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कहाँ गई तुम दीदी

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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घर के नींव की
ईंट थी दीदी तुम
सहसा पतझड़ी हवा ने
बिखेर दिए हर
ईट इस घर की,
विरान कर गई वो आंगन
जिसमें तुम्हारी मुस्कुराहटें
खिलखिलाती थी!!

हम एक वृक्ष से उत्पन्न पत्ते,
नहीं जानते थे, कहाँ जाते
है शाख से टूटकर
धरा पर सूखे पत्ते सा कर
गई जीवन हम सबका,
नहीं समझ पाये तुम्हारा
यूँ चले जाना आजतक !!

जिंदगी के हर उतार-चढाव
की साथी थी तुम,
आज भी आंखों की
नमी हो तुम,
मेरी हंसी में कौन
हॅसेगा साथ मेरे,
दुःख में कैसे मुस्कराते हैं,
सिखाती थीं तुम !!

तुम्हारा चले जाना
पिताजी सह ना सके ,
टूट कर बिखरे हम अब
तक जुड़ ना सके
थोड़ा तो ठहर जाती
साथ हमारे
माँ को कैसे ऐसे
छोड़ गई तुम ??

आज भी हर एक के
हृदय में बसी हो तुम,
मुझे पता है मेरे
आसपास ही हो तुम,
बार बार दिल कहता है
कहीं से लौट आओगी तुम
अपनी ना खत्म होने
वाली मुस्कराहट लेकर !

जीवन और मृत्यु
अपरिहार्य चक्र है जाना है
जीवन क्षण भंगुर है
ये भी माना है
किन्तु प्रेम शाश्वत है
जो मेरे दिल मे बसा है
तुम्हारे लिए, वो साथ रहेगा
मेरे दुनिया से
विदा होने तक !!

मेरा समय भी हार गया
आज मन व्यथित है,
कैसे विश्वास दिलाऊं
खुद को तुम नहीं हो,
खुदा से मांग लू दीदी तुमको
अपने लिए, हर जन्म में
मेरी दीदी बनकर!!

परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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