कितना ख्याल रखते थे, तेरे खाने से लेकर तेरे सोने की हर चीज का वो ध्यान रखते थे, तू उनकी परवाह करे या ना करे उन्हें तेरी परवाह हैं, वो तेरे भगवान है फिर तू आज उनसे क्यों दूर हैं।। आज मां बाप के बारे में…….. तू आज भले ही मां बाप से रिश्ता तोड़ ले पर वो तुझे कभी नहीं छोड़ेंगे, तू जब भी मुसीबत में होगा तब मां बाप ही तेरे काम आयेंगे, अभी भी वक्त है तू समझ जा, उनसे प्यार कर, उनका ख्याल रख...
ओ जी कोई ना
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ओ जी कोई ना

डॉ. रुचि गौतम पंत फ़रीदाबाद, (हरियाणा) ******************** ये दूर तलक पसरे मोहल्ले, ये हर चप्पे पे छायी खामोशी, सब घरों में क़ैद ज़रूर हैं, पर थमी नहीं है ज़िंदगी, इसे मजबूरी मत समझना, ये मजबूती है मेरे लोगों की, यहाँ एक एक बच्चा भी शेर सा पला है, तेरा तो पता नहीं कोरोना मेरा हिंदुस्तान जीतने वाला है। यहाँ बजती है घंटियाँ, सुबह शाम अज़ान भी है, यहाँ हर घर में बसता है भगवान, और हर इंसान को खुद पे ग़ुमान भी है, तेरा पता ग़लत है कोरोना, तू आया मेरे हिंदुस्तान में है। यहाँ बाँधती हैं बहनें, कलाइयों पे राखी, हर कलाई सिर्फ़ प्यार से चुनी है यहाँ धर्म कर्म की लड़ियों ने, हम सबके के बीच एक तार बुनी है। यहाँ अगर होली वाले हैं दिन, तो मुबारक बक़रीद की शामें भी हैं, यहाँ कोई कारण नहीं पूछता, माहोल-ए-जश्न ज़रा आम सा है। तेरा पता ग़लत है कोरोना, तू आया मेरे हिं...
एक पैगाम जिंदगी के नाम
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एक पैगाम जिंदगी के नाम

अनिता शर्मा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जिंदगी की दौड़ में ऊँचाइयों की होड़ में रफ्तार में तार तार गुमनाम जब हर बार तो राही की पहचान के लिए एक नाम जरूरी होता है.. जीवन के संचार में खूबियों के भंडार में उड़ने को आकाश में निरन्तरता की आस में जज़्बे को दिशा देने के लिए हाँ थोड़ा विराम जरूरी होता है... कुछ आकलन जीवन में कुछ संकलन चितवन में सृजन के पल संजोए लम्हे को माला में पिरोए कुछ सुकूँ पलों के लिए मन पर लगाम जरूरी होता है... भागती सी जिंदगी ओर सपने सतरंगी कुछ पाने की उमंगे थी विचलित मन की तरंगे थी हाँ ठोकरों पर मलहम के लिए, थोड़ा सा आराम जरूरी होता है... चलकर रुकना रुककर चलना बिना चले तो जीवन तन्हा क्या ठहराव क्या है बहाव नियति की चाल वक्त का प्रवाह इन सबको समझने के लिए क्या ऐसा अंजाम जरूरी होता है.... परिचय :- श्रीमती अनिता शर्मा निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : प...
विरह मिलन की तैयारी
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विरह मिलन की तैयारी

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** आज साजन मेरे द्वारे आए मै विरह अगन की मारी रे। बचपन ब्याह रचा दी बाबुल अब बढ़ हुई सयानी रे विरह मिलन की भूख है कैसी ठीक समय पर आए बराती डोली लाए सवारी रे सोलह सिंगर सजा मेरी सखियाँ गजरा बाँध संवारी रे। कजरा नयन भरो मेरी सखियाँ ओढ़ा दे सोना जडल चुनरिया रे। सुसक सुसक मोरे बाबुल रोए भइया बैठी दुआरी रे। बाह पकड़ कर मैया रोयी भाभी अंक भर वारी रे अब धैर्य रखो मोरे बाबुल बेटी जात बिरानी रे। एक दिन रोती छोड़ सभी को चल देती ससुराली रे। छढे मंजिल पर एक कोठरिया तामे एक दुआरी रे। अहनद घहरद शहनाई जलता दिप हजारी रे। विरह मिलन में चली अकेली लगी प्रीतम की छतिया रे। निज अस्तित्व गवा मै बैठी। विरह मिलन की तैयारी रे। परिचय :- ओमप्रकाश सिंह (शिक्षक मध्य विद्यालय रूपहारा) ग्राम - गंगापीपर जिला - पूर्वी चंपारण (बिहार) सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindiraks...
आगे बढ़ता चल
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आगे बढ़ता चल

