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कविता

मेरे पिता
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मेरे पिता

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** मेरे लिए आन बान, शान है पिता धरती का साक्षात भगवान है पिता..!! सब रिश्तों का एक मिसाल है पिता अपनों के लिए बनते ढाल है पिता..!! छाले हो पांव में नहीं दिखाते है पिता कंधे पर बैठाकर भी घुमाते है पिता..!! पैरो पर खड़ा होना सिखाते है पिता सही, गलत का राह दिखाते है पिता..!! जिम्मेदारियों का बोझ उठाते है पिता गम सहकर खुद मुसकुराते है पिता..!! अपनो कि हर चाह पूरी करते है पिता दो में से दो रोटी देना जानते है पिता..!! भूखा रहकर बच्चों को खिलाते है पिता जिंदगी जीना बच्चों को सिखाते है पिता..!! डगमगाते कश्ती का खेवनहार है पिता बच्चों के लिए मानो पूरा संसार है पिता..!!! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा य...
डिजिटल रिश्ते
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डिजिटल रिश्ते

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सोशल मीडिया पर आकर रख जाते दिल का हाल, पर जब कोई पूछे रिश्तों का सच, तो चुप हो जाते तत्काल। डिजिटल रिश्तेदार हजारों-लाखों में मिल जाएंगे, मगर अपने ही घर के रिश्ते अक्सर भूखे रह जाएंगे। मन हुआ तो स्टेटस देखा, लाइक किया, इमोजी भेज दिया, औपचारिकता की चादर ओढ़ स्नेह का कर्तव्य पूरा कर लिया। लगाव कब का खत्म हो चुका, बाकी नहीं बचा एक प्रतिशत, भावनाएं अब फाइलों जैसी, रिश्ते बन बैठे हैं डेटा-संचित। घर में कोई शुभ आयोजन हो, निमंत्रण जाए हर द्वार, कुछ लोग बेमन से आएंगे, निभाने भर को व्यवहार। खाया-पीया, सलाहें दीं, व्यवस्था पर टिप्पणी सुनाई, फिर यह कहकर चल देंगे- "घर में बहुत व्यस्तता भाई।" और जो कल तक निखट्टू थे, बदनाम थे जिनके नाम, वही शायद सबसे ज्यादा बताये घर में है अपना काम। रि...
पतझड़ जरूरी हैं
कविता

पतझड़ जरूरी हैं

प्रतिभा दुबे "आशी" ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** नई शाख़ों को आने के लिए, बसंत की बहार में नवीन, कोंपलों को खिलने के लिए...।। पतझड़ अंत नहीं मुक्ति है नवीन संचार के माध्यम से, प्रकृति की संरचना के फिर जीवंत हो उठने के लिए...।। पतझड़ भी ज़रूरी है फिर से बसंत आने के लिए क्योंकि चक्र यही चलता रहेगा मुरझाए मन को खिलाने के लिए...।। रौशनी जरूरी है... अंधकार को मिटाने के लिए जीवन यह क्षण भंगुर मात्र संतुष्टि जरूरी है यहाँ से जाने के लिए...।। तलाश करते रहे सुकून हम तलाशते रहे खुशियाँ मुस्कुराने के लिए ये पतझड़ एहसास दिलाता है एक जिंदगी काफी है मुस्कुराने के लिए...।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे "आशी" (स्वतंत्र लेखिका) निवासी : ग्वालियर (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना...
खुद अपना हॉलमार्क बनिए
कविता

खुद अपना हॉलमार्क बनिए

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** खुद अपना हॉलमार्क बनिए, पहचान उधार न लीजिए, सत्य, श्रम और संस्कारों से जीवन का श्रृंगार कीजिए। भीड़ के पीछे चलने से व्यक्तित्व नहीं निखरता है, अपने कर्मों की चमक से ही हर चेहरा सँवरता है। सोने की शुद्धता जैसी हो मन की निर्मलता आपकी, ऐसी छाप छोड़ जाइए कि मिसाल बने हस्ती आपकी। आंधियाँ लाख आएँ पथ में, धैर्य कभी मत खोइए, अपने आदर्शों की ज्योति से हर अंधियारा धोइए। खुद अपना हॉलमार्क बनिए, यही सफलता का सार, चरित्र की खुशबू से महके जीवन का हर द्वार। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन का कार्य शुरू...
सपने
कविता

सपने

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मैंने कभी संजोए सपने सपनों मे खो, खो कर कई महल ढहाए मैंने सपनों में बना, बना कर। आया कोइ दूर गगन से तारागणों का समूह कर गया आंगन को दिप्त मेरे समा गया पुनः सपनों में अंजली में पुन्ज उलिचा मैंने सपनों के दोने से गति प्रकाश की देखी मैंने कोसों, मीलों थी जो दूर मन बवरा उड, उड जाता गगन क्षितिज से दूर। ये पर्वतों की हरियाली ये वृक्षों की छाया शाख, शाख पर क्यों पुकारें पी, पी पपिहा गान। सपने में जो मन्जर देखा देखा स्वयं को चहकते हुए आंख खुली तो न था पर्वत ना ही उलिजा गया कोइ पुन्ज। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के ल...
योग करो
कविता

योग करो

आशा जाकड़ 'आस' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** योग करो, योग करो, तन को रोग मुक्त करो। प्रातः उठ योगा करो, सारी बेचैनी दूर करो।। व्यायाम करने से मिलती है ऊर्जा स्फूर्ति। आध्यात्मिक, मानसिक व शारीरिक शक्ति। योग करने से रहता स्वस्थ तन-मन प्रसन्न। मन में अच्छे विचारों का होता है आगमन।। शुद्ध वायु मिले, प्रातः प्रतिदिन भ्रमण करो। पेड़ पौधे लगाओ, ऑक्सीजन प्राप्त करो।। योग हमारे जीवन का अच्छा सुलभ व्यायाम। प्रतिदिन करो अनुलोम, विलोम व प्राणायाम।। जीवन में यदि करोगे प्रतिदिन नियमित योग। कभी समीप न फटकेगा कोई चिंता या रोग।। परिचय :- आशा जाकड़ (शिक्षिका, साहित्यकार एवं समाजसेविका) शिक्षा - एम.ए. हिन्दी समाज शास्त्र बी.एड. जन्म स्थान - शिकोहाबाद (आगरा) निवासी - इंदौर (मध्य प्रदेश) व्यवसाय - सेन्ट पाल हा. सेकेंडरी स्कूल इन्दौर से सेवानिवृत्त शिक्षिका प्रकाशन कृति...
बहिनी
आंचलिक बोली, कविता

बहिनी

कामता साहू भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) सगा बरोबर दु दिन बर, मोर अंगना मा पाँव मड़ाथस।। दुख पीरा ल बिसरा के अपन, मया के गोठ गोठियाथस।। तोर आये ले घर दुवार हा, होरी, देवारी कस लागथे।। जइसे बसंत के आये ले, चिरई-चुरगुन मन चहकथे।। परिचय :- कामता साहू (शिक्षक) निवासी : भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) सम्प्रति : शिक्षक घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 60360 पर सूचित अवश्य करें …...
पिता का फर्ज
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पिता का फर्ज

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** पिता हूँ, पिता का दर्द जानता हूँ ! गम छिपाकर मुसकुराने का मर्म जानता हूँ..!! छाले हो पांव में कोई गम नहीं ! कंधे पर बैठाकर दुनिया घुमाना जानता हूँ..!! ना दे कोई मुझे नसीहत जीने का ! अच्छी जिंदगी जीने का हर राज जानता हूँ..!! जिम्मेदारियों ने जकड़ लिए है पर मेरे ! वरना ख्वाबों के शहर में उड़ना जानता हूँ..!! अपनों की खुशी और अपनों का प्यार ! लक्ष्य है पिता की जिंदगी का मैं भी जानता हूँ..!! जी रहे है हम भी बेहतर जिंदगी ! पर पिता हूँ, पिता का हर फर्ज जानता हूँ…!! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं ...
गुरुजनों की याद आती वाणी
कविता

गुरुजनों की याद आती वाणी

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** बचपन में पढ़ते वक्त, गुरूजी रहते रोज साथ कहते थे, पढोगे मन से, जीवनभर रहेगी बातें याद।। गुरुजी के मुखारबिंद से निकलते है ज्ञान के अनमोल वचन, ज्ञान की घुंटी पिलाकर सुनते रहे गुरूवचन बचपन के दिन याद करें याद आते अनमोल वचन, बच्चो सदैव याद रखना अनमोल महानवचन, गुरुजन के आजीवन अनमोलवचन ये है सच्चे धन, आते है याद, कहते रहे गुरुजी, भूलना कभी नहीं ज्ञान की मूलबात, हमेशा संग रखना अनमोल बात अटके जब जीवन में जब कोई काज करना लेना गुरुजी की बातें दिल से याद, विपत्ति में गुरुदेव की हो न हो आती है कही बात की याद, कहते सदैव गुरुजी, माता पिता, गुरुजनों परिवारजनों कुटुम्बजनों, और आत्मीयजनों से सदैव बनाये रखो प्रेम सदभाव व्यवहार और रखना सदैव आपसी अपनापन, स्नेहप्यार, मुलाकात बनाये रखो ऐसे मजबूत रिश्ते, अनुभव...
ओलम (अनन्त प्रेम)
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ओलम (अनन्त प्रेम)

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** जी रहा हूँ जीवन बड़ी ही शिद्दत से क्या मेरी पीड़ा का कारण बन तुम मुझे शून्य करोगे ? हारा तो कभी था ही नहीं मैं पर क्या छेड़ मेरे जज्बातों की तरंगों को मुझे तुम अधूरा करोगे? मानता हूं तुम्हें भेजा है उस खुदा ने स्वयं मेरे पास क्या छेड़ प्रेम का राग मुझे हीरा करोगे ? परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी मे...
मनुष्य होने का अर्थ
कविता

मनुष्य होने का अर्थ

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** मनुष्य होना केवल दो पैरों पर चलना नहीं है, न ही ऊँची इमारतें बनाना, समुद्रों को मापना या आकाश को छू लेना। मनुष्य होना एक भावना है, एक उत्तरदायित्व है, एक सतत संघर्ष है अपने भीतर की रोशनी को बचाए रखने का। जब पृथ्वी पर पहला मनुष्य आया होगा, तब उसके पास न धन था, न सत्ता, न विज्ञान। उसके पास केवल जीवन था और जीवन के प्रति एक आश्चर्य था। वह नदी को देखकर मुग्ध होता था, पेड़ों को देखकर प्रसन्न होता था, और आकाश को देखकर अपने छोटे होने का एहसास करता था। समय बीतता गया सभ्यताएँ बनीं, नगर बने, राज्य बने, और फिर महत्त्वाकांक्षाएँ भी। मनुष्य ने ज्ञान अर्जित किया, नई खोजें कीं, असंभव को संभव किया। उसने पर्वतों को काटकर रास्ते बनाए, नदियों पर पुल बनाए, और अंतरिक्ष तक पह...
पत्थर और माटी
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पत्थर और माटी

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* पत्थर गिरा माटी पर माटी हो गई चूर पत्थर हुआ घमंड से भरपूर बोला अकड़ कर, देखा मेरा बल तुममें-मुझमें हैं कितना अंतर। माटी बोली सच कहा तुमनें पत्थर हैं बड़ा मुझमें और तुममें अंतर, मैं माटी तुम हो पत्थर, मैं देती जीवन जड़-चेतन कों, तुमसे मिलती केवल ढोकर, मैं खेतों में फसल ऊगाती, बागों में फू़ल महकाती, हरी-भरी धरती करती। पेड़-पौधे , फल-फूल, धरती का हर प्राणी, तुमसे होता आहत, रह जाते सब मन मारकर तुम देते केवल ठोकर, तुममें-मुझमें है अंतर मैं देती जीवन, तुम देते केवल ठोकर।। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मानि...
मुखौटे
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मुखौटे

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** दर्द की दरारें चेहरे पर उभरने लगी जो इस कदर , होठों की सलवटें और मुखौटे दिखने लगे हर तरफ। मुफलिसी की निशानी पैबंद लिबास न होते अगर, मासूम की मासूमियत को मौसम की होती नहीं खबर। बाजारों की भीड़ में खोजते रहे वो आईना उम्र भर, बिंब सच के नकार, मुखौटे ही बदलते रहे मगर। पद मद शान ओ संपत्ति लिए भटकते रहे सदा दर ब दर, मिथ्या स्वार्थ के पसीने ही मुखौटे से रिसते रहे तर ब तर। कोई भूख से लड़ता रहा कोई उठ गया नींद से हार कर, मुखौटों के पीछे कोई ख्वाब की होती नही नजर। सब अपने हिस्से का अंधेरा ढो रहे हर डगर, यहां मुखौटों में उजाले की किसको कहां खबर। परिचय :- सूर्यपाल नामदेव "चंचल" शिक्षा : एम ए अर्थशास्त्र , एम बी ए ( रिटेल मैनेजमेंट) व्यवसाय : उद्यमी, प्रबंधन सलाहकार, कवि, लेखक, वक्ता निवासी : जयपुर (राज...
घटा सावन की
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घटा सावन की

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** पहले सावन की सन्ध्या आंचल पसार रही रजनी गन्धा वृक्षों के झुरमुट में खग वृन्द बोलते पी को पुकारते मधुर स्वर में गाते। दामिनी दमक रही चम्पई सन्ध्या हैं पहले सावन के घिर आए मेघ हैं बह रही मन्द पवन जैसें कुछ गाती नीर कण बौछारें सिहर-सिहर जाती। कन्दुभी रंग सजा मेघों के भाल पर गा रहे, नाच रहे मयुर मधुर ताल पर तरु तड़ाग पल्लवित हैं चम्पई शाम आ रहीं पहले सावन की घटा बार-बार छा रही। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरक...
पिता होते हैं महान
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पिता होते हैं महान

आशा जाकड़ 'आस' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** समुद्र से गम्भीर हिम से अटल दुःखों में होते कभी न विचल ऊपर से कठोर अन्दर  कोमल हृदय से विशाल, मन के सरल सिखाते त्याग बलिदान। पिता होते हैं महान।। माँ धरा तो पिता आकाश बच्चों का है आत्मविश्वास मांँ दीपक तो पिता प्रकाश माँ जीवन पिता देता स्वाँस अनेक गुणों की खान। पिता होते हैं महान।। पिता मुख से बोलते नहीं मन की बात जान लेते हैं। बच्चों की हर ख्वाहिश को पूरा करने की ठान लेते हैं देते हैं  अपूर्व  ज्ञान। पिता होते हैं महान।। पिता होते हैं वेद-पुराण करते संस्कार-निर्माण हर समस्या का समाधान संग पिता, साथ भगवान ईश्वर का हैं वरदान। पिता होते हैं  महान।। बच्चों के सुख के लिए चलते रहते अथक पाँव हर मुश्किल आसाँ करते नहीं देखते धूप और छाँव करते श्रम का अनुदान। पिता तुम हो महान।। पिता गाइड है और रक्षक आल...
कमियों सहित स्वीकार्यता
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कमियों सहित स्वीकार्यता

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** पूर्ण कहाँ इस जगत में, मानव का आकार। गुण-अवगुण के संग बना, जीवन का संसार॥ अस्सी गुण हों यदि किसी, बीस रहें कमजोर। उन कमियों को मानकर, बढ़ता प्रेम का दौर॥ चालीस गुण यदि मिलें, साठ रहें अनजान। फिर भी उसमें ढूँढ़िए, मानवता की शान॥ दोष न गिनते रहिए सदा, गुण पर दीजै ध्यान। कमियों संग जो अपनाए, वही बड़ा इंसान॥ चाँद स्वयं निष्कलंक कब, दाग लिए मुस्काय। फिर मानव से पूर्णता, क्यों जग आशा लगाए॥ रिश्तों की मधुरता तभी, रहती सदा अटूट। जब कमियों को छोड़कर, गुणों से जाएँ छूट॥ स्वीकारों के फूल से, महके हर व्यवहार। त्रुटियाँ भी प्रिय लगें, जब हो सच्चा प्यार॥ शिव ही केवल पूर्ण हैं, शेष सभी अपूर्ण। कमियों सहित जो मान ले, उसका जीवन पूर्ण॥ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निव...
मानवता बनाम युद्ध
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मानवता बनाम युद्ध

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** मानवता और युद्ध एक दूसरे के विपरीत शब्द है मानवता युद्ध में समाप्त हो जाती है। युद्ध में लाभ नहीं हानि ही हानि है प्रकृति की हानि जनहानि आर्थिक हानि मानवता की हानि। युद्ध किसी विषय का समाधान नहीं, शांति और संवाद युद्ध का परिणाम है, मानसिक अशांति, डर, द्वेष और जन हानि यही युद्ध के परिणाम है। बम, गोला, बारूद, मिसाइल, यह कोई शांति के प्रतिक नहीं, प्रेम भाईचारा आपसी सौहार्द देश की उन्नति के प्रतीक है नहीं युद्ध। युद्ध से आर्थिक उन्नति पीछे धकेल जाती है जिससे गरीबी भुखमरी उन्नति व्यापार सब चीज पीछे रह जाती है। आदमी जीने को मजबूत हो जाता है। गति प्रगति स्थित हो जाती है। मानवता युद्ध का परिणाम नहीं प्रेम का विध्वंस है। मानवता का अंत है। प्रगति मै अवरोध है। आर्थिक उन्नति का...
२ जून की रोटी
कविता

२ जून की रोटी

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** मैं बेच देता हूं अपना ईमान, अपना सत्य, नैतिकता और खुद को भी...!! मैं पशु, पक्षी, जानवर नहीं, इंसान हूं, केवल इंसान ! दो जून की रोटी के खातिर ?? नीचता कि हद तक गिरकर... मैं बेच देता हूं, अपना अस्तित्व।। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 6036...
आपबीती
कविता

आपबीती

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** रिश्ते मजबूर है हमसे, इसीलिए सब दूर है हमसे, जो नादानियां नहीं की हमने कहा उसका सुरूर है हमसे, पलकों पर बिठाये, खिलाये, पिलाये, वो दिखाते गुरूर है हमसे, अन्न की कमी का अहसास होने नहीं दिया कभी हमने, हमी को कहते मगरूर हमसे, कांधे पर बिठाया, पढ़ाया लिखाया, अब उन्हें शिकवा भरपूर है हमसे, दिल में बसे रहे रात दिन जो पता नहीं क्यों दूर है हमसे, जा ले ले घर जमीं और खुशियां अब बता भी जा क्या फितूर है हमसे, वारने ही वाला था सब कुछ हर सितम ढाना मंजूर है हमसे, आपबीती सुनाऊं और कितना कहा सबने यही दस्तूर है हमसे। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया...
कब तक बली की वेदी पर चढती रहेंगी बेटियाँ
कविता

कब तक बली की वेदी पर चढती रहेंगी बेटियाँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** सजती है नुमाइश समाज मे बेटियों की और लगती है बोलियां बेटों की, अखिर कब तक बेटियों को सिसकते मौत को गले लगाता देखते रहेंगे उनके परिजन? माता-पिता बन दुलार दिया बेटे-बेटी को बराबर का, फिर क्यूँ घर आई बेटी की बलि चढाते है दहेज और नफरत की बेदी पर? धधक रही हैं घरों और रसोई में ना जाने कितनी बेटियाँ, कब तक जकडी रहेंगी अत्याचार और खौफ की ये बेड़ियाँ? क्यूँ तौलते हैं उस दौलत के तराजू पर बेटियों को, जहां चंद सिक्कों के लिए बेच देते हैं लोग सम्मान को। लाजो से पली राजकुमारी एक दिन भेंट चढ़ जाती हैं दहेज के दानव पर और राख हो जाती हैं अग्नि में एक तिनके की तरह। बेटी कोई वस्तु नहीं उनका कोई मोल नहीं इतिहास भरे हैं इनकी करुणा और वीरता की सच्ची कथाओं से। अब तो उठो समाज के पहरेदारों...
स्वप्न सुख
कविता

स्वप्न सुख

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** सपनों का अपना अहसास होता है इसीलिए ये असल से खास होता है रोकेगा कौन दिल को झूमने से रोकेगा कौन लबो के चूमने से हवायें चले या ना चले मगर मादकता का मन अहसास होता है कोई मौसम नहीं कलियाँ फूटने का कोई वक्त नहीं कोयल कूकने का जिस वक्त भी मन करे अपना सुर संगीत का आगाज होता है बिन मौसम बादल गरजते हैं गौरी खड़ी सामने वे बरसते हैं भिगो जाते प्रिये की कोमल काया संग भीगें, अंदाज अलग होता है मिल लेते हैं बेझिझक सपनों में मन खोया रहे प्रीत के सपनों में वास्तव में क्या होगा, कौन जाने यहां मन चाहा मिलाप होता है सुख ही सुख, कहां दुख सपनों में ना अलगाव की चर्चा है अपनो में हकीकत में नहीं, सपनों में ही सही अरमान पूराने का अहसास होता है परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, द...
पिता होना आसान नहीं होता
कविता

पिता होना आसान नहीं होता

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** गगन चूमती इमारत का नीव का पत्थर होना आसान नहीं होता।। कि अपने मुस्कुराते अधरों से, हलाहल पीना आसान नहीं होता।। रात को शीतल चांद,दिन को सूरज सा तपना आसान नहीं होता। कि इस मायावी जग में, निस्वार्थ प्रेम करना आसान नहीं होता ।। अपने खून पसीने से एक कोरी किताब लिखना आसान नहीं होता।। कि साध कर भागते समय को, गीता बाँचना आसान नहीं होता।। निर्मल कोमल हृदय को सक्ता का, आवरण ओढ़ना आसान नहीं होता। कि घर बाहर की जिम्मेदारियों को, कांधे ढोना आसान नहीं होता।। नर्म नर्म कलियों को सहेज, ओक में भरना आसान नहीं होता। कि लड़खड़ाते कदमों को, एक सही दिशा देना आसान नहीं होता।। जीवन के खेल में, जीतकर भी हारना आसान नहीं होता। बैठ कर जमीन पर दिन में तारे देखना आसान नहीं होता।। फटे हाल घिसे जूते लिए, कड़ी धूप में...
मनुष्य बचा रहे
कविता

मनुष्य बचा रहे

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** युद्धों से नहीं, प्रेम से चलती है पृथ्वी। तलवारें सीमाएँ बना सकती हैं, घर नहीं। घृणा भीड़ जुटा सकती है, समाज नहीं। मैंने देखा है- एक सैनिक की माँ सीमा के दोनों ओर एक जैसी रोती है। एक बच्चे का भय किसी धर्म का नहीं होता। एक भूखे मनुष्य की रोटी किसी राष्ट्र की नहीं होती। फिर हम क्यों नामों, झंडों और दीवारों में मनुष्य को बाँटते हैं? समय की सबसे बड़ी आवश्यकता नई विजय नहीं, मनुष्य का बचा रहना है। क्योंकि यदि प्रेम हार गया, तो जीतकर भी हम हार जाएँगे। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज"...
सपन सलोने
कविता

सपन सलोने

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** सपन सलोने लगे सुहाने, मौसम प्रीति पुनीत। राग वसंती गूँज रहा है, गाती कोयल गीत।। कोमल कलियाँ चिंता करतीं, खिलता बेला फूल। धवल मनोहर छवि भी न्यारी। चुभे न कोई शूल।। भ्रमर लालची मँडराता है, माली भी भयभीत। बाँहें फैलाए नभ आया, धरती है बेचैन। चली झूम मुस्काती पुरवा, मिले किसी से नैन।। प्रणय सितारे हर्षित होते, आया है मनमीत। प्यासे अधरों प्रीति सजी है, प्रेम सुरभि का ताज। महक रही है फुलवारी भी, मदमाता ऋतुराज ।। सागर से संगम को व्याकुल, मिले नदी को जीत। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृ...
वैभव
कविता

वैभव

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** यह विचित्र-सा लाड़ला, वैभव किया कमाल। खेल-जगत में छा गया, आज बिहारी लाल।। माता गृहिणी आरती, पितु संजीव सुजान। मोतीपुर से यह निकल, बना बिहारी शान।। वैभव कम वय में किया, जादू-टोना यार। छक्का-चौका मार कर, चौंकाया संसार।। दिग्गज सब हैरान हैं, वैभव यह अवतार। गेंदबाज जितने बड़े, डाले हैं हथियार।। सूर्यवंश का यश खिला, छाया देश-विदेश। वैभव एक मिसाल को, किया जगत में पेश।। गाँव-गली में खेलते, पाया श्रेष्ठ मुकाम। विश्वपटल पर गूँजता, वैभव का यश-नाम।। कीर्तिमान वैभव गढ़ा, रचा नया इतिहास। चकित आज संसार है, यह बालक है खास।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (पी.एन.बी.) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्व...