होली के रंग मस्ती के संग
डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल'
मंडला (मध्य प्रदेश)
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मौसम हुआ है फागुनी,
फागों पर छाया शवाब।
हरम मन में सजने लगे,
फिर रंग-बिरंगे ख्वाब।
हर कली को है चूमता,
चंचल भ्रर सदाबहार।
फिजाओं में है घुल रही,
देखो अब बसंती बयार।
गली-गली में हो रही,
अब रंगों की बरसात।
रंग-बिरंगे से दिन हुए,
हुई मस्ती वाली रात।
बहके बहके से कदम,
हो गई नशीली चाल।
भंग की मस्ती में अब,
तन मन हुए हैं बेहाल।
अंगारों सा दहक उठा,
गोरी का तन है आज।
सुध बुध है बिसराय के,
भूल गई वो सब काज।
भींग गई लहंगा चोली,
भींग गई चुनरी आज।
गोरी का घूंघट सरका,
तज करके सारी लाज।
मुखड़ों पर हैं सज रहे,
अब इंद्र धनुषी ये रंग।
हुलियारी टोली निकली,
फिर से मस्ती के संग।
परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल'
निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश)
सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी से...













