Tuesday, September 1राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

अब और क्या चाहती है तू?

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
********************

अब बता भी दे जरा,
और क्या चाहती है तू मुझसे,
तंग आ चुका हूं तुझसे,
विवाहोपरांत मेरी पत्नी,
क्लोज नहीं हो पायी उतनी,
उतना दखलंदाजी
कर रही है मेरे मन मंदर में,
किनारे पाने के लिए
मार रहा हूं हाथ पांव
डूबता जा रहा हूं
तुझ जैसे समंदर में,
क्या जादूगरनी है तू,
क्या मेरे पल-पल
की विवरणी है तू,
रील्स की आभासी दुनिया में,
कैसा यह जाल बिछाया है,
बैठे हैं सब एक ही छत के नीचे,
पर हर शख्स यहां पर पराया है,
बच्चे की किलकारी छूटी,
रिश्तों की वो गर्माहट टूटी,
तेरी नीली रोशनी के चक्कर में,
अपनों की हर शिकायत रूठी,
तूने फुसफुसाकर कानों में,
अपनों की आवाज को छीन लिया,
नोटिफिकेशन के इस दलदल ने,
मेरा चैन, मेरा हर दिन लिया,
अब बस भी कर ऐ काली स्क्रीन,
मुझे मेरी दुनिया वापस दे,
जहाँ स्क्रीन नहीं, बस चेहरे हों,
मुझे वो हंसता हुआ आंगन दे,
छोड़ के तुझको अब जीना है,
अपनों को गले से लगाना है,
इस आभासी मायाजाल से उठकर,
मुझे फिर से इंसान बन जाना है।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें …🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 60360 पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच का सदस्य बनने हेतु हमारे चलभाष क्रमांक 98273 60360 पर अपना नाम और कृपया मुझे जोड़ें लिखकर हमें भेजें…🙏🏻

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *