आँच अहसास की
छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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सुलग रहे मोरे अंग अंग सजना
तड़पूं अकेली मनवा चैन न पाये
बसंत बयार बहे, मौसम रंगीला
तरसे जिया, काहे न पिया आये
कूके कोयली, बोले पपीहा
विरह-अगन मोरा जिया जराये
विरह-अगन से जियरा धधके
ननदिया जब शृंगार सजाये
फूलवा महके, पाखी चहके
देवरानी, जेठानी छेडछाड़ जाये
मन ही मन मैं तरसूं घनी जो
लहक लहक भाभी रंग उड़ाये
देवर होले होले करे इशारे
कैसे बचूँ, मोहे समझ न आये
आय पिया मोहे उर से लगाओ
रातें सर्दी की खाली न जाये
चैन मिले जो दीदार करूँ मैं
लंबी रतिया मोहे खूब सताये
टेर उठे जो माधव मुरलिया की
चीर, चीर जाये करजेवा मोरा
झंकार उठे पग की पायलिया
नयन तन्हा, छलक-छलक जाये
सातों सुर हँस सजाये पवनिया
इंद्रधनुष रंग नभ में सरसाये
इंतज़ार में गौरी पूछे दरवजे से
मनवा सरसे,कब पिया आये
आँच अहसास ...




















