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कविता

नीड़
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नीड़

डोमेन्द्र नेताम (डोमू) डौण्डीलोहारा बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** चूं-चूं करती आई मेरी रानी चिड़िया, नीड़ बनाती अपनी बढ़िया-बढ़िया। नित करते अपने संरक्षण वास्ते, नीड़ बनाती अपनी बढ़िया-बढ़िया।। कल-कल बहती सारी नदियां रोज विचार करती है चिड़िया। रोज पीढ़ी मेरी बढ़े भी आगे कैसे, विचारमंथन करती है नित चिड़िया।। दाना-पानी भोजन व्यवस्था, लगी रहती है हमेशा रानी चिड़िया। मीठी मधुर-मधुर गाए गीत नित, नीड़ अपनी रोज सुन्दर करती बढ़िया।। अपनी मधुर वाणी से मन सबकी मोह लेती, करती हमेशा उपकार का कार्य चिड़िया।। नित नया नीड़ बना तिनकों से अपनी खुद का, प्यार का भाव सभी में जगाती है चिड़िया।। परिचय :-  डोमेन्द्र नेताम (डोमू) निवासी : मुण्डाटोला डौण्डीलोहारा जिला-बालोद (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपन...
बाकी है
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बाकी है

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** चंद खुशियों की हसरत में बेपनाह दर्द बाकी है। जो बीच रास्ते छोड़ दिया तुमने अभी वो साथ बाकी है। जो तुम तक पहुंच न पाई मेरी सदायें बाकी है। मेरे खामोश लफ्जों की हजारों बातें बाकी है। थकी आंखों का लम्बा अभी इंतजार बाकी है। जो रूह को सकून दे जाता तेरा दिदार बाकी है। चंद खुशियों की हसरत में बेपनाह दर्द बाकी है। जो बीच रास्ते छोड़ दिया तुमने अभी वो साथ बाकी है। किस कसूर की दी है सजा अभी इल्ज़ाम बाकी है। मौत का दे दिया फरमान अभी हमारी जान बाकी है। सजदों में बांधी उस डोर की अभी वो गांठ बाकी है। क्यों दुआएं कबूली नही गई वो फरियाद बाकी है। चंद खुशियों की हसरत में बेपनाह दर्द बाकी है। जो बीच रास्ते छोड़ दिया तुमने अभी वो साथ बाकी है। हम ने अजमा लिया सब को खुदा का इम्तिहान बाकी है। इश्क़ का यह स...
बच्चे देश का भविष्य
कविता

बच्चे देश का भविष्य

रामेश्वर दास भांन करनाल (हरियाणा) ******************** बच्चे हैं हमारे देश का भविष्य, हमें मिलकर इनका बचपन बचाना है, स्कूल में भेज बच्चों को, काबिल उन्हें बनाना है, बाल मजदूरी से बचपन, उबर नहीं कभी पाता है, शारीरिक मानसिक बच्चे को, बड़ा आघात लग जाता है, हैं खेलने, पढ़ने के दिन जो, दुस्वार यह हों जातें हैं, बाल मजदूरी से बच्चों के, जीवन तबाह हो जाते हैं, गांँव शहर ए मेरे देश के लोगों, बाल मजदूरी पर रोक लगानी है, बच्चों का जीवन खुशहाल बने ऐसी व्यवस्था मिलकर हमें बनानी है, परिचय :-  रामेश्वर दास भांन निवासी : करनाल (हरियाणा) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करव...
छोटी काशी (गोला)
कविता

छोटी काशी (गोला)

गौरव श्रीवास्तव अमावा (लखनऊ) ******************** मन उत्सुक था घोर चपलता, सम्भव नहीं इसे समझाना, महादेव का था ये बुलावा, अब तो हमको था ही जाना। दुःख के काले बादल उड़ गए, मिट गयी मन की घोर उदासी, काशी-काशी, काशी-काशी पहुंच गए हम छोटी काशी।। देख दृश्य छोटी काशी का, मैल मिट गया सारा जी का। मन व्याकुल था आंखें तरसी, दर्शन मिलें तों आंखें बरषी। इससे जुड़ी है राम कहानी, जो चौदह वर्ष हुए वनवासी।। काशी-काशी, काशी काशी पहुंच गए हम छोटी काशी।। दूर-दूर से आते हैं जन महादेव के दर्शन पाने। कई संन्यासी दिखें यहां जो खुद को हर के रंग में ढालें। कुछ तो देखें घोर तपस्वी, कुछ तो मिलें यहां संन्यासी काशी-काशी, काशी-काशी पहुंच गए हम छोटी काशी।। परिचय :- गौरव श्रीवास्तव निवासी - अमावा (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना...
वीरान सी बस्ती
कविता

वीरान सी बस्ती

आयुषी दाधीच भीलवाड़ा (राजस्थान) ******************** सुनसान सी सड़के झांकती है मेरी और, मानो कह रही है वो मुझसे, अपने कदमो की आहट से, महका दे इस गाँव को। वीरान सी इस बस्ती में , झुका हुआ बरगद का पेड़ खड़ा है, मानो वो मुझसे कह रहा है, आ बैठ़ मेरी छाँव में। वीरान सी इस बस्ती में, खाली पड़े मकानों की दीवारें, मुझसे कुछ यूँ बोल रही है, आ खेल तू इस आँगन में। वीरान सी इस बस्ती में, खेतों की ये मिट्टी, मुझसे कुछ यू बोल रही है, आकर छू ले मुझको, चारों और फैला दे, सौंधी सी मिट्टी की खुशबू को। वीरान सी इस बस्ती में, सुनसान सी सड़कें, मानो मुझसे कुछ कह रही है। परिचय :-  आयुषी दाधीच शिक्षा : बी.एड, एम.ए. हिन्दी निवास : भीलवाड़ा (राजस्थान) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, ...
मिलकर नीर बचाना होगा
कविता

मिलकर नीर बचाना होगा

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** मिलकर नीर बचाना होगा, वरना पछताओगे। वसुधा छोड़ नीर पाने को, और कहाँ जाओगे। नित धरती का दोहन करके, इसको व्यर्थ बहाते। कमी दीखती जब पानी की, तब क्यों तुम पछताते। रखें सहेज सदा पानी को, इसकी कीमत जाने। पानी है हम सबका जीवन, कीमत भी पहचाने। धीरे-धीरे कभी इस तरह, होगी गर पानी की। प्यासे, बिना नीर आएगी, याद तुम्हें नानी की। जितनी पड़े जरूरत हमको, इतना पानी ले लें। वरना सूख जाएंगी पल में, सबकी जीवन बेलें। पानी है अनमोल खजाना, मिलकर ऐसे सहेजें। मानव कर प्रयत्न पी लेगा, कहां जानवर भेजें। दिन दूनी और रात चौगुनी, गर्मी बढ़ती जाती। जलस्तर घट रहा निरंतर, धरती सूखी जाती। पशु पक्षी बेचैन भटकते, जहां नीर पाते हैं। बाजी लगा जान की अपनी, वहीं चले जाते हैं। अब गर्मी तन बदन जलाती, पीड़ा सही न...
डॉ. भीमराव अम्बेडकर
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डॉ. भीमराव अम्बेडकर

सीमा रंगा "इन्द्रा" जींद (हरियाणा) ******************** बुद्धि से तेज विचारों से श्रेष्ठ ज्ञान में ज्ञानी सहनशीलता की मिशाल जला दी जिसने अलख ज्ञान की आओ करें नमन उस महान ज्ञानी को किताब, कलम को बना ढाल छा गए जो महान करोड़ों दिलों पर जिसका राज रख नारी को संग दिला कर महिलाओं को शिक्षा का अधिकार बने नारी रक्षक गरीबों वंचितों को दिया उठा समानता का पढ़ाया पाठ सहकर कठोर यातनाएं रख शिक्षा को आगे आम से बने खास लिख दिया जिसने संविधान कहलाए वे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर नमन मातृभूमि के लाल को। परिचय :-  सीमा रंगा "इन्द्रा" निवासी :  जींद (हरियाणा) विशेष : लेखिका कवयित्री व समाजसेविका, कोरोना काल में कविताओं के माध्यम से लोगों टीकाकरण के लिए, बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ हेतु प्रचार, रक्तदान शिविर में भाग लिया। उपलब्धियां : गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड स...
हर पल नयी लगती है तू
कविता

हर पल नयी लगती है तू

डॉ. संगीता आवचार परभणी (महाराष्ट्र) ******************** हर पल कुछ नये से सुहाती रहती है तू नये सिरे से दिल को यूँही लुभाती है तू नयी नवेली दुल्हन जैसी सजती है तू नया कुछ कर गुजरने का ज़ज्बा देती है तू... लड़ने की प्रेरणा बनकर खड़ी है तू दुनियादारी के मायने समझाती है तू व्यस्त रहने के फायदे सिखाती है तू व्यवहार से वास्ता भी जताती है तू... बुराई से भी कभी-कभी टकराती है तू हौसला-अफजाई की मशक्कत करती है तू डटकर चलना भी बताती रहती है तू हमसफर बनके चलना जानती है तू... खुद का अन्दाज बनाने को उकसाती है तू औरों के लिए जीने का अवसर देती है तू विधाता की भेंट खुशनुमा रहती है तू जिन्दगी हर पल नयी उम्मीद जगाती है तू... परिचय :- डॉ. संगीता आवचार निवासी : परभणी (महाराष्ट्र) सम्प्रति : उप प्रधानाचार्य तथा अंग्रेजी विभागाध्यक्ष, कै सौ कमलताई जामकर मह...
मतलबी
कविता

मतलबी

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैंने जहां देखा, मैंने तहा देखा। लोग मुझसे जुड़े बस मतलब के लिए, न मेरे विचारों के लिए न मेरे लिए। जो भी मुझसे मुस्काया किसी न किसी, मतलब के लिए फरेब के लिए। न की अपनेपन के लिए हसीन आंखों ने मुझे भी तका पर न प्रेम के लिए न वफ़ा के लिए बस एक चलते-फिरते हमसफर के लिए। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प...
जकड़न
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जकड़न

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हाथ बंधा है, पांव बंधा है और बंधा मस्तिष्क, चुन सकते नहीं प्रेयसी कैसे लड़ाएं इश्क़, हाथ काम तो कर रहे पर किसी और का, पांव थिरक जा रहा किसी के रोकने से, मस्तिष्क दूसरों के डाले डाटा अनुसार चल रहा है, दरअसल यह मानसिक गुलामी के जकड़न का असर है, समाज और समाज के लोगों से दूर रहने का असर है, जिस हथियार के दम पर नौकरी पाया, रुतबा पाया, उसे भूल धुर विरोधी को गले लगाया, सालों साल लोगों को बहकाया, तो समाज की चिंता अब क्यों? अब कोई तवज्जो दे तो क्यों? मनन जरूर कीजिए। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच...
वर्ण पिरामिड
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वर्ण पिरामिड

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** वर्ण पिरामिड ॐ शिव ओंकार निराकार परमेश्वर त्रयम्बकेश्वर करो विश्व उद्धार हे शंभू त्रिचक्षु संकटी भू कल्याण कुरु बजादो डमरू करो तांडव शुरू ओ रुद्र शंकर विश्वेशर ओंकारेश्वर महाकालेश्वर आओ परमेश्वर परिचय : सरला मेहता निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३...
एक नन्हीं परी
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एक नन्हीं परी

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** नीले बादलों के रथ पे सवार झिलमिल तारों की पीछे है कतार चाँद की चांदनी दे रही बिदाई रिमझिम बूंदों ने शहनाई बजाई एक नन्हीं परी आँगन में उतरी उषा की लाल किरणें ज्यों बिखरी महके कनेर जुही चंपा हरसिंगार हर द्वारे झूमते देखो वंदनवार चाची ने रंगीली रंगोली सजाई ढोलक की थाप पे सोहर गवाई आरती भुआ ने खूब उतारी दादी ने काजल की बिंदी लगाई ठुमक ठुमक कर चलने लगी गुड़िया सजने अब लगी ख्वाबो की दुनिया तोड़ हदे सारी भरो ऊँची उड़ान माँ और बाबा ने कर दिया ऐलान गुड़िया ने सोची अंतरिक्ष की सैर या जा विदेश मनाऊँ अपनी खैर बाबा ने बोला पंख हमने दिए राहे मिल जाएगी पर ज़रा होले होले बुलन्द हौंसलें संजोए दिल में सात सुर गुंजाती पैजनियाँ ख़ामोश जय हिंद सेना में सरहद पे जा डटी नहीं हूँ बेटे से कम मैं...
संयम से हम
कविता

संयम से हम

प्रतिभा दुबे ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** संयम का हथौड़ा और अपनी विवेक की छैनी के साथ करते रहे कार्य बहुत बड़ा परिवर्तन भी ला सकते हम और आप।। जरा से धैर्य की हो बात तराश सकते हैं स्वयं को हम किसी हीरे की तरह ईश्वर से प्रदत्त हैं ये गुण संयम से हैं हम और आप।। हमको ज़रूरत संयम की अपने कर्म के हथौड़े से किया जब समय पर वार असंभव नहीं रहा कुछ भी जीवन में आया हर्ष अपार ।। हुए जो संयमित हम जीवन में उपकृत होंगे ईश्वर के समक्ष होंगे उस अनुकंपा के अधिकारी संयम से ही हम और आप ।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे (स्वतंत्र लेखिका) निवासी : ग्वालियर (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी...
कुछ लोग दीवाने होते हैं
कविता

कुछ लोग दीवाने होते हैं

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** कुछ लोग दीवाने होते हैं विरले अन्जाने होते हैं राष्ट्र -धर्म के लिए जिन्हें नव-राह बनाने होते हैं उनको धन की कुछ चाह नहीं कुछ जीवन की परवाह नहीं पा सका न कोई थाह कभी सागर मस्ताने होते हैं सारा जग उनका अपना है पर स्वदेश पहला सपना है मातृभूमि-भाषा पे मिटकर कुछ अलख जगाने होते हैं छोड़ दिया घर-बार जिन्होंने पाया सबका प्यार उन्होंने कुल-वंश में नहीं बधें जो- अभिनव-पहचाने होते हैं नींद नहीं जिनको प्यारी है बस-करने की तैयारी है सबसे प्रिय सबसे अलग- कुछ मन में ठाने होते हैं चलते रहते नई राहों पर रोते हैं जग की ऑहों पर सुख-दुःख में जिनके कर्म- सदा - पहचाने होते हैं ना सोचें क्या राह कठिन है ना जानें क्या बात कठिन है देश-राह में चलने वाले- अद्भुत सैलाने होते हैं परिचय :-  बृजेश आनन्द राय नि...
हाला
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हाला

ललिता शर्मा ‘नयास्था’ भीलवाड़ा (राजस्थान) ******************** कौन फ़िज़ा में घोल रहा, गरल भरा ये प्याला यूँ। नस-नस में क्यूँ दौड़ रही, मधुशाला की ये हाला यूँ? घर का दिया ही बुझने लगा, करके घर को काला यूँ। उसको पिला दे साक़ी ज़रा-सी, छोड़ के मेरे वाला यूँ॥ आँख में आकर बैठ गया, मदिरा का ये नाला यूँ। फूट रहा न जाने कब से, अश्रु का ये छाला क्यूँ? झुलस रहा है उपवन मेरा, फूल सुगंधित मतवाला यूँ। गंध लगे दुर्गंध उसी को, जब जाता मदिरा में डाला यूँ॥ वेशबदलकर कौन यहाँ, आया ओढ़ दुशाला यूँ। उजली चादर मैली करने, बुनता कोई जाला क्यूँ? यौवन की मादकता से, रोई गुल की माला क्यूँ ? चूर नशे में सोच किसी की, बली चढ़ी कोई बाला क्यूँ? अच्छी बातें नहीं सुहाती, बुरी को जाता पाला क्यूँ? नशे ने किया है नाश सभी का, नशे को सबने न टाला क्यूँ? परिचय :-  ललिता शर्म...
तू कापुरुषों का पूत नहीं
कविता

तू कापुरुषों का पूत नहीं

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** चलने से पहले तय कर ले, दुर्गम पथ है अँधियारों का। हे वीर व्रती ! तब बढ़ा चरण, होगा रण भीषण वारों का।। यह भी तय है तू जीतेगा, शासन होगा उजियारों का। तू कापुरुषों का पूत नहीं, वंशज है अग्निकुमारों का।। नदियाँ लावे की बहती थीं, जिनकी शुचि रक्त शिराओं में। जो हर युग में गणनीय रहे, धू-धू करती ज्वालाओं में।। तू उन अमरों का अमर पूत, आर्यों की अमर निशानी है। तेरी नस-नस में तप्त रक्त, पानीदारों का पानी है।। हे सूर्य अंश अब दिखा कला, कर सिद्ध शौर्य टंकारों का। दुनिया बोलेगी जयकारे, दिल दहल उठेगा रारों का।। तू कापुरुषों का पूत नहीं, वंशज है अग्निकुमारों का।। तेरी जननी की हरी कोख, करुणा की तरल पिटारी से। अवतरण हुआ है हे कृशानु! तेरा बुझती चिनगारी से।। हे हुताशनी पावक सपूत! बलधर अकूत...
सपनों का महल
कविता

सपनों का महल

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मैंने कभी संजोए सपने सपनों में खो, खो कर कई महल ढहाये मैंने सपनों में बना-बना कर। आया कोई दूर गगन से तारांगणो का व्युह करो आंगन को दीप्त मेरे समा गया पुनः सपनों में। भर-भर पूंज उलिचा मैने सपनों के दोनों से गति प्रकाश की देखी मैंने कोसो, मिलो थी जो दूर मन बावरा उड़-उड़ जाता गवर्नर क्षितिज से दूर। यह पर्वतों की हरियाली वृक्षों की ऐ छाया शाख-शाख पर क्यों पुकारे पी-पी पपीहा गान। सपनों में जो मंजर देखा देखा स्वयं को चहकते हुए आंखें खुली तो न था पर्वत न हीं उलिचा गया कोई पुंज। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के ले...
संकल्प
कविता

संकल्प

कुंदन पांडेय रीवा (मध्य प्रदेश) ******************** मैं तपस्विनी की सुता भला, तप में विश्राम क्या पाऊंगी। प्रतिदिन नव कोपल सम ही मैं, आगे बढ़ती ही जाऊंगी। हरक्षण जो कष्ट लिए उर में, मैं उस वसुधा की जाई हूं। हो आदि पुरुष भी नतमस्तक, ऐसी शक्ति बन आई हूं। क्यों लक्ष्य नहीं मैं पाऊंगी, ना पीछे कदम हटाऊंगी। बाधाओं से लड़ जाऊंगी, निज स्वत: ढाल हो जाऊंगी। गर मार्ग बिना कंटक के हों, मंजिल में प्रीत न पाऊंगी। बिन बाधाओं के प्राप्त हुआ, वह लक्ष्य नहीं अभिशाप हुआ। जितनी ही असफलता आए, उतना ही कदम बढ़ाऊंगी। हरगिज भी ना अकुलाऊंगी, एक दिन मंजिल पा जाऊंगी। परिचय :-  कुंदन पांडेय निवासी : रीवा (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कह...
हारते हुए मन को समझना
कविता

