नीम का पेड़
छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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हर साल की तरह
नवोदित हुई एक नई सुबह
ले आई जीवन का
एक नव वर्ष
नव चिंतन, नव मनन
ले नव आशाओं का दीप....
जलते ही आस-दीप
मानो सिमट गये हों
जीवन के अंधेरे
मगर
ये प्रकाश
उघाड़ गया जीवन के
प्रत्यक्ष-परोक्ष
तन, मन पर लगे
आघाती घावों को
एक पल खुशी हुई
अतीत के सुनहरे पल देख
तो कभी
व्यथित हुआ मन
छद्म हंसी के दुशाले के
आवरण में छिपे
रेशा-रेशा,
रिसते दर्दीले घावों को....
मगर
मन ने आज जाना
सच्चा साथी है कौन..?
वो है मेरा हम उम्र
दालान में खड़ा नीम का पेड़
जिसने पिया है छिप-छिप
मेरे तिक्त आँसूओ का जल
और.. बदलते कैलेंडर में भी
मुस्कुराता रहा है
और.. होने दिया खारा
अपने ही अस्तित्व को
मुस्कान स्वरूप रहा हरा-भरा...
साक्षी था
मेरे हर गुण-दोष रक्त के
ढक लेता था सब
अपने हरे पत्तों के जाल ...














