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कविता

यादें
कविता

यादें

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** अतीत की यादें मन को झकझोरती है क्या करूँ इस मन को कैसे समझाऊं इसे। उडता है पंख लगाकर पंछी सा आघात सहता, आघात देता अतीत की खाई मे गोता लगाता। मन उदास होता है तो आँखें सब कुछ कहती है। मन की तरंगो का पीछा करते करते अतीत भुलाऐ नही भुलते आखिर क्यों मन इतना चन्चल है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय ...
पिता
कविता

पिता

सौरभ डोरवाल जयपुर (राजस्थान) ******************** आज फिर वो शख्स याद आया, मेरे साथ मेरा बचपन खेला। मेरी जरुरत पूरी करते-करते, बड़ी कठिनाइयों को झेला।। सर्द, गर्म बारिश झेली, दिन रात कर दिए एक। मन में इच्छा यही बसी थी, मेरा बेटा बन जाए नेक।। दुःख देखा, सुख देखा, समय नही था उनको खुद के अरमान के लिए। सब कुछ किया, सब कुछ सह कर किया, सिर्फ मेरी मुस्कान के लिए।। गया जिस दिन वो शक्स, मेरा सारा सुरूर चला गया। मेरे पिता के साथ ही, मेरा सारा गुरुर चला गया।। पिता ने परिवार संभाला, संभाली घर की सारी जिम्मेदारी। घर को घर बनाया, सुविधाएँ करी, पर उन सबमे नही थी उनकी हिस्सेदारी।। देखा है संघर्ष पिता का मैंने, उन्ही के पदचिन्हों पर चल रहा हूँ। लोग ना जाने क्या समझते है, मैं तो आज भी उन्ही की मेहनत से पल रहा हूँ।। परिचय : सौरभ डोरवाल निवासी : भोजपुरा, जिला- जयपुर (रा...
नशा (सकारात्मक दृष्टिकोण)
कविता

नशा (सकारात्मक दृष्टिकोण)

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** विज्ञान का मानना है कि किसी वस्तु के सेवन से मस्तिष्क की तंत्रिकाएं प्रभावित होती हैं और व्यक्ति का व्यवहार परिवर्तित हो जाता है। किंतु, यह आवश्यक नहीं है कि केवल मस्तिष्क को प्रभावित करने वाली वस्तुएं ही 'नशा' हैं। यदि नशे को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह कला और भावना के प्रति गहरी दीवानगी को दर्शाता है। न करते औषधियों से प्रेम धन्वंतरि, तो आयुर्वेद का सटीक प्रमाण कहाँ से मिल पाता? न होती ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की लगन राजा हरिश्चंद्र में, तो सामाजिक नैतिकता की स्थापना कहाँ से हो पाती? न होती ज्ञान और संगीत की तल्लीनता देवर्षि नारद में, तो वेदों का प्रचार-प्रसार कहाँ से हो पाता? न होती भक्ति-भावना की पराकाष्ठा भक्त प्रह्लाद में, तो ईश्वरीय आस्था की सिद्धि कहाँ से हो पाती? न होता निःस्वार्थ भाव महर्षि दधीचि मे...
भीगी-भीगी धरती पर
कविता

भीगी-भीगी धरती पर

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** भीगी-भीगी धरती पर, पैरों के निशान बनाते हैं। बारिश की बूंदों संग, बचपन याद करते हैं। मन को भिगो कर गुन गुनाते हैं। जमीन के आँचल में जब बादल उतरे। सारे घाव धरा के भर जाते। मिट्टी की सोंधी खुशबू, साँसों में उतर जाती। मोती सी बूंदें गिरें, बदरा भी ढोल बजाये। झरते झरने मन को कितना रिझाये। नव-श्रंगार कर धरा ने उपवन सजाया। लताओं ने उमंगों का झूला लहराया। उमड़ घुमड़ बरसे बादल, बारिश की घटाएं। झूमते पेड़ों की डालें भी झुक-झुक जायें। भीगी-भीगी धरती पर हरियाली की चादर से, धरा को घूंघट उड़ायें। यह बारिश की घटाएं, देखे मेरा मयूर मन। बादलों की स्याही से कलम भिगोता। मेरा हर भाव नया सृजन हो जाता। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक...
अपूर्व प्रेम
कविता

