बोली
राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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छत्तीसगढ़ी बोली
झिनकर भरोसा के
सबो बोलहि गुरतुर बोली,
कोनो कस्सा बोलहि,
कोनो गुरतुर बोलहि,
कोनो जहर मौहरा
कस बोलहि,
त कोनो नुनछुर बोलहि,
पढ़हे लिखे मनखे ले
मत पालव उम्मीद,
के गाबेच करहि
मीठ-मीठ गीत,
पढ़ेच होय ले का होही,
जात के गरभ म
अतका घमंड हे
जागतेच रइही
कभू नई सोही,
एक ठीन बेरा रहिस
रिस्ता नता अनुसार
सबो मीठ बोलय,
मीत मितान मन तो
गोठियाय के पहिली
मुंहे म सक्कर ल घोलय,
फेर आज सब नंदावत हे,
गियां, महापरसाद
ल छोड़ संगी
दाई, ददा, भाई तक
ल भुलावत हें,
कहां गइस मया अउ
कहां गइस दया,
आज सबो हे
सुवारथ खातिर
सिरिफ बासी खया,
सत ल बताय
बेरा चिचियाथें,
अउ मीठ बोली म
चेता के धमकाथें,
मोला तो कोनो नई दिखत हें
बिन सुवारथ के मीठ बोलवा,
बोली के दोस नई हे
आज सबो एके
रद्दा म रेंगत हें
ब्यवह...