उषा शर्मा "मन" बाड़ा पदमपुरा (जयपुर) ******************** राही आगे बढ़ता चल। ना हो परेशान, ना हो हताश, मेहनत संग आगे बढ़ता। राही आगे बढ़ता चल। निराशा दूर कर आस संजोए, विश्वास संग आगे बढ़ता चल। राही आगे बढ़ता चल। उम्मीद की नई किरण जलाए, आत्मविश्वास संग आगे बढ़ता चल। राही आगे बढ़ता चल। मंजिल तेरी राह देख रही, हौसलो संग आगे बढ़ता चल। राही आगे बढ़ता चल। अपने लक्ष्य पर डटे रह, संयम संग आगे बढ़ता चल। राही आगे बढ़ता चल। मुश्किलों को संघर्ष से दबा के, दृढ़ संकल्प संग आगे बढ़ता चल। परिचय :- उषा शर्मा "मन" शिक्षा : एम.ए. व बी.एड़. निवासी : बाड़ा पदमपुरा, तह.चाकसू (जयपुर) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में...
अपनों ने ही मारा है
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अपनों ने ही मारा है

अर्चना अनुपम जबलपुर मध्यप्रदेश ******************** समर्पित- दंगो के दौरान फर्ज निभाती निर्दोष पुलिस पर होने वाले हिंसक हमलों की अमानवीयता दर्शाने का प्रयास परसी थाली छोड़ मैंने फोन उठाया जबकि अभी हाल ही सत्तरह घण्टे ड्यूटी कर, घर आया। रात के बजे हैं एक, बच्चे लंबे समय तक राह देख, कि, पापा कुछ लाएँगे आस लगाए सो गए हैं। ना जाने पापा किस दुनियां में गुम हो गए हैं? देखकर सोते बच्चों को आँख मेरी भर आईं। हिम्मत बाँधती उसनींद पत्नी नज़दीक आई। हाँथ ही धोये की वो झट खाना ले आई। समझ गई, दौरान ड्यूटी, खाना तो आया होगा। कईलाशों के बोझ! कंधों, चीखों के कान में थे; मैंने नहीं खाया होगा। भूख लगती भी किसे है ऐंसे हालातों में? एक पुलिस रखती धैर्य उन्मादी जज्बातों में। एक ही खाया था कौर; की उस ओर; घण्टी फिर से फ़ोन की बजी। रोका संगिनी ने हाँथ थाम लिया कल ही तो देखी ...
किसी मोड पर
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किसी मोड पर

आशीष कुमार पाण्डेय कानपुर उत्तर प्रदेश ******************** मै सोचता हूँ, की वो किसी मोड़ पर दिख जाये। मुझको देखे, और थोड़ा सा मुस्कुराए।। वो साड़ी में कैसी लगती होगी, वो घडी की जगह चूड़ियाँ कैसे सजती होगी। क्या वो मुझसे मिलेगी, और गले लग जाएगी, या मुझको देखते ही वहाँ से चली जाएगी।। पर कही वो मुझे भूल ना जाये। मै सोचता हूँ की वो किसी मोड़ पर दिख जाये।। वो दो चोटी वाले बाल, आज खुले होगें ना। वो आँखो में सुरमा, होंठो में लाली होगी ना।। अब वो किसी और की, घरवाली होगी ना। क्या वो यहाँ आकर बगीचे में आयेगी, मेरे बारे में सोच कर, अपने आँसुओ को बहायेगी।। क्या वो मुझको, अब भी अपनी मोहब्बत कहती होगी। या एक बुरा समय सोचकर, भूलजाने की कोशिश करती होगी।। पर मै सोचता हूँ की, कही उसे मेरा एक पुराना खत मिल जाये। मै सोचता हूँ की, वो किसी मोड़ पर दिख जाये।। परिचय :-  आशीष कुमार प...
मेरा बचपन
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मेरा बचपन

मुकेश गाडरी घाटी राजसमंद (राजस्थान) ******************** किया दिन थे जब न कुछ करना। ना ही कुछ पड़ना।। ऐसा ही था मेरा बचपना! माँ के हाथ का भोजन खाना। पीता के हाथ पकड़कर चलना।। ऐसा ही था मेरा बचपना! गांव की गलियों में गुमना। दोस्तो के साथ में खेलना।। ऐसा ही था मेरा बचपना! माता पिता की डाट में प्यार का होना। कभी ना चाहा दिल में चुभाना।। ऐसा ही था मेरा बचपना! मोह था हमे प्रसाद का खाना। हम को भी दिखता था भक्ति का आना-जाना।। ऐसा ही था मेरा बचपना! . परिचय :- मुकेश गाडरी शिक्षा : १२वीं वाणिज्य निवासी : घाटी( राजसमंद) राजस्थान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आद...
ये हिन्दुस्तां हमारा है।
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ये हिन्दुस्तां हमारा है।

प्रिन्शु लोकेश तिवारी रीवा (मध्य प्रदेश) ******************** जगत को सीख देता है प्रभू की अमर कहानी से। पतित तरु सींच देता है प्रभू की मधुभरी वानी से। शत्रु दल कांप जाता हैं यहां की अमित जवानी से। सत्य की जीत होती है औं धरमों का सहारा है। ये हिन्दुस्तां हमारा है ये हिन्दुस्तां हमारा है। यहां की गोद में गंगा जी प्रतिदिन वास करती हैं। पतित नर का पतन वो क्षण भर में नाश करती हैं। यहां के राज धरमों में प्रजा विश्वास करती है। यहां का हर शहर हर गांव लगता कितना प्यारा है। ये हिन्दुस्तां हमारा है ये हिन्दुस्तां हमारा है। मां के सिर-मुकुट में बर्फ़ कि मणियां चमकती हैं। यहां हर पुत्र के हर रोग कि जड़ियां लटकती हैं। यहां हर एक औषधि डाल में चिड़िया चहकती हैं। हिमालय से भवानी ने रामेश्वर को निहारा है। ये हिन्दुस्तां हमारा है ये हिन्दुस्तां...
जीवनधारा
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जीवनधारा

बिपिन कुमार चौधरी कटिहार, (बिहार) ******************** कोई नहीं चाहे गम यहां पर, खुशियां ही सबको है प्यारा, चलता नहीं किसी का वश, यही है धुवसत्य जीवनधारा, माया जाल में गोता लगाएं, ज्ञान, धन या रुतबा जुटाएं, कितना भी कर लें हमारा तुम्हारा, मृत्यु द्वार तक ले जाये जीवनधारा, बेचा ईमान, चाहे किया महादान, करती यह है, सबका कल्याण, सेठ, साहूकार या हो निर्धन-बेसहारा, सबकी नाव खेबे यही जीवनधारा, जन्म मृत्यु का जीवन चक्र, खुशी और गम इसका किनारा, करे चाहे हम लाख जतन, निर्बाध, उन्मुक्त यह है बंजारा, रहो चिंतामुक्त, करो सत्कर्म, रहेगा अमर, कृति और जीवन, जब तलक रहेगा चांद सितारा, यही पावन संदेश देता जीवनधारा.. . .परिचय :- बिपिन बिपिन कुमार चौधरी (शिक्षक) निवासी : कटिहार, बिहार घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक...
तंहा सफर में
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तंहा सफर में

मनोरंजन कुमार श्रीवास्तव बिजनौर, लखनऊ ******************** यादों के इस तंहा सफर में यादों के इस तंहा सफर में, मनोहर, एक हमसफर की तलाश है दुख के काले अंधियारों में, सुख के पुलकित राहों में, साथ जो निभा सके उम्र भर, मनोहर, एक हमराह की तलाश है यादों के एक हमसफर की यूँ तो चेहरे हैं कई हजार, दुनिया के इस भीड़ में, पर उन हजारों के बीच में, मनोहर, एक अपने की तलाश है यादों के एक हमसफर की जीवन के कड़े संघर्ष में, राह जो दिखा सके अंत तक, पथ प्रदर्शक बन जाये जो, मनोहर, एक उम्रदराज की तलाश है . परिचय :-  मनोरंजन कुमार श्रीवास्तव निवासी : बिजनौर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख,...
नदी और नारी
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नदी और नारी

