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अटल इरादे वाली बात
कविता

अटल इरादे वाली बात

सीताराम पवार धवली, बड़वानी (मध्य प्रदेश) ******************** अटल नीति पे चले तो ये समस्या समाप्त हो जाएगी। मृत्युंजय महाकाल के कपाल पर जब भी बल पड़ेंगे। सप्तसागरो की तो बात क्या ये हिमगिरी ढल पड़ेंगे। यह न समझना दिशाएं भी तुम्हारा रास्ता रोक लेगी एक दीप तो क्या यारों यहां हजारों सूरज जल पड़ेंगे। अटल इरादे वाली बात अटल जी ने जहां को बताई है पोखरण का विस्फोट सुन सारे दुश्मन भी दहल पड़ेंगे। कारगिल हो या कश्मीर हमने ये जीत के तिरंगे गाड़े हैं चलना मुश्किल होगा हिमालय से दुश्मन फिसल पड़ेंगे। दिल्ली से लाहौर बस चला इरादा अपना जताया था अटल इरादे देख हमारे शायद यह दुश्मन उछल पड़ेंगे। भारतरत्न अटल यहां सुरमाओ के सुरमा माने जाते थे आज भी उनकी रचनाएं पढ़ हमारे दिल मचल पड़ेंगे। अटल नीति पे चले तो ये समस्या समाप्त हो जाएगी इस नीति से भारत की समस्याओं के हल निकल पड़ेंगे। ...
कन्याभ्रूण हत्या
कविता

कन्याभ्रूण हत्या

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** मां तेरी मैं घनी लाड़ली, ना गर्भ से करों विदाई। बाबुल मेरी गलती बतला, सब समझें मुझे पराई। जहां आंगन तेरे खेलती, ले फूल सी अंगड़ाई। पापा देख देख मुस्काती, मैं सहती नहीं जुदाई। मैं अंगुली पकड़े चलती मां, जग तेरी करें बढ़ाई। तात-मात से दुनिया कहती, बेटी ही घर महकाई। मां तेरी मैं घनी लाड़ली, ना गर्भ से करों विदाई। बाबुल मेरी गलती बतला, सब समझें मुझे पराई। देख जगत की यह करतूतें, आंखें मेरी भर आई। गर्भ से जब किए निष्पादन, बोटी-बोटी घबराई। मखमल सी मेरी काया को, यूं खंड-खंड कटवाई। चीखें मेरी निकली होगी, मां गर्भाशय मरवाई। मां तेरी मैं घनी लाड़ली, ना गर्भ से करों विदाई। बाबुल मेरी गलती बतला, सब समझें मुझे पराई। कैसे होगा मंगल गायन, कहां बजेगी शहनाई। पाप किया बेटे के खातिर, बेटी जिसने कटवाई। जब बहू ढूंढते ज...
जीत
कविता

जीत

अमित डोगरा कांगड़ा, (हिमाचल प्रदेश) ******************** तू सोच अच्छा तू कर अच्छा तू देख अच्छा तू सुन अच्छा। तू विचार अच्छा तू शांत बन तू धैर्य रख तू तर्क कर तू विवेकशील बन तू मननशील बन तू सत्य पर चल तू खुद पर विश्वास रख तू ईश्वर को सुन फिर तेरी जीत निश्चित है परिचय :- अमित डोगरा निवासी : जनयानकड़ कांगड़ा, (हिमाचल प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचि...
गर्वित अटल बिहारी
कविता

गर्वित अटल बिहारी

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** पैतृक गाँव बटेश्वर में ही, जन्म आपने पाया। कृष्ण बिहारी, कृष्णा देवी, का घर धन्य बनाया। पच्चीस दिसंबर सन चौविस में, जन्मे अटल बिहारी। मात-पिता परिजन हर्षित थे, छाई खुशियाँ भारी। सरस्वती शिक्षा मंदिर सँग, वे कॉलेज पढ़े थे। शिक्षा अरु कौशल के दम पर, ऊँचे शिखर चढ़े थे। नमिता और नंदिता दोंनों, गोद लिए बेटी थीं। लाड प्यार से पाला उनको, दोनों परम चहेतीं। जनमानस की सेवा करना, ध्येय बनाया अपना। निर्बल, निर्धन सभी सुखी हों, मन में देखा सपना। राजनीति में पहुँच आपने, जनसंघ को अपनाया। प्रथम सांसद बन दुनिया में, यश सम्मान कमाया। अपनी वाणी पर संयम रख, सबका मन हर्षाया। देश विदेशों में भारत का, था परचम लहराया। रहे सांसद और मंत्री, प्रखर अग्रणी वक्ता। राजनीति में जगह आपकी, कोई नहीं ले सकता। ...
सृजन
कविता

सृजन

डाॅ. रेश्मा पाटील निपाणी, बेलगम (कर्नाटक) ******************** शीतल-शीतल चंदा की किरण है। महकी-महकी आज पशन है। तरल-तरंग मनमें उमडे है उमड-उमड मन गीत है गाता। सुख है, दु:ख है समझ ना पाये मन भी बडा चपल चंचल है। डाल-डाल पर भँवरा मंडराये कली-कली को फूल बनाये। दूर कही बांसुरी बजाए राधा-राधा किशन बुलाए। मनवा महके, तनवा दहके सृष्टी का कैसा सृजन है। परिचय :-  डाॅ. रेश्मा पाटील निवासी : निपाणी, जिला- बेलगम (कर्नाटक) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके ...
हिम जैसे अटल
कविता

हिम जैसे अटल

आशा जाकड़ इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** अटलजी सचमुच थे तुम हिम जैसे अटल। भारतमाँ के सच्चे सपूत थे अद्भुत विरल।। शरीर दिव्य हो गया आवाज मौन हो गई, अटलजी की आत्मा आज अमर हो गई। बात कहते थे सटीक शांत मन निर्मल, अटलजी सचमुच थे तुम हिम जैसे अटल। मौन है आज आस्मां मौन है सारी जमीं, मौन है शीतल पवन मोहन है मां भारती। देश- प्रेम अलख जगाई थे हृदय निश्छल, अटलजी सचमुच थे तुम हम जैसे अटल। शब्दों का भंडार, भावनाओं का ज्वार थे कुशल राजनीतिज्ञ, भाषण धुआंधार थे। आरोप-प्रत्यारोप से विरोधी हो जाते तरल, अटलजी सचमुच थे तुम हिम जैसे अटल। समुद्र सम गंभीर थे, स्पष्टवादी धीर थे, प्रेम-शांति के मसीहा, सच्चे कर्मवीर थे। सत्यनिष्ठ, स्वाभिमानी, थे मन के सरल, अटलजी सचमुच थे तुम हिम जैसे अटल। जीवन-युद्ध विजेता कष्टों में भी हंसते, बाधाओं को परे हटा राह स्वयं चुनते। थे संघर्षर...
सर्दी आई
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सर्दी आई

प्रभात कुमार "प्रभात" हापुड़ (उत्तर प्रदेश) ******************** सर्दी आई, सर्दी आई ठिठुरन भी संग ले आई अम्मा ने टोपा जर्सी खूब पहनाई, फिर भी नहीं आई गरमाई सर्दी आई, सर्दी आई। आसमान में घटा छाई सूरज दादू से गुहार लगाई, वह भी खेल रहे लुका-छुपाई सांझ हुई शीत लहर दौड़ी आई, सर्दी आई, सर्दी आई । तन बदन में कंपकंपी आई अम्मा दे दो मुझको मोटी सी एक रजाई तब आएगी खूब गरमाई। खाएंगे मूंगफली गजक मिठाई। सर्दी आई, सर्दी आई। परिचय :-  प्रभात कुमार "प्रभात" निवासी : हापुड़, (उत्तर प्रदेश) भारत शिक्षा : एम.काम., एम.ए. राजनीति शास्त्र बी.एड. सम्प्रति : वाणिज्य प्रवक्ता टैगोर शिक्षा सदन इंटर कालेज हापुड़ विशेष रुचि : कविता, गीत व लघुकथा (सृजन) लेखन, समय-समय पर समाचारपत्र एवं पत्रिकाओं में रचनाओं का निरंतर प्रकाशन। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना...
मेरा सफर…
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मेरा सफर…