अपूर्व प्रेम

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** रोज झुक जाता हूं मैं शिव के आगे मांग लेता हूं हर दुआ में तुम को। ना मांग पाऊं अगर कभी तुमको तो मांग लेता हूं हर खुशी तेरी। वजह ढूंढता हूं कुछ और लिखने की हर अल्फाज में मगर तुम नजर आ जाते हो। तेरे चेहरे की मासूम मुस्कुराहट को देखकर शिव सी समाधि मेरे हृदय तल को लग जाती है। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, ल...
सब चेहरों में उलझे हैं
कविता

सब चेहरों में उलझे हैं

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सब चेहरों में उलझे हैं, चरित्र गढ़ने के लिए क्षण पास नहीं. दर्पण हर घर में है, किंतु आत्मदर्शन के लिए अवकाश नहीं. शब्दों का श्रृंगार बहुत है, पर अंत‌स में सत्य का वास नहीं. ऊँची-ऊँची बातें चहुँओर, आचरण में उनका प्रकाश नहीं. शपथों की शैल-शृंखला, पर कर्मों का हिमालय नहीं. शोर बहुत है आँगन-आँगन, पर मन में शिवालय नहीं. भीड़ में यशोलिप्सा है, पर स्व से मिलन का प्रयास नहीं. जन-जन जग जीतने निकला, अंतर्मन पर विश्वास नहीं. संबंधों की गर्माहट खोई, अपनत्व का कोई आभास नहीं. मुस्कानों का व्यापार बहुत है, पर उर में प्रेम का वास नहीं. धन-दौलत की चकाचौंध में, मूल्यों का कोई सम्मान नहीं. जीवन की भाग-दौड़ में, जन की जन से अब पहचान नहीं. आओ पहले स्वयं को गढ़ लें, इससे बड़ा कोई विकास नहीं. ...
नेता जी के टारच
आंचलिक बोली, कविता

नेता जी के टारच

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) नेताजी अड़ गे, कहिथे हमर सरकार आय ले प्रदेश हर किलोमीटर भर आघु बढ़ गे, मय अकचका गंय, त फेर हमन काबर अपन जगेच म हवन, खिसकीच नहीं काबर हमर कुंदरा वाला भवन, कथे तैं नइ समझे जोजवा, तोर आंखी हेवय नवा खोजवा, हमर सरकार हर घर-घर गइच हवय, जेला जउन चीज के जरूरत रहिच वो हर चीज ल बांटिच हवय, फेर मय कहेंव तुंहर किलोमीटर भर वाला टारच कति कति बारे हवा, कति के अंधियार ल संघारे हवा? भाषण के उजियार ह नेताजी, सिरिफ पोस्टर म चकाचक दिखथे, हमर गाँव के नरवा-गरवा म, आज घलो अंधियारी रेंगथे, तुंहर बिकास ल कोन गरुवा हुदेनथे, कका,भतीजा,नोनी,बाबू, जम्मो झन अइसने बेहाल हवन, तुंहर आघु बढ़े के गोठ सुनके, हमन अपन जगे म थिरक आय हवन, बतावा त अइसन बिकास कति पाय हवन? परिचय :-  राजे...
पशुपतिनाथ
कविता

पशुपतिनाथ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** अद्भुत सौंदर्य उतरा था धरा पर एक रात हमने देखा, जहाँ मौन था किंतु शब्द बोल रहे थे, प्रकृति की सुन्दरता भिन्न-भिन्न रूप रंग में अपनी छटा बिखेर रही थी , तारे भी इस मनमोहक छवि को निहार रहे थे, शांत निस्सीम क्लांत रात गौशाला की रात थी !! तभी एक शब्द कानो में पड़ा गौ माता पुकार रही थीं, कह रही थीं सो जाओ बहुत रात हो चुकी है , उनकी आवाज सुन बत्तखों ने गान शुरू कर दिया , बाकी पक्षी भी सुर ताल में गीत गुनगुनाने लगे ! कुछ जीव सूकून की नींद सो रहे थे कुछ विचरण कर रहे थे, मंद-मंद मलय उनको सहला रही थी ! अचानक सूकून की तंत्रा भंग हुई, कोई जीव करूण गुहार लगा रहा था, वो दर्द में था उसके साथ बहुत से जीव जो असहाय थे नेत्रहीन थे, जो हड्डी हड्डी हो चुके थे वो भी जाग रहे थे ! उनकी तकलीफें...
लम्हा-लम्हा चुराना पड़ता है
कविता

लम्हा-लम्हा चुराना पड़ता है

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन कोई आसान सफर नहीं, काँटों पर चलकर मंजिलों को छूना पड़ता है। गिरते हैं, संभलते हैं, फिर बढ़कर, मेहनत से तकदीर बनती है। उम्मीद का दिया कभी बिना बुझे, अँधेरे में भी रौशनी बनकर, खुद चमकना पड़ता है। समय कभी साथ दे, कभी परीक्षा ले, किस्मत साथ ना दे। शिद्दत से जो जुड़कर, कभी न हारा, हर लम्हा एक लड़ाई है, हर साँस एक कहानी है। जो समय चुराकर मेहनत कर ले, उसी के नाम तारीखें और जवानी है। मंजिल पूछती है मेहनत का हिसाब, और सपने माँगते हैं वक्त की कुर्बानी। जो आज पसीना बहा दे मेहनत में, कल दुनिया उसी की जुबानी को गले लगाता है। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचन...
यमराज का ग़ुस्सा
कविता

यमराज का ग़ुस्सा

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** पहली वारिश और ये हाल हर ओर सुनाई पड़ रहा त्राहि माम बेचारा यमराज है परेशान लोग उसे बेवजह कर रहे बदनाम। सुनकर उसे भी गुस्सा आया जोर से भन्नाया-इज्जत का फालूदा बनाया। कहने लगा- ये सब विकास की माया है कमीशन जमकर खाया गया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई नदी, नाले, तालाबों पर अतिक्रमण अनियोजित शहरीकरण, गाँवों से पलायन आधुनिकता की आँधी और नित नव सुविधाओं का लोभ बढ़ता प्रदूषण, बिगड़ता मौसम चक्र ऊपर से स्वार्थ, लोभ की विकृति मानसिकता मरती संवेदनाएं, जहरीली होती भाव-भंगिमाएं यही है आज का मानव समाज। बदले में रोता है, खूब खोता है, जो बोता है, वही तो काटता है फिर भी जमकर अफसोस करता और घड़ियाली आँसू बहाता है, मगर खुद को बदलने का विचार भूलकर भी मन में नहीं लाता है, बस! दोष पर दोष सिर्फ औरों को ...
भीड़ का आदमी
कविता

भीड़ का आदमी

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** सबके साथ चलता हुआ आदमी धीरे-धीरे अपने साथ चलना भूल गया। वह हर बात पर सहमति में सिर हिलाता रहा, यह जाने बिना कि एक दिन उसका अपना सिर उसकी अपनी बात के लिए बचा ही नहीं। अब वह भीड़ में है, सुरक्षित भी, स्वीकार भी। बस, आदमी नहीं रहा। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज" शामिल हैं। रुचि : हिंदी एवं हरियाणवी भाषा में काव्य लेखन के साथ पटकथा लेखन, संवाद लेखन तथा स्वतंत्र फिल्म निर्देशन में भी रुचि रखते हैं। विशेष : आपकी रचनाओं के केंद्र में मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन, करुणा, पर्याव...
मन की मुराद
कविता

मन की मुराद

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन की मुरादों में बसता प्रेम का मधुर उजास, जिससे महक उठता जीवन, जैसे सावन की मिठास। परिवार के स्नेह से सजता हर आँगन का द्वार, अपनों के संग ही मिलता जीवन को सच्चा प्यार। माँ की ममता, पिता का आशीष अमृत बन जाता, संस्कारों का दीप हृदय में उजियारा फैलाता। देशभक्ति की ज्योति जले तो मन वीर बन जाए, मिट्टी की सौंधी खुशबू जीवन का गौरव कहलाए। तिरंगे की शान हेतु जो सपनों को अर्पित करते, वही राष्ट्र के इतिहास में स्वर्णिम अक्षर भरते। मन की मुराद यही कि हर नारी को मान मिले, उसके श्रम, साहस और सपनों को सम्मान मिले। नारी केवल कोमलता नहीं, शक्ति की पहचान, उसके चरणों से ही खिलता जीवन का मधुबन महान। मन चाहे ऊँचाइयों का हर शिखर सरल हो जाए, मेहनत के हर पथ पर सफलता मुस्कुराए। सत्य, प्रेम और करुणा से जीवन का श्रृंगार...
आज और कल
कविता

आज और कल

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** चौपालों की दशा आज और कल का चौपाल बडा सा बरगद का पेड़ पेड़ के चारों ओर बना बडा सा चबुतरा प्रतिदिन आबाद रहता था। प्रातः काल में बचपन खेलें दोपहरी में महतारी बतियातीं सन्ध्या लगतीं बैठक वृद्धों की। खूब खेल होते बरगद के फूल और पत्तों से। बनती रोटियां बरगद की छाया में ले हाथ में रोटी का टुकडा थामे हाथ मां का आंचल चबाता हैं रोटी का टुकडा। चौपाल पर चढकर गोल-गोल चक्कर काटता है लाला पर, अब हां पर अब न चौपाल हैं न बरगद का पेड न पिपल की पिपरी न नीम की ठंडी छाया। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचन...
जरा आगे बढ़कर तो देखो
कविता

जरा आगे बढ़कर तो देखो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** परंपराओं से आगे ज़रा बढ़कर तो देखो, पुरातन झंझावातों से थोड़ा उबरकर तो देखो। बदल दो उस व्यवस्था को, जो रोकती हो आगे बढ़ जाने से, समय के साथ कदमताल मिलाने से। हर व्यवस्था समय के साथ बदलती है, हर युग अपनी नई मान्यताएँ गढ़ती है। यदि जकड़े रहोगे बीते हुए विचारों में, तो जड़ता किसी की भी चेतना को ही कुतरती है। पगडंडियों और बैलगाड़ियों से निकलकर, हम रेल और हवाई सफ़र तक आ गए। जिन्होंने समय की चाल पहचानी, वे दुनिया भर में अपनी पहचान बना गए। जब उड़ने को नए पंख निकल आते हैं, घिसी-पिटी राहें फिर कहाँ सुहाते हैं। जब व्यवस्था किसी योग्य को ठुकरा देती है, तभी एक नया विचार जन्म लेता है, और संभावनाओं का नया आकाश देता है। न्यूटन, डार्विन, आइंस्टीन आज भी इसलिए याद हैं, क्योंकि उनके विचा...
ऐ बारिश …
कविता

ऐ बारिश …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* ऐ बारिशों तुम इंसाँ न बनो यूँ मत करो कि जब ज़मीं की साँसें प्यास से थमने लगें दरिया के दीदे सूख जाएँ पेड़ों की हथेलियाँ दुआ में उठकर बिखर जाएँ तब तुम कहीं समंदर की छतों पर गीत गाती फिरो। और फिर एक रोज़ अचानक इस कदर टूटकर बरसो कि बस्तियाँ डूब जाएँ घरोंदे टूट जाएँ ख़्वाब छूट जाएँ, और इंसाँ तुम्हें इंसाँ होने की दुहाई दें। यह हुनर तो इंसानों का है ज़रूरत के वक़्त साथ न देना और जब ज़रूरत गुज़र जाए तो एहसानों की बारिश लेकर बरसते हुए लौट आना। तुमने देखा तो होगा रिश्तों को सूखी धरती सा तड़पते हुए, तेरी बूंदों सा बिखरते हुए एक हाथ, एक साथ की आस में रिश्तों के आसमाँ को तकते हुए। इंसाँ आए भी तो ऐसे जैसे सैलाब हो लिए सूखे में बारिश का ख़ाब हो लिए साथ कम देते हैं हिसाब ज...
उसूल भूल गए…?
कविता

उसूल भूल गए…?

संजय एम तराणेकर इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** सादगी की राहों पर जो चुपचाप बढ़ गया, ईमान का दीप बनकर अँधेरों से लड़ गया। जिनके महलों में भी "सेवा" का ही शोर है, इस हिसाब में हर सुविधा का कोई छोर है। कुर्सी मिली तो जनता का ही नाम भूल गए, भत्तों की 'फेहरिस्त' में सारे उसूल भूल गए। एक जनाब पैदल चलकर मिसाल लिख रहे, बाकी तो लाल बत्ती में भी सवाल लिख रहे। रिश्वत की धूल से जब 'आईना' धुंधला हुआ, सच का चेहरा देख के हर चेहरा मिला हुआ। यहाँ गांधी के नाम पे भाषण तो रोज़ हो गए, गांधी के रास्ते मगर आज भी कम से हो गए। परिचय :- संजय मुरलीधर तराणेकर एक स्वतंत्र कवि, लेखक व फ़िल्म समीक्षक हैं। आप साधारण परिवार में जन्मे मूलतः मध्य प्रदेश के इन्दौर के निवासी हैं। आपका सन १९९० के दशक से लेखन में मन रमने लगा और ‘पत्र संपादक के नाम‘ से अपनी लेखन यात्रा ...
समय
कविता

समय

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** समय का कारवां बढता गया मैं पिछे रह गई क्योंकि समय के पंख लगे थे और... और मैं, थी पंख विहिन। समय को साधा नहीं अवसर के सन्धान से काश... समय पंख कटा होता मैं पिछे मुडकर नहीं देखतीं। जग के झंझावातों मैं कब, कैसे समय हाथ से निकल गया मैं समझ नहीं पाई समय के बढ़ते कारवां के इशारों को। मैं समय को झेल न पाई कोई कह भी रहा था मुझे चल दो, कारवां के साथ। पर मैं पकड़ न पाई समय को झुककर प्रणाम करता समय मेरे पास से गुजर गया गुजरते समय के प्रणाम का मैं उत्तर न दे पाई। देखो... हां देखो वह आज मुझे अतीत बन चिढा रहा है और...मै... समय की सीमा पर हाथ मलती रह गई। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रच...
कतरा-कतरा सागर का
कविता

कतरा-कतरा सागर का

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कतरा-कतरा सागर बनता, बूँद-बूँद में शक्ति समाई, छोटे-छोटे शुभ प्रयासों से जीवन ने मंज़िल पाई। हर अनुभव एक मोती बनकर मन की माला में जुड़ जाता, संघर्षों की हर छोटी लहर साहस का दीपक बन जाता। प्रेम, दया, करुणा के कतरे जब मानव-हृदय में खिलते हैं, सूखी धरती जैसे सावन पाकर हरियाली से मिलते हैं। ज्ञान की हर छोटी किरण अज्ञान का तम हर लेती है, सत्कर्मों की हर बूँद मिलकर जीवन-गंगा भर देती है। आओ हम भी कतरा-कतरा मानवता का सागर भर जाएँ, अपने शुभ कर्मों की लहरों से जग में प्रेम-सुगंध फैलाएँ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथ...
आत्म-मंथन
कविता

आत्म-मंथन

आरुषि कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं-मैं में नहीं, मुझसे हूँ। हिम्मत नहीं है मुझमें फिर भी कहूँगी। समझ नहीं है मुझमें फिर भी लिखूँगी। अक्सर लोग निकाल देते हैं मेरे विचार को दिमाग से क्योंकि मैं-मैं में नहीं मुझसे हूँ। चाहती तो हूँ दुनिया से दूर रहना फिर सोचती हूँ मैं ही क्यों? क्यों कोई और नहीं? बस ऐसी ही बेतुकी-भरी ख़्वाहिशों में उलझी रहती हूँ। फिर मायूस होकर, गुमसुम-सी, मैं ख़ुद को ही अपने में समेट लेती हूँ। परिचय :- आरुषि शिक्षा : १२वीं कक्षा की छात्रा राजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गाहलियां निवासी : कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को ...
जन्मदिवस
कविता

जन्मदिवस

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बढ़ता चला जा रहा हूँ के करीब, शनैः शनैः,अनवरत- आगे बढ़ने की प्रक्रिया जारी है सतत... दिन-ब-दिन कुछ खोते हुए, सबकी बधाइयाँ लेते हुए, काफी समय बाद जब देखता हूं पीछे मुड़कर, लगता है जैसे बचपन से बुढ़ापे में आ गया हूँ उड़कर। खेलकूद, शिक्षा, प्रेयसी, पत्नी, पुत्र और पुत्री- जीवन चलता रहा मानो एक ही सूत्र में बँधी कड़ी। मौके आए कई अच्छे पद के, पर आड़े आईं सीमाएँ मेरी औकात और सामाजिक स्थिति की- वही सरहदें जो हर कदम पर मुझे रोकती रहीं, तोड़ती रहीं। भरोसा दिलाने वाले अपने एक-एक कर मुकर गए, अपनी जिम्मेदारियों का बोझ मुझ पर छोड़कर उबर गए। फिर शुरू हुआ दौर संघर्ष का- चंद सिक्के कमाने का, और शिक्षा के विमर्श में खुद को बचाए रखने का। राहें गुज़रीं कठिन परिश्रम से, मैं दूर होता गया अप...
नदी किनारे
कविता

नदी किनारे

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कहीं कोई मिलता है बिछुड जाने के लिए क्यों हुक सी उठती है, फिर मिलने के लिए। तमाम शब खोया रहा खयाल में उसके जैसें चांद खो जाता है घटाओं में जैसें न जाने कब तक रोती रही आंखें बेदर्द हाल मेरा देख, दिवारे भी शिकवे करने लगी उसके कहीं कोई बीता लम्हा, बीता अरसा सावन बीता, भादौ बीता चंचल किरणों संग पुनम बीती अंधियारी बीती रिती रिती। हर कोई था यहां सबका अपना नदी किनारे मैं ही था, सिर्फ प्यासा, प्यासा। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियो...
हक और शक
कविता

हक और शक

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** एक धोबी की आवाज़ पर बिना जाँच पड़ताल घर से निकाला माता सीता को मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने न जाने कैसी ये मर्यादा थी राम की या फिर था पुरुषोचित मन का शक.... भरे दरबार में स्वयंबर की आड़ में परम ज्ञानी, अति बलशाली प्रतापी भीष्म ने तलवार की नोक पर अम्बे, अम्बिका और अम्बालिका तीनों को इच्छा के विरुद्ध उठा लिया.... शायद... मर्यादा की छाँव में रहा हो पुरुषोचित हक..... सभी परिवार प्रमुखों के समक्ष धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर ने द्यूत क्रीड़ा में स्व भार्या द्रोपदी को बिना उसकी मर्जी जाने लगा दिया दाव पर मन कहाँ समझ पाया कि स्वांग था मर्यादा का या फिर पांडवों का पुरुषोचित हक..... कौरवों के राज दरबार में नीति कुशल विदुर द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म जैसे अजेय व्यक्तित्वों के साम...
मन का कुरुक्षेत्र
कविता