हारते हुए मन को समझना

काजल कुमारी आसनसोल (पश्चिम बंगाल) ******************** ये जिंदगी है मेरे दोस्त, बहुत आजमाएगी। जो चाहा नहीं कभी, वो भी करवाएगी ।। पर मतलब नहीं इसका, हम हारकर बैठ जाएं। कोशिशें छोड़ दें, खुद को समझाकर बैठ जाएं ।। अभी तो सफर लंबा है, बहुत दूर जाना है। जो रूठे हैं रास्ते उनको भी मनाना है ।। मत सुना करो उनकी जो रास नहीं आते । इंतजार उनका कैसा ..... जो इंतजार का अर्थ नही जानते ।। हर कोई हमें प्यार करे ये हमारे बस में नहीं । पर हम सबको प्यार दें, बेशक हमारे बस में है ।। हां, टूटी चीजें चुभती हैं, बहुत सताती हैं। मन की उदासी का बवंडर ले आती है ।। घुट-घुट के हम खुद में सिमट से जाते हैं । चाहकर भी इससे निकल नही पाते हैं ।। इसलिए खुद को ऐसा बनने मत देना । बेवजह आसुओं को बाहर निकलने मत देना ।। कह दे कोई खुदगर्ज तो चुपचाप सुनना । पर हमदर्द हमेश...
ज़िम्मेदार कौन
कविता

ज़िम्मेदार कौन

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** कहीं ट्रक से ट्रक टकराता है, कहीं कोई बिना ब्रेक की गाड़ी दौड़ाता है इनका परिणाम हादसा होता है इनका ज़िम्मेदार कौन होता है? कहीं शराबी ड्राइवर ट्रक चलाता है कहीं बिना लाइसेंस के वैन भगाता है कभी स्कूल बस अनफ़िट होती है ये सब हादसों के शिकार होते हैं इनका ज़िम्मेदार कौन होता है कभी ८० की रफ़्तार मासूमों की जान लेती है कभी ओवरलोडेड ट्रक पलट जाता है कहीं गड्ढे गाड़ी उछालते हैं प्रति दिन हज़ारों जानें जाती हैं कोई मोबाइल के चलते गाड़ी चलाता है कोई असावधान हो जाता है लगातार गाड़ी चलाचला कर किसी की नींद पूरी नहीं होती ये सब कइयों की मौत से खेल जाते हैं इन सबका ज़िम्मेदार कौन होता है? ज़रा सोचें, ज़रा समझें, इनमें से कोई कारणों के ज़िम्मेदार हम स्वयं होते हैं। परिचय :- डॉ. किरन अवस्थी सम्प्रति : ...
हे ! महावीर
कविता

हे ! महावीर

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** महावीर कल्याणक तुमने दिया अहिंसा-गीत। तुम हो मानवता के वाहक, सच्चाई के मीत।। राजपाठ तुमने सब त्यागा, करने जग कल्याण। हिंसा और को मारा, अधरम को नित वाण।। जितीन्द्रिय तुम नीति-प्रणेता, तुम करुणा की जीत। तुम हो मानवता के वाहक, सच्चाई के मीत।। कठिन साधना तुमने साधी, तुम पाया था ज्ञान। नवल चेतना, उजियारे से, किया पाप-अवसान।। तुमने चोखा साधक बनकर, दिया हमें नवनीत। तुम हो मानवता के वाहक, सच्चाई के मीत।। नीति, रीति का मार्ग दिखाया, सत्य सार बतलाया। मानवता के तु हो प्रहरी, रूप हमें है भाया।। त्यागी तुम-सा और न देखा, खोजा बहुत अतीत। तुम हो मानवता के वाहक, सच्चाई के मीत।। भटक रहा था मनुज निरंतर, तुमने उसको साधा, महावीर तुम, इंद्रिय-विजेता, परे भोग की बाधा।। कर्म सिखाया, सदाचार भी, तुम हो भावातीत। तुम हो म...
दूर कहीं अब चल
कविता

दूर कहीं अब चल

गोपाल मोहन मिश्र लहेरियासराय, दरभंगा (बिहार) ******************** राहत के दो पल आँखों से ओझल। रोज लड़े हम तुम निकला कोई हल ? न्यौता देतीं नित दो आँखें चंचल। झेल नहीं पाए हम अपनों के छल। भीड़ भरे जग से दूर कहीं अब चल। मौन तुझे पाकर चुप है कोलाहल। कितने गहरे हैं रिश्तों के दलदल। है आस मिलेंगे ही आज नहीं तो कल। परिचय :-  गोपाल मोहन मिश्र निवासी : लहेरियासराय, दरभंगा (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gma...
सम्राट अशोक
कविता

सम्राट अशोक

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बिंदुसार के पुत्र आपने एकछत्र साम्राज्य बनाया था, देश तो देश विदेशों में भी अपना लोहा मनवाया था, देख लहू की धार, अपने मन को विचलित पाया था, मन की शांति पाने खातिर बुद्धत्व को अपनाया था, लाखों स्तूप और शिलालेख धम्म के लिए बनाया था, हिंसा त्यागा अहिंसा अपनाया, खुद का मन निर्मल बनाया, आपने ही अथक प्रयत्न कर बुद्ध राह सहेजा था, पुत्र महेंद्र पुत्री संघमित्रा को समुद्र पार तभी तो भेजा था, शिक्षा लेने दुनियाभर से हर वर्ष हजारों आते थे, शिक्षा के संग शासन सुमता की बातें लेकर जाते थे, अशोक चक्र और चार शेर चिन्ह को देश ने यूं ही नहीं अपनाया है, विदेशियों ने अपने ग्रंथों में महान अशोक के निर्भीक शासनकाल का गुण गाया है, लड़ना नहीं है हमको अब तो मिलकर एक हो जाना है, अपना राज लाकर फिर से प्रियदर्शी का ...
जीत-जीत सोच तू जीत जायेगा
कविता

जीत-जीत सोच तू जीत जायेगा

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** जीत-जीत सोच तू जीत जायेगा। हार से कभी न फिर घबरायेगा। अकेला चल राह में कदमों को बढ़ा, एक दिन तेरा ये मेहनत रंग लायेगा।। कुरुक्षेत्र के मैदान में जंग है जारी। जी जान लगा अपनी कर तैयारी। धनुर्धारी अर्जुन बन संशय में न घिर, कृष्ण की तरह दिखा विराट अवतारी।। मंजिल की आंखों में पहले आंखें तो मिला। लक्ष्य पाने मनबाग में कुसुम तो खिला। नित कर्म ही तेरा भाग्य है वीर मनुज, रुकना नहीं चाहिए अभ्यास का सिलसिला।। आयेंगी चुनौतियां तेरी लेने परीक्षा। दृढ़ पर्वत के समान खड़ा कर प्रतीक्षा। साहस भरके मन में सामना तो कर, मिलेगी सफलता पूरी होगी हर इच्छा।। परिचय : अशोक कुमार यादव निवासी : मुंगेली, (छत्तीसगढ़) संप्राप्ति : सहायक शिक्षक सम्मान : मुख्यमंत्री शिक्षा गौरव अलंकरण 'शिक्षादूत' पुरस्कार से सम्मानित। घोषणा पत्र : मैं ...
दामिनी की आवाज
कविता

दामिनी की आवाज

श्रीमती निर्मला वर्मा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** लगता है पौरुष की परिभाषा बदल रही है बहन बेटी की रक्षा और दुलार की जगह हवस की भावना पनप रही है लगता है पौरुष की परिभाषा बदल रही है क्या वक्त, क्या जगह, क्या उम्र, क्या ब्याहता, कुमारी कन्या या वृद्धा सभी पर वासना कहर ढा रही हैं लगता है पौरुष की परिभाषा बदल रही है एक "शक्ति" का प्रतीक पर छः छह दानवों ने अपनी घिनौनी ताकत दिखाई पुरुष होने की क्रूर से क्रूरतम हैवानियत दिखाई नारी की सुरक्षा खतरे में दिख रही है लगता है पौरुष की परिभाषा बदल रही है उन दरिंदों के लिए अबला असहाय होने लगी, किंतु उसकी "कराह" सिहिनी की गर्जना बनी दामिनी नाम दिया है उसकी आह को क्योंकि दामिनी जब कड़कती है गरजती है तो आसमान से धरती को हिला देती है आज इस धरती की "दामिनी" ने हिला दिया है देश को क्षण भर की ...