शैलेष कुमार कुचया कटनी (मध्य प्रदेश) ******************** सफर पर निकले पीछे कदम ना करना जो आये मुश्किल रफ्तार तेज करना।। कांटे बहुत है मंजिल में मेरे चल रहे है मगर साथ है कोई अपना।। दुश्मन अंधेरा क्या करेंगे पग-पग पर मेरे दिए की रोशनी में चलना सीखा है मैने।। थक कर जब मैं बैठा चलना बहुत था दिख रही थी मंजिल हाथ थामा औऱ चल दी अम्मा।। बहुत मिली रुकावटे राह टेढ़ी-मेढ़ी थी चल रहे थे हम क्योकि साथ थी अम्मा।। पहुँचना मुश्किल लगा सफर में जब भी याद किया माँ को तो हिम्मत मिली हमे।। आराम करेंगे फुर्सत से अभी चलना बहुत है मिले जो लोग राह में भटकाया बहुत है।। परिचय :-  शैलेष कुमार कुचया मूलनिवासी : कटनी (म,प्र) वर्तमान निवास : अम्बाह (मुरैना) प्रकाशन : मेरी रचनाएँ गहोई दर्पण ई पेपर ग्वालियर से प्रकाशित हो चुकी है। पद : टी, ए विधुत विभाग अम्बाह...
भारत की आब पंजाब
कविता

भारत की आब पंजाब

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** पंच और आब से बना पंजाब यह पांच नदी का उद्गम है इसी धरा ने जनधन पाला, महां स्तंभ भारत का है। प्यारे देशवासियों ऋग्युग के, ना ऐसी बात करें जिससे टुकड़े हों भारत के अखंडता को खतरा‌ हो। भारत की सीमाएं उत्तर में, यूरोप की निकटवर्ती थीं दक्षिण में हिंदमहासागर‌की, अंतिम सीमा भी अपनी थी उन द्वीपों में बसी आज भी भारत की संस्कृति है आर्यों की प्राचीन कथाएं, वहां आज भी‌ प्रचलित हैं गुरु तेग बहादुर, गुरु नानक की वाणी को याद करें अखंडता और रहे एकता गुरवाणी को याद करें भारत के वीरों की भूमि, यह वीरों की आंखों का पानी ‌है इन वीरों की गाथाएं धरती पर लासानी हैं तोड़फोड़ की बात करें ना, ना भाई से भाई बिछुडें कोई विदेशी तोड़ न पाए, हम सब भारत के बेटे हम अपने ऊपर हावी नहीं किसी को होने देंगे हम भारतवासी ...
मत वहन करो
कविता

मत वहन करो

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मत वहन करो मेरे विचार को मुझे भी नहीं चाहिए तुमसे अलंकार के भूषण। मत वहन करो मेरी वाणी को मुझे भी नहीं चाहिए तुमसे छंदों के बंधन। मत वहन करो मेरे अंतर्द्वंद को मुझे भी नहीं चाहिए तुमसे परिछंदों के द्वंद। मत वहन करो मेरे अंत:वेगों को मुझे भी नहीं चाहिए तुमसे रागों की रागनी। मत वहन करो मेरे हृदय तल की असवादों को मुझे भी नहीं चाहिए तुम्हारे रसों से उत्पन्न रसायन। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित...
जीवन
कविता

जीवन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक बिन्दु से लेकर अनंत तक असंपूर्णता असंपन्नता से सम्पूर्ण सम्पन्नता तक जीवन संग्राम गाथा है हर घड़ी, हर पल हर दिवा हर रात्रि कष्ट में सुख में, नींद में स्वप्न में मनुज में जीव में, चहुँ ओर प्रकृति में निरन्तरता है जीवन निरंतर ये जीवन कर्म की परिभाषा, चुनौती का पर्याय शतरंज सा है जीवन कहीं रुकाव नहीं कहीं ठहराव नहीं हारे हुए योद्धा पर अनवरत चलता है जीवन कुछ कर गुजरने की तमन्ना, लक्ष्य साध मंजिल पाने की चाह बदलते हुए समीकरण, सब्रता के अपने अपने चरण सहनशीलता से विकास, कहीं उग्रवादिता से विनाश यश अपयश के साथ, रिक्त हो रहे धैर्य व साहस के संग कहीं कशमकश से जूझता, कहीं परिपक्व है जीवन एकाग्र कर्म पथ पर चलने का नाम जीवन जीवन का लक्ष्य केवल अंत है, मगर.... मृत्यु के बाद भी तो है "जीवन...
एक लड़की गुड़िया सी
कविता

एक लड़की गुड़िया सी

रमाकान्त चौधरी लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) ******************** एक गुड़िया सी लड़की घर में, बातें बहुत बनाती है। है नटखट शैतान बहुत, पर सबके दिल को भाती है। घर भर को है खूब रिझाती, अपनी मीठी बोली से। कॉपी सारी रँगती रहती, बना बना रंगोली से। बात बात पर धमकी देकर, सबपर हुकुम चलाती है। है नटखट शैतान बहुत, पर सबके दिल को भाती है। इस कमरे से उस कमरे में, दिन भर चलती रहती है जरा डाट पर रो देती, पर बिलकुल नही सुधरती है। मम्मी पापा भाई बहन, वह सब पर प्यार लुटाती है। है नटखट शैतान बहुत, पर सबके दिल को भाती है। कभी डॉक्टर, कभी वो टीचर, फौजी भी बन जाती है। क्या क्या मुझको करना है, वह अच्छे से समझाती है। देख देख कर दर्पण बिटिया, खुद को खूब सजाती है। है नटखट शैतान बहुत, पर सबके दिल को भाती है। परिचय :-  रमाकान्त चौधरी शिक्षा : परास्नातक व्यवसाय : वकालत नि...
लेखन का दम
कविता

लेखन का दम

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** कवियित्री 'अनामिका अंबर’ को पढ़ने से रोक वजह से सृजित मेरी नई छंद रचना। सृजनकारों की आन-बान-शान लेखन सृजन का पुरातन इतिहास स्वाधीनता युद्ध तक और रीति भक्ति काल तक ले जाता है। आव्हान है पुराने युग के साहित्यकारों के देश में प्रखर कलम चलती रहे और देश के सही मुद्दों पर लिखती रहे। आभार सहित। हिंदुस्तान में लेखन का दम, गुजरे युग परखा होगा। तुलसी कबीर मीरा रहीम, लेखन युग बदला होगा। आजादी अमृत महोत्सव, जनता पुलकित भारी है। कवि कवियित्री पे सीधी रोक, 'अनामिका’ बेचारी है। हरेक घर कविता निकलेगी, अंबर तक की बारी है। भक्ति रीति युग रचनाओं में, खूब निपुणता पा जाते। गंगा यमुना सरयू गाथा में, साहित्य झलक महकाते। कदंब पेड़ काव्य ’सुभद्रा’, पावन यमुना दिखलाती। विषैली यमुना नदी जल को, कालिया मर्दन कराती। पर्यावरण जो वर्तमान में, समझना कलम क...
मकान का रिश्ता
कविता

मकान का रिश्ता

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** नाना-नानी का मकान जहाँ बिताई गर्मी की छुट्टियाँ नाना का लाड नानी का दुलार नाना के हाथों लाई इमरती नानी का झूला नानी की कहानी। मेरे मस्ती करने पर नानी मुझे नहीं माँ को डांटती दुलार के डाट से ढक देती नाना-नानी बन चुके जो तारे गर्मी की छुट्टियों में सूने घर में नहीं मिलती नाना-नानी की मुझे बुलाती आवाजे। नहीं झूलते हवाओं से झूले रातों को आकाश में सूने नयन उन्हें निहारते नाना-नानी का आशियाना टूट चूका उनकी उम्र की तरह यादें तस्वीरों में कैद आँखों में आँसू लिए रिश्ते निहार रहे ढहते मकान। नयापन लौट आएगा नई उमंगों के साथ ये वैसा ही लगेगा जैसे बुजुर्गों के गुजर जाने के बाद नन्हें बालक ने लिया हो जन्म नए रिश्तों के साथ नई उमंगों के साथ बुजुर्गों के आशीर्वाद के साथ नयापन समेटे। परिचय :- संजय वर्मा "...
बेटियां
कविता

बेटियां

रामेश्वर पाल बड़वाह (मध्य प्रदेश) ******************** दोनों घरों की पहचान होती है बेटियां एक बहू दूसरे में मां की शान होती है बेटियां। बहू बेटियां ही चलाती हैं घर और सबको खिलाती है रोटियां पिता की खुशी और मां का अरमान होती है बेटिया। कितनी भी मुसीबत आए नहीं घबराती है बेटियां दर्द का एहसास और खुशियां की पहचान कराती है बेटियां। बहता है नीर आंखों से जब रोती है बेटियां कैसे चलता यह संसार जब ना होती बेटियां। बड़े-बड़े आंसू रुलाती है बेटियां विदा होकर जब घर से जाती है बेटियां। परिचय :-  रामेश्वर पाल निवासी : बड़वाह (मध्य प्रदेश) विधा : कविता हास्य श्रृंगार व्यंग आदि। प्रकाशित काव्य पुस्तक : पाल की चांदनी। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, ल...
अब से पहले
कविता

अब से पहले

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** पहले भी रात होती थी ...चांद होता था। तारों के साथ -साथ आसमान होता था। उन तमाम रातों में, जो चटक जाते थे तारे, उन्हें देख कर ख्वाब बुना करता था। मैं जागता था ...अनगिनत सपने देखने के लिए। मैं तलाशता था उन राहों को जो है .......मेरे लिए। जिंदगी की राह में लेकिन..... सब बदल गया। रात तो वही है ....लेकिन आसमान बदल गया। क्या ......मैं सोचता था.. अब क्या मैं सपने बुनूं। यह कहाँ ठिठक गया .... किससे कहूँ। वो भरम कि मैं अकेला नहीं.... मेरी तन्हाई से वो भी पिघल गया। अब सोचता हूँ..... कहूँ भी तो क्या कहूँ। आज भी जाग रहा हूँ....... पहले की तरह। लेकिन ख्वाबों का सिलसिला लगता है कि थम-सा गया। जिंदगी जो मृगतृष्णा दिखा रही थी और ..... मैं तो प्यासा ही रह गया। टूटे हुए ख्वाबों के आईने में, फिर से अपन...
सातों जन्म मांगती तुझको हूं
कविता

सातों जन्म मांगती तुझको हूं

सीमा रंगा "इन्द्रा" जींद (हरियाणा) ******************** क्या हुआ मुझे दिया नहीं कभी लाखों का हार, पर जीवन के हर पल को माला में संजोया है। क्या हुआ मुझे कभी दिया नहीं कीमती उपहार पर अपने जीवन के कीमती पल मेरे नाम किए हैं। क्या हुआ कभी मुझे महंगी साड़ी गिफ्ट नहीं की पर हमारे रिश्तो को एक-एक धागे में पिरोए रखा है। क्या हुआ ऊंचे महलों में नहीं बिठाया कभी हमें पर छोटे से घर की एक-एक ईंट में प्यार भर दिया है। क्या हुआ कभी हम गए नहीं विदेश घूमने तो स्वदेश के हर सुनहरे संगीत से रूबरू करवाया है। कभी किया नहीं झूठा वादा कि ताज महल बनवा दूंगा पर घर के एक कोने में सुंदर सा कमरा हमारे नाम किया है। क्या हुआ कभी हम धन-दौलत से भरा नहीं हमारा घर प्यार भरपूर देकर हमें रहीस बना दिया है। दुनिया से अलग है मेरे हमसफर झूठे वादे करते नहीं मुझे हमेशा खुश रखते हैं हमारे लिए वही...
शिक्षा व्यवस्था
कविता

शिक्षा व्यवस्था

शशि चन्दन इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** शिक्षा जीवन का सार है, संस्कारों का मीठा संसार है, आत्मा का परमात्मा से मिलन का... एकमात्र यही सच्चा द्वार है।। दिनचर्या हो कैसी, व्यवहार हो कैसा, कोरे मन पे लिखो बस न ऐसा वैसा.. कलम ही सारथी बेड़ा लगाती पार, शिक्षा ना खरीदी जाती देकर पैसा।। भगवान राम कृष्ण भी पढ़े गुरुकुल में, सर्व शिरोमणी बने तब रघुकुल में..। जीवन ज्योति के आखर आखर जोड़, गीताधारी कहलाए जगतकुल में।। युग बीते परिवर्तन हुए बदली नियमावली, विद्या मंदिरों में लगने लगी हाट बाजारों की गली, विद्यार्थी जीवन सिमटने लगा किताबों में.. मां सरस्वती की वीणा रूदन कर विदा हो चली।। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था चलती ठेकों पे, कलम से कलाम बनना हुआ दूर, परीक्षा उत्तीर्ण होती आज नेगों से....।। ज्ञान का प्रकाश नहीं.. लाचारी भरी शिक्षकों की जेबों में....।। देश के ...
ऋण
कविता

