Tuesday, July 14राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

इंसान में भगवान समाए हैं

डॉ. रमेशचंद्र मालवीय
इंदौर (मध्य प्रदेश)
********************

हम मंदिर-मंदिर में भगवान ढूंढते हैं
लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं।
हम इधर-उधर ही भटकते रहते हैं
अपनी ही उलझन में अटकते रहते हैं
आशा और निराशाओं के झूले पर
हम हर दिन-रात हीलटकते रहते हैं
हम तीर्थ और धामों में घूम आए हैं
लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं।
हम नहीं जानते कि भगवान कहां है
हम नहीं जानते उनकी पहचान कहां है
कहते हैं कि वो कण-कण में समाया है
लेकिन उनकी धरती-आसमान कहां है
हम उनको मूर्तियों में सजाए हैं
लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं।
आखिर भगवान को हम कब पहचानेंगे
वो हृदय में बसे है ऐसा हम कब मानेंगे
हर इंसान के हृदय में भगवान विराजे हैं
इंसान में है भगवान उसे हम कब जानेंगे
हम पत्थर में ही भगवान को पाए हैं
लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं।

परिचय :- डॉ. रमेशचंद्र मालवीय
निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।

आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻

आपको यह रचना अच्छी लगे तो साझा अवश्य कीजिये और पढते रहे hindirakshak.com राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच से जुड़ने व कविताएं, कहानियां, लेख, आदि अपने चलभाष पर प्राप्त करने हेतु राष्ट्रीय  हिन्दी रक्षक मंच की इस लिंक को खोलें और लाइक करें 👉 👉 hindi rakshak manch  👈… राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच का सदस्य बनने हेतु अपने चलभाष पर पहले हमारा चलभाष क्रमांक ९८२७३ ६०३६० सुरक्षित कर लें फिर उस पर अपना नाम और कृपया मुझे जोड़ें लिखकर हमें भेजें…🙏🏻.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *