राम नाम की मधुशाला (भाग- ५)
प्रेम नारायण मेहरोत्रा
जानकीपुरम (लखनऊ)
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अंगूरी मदिरा पीने,
मदिरालय जाना पड़ता है।
कठिन कमाई से अर्जित धन,
व्यर्थ गवांना पड़ता है।
राम नाम मदिरा अंतर में,
खोल भरम का तू ताला।
बिना मूल्य के जी भर पी ले,
बन जायेगा मधुशाला।
राम नाम मदिरा में डूबा,
फिर कुछ नहीं लुभायेगा।
पूर्ण तृप्त होगा हरपल तू,
खुद में ही सुख पायेगा।
बहुत नशीली है ये मदिरा,
शीघ्र उठा ले तू प्याला।
स्वास्थ नहीं करती खराब ये,
पी जा पूरी मधुशाला।
पी कबीर ने राम नाम को
जब लेखनी उठाई है।
ऐसी अमृतवाणी फूटी
पढ़ दुनिया हरसाई है।
राम नाम की मदिरा पीकर,
हाथ लिए घूमा प्याला।
दोनों हाथ पिलाई जग को,
फिर भी भरी है मधुशाला।
राम नाम की मदिरा पीनेवाला,
उन्मत रहता है।
जग आसक्ति छूट जाती है,
सदा स्वस्थ तन रहता है।
हाथ कार्य करते दिखते हैं,
अंतर चले "नाम" माला।
सुमिरन में रम जाता है मन...
