ऋण

महेश बड़सरे राजपूत इंद्र इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** खड़ा हूं इस मातृभूमि पर ऋण जाने कितनों का सर है। आज बड़ा मैं अभिभूत हूं आशीष बड़ों का भर-भर है। माता-पिता-भाई-बहनों का, ऋषियों और गुरुजनों का, शेष बचे कितने प्रखर है? ऋण जाने कितनों का सर है। जात-समाज और पित्रों का, सहपाठी, बंधु-मित्रों का, जिनके कारण 'इंद्र' निडर है, ऋण जाने कितनों का सर है। जल-अग्नि-वायु-आकाश और भूमी का मुझमें वास, इनसे ही तो हम नश्वर है, ऋण जाने कितनों का सर है। आज जन्मदिन पर याद करूं, मन-बुद्धि-कर्म अर्पित करूं, ऋण जितनों का भी सर है, इस जनम चुकाने का अवसर है। इस जनम चुकाने का अवसर है। परिचय :- महेश बड़सरे राजपूत इंद्र आयु : ४१ बसंत निवासी :  इन्दौर (मध्य प्रदेश) विधा : वीररस, देशप्रेम, आध्यात्म, प्रेरक, २५ वर्षों से लेखन घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित ...
श्रमिक देव
कविता

श्रमिक देव

दिनेश कुमार किनकर पांढुर्ना, छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) ******************** जिनके लघु स्वेद कणों से, मिट्टी भी सोना हो जाती है, जिनकी भुजाओं के बल से, नई ज्योत्सना खिल जाती है!... ऐसे श्रम वीरों ने सदा से, धरती का रूप सँवारा हैं, हल, हथौड़ा, हँसिया से, मोड़ी इतिहास की धारा हैं!... इन्होंने दुनिया को सदा दिया, वैभव ऐश्वर्य सुख सुविधाएं, और बदले में सदा पाया हैं, आंसू क्रंदन अभाव पीड़ाएँ!.... धनपतियो का सारा वैभव, इनके श्रम पर टिका हुआ है, धरा का सम्पूर्ण निर्माण भी, इनके ही हाथो तो हुआ है!... भौगोलिक सीमाओ से परे, ये अनवरत सृजन करते जाते हैं, परं देवतुल्य श्रमिक कहीं भी, इसका भोग नही कर पाते हैं!... परिचय -  दिनेश कुमार किनकर निवासी : पांढुर्ना, जिला-छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र :  मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौ...
मंजिल
कविता

मंजिल

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** रास्ता भूल गई या मंजिल ठहर गई मेरे लिए कोई आ गया सफर में या मैं ठहर गई मंजिल के लिए वाकया यार सच है कि सफर कटता नहीं बिना हमसफर के लगता है, कोई हमसफर मिल जाएगा अगले पड़ाव के लिए। सफर में गुफ्तगू का मजा कुछ और ही होता है पराया होते हुए भी हमसफर अपना सा लगता है जिन्हें हम अपना समझे हुए हैं वह दो कदम साथ चलते हैं। बदली जो राह उनकी तेवर भी बदले-बदले लगते हैं ए दिल संभल, गुमान न कर किसी अजनबी का ये वह राहगीर जो ठहरे पानी में चांद सितारे से लगते हैं। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ीआप शासक...
शहरी/किसान
आंचलिक बोली

शहरी/किसान

ज्ञानेन्द्र पाण्डेय "अवधी-मधुरस" अमेठी (उत्तर प्रदेश) ******************** (अवधि भाषा) भले तू बाट्या बड़ा महानु, बड़ा सा अहै तोहारु मकानु, अही हमु किञ्चौ ना हलकानु, हे बबुआ हमहूँ अही किसानु।। बड़ु सुंदरु रहनि-सहनि तुम्हरा हर मनईन ख़ातिर इकु कमरा बढ़िया तोहार है खानु-पानु मुला लागतु हौ जैसेन बिमरा नूनु-भातु चटनी-रोटी ई हमारु पूरिउ-पकवानु।। हे बबुआ ... तू ए सी मा बासि करौ ठंडाई पी-पी ऐश करौ हमतौ सेंवारी मा घूमी मुला ठंड़ी-ठंड़ी सांसु भरौं फ्रिज कै तू पानी पिअतु अहा हमरौ गगरी मा हउ भरानु।। हे बबुआ ... तू सूटेड-बूटेड बना रहा हरु चौराहे पै अड़ा रहा हमतौ बस खेती-बारी मा चंहटा-मांटी मा सना रहा रूपिया-पैइसा से लदा अहा हमतौ अही मटिया मा धसानु।। हे बबुआ ... तू कामु किहा रूपिया पाया मनमाना सबकछु भरि लाया हमतौ खेते म जरी-मरी तब्बौ हाथे न दिखी माया तू मालु-...
सदा विजय होती है उनकी
कविता

सदा विजय होती है उनकी

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** जिनमें भरा स्वाबलंबन है, वे मुहताज न होते। सदा राज करते दुनिया पर, कभी ताज ना खोते। जो सागर का ह्रदय चीरते, वे मोती पाते हैं। जो गहरे जाने से डरते, बैठे रह जाते हैं। जो फैलाते पंख हवा में, अंबर में उड़ जाते। जो संकल्प करें ध्रुव जैसा, ऊँचाई हैं पाते। कर प्रयास जो सागर को भी, गागर में भरते हैं। उनकी सदा विजय होती है, जो प्रयास करते हैं। रखें इरादे जो फौलादी, सदा सफलता पाते। तूफानों से जो डर जाते, वे पीछे रह जाते। परशुराम सा तेज धारकर, जो आगे बढ़ते हैं। प्रभु की कृपा प्राप्त कर पंगु, उच्च शिखर चढ़ते हैं। वादा करें स्वयं से पक्का, रक्खें अटल इरादा। सारे काम करें दृढ़ता से, मिले भाग्य से ज्यादा। जो अपना पुरुषार्थ जगाकर, पौरुष दिखलाते हैं। पथरीली राहों पर चलते, वही शिखर पाते हैं। ...
निजी बयान है
हास्य

निजी बयान है

किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया (महाराष्ट्र) ******************** पार्टी के पदाधिकारी को बयान देने बोलता हूं तीर निशाने पर लगे तो सही है बोलता हूं कोई विवाद हो जाए तो प्लान बदल देता हूं यह उसका निजी बयान है ऐसा बोल देता हूं शाब्दिक बाण हमेशा स्टॉक में रखता हूं नहले पर दहला मारने बोलता हूं बात बिगड़ गई तो यू-टर्न ले लेता हूं यह उसका निजी बयान है ऐसा बोल देता हूं अक्सर चुनाव के समय बयान तीर से छोड़ता हूं बयान देने वालों की चैनल बनाता हूं दांव उल्टा पड़ गया तो पलट जाता हूं यह उसका निजी बयान है ऐसा बोल देता हूं शाब्दिक दांव-पेचों का खेल खूब खेलता हूं मान-सम्मान गिराने के दांव-पेच खेलता हूं उल्टा चोर कोतवाल को डांटे टेढ़ा पड़ा तो यह उसका निजी बयान है ऐसा बोल देता हूं मेरे धुर विरोधी विचारधारा वाले भी खेलते हैं प्री प्लानिंग से उल्टा सीधा सब बोलते हैं फायदा हुआ त...
भ्रम टूट गया
कविता

भ्रम टूट गया

प्रतिभा दुबे ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** अच्छा हुआ दोस्त, जो भ्रम टूट गया साथ होने का तेरा वादा, जो अब छूट गया ।। तुझे बादशाही मुबारक तेरे शहर की, मुझे मेरे गांव का मुसाफिर ही रहने दे।। अच्छा हुआ चलन नहीं रहा अब किसी के विश्वास का खुद के खुदा को आखिर किसी की कोई तलाश कहा।। दोस्ती के लिए तेरा अक्सर, मेरे घर आना, जाना, हम प्याला वक्त के साथ-साथ अच्छा हुआ किताबी बातों की तरह छूट गया।। आज ठोकर खाई है तब जाकर कहीं आज मतलबी दुनिया की ये, दोस्ती समझ आई ।। हमने तो कोशिश की थी रंग जमाने की यारी में, तेरे विचारों की भी कहीं बहुत गहरी खाई थी शायद।। दोस्ती के लिए, कहां रहा गया वह दोस्ताना माहौल पहिले जैसा मैं तो मुसाफिर हूं मेरे गांव का ही, मैंने तेरे शहर आना अब छोड़ दिया।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे (स्वतंत्र ल...