अनुराधा बक्शी "अनु" दुर्ग, छत्तीसगढ़ ******************** निश्छल नदी में अक्सर लोग पाप धोने आते हैं। आस्था के नाम पर गंदा कर चले जाते हैं। उसकी पवित्रता को दिल में रख कर देखना। कभी जलजला, कभी किनारे मंदिर बन जाते हैं। स्त्री और नदी दोनों की पवित्रता में है समानता। दोनों के गर्भ गृह में सृष्टि का स्पंदन होता। नदी भी सृजन करता स्त्री भी सृजन करता। इनकी अमृतधारा पावन करती धरा। इनकी बाहों में अठखेलियां करते गौतम राम कृष्ण। इनके पावन तट पूजे जाते कौन हो इनसे उऋण। नारी से नर बना, नदी में नर तर जाते। नदी और नारी भक्ति का एक रूप कहलाते। दोनों की गहराई में उतरकर ही इन्हे पाया जाता है। इन दोनों का सम्मान करने वाला ही पूजा जाता है। इनके पावन चरणों में जीवन सुगम सुहाने हो जाते हैं। ऋषि मुनि पावन धरा पर इनकी वजह से पूजे जाते हैं। स्वयं को इनमें अर्पण कर दो। नदी को पूजो, नारी में समर्पण कर दो। नारी में...
प्रीत का रोग
कविता

प्रीत का रोग

जसवंत लाल खटीक देवगढ़ (राजस्थान) ******************** (हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता लेखन प्रतियोगिता में प्रेषित कविता) प्रीत का रोग लगा मुझे, नींदे उडी रात की। तुम अलबेली शाम हो, मेरे प्यारे गाँव की।। प्रेमरस में खो जाता, इंतजार में कटे रतिया। हे खुदा उससे मिला, बरसती है ये अंखिया।। चाँद देख उसे याद करू, तारों की मैं सैर करु। तेरे प्यार में पागल हूँ, सपनो में तेरी मांग भरु।। तेरी एक झलक पाने, दिन भर मैं राहे तकता। पागल प्रेमी आवारा मैं, खाना पीना भी तजता।। तुझसे मैं आँखे मिलाता, शर्म से नैन झुक जाते। कोमल हाथो के स्पर्श से,रोम-रोम मेरा महकाते।। तेरे ख़ातिर जीवित हूँ मैं, तेरे ही सपने बुनता। चलता अगर मेरा राज, हमसफ़र तुझे चुनता।। सुनो तुम मेरी बन जाओ, परी बना कर रखूंगा। जीवन के इस सफर में, पलकों पे बैठा के रखूंगा।। बारिश का मौसम सुहाना, आ गयी बरसात भी। तुम ...
पिता की याद
कविता

पिता की याद

मनीषा व्यास इंदौर म.प्र. ******************** दुनिया के गम को हंसकर झेल लेती हूं, सहेजकर रखी यादों को तस्वीर में समेट लेती हूं पिता की याद में अक्सर छिपकर रो लेती हूं । जिंदगी के लम्हों में यादों को ताज़ा करती हूं चेहरे की झुर्रियों में, सदियां खोज लेती हूं, पिता की याद में अक़्सर रो लेती हूं। घर पहुंचकर ठिठक जाती हूं, अचानक फिर तस्वीर देख लेती हूं। चौखट पर सर को झुकाकर नमन कर लेती हूं,,................. पिता की याद........ स्मृतियां क्षण-क्षण सामने आती हैं, फिर उनके हौसले को सलाम कर लेती हूं। कलम थमने सी लगती है शब्द फिर बटोर लेती हूं पिता की याद,..... गमगीन जिंदगी की उदासी भरी शाम और दर्द से भरी सुबह के आभास में पिता की कर्मठता, धैर्य ,विवेक और साहस फिर खोज लेती हूं। पुरुषार्थ की कर्म गीता पढ़ लेती हूंl पिता की याद में अक्सर छिपकर रो लेती हूं। परिचय :-  मनीषा व्यास (लेखिका संघ) शि...
गुरू मंत्र निराला
कविता

