
विशाल कुमार महतो
राजापुर (गोपालगंज)
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घटाएं आ गई, आसमा छा गई,
और दिन भी आये सुहाने हैं,
घटाएं आ गई, आसमा छा गई,
और दिन भी आये सुहाने हैं,
और एक पापा है, साहब जिन्हें
आज भी इस बरसात में कागज कमाने है।घर आकर बच्चों को जब
पापा ने खाना खिलाया होगा,
हम बच्चों को क्या पता,
पापा ने आज किस हाल में कमाया होगा।
बच्चों के सपने पूरे हो,
और रहने के लिए सुंदर घर भी बनाने है,
बच्चों के सपने पूरे हो,
और रहने के लिए सुंदर घर भी बनाने है,
और एक पापा है, साहब जिन्हें
आज भी इस बरसात में कागज कमाने है।आज फिर किसी ठीकेदार के आगे,
पापा ने हाथ फैलाया होगा ।
पूरे दिन अपने लहू को जिसने,
पसीने के रूप में बहाया होगा ।
बच्चों के लिए सुंदर कपड़े,
और ढ़ेर सारे खिलौने लाने हैं,
बच्चों के लिए सुंदर कपड़े,
और ढ़ेर सारे खिलौने लाने हैं,
और एक पापा है, साहब जिन्हें
आज भी इस बरसात में कागज कमाने है।उन्हीं चंद टुकड़ो के लिए,
कितना कष्ट उठाया होगा
फ़टी पुरानी कुर्ता में पूरे
बदन को कैसे छिपाया होगा
अच्छे अच्छे स्कूलों में,
अपने बच्चों को जो पढ़ाने है,
अच्छे अच्छे स्कूलों में,
अपने बच्चों को जो पढ़ाने है,
और एक पापा है, साहब जिन्हें
आज भी इस बरसात में कागज कमाने है।
निवासी : राजापुर (गोपालगंज)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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