मन का कुरुक्षेत्र

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन के भीतर रोज ही, छिड़ता नया संग्राम। अर्जुन-सा संशय खड़ा, कृष्ण बने सतनाम॥ लोभ-मोह की सेनियाँ, घेरे चारों धाम। विवेक धनुष जब तान दे, मिट जाए अंधियाम॥ क्रोध दुर्योधन बन गया, अहंकारी बलवान। प्रेम-सुदर्शन घूमकर, करे उसे निष्प्राण॥ ईर्ष्या की गांधारियाँ, बाँधे मन के नेत्र। सत्य सूर्य जब उग पड़े, जगमग हो कुरुक्षेत्र॥ कामनाओं के चक्र में, उलझे जीवन-तंतु। संयम बन अभिमन्यु जब, तोड़े सारे बंधु॥ धैर्य भीष्म-सा अटल हो, श्रद्धा बने कवच। विपदा कितनी भी बढ़े, न डिगे मन का रथ॥ सद्गुण पांडव बन खड़े, दुर्गुण कौरव जान। जीत उसी की अंत में, जो रखे धर्म विधानl मन का कुरुक्षेत्र है, जीवन का विस्तार। जो खुद को ही जीत ले, उसका हो उद्धार॥ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध...
इंसान में भगवान समाए हैं
कविता

इंसान में भगवान समाए हैं

डॉ. रमेशचंद्र मालवीय इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हम मंदिर-मंदिर में भगवान ढूंढते हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। हम इधर-उधर ही भटकते रहते हैं अपनी ही उलझन में अटकते रहते हैं आशा और निराशाओं के झूले पर हम हर दिन-रात हीलटकते रहते हैं हम तीर्थ और धामों में घूम आए हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। हम नहीं जानते कि भगवान कहां है हम नहीं जानते उनकी पहचान कहां है कहते हैं कि वो कण-कण में समाया है लेकिन उनकी धरती-आसमान कहां है हम उनको मूर्तियों में सजाए हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। आखिर भगवान को हम कब पहचानेंगे वो हृदय में बसे है ऐसा हम कब मानेंगे हर इंसान के हृदय में भगवान विराजे हैं इंसान में है भगवान उसे हम कब जानेंगे हम पत्थर में ही भगवान को पाए हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। परिचय :- डॉ. रमेशचंद्र मालवीय निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषण...
मरुधरा रा मान-धणी
कविता

मरुधरा रा मान-धणी

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** (राजस्थानी भाषा) जेता-कूंपा री तलवार घणै, थर-थर कांपै बैरी सारा, मालदेव रा दाह्या-बायां, गूंज्या रण में जकां रा नारा। मारवाड़ री माटी रा वे, मान-बढावण हार, रण में जुंझार बण'र लाड्या, धरम रा राखां धार। चित्तौड़गढ़ रो ऊंचो धज, गौर-बादल री ओळखांण, रतन सिंह रा अंगरक्षक, राख्यो कुल-मर्यादा रो मांण। केसरिया बाना पेर'र वे, रण-खेत में कीनो प्रवेश, छाती ठोक'र मिटा दियो, दुश्मन रो अळगौ भेष। उदय सिंह रा ओजस्वी वे, जयमल-फत्ता अणखिला, चित्तौड़ री प्राचीर माथै, सावळ बण'र उभा खिला। धड़ लड्या अर शीश कड्या, पर पग पाचो नी दियो, वीरता री ओ मूंछ्याळी गाथा, इतिहास माथै लिख दियो। महोबा रा आन-बाण, आल्हा-ऊदल रो प्रताप, रण-भेरी बाज्या पछै, दुश्मन पावै घणो संताप। पृथ्वीराज सूं भिड्या रण में, ओ तो अजब खेल दिखाय...