गुरू मंत्र निराला

अंजली सांकृत्या जयपुर (राजस्थान) ******************** मेरे पथ का साथी हैं, पाखी मेरे हूनूर का... गुरु संग क़दम बढ़ाते चल, गुरु द्रोण की तस्वीर बन... मैं मुसाफ़िर, मँझधार में... मेरे उड़ान को भरते चल... क़िस्मत का खेल ना बन, कर्म का भाग्य बन।। मैं उदय हो जाऊँ सूरज सा, ऐसा उत्साह भरता चल... तूँ परछाईं बनाता चले, मै संग रास्ते चलता चलूँ।। गुरु हैं सफ़लता का मंत्र, थामे उसका हाथ चल।। मेरे ज़ुनून की आग को, पाक नज़रो ने तराशा हैं.. मैं हीरा तेरे कक्ष का, मंज़िल का साथी बन।। क़िस्मत की आँखे दिए, हवाओं को सन्न करता चल... गड़गड़ाहटों के दोर का, मेरा हिस्सा बनता चल... क़लम तूने सिखाई हैं, हवाओं में रूत आइ हैं.. छेड़खानिया मेरे सपनो से, शैतानिया बढ़ाई हैं।। तूँ संग मेरे जलता गया, मैं लोहे जेसे पिघलता गया।। मैं हथियार, तेरी धार का.. तेरा नाम जहांन में करता गया... तेरा ...
आत्म  मंथन
कविता

आत्म मंथन

अनुराग बंसल जयपुर राजस्थान ******************** जब भी अकेला बैठता हूँ, शुन्य की गहराइयों मैं यह सोचने लग जाता हूँ। क्या खोया और क्या पाया समझ नहीं पाता हूँ।। जब भी अकेला बैठता हूँ, अतित की गहराइयों मैं डूबने लग जाता हूँ। क्या गलत किया और क्या सही का हिसाब नहीं लगा पाता हूँ।। जब भी अकेला बैठता हूँ , खुद से ही बाते करने लग जाता हूँ। क्यों हो रहा हैं ये का जवाब ढूंढ नहीं पाता हूँ।। जब भी अकेला बैठता हूँ, कुछ हसीन लम्हे याद आ जाते है, फिर दिल को ये समझाता हु, जो होना था हो गया, और आगे बढ़ने की कोशिश करने लग जाता हूँ।। . परिचय :- अनुराग बंसल निवासी : जयपुर राजस्थान शिक्षा : एम.टेक. (स्ट्रक्चर), बी.टेक (सिविल) घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्...
जीत निश्चय है हमारी
कविता

जीत निश्चय है हमारी

अमर सिंह राठौड़ राजसमन्द राजस्थान ******************** कोरोना वुहान से आया, लगता इसे प्राप्त वरदान। मानवता का है ये शत्रु, तोड़ देंगे इसका अभिमान। विश्व की भांति भारत को, इस जंग से लड़ना है। हर जंग में हुआ विजेता, ठान फिर से करना है। हमे है कोरोना से लड़ना, मानव तुम करो एकता। अनेकता में होती एकता, ये भारत की विशेषता। समाजिक दूरी रखना है, ये जीत हमे दिलवाएगी। आखिर ये बकरे की माँ, कब तक खैर मनाएगी। बीमार से न लड़ना हमे, कोरोना से लड़ लीजिये। जंग की दवा बस दुआ, योद्धा सम्मान कीजिये। मूल धर्म क्या है? अपना, जरा तुम यह सोचना। धर्म, जाति और पार्टीवाद, ये पड़ेगा अब छोड़ना। आत्मविश्वास व संकल्प से, जीत निश्चय है हमारी। इस भारत के गौरव का, गान करेगी दुनिया सारी। . परिचय :- अमर सिंह राठौड़ पिता : मोखम सिंह जी निवासी : कनावदा "राजसमन्द" राजस्थान शिक्षा : १२वी विद्यार्थी रा.उ.मा.वि.देवपुरा र...
हद कर दी आपने
कविता

