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विराम कायरता नहीं

शिवदत्त डोंगरे
पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
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कुछ लोग संवाद
नहीं करते
वे रणनीति खेलते हैं।
वे जानबूझकर
ऐसे शब्द चुनते हैं
जो आपके तर्क पर नहीं,
आपकी नसों पर वार करें।

उनका उद्देश्य
समाधान नहीं होता,
बल्कि आपको
भावनात्मक रूप से
असंतुलित करना होता है।
ताकि आप मुद्दे से हटें,
और वे आपकी
प्रतिक्रिया को
आपकी हार
बना सकें।

ऐसे लोग बहस के
बीच अचानक से
आपके चरित्र पर
प्रश्न उठाएंगे,
आपकी किसी
पुरानी भूल को उछालेंगे,
या आपकी आवाज़, भाषा,
लहजे पर टिप्पणी करेंगे।

असल विषय वहीं
पड़ा रह जाता है
और संवाद एक
निजी युद्ध में
बदल दिया जाता है।
क्रोध की अवस्था में
तर्क धुंधला पड़ जाता है।
शब्द तेज़ हो जाते हैं,
पर अर्थ कमजोर
हो जाता है।

और ठीक यही
वह क्षण होता है
जहां चालाक व्यक्ति
जीत का
भ्रम रच लेता है।
इसलिए जब भी
ऐसे किसी
व्यक्ति से सामना हो
अपने भीतर के
पॉज़ बटन को सक्रिय रखें।

पॉज़ का अर्थ चुप
हो जाना नहीं है,
बल्कि खुद को
बचा लेना है।
एक गहरी सांस
एक क्षण का मौन
और एक सीधा प्रश्न
हम विषय पर ही
बात कर रहे हैं, है ना?

कई बार सबसे
सशक्त उत्तर तुरंत
दिया गया जवाब
नहीं होता,
बल्कि रोकी हुई
प्रतिक्रिया होती है।

विराम कायरता नहीं है।
विराम आत्म-संरक्षण है।
एक सचेत ठहराव,
जहाँ आप स्वयं से पूछते हैं
“मैं प्रतिक्रिया दे रहा/रही हूँ
या उत्तर?
कभी-कभी
सबसे गहरी बुद्धिमत्ता
स्पष्ट शब्दों में नहीं,
संयमित मौन में
प्रकट होती है।

परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक)
पिता : देवदत डोंगरे
जन्म : २० फरवरी
निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है।


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