हद कर दी आपने

रमेशचंद्र शर्मा इंदौर मध्य प्रदेश ********************  सारा माल हजम, कुछ तो करो शरम, नोट लगे छापने, हद कर दी आपने ! खोटे तुम्हारे करम, माल उड़ाते गरम, कमा रखा था बाप ने, हद कर दी आपने ! कुछ तो पालो धरम, भ्रष्टाचारी घोर चरम, पीढ़ियां लगेगी धापने, हद कर दी आपने ! मत पालो अब वहम, पापी नारकी बेशरम, क्या डस लिया सांप ने, हद कर दी आपने ! प्रभु की मार बड़ी मरम, किसी दिन बिकेंगे हरम, फिर लगोगे यहीं कांपने, हद कर दी आपने ! हिस्सा खाते दूसरों का, पाप घड़ा भरा अपनों का, जल्दी कंडे लगोगे थापने, हद कर दी आपने ! बगुला भगत बनते हो, स्वांग मदारी धरते हो, माला लगते जापने, हद कर दी आपने ! परिचय : रमेशचंद्र शर्मा निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकत...
एक रात यूँ ही
कविता

एक रात यूँ ही

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** एक रात यूँ ही मै ठिठक कर सहम गया अस्मा की ओर हाथ बढ़ाकर लपक गया। निस्तब्ध शांत रात में क्या दीवाली माना रहे हो अपने घर मे तुम महा पटका उड़ा रहे हों। तोपो की जैसी गरज आवाज में तिमिर की प्रकाश में तुम महदीपवाली माना रहे हो बोलो बदलो तभी उत्तर में कुछ बूंदे टपकी। अचानक अंधकार की घानाआवरण सम्पूर्ण दिशा में फैल गयी। मालूम हुआ कि कम्पन से सम्पूर्ण दिशा ही हिल गयी। तिमिर की प्रकाश सभी मीठे दिख पड़े सभी स्वच्छ निरभ्र शांत। ईस्वर की तरफ से यह ओमकार ध्वनि होता है प्रार्थना रूपी साक्षात्कार होता है। वर्षा की रात सुहानी झींगुर की गुंजन दादुर की टर टर की आवाज में यह रात शोभायमान होती है परी रूपी बदलो की समूहों से वर्षा की बूंदो रूपी पुष्पो से मातृ भूमि की अभिषेक होती है जन जीवन मे फिर से नव गीत की संचार होती है। . परिचय :- ओमप्रकाश सिंह (शिक्षक म...
कृषक
कविता

कृषक

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. ******************** धरती माता के आँचल में, हरियाली जो बोते। अमन चमन की, खुशियाली को, श्रम का बोझा ढोते। वो किसान होते। शीत धाम आंधी वर्षा में हँसते कदम बढा़ते। खेत और खलिहानों के हीं गुण गोरव ये गाते। पले धूल मिट्टी में जन्मे इस में ही मिल जाते। अर्द्ध नग्न तन भूखे रत हैं किन्तु नहीं कुम्लाते। अन्न देश को जुटा रहें हैं ये किसान कहलाते। लगे जूझनें संघर्षों से, वे विश्राम न पाते। माँ समेट लेती गोदी में ये तो श्रम के है दीवाने। नमन उन्हें मे करती, उनकी व्यथा कोन जाने। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ...
मजदूरों की आंखें
कविता

मजदूरों की आंखें

पायल ‌पान्डेय कांदिवली, पूर्व- मुंबई ******************** इन मजदूरों की आंखें नम हैं, ज़रा, पूछों इनसे, इन्हें क्या ग़म है? नेत्रों से अश्रु धारा बही जा रही है, लग रहा है, जीवन जैसे वीरान वन‌ है। मीलों दूर चल रहें हैं, अधर जैसे एक मुस्कान के लिए तरस रहे हैं, इक आस में छोड़ कर अपना घर-बार, सुकून कि तलाश में ये इतना भटक रहे हैं। पैरों में थकन बेशुमार है, ह्रदय में पीड़ा अपार है, ये कैसा समय आया है, दर दर की ठोकरें खाने के लिए, ये मजदूर बेबस और लाचार हैं। सरकारी राहतों की योजना भी, अब इनके मन की व्यथा नहीं मिटाती, जल की शीतलता भी, अब इनकी प्यास नहीं बुझा पाती। लाचारी का इतना बेबस आलम है की, शरीर की काया भी अब इनका साथ छोड़ती जाती! मंजिल तो अभी दूर है, फिर भी अपने कर्मों में प्रयत्नरत इनका तन है! कभी तो बदलेगी यह स्थिति भी, इसी आस में बीतता, अब इनका जीवन है। इन मजदूरों की आंखें नम हैं, ...
कोख की आवाज़
कविता

कोख की आवाज़

अनुराधा बंसल गुप्ता जयपुर, राजस्थान ******************** आज माँ में तेरी कोख में आयी हूँ देखा है ना तूने मुझे, देख तुझसा ही निर्मल चेहरा लिए आयी हूँ माँ आज तूने छुआ मुझे तेरे इस चूँभन में संसार की हर ख़ुशी के बड़कर सुख पाया हैं मेने.. इस संसार का दीदार तो किया नहीं फिर भी तुझमें इस संसार को पाया हैं मेने देख माँ आज हाथ बने है कल लकीरें भी जल्द बनेगी फिर मेरे हाथो में तू हमेशा हमेशा संग रहेगी .. माँ तू यू चुप क्यू है बोल ना ये खोफ़नाक आदमी कोन है ?? जो बार तुझे बेबस करके मुझसे दूर ले जाने की कोशिश करता है माँ बनाकर ख़ुद को बेबस नहीं छोड़ेगी न तू मुझे हर पल तो मेरा अटूट अहसास तूने अपनी साँसो में पाया है.... बोल ना मेरी ग़लती है क्या ? क्यू देना चाहता है ये ज़माना सज़ा? तू भी तो इक बेटी है तेरी भी तो इक माँ थी फिर क्यू ये सज़ा मुझे मिली ? क्यू मेरी चीख़ तुझे सुनायी ना दी ? क्यू तू बेबस लाच...
हिमालय से आती आवाज
कविता

हिमालय से आती आवाज

डॉ. पुष्प कुमार राय बांका बिहार ******************** उठो, वीर सैनिकों सुनो, भारत मां की पुकार आज हिमालय से आती आवाज। गौर करो, युद्ध की मानो हो आगाज रखना मां के दूध का लाज हिमालय से आती आवाज। कह दो, वीरों दुश्मनों से बात ये तुम आज इक्कीसवीं सदी का है भारत आज हिमालय से आती आवाज। याद करो, वीरों बासठ का वह चीनी खाज हर भारतीय बदला लेंगे आज हिमालय से आती आवाज। प्रण कर, वीरों तू बारंबार आज लहू से रंगीन हो ना हिम आज हिमालय से आती आवाज। बढ़े चलो मुड़कर देखो पीछे ना आज होगी तेरे सिर पर ही विजयी ताज हिमालय से आती आवाज। उठो वीरों उत्साहित है जननी लाखों आज करने भव्य श्रृंगार तेरी आज हिमालय से आती आवाज। मत भूलो, वीरों शहीदों की भूमि ये विशाल निकल पड़ो तिरंगा लेकर आज हिमालय से आती आवाज। घबराओ मत वीरों हमको है तेरी शौर्य पर नाज फूंक दो पाञ्चजन्य शंख तुम आज हिमालय से आती आवाज। हे वीरों रौंद डालो...
इंतजार
कविता

इंतजार

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** मेरे इश्क के समंदर को फिर बेचैन कर गया कोई, ठहरे हुए जज्बात में फिर हलचल कर गया कोई, पत्थर मारा था उठाकर फिर किसी ने समंदर में, मेरे इश्क के शांत समंदर में फिर हिलोरे दे गया कोई। मौत को आकर देखो इस हद तक जी गया कोई, कि जीने से पहले अपने आप को हरसू कर गया कोई, उदास आंखों में फिर समंदर का सैलाब उमड़ा है , मौत से पहले ही लहरों सा आकर समंदर में पैगाम दे गया कोई। आज आंखों को बेइंतहा इंतजार दे गया कोई, आंखों से अश्कों को इस कदर बहता छोड़ गया कोई, क्या समझाऊं दिल को उसके इंतजार की वजह, दिल में उठते तूफान में फिर कसक जगा गया कोई। वक्त के पिंजरे को खोल कर सांसो का परिंदा उड़ा गया कोई, दिल में उठते तूफान को हर पल थाम गया कोई, सिमट जाती है एक-एक करके ख्वाहिशें सारी दिल में, जिंदगी की कशमकश से दूर श्मशान में इंतजार कर रहा है कोई। दर्द बढ़...