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दुनिया देखे नाही
कविता

दुनिया देखे नाही

जयप्रकाश शर्मा जोधपुर (राजस्थान) ******************** बुद्धि ये कहती है सयानों से मिलकर रहना हदय ये कहता है दीवानों से मिलकर रहना अपने टिकने नहीं देते हैं कभी चोटी पर जान-पहचान अनजानों से बनाए रखना अब आसान नहीं है उसे रोक के रखना वह मृत्यु है किसी की नहीं सुनती कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूढै वन मांहि.. ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखे नांहि..! परिचय :- जयप्रकाश शर्मा निवासी : जोधपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak1...
अपना कर्म सुधारों भाई, जीवन की यही सच्ची भलाई
कहानी

अपना कर्म सुधारों भाई, जीवन की यही सच्ची भलाई

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** लोग कहते है कि सतनाम कहो पाप कट जायेगा, राम नाम कहो पाप कट जायेगा, गंगा में नहा लो पाप कट जायेगा। इसलिए मैं मानता हूँ कि पाप, तुम करो ही मत। कभी हो गया तो हो गया, आगे अब गलती न करो। गलती तो इंसान से ही होती है, दिवार से नहीं। अत: गलती से बचने के लिये गलती का रास्ता छोड़ना है, यह नहीं कि कोई मंत्र-वंत्र जपकर उसको काटने की बात करनी है। कोई मंत्र-वंत्र जपने की आवश्यकता नहीं है कि जिससे आपका पाप कट जाए। सब कुछ सामने आता है। समझ है अपने कर्म को सुधार करने की, इसी में ही मानव समाज की भला है। मानव को समाज में रहकर जीवन जीने की कला सीखना चाहिए। सदाचार व नैतिकता पर आधारित मार्मिक कहानी का अंश राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच के पावन पटल पर रखने का प्रयास है। इसी आशा और विश्वास के साथ पाठकगण सहर्ष अपनाएंगे और इसके अध्ययन मनन से सच...
वनिता
आलेख

वनिता

अनन्या राय पराशर संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश) ******************** हे नारी !! तुम्हें भय कैसा आँखों मे अश्रु और माथे पर ये लकीरें...?? तुम्हें दुख किस बात का है...?? ऐसी कौन सी पीड़ा है जो तुम्हें अंदर ही अंदर खाये जा रही...?? मैं क्या कहूँ कैसे कहूँ, मुझसे कुछ कहा भी नहीं जा रहा। मैं इस युग में खुद का अस्त्तित्व मिटते देख रही हूँ। मैं अबला जैसे नामों से पुकारी जा रहीं हूँ। मेरे हाथों में सजी ये हरी लाल चूड़ियाँ कमज़ोर एवं नकारे इंसान के लिए प्रयुक्त होने लगी हैं। और पैरों में सजे ये पायल बेड़ियों का रूप ले चुके हैं। मेरे अपने भी मुझे भार समझ बैठे हैं। उन्हें लगता है मैं कमजोर हूँ, मैं कुछ नहीं कर सकती। तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ। मुझे लगता है मेरा होना सच में ही व्यर्थं है। तुम्हीं बताओं मैं कैसे बतलाऊँ उन्हें अपनी महत्ता...?? लेखिका- हे देवी, आप बिलकुल भी परेशान न हो औ...
“बाकी सब वैसा का वैसा ही तो रहेगा” (नारी व्यथा)
कविता

“बाकी सब वैसा का वैसा ही तो रहेगा” (नारी व्यथा)

कु. आरती सिरसाट बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) ******************** नाम बदलेगा, गाँव बदलेगा, शहर बदलेगा, यहां तक की प्रदेश भी बदल जाएगा.... ज्यादा कुछ नही बस पहचान और पता ही तो बदलेगा... बाकी सब वैसा का वैसा ही तो रहेगा... दर्द वहीं रहेगा... सहना भी रोज की तरह ही होगा... कुछ भी तो नही बदलेगा... सहनशीलता की सीमा को थोड़ा ओर बड़ाना होगा... ज्यादा कुछ नही बस खामोशी से ही हर आँसू भी पीना होगा... बाकी सब वैसा का वैसा ही तो रहेगा... ना तो कोई माँ की तरह बिस्तर पर खाना लाएगा... ना ही पापा की तरह कोई सुबह की सलाह देने वाला होगा... अंदर से रहकर अकेला ओरों के सामने हँसना होगा... ज्यादा कुछ नही बस अपना वजन खुद को ही उठाना होगा... बाकी सब वैसा का वैसा ही तो रहेगा... सारे अरमानों की करके हत्या इल्जाम खुद पर ही लगाना होगा... बेबस चीखती जुबान को मन ही मन में दफ़न करना हो...
मानव की मानवता
कविता

मानव की मानवता

विरेन्द्र कुमार यादव गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) ******************** मानव की मानवता का हो गया पतन, इसलिए बीमार है विश्व व सारा वतन। खो रहे है सभी अपने चयन व अमन, मानव ही ने किये सारे दूषित ये पवन। जंगल काट बनाये कारखाने व भवन, कोरोना बीमारी के जिम्मेदार है कवन। मानव आंक्सीजन के स्रोत करे गमन, कैसे बचाये मानव स्वयं का ये जीवन। प्राकृति से बधि है हमारी जीवन डोर, कोरोना ही कोरोना फैला चारों ओर। हे!मानव तुम हैवानियत को दो छोर, निकाल दो मन से छिपा है जो चोर। चल नहीं रहा है मानव का कोई जोर, हे! मानव मानवता ही धर्म-कर्म मोर। सच्चाई से मानव आप मुख न मोड़, प्राकृति से सच्चा रिश्ता लो तुम जोड़। लौट आयेगा सबका चयन और अमन, खुशहाल हो उठेगा अपना सारा वतन। परिचय :- विरेन्द्र कुमार यादव निवासी : गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना...
बाबा केदारनाथ
भजन

बाबा केदारनाथ

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** कुछ न कुछ तो कमी है तड़प में, जिससे बाबा ने दर न बुलाया। आके बाबा ने कानों में बोला, तू तो दस रूप धरके है आया। कुछ न कुछ... रूप तेरे अनेकों हैं बाबा, जिनमे १२ हैं ज्योति से प्रकटे। ११ के हो चुके मुझको दर्शन, प्राण तेरे दरश को है अटके। कई वर्षों से पंक्ति में हूँ मैं, क्यों दयालु न मुझको बुलाया। कुछ न कुछ... हम हैं संसारी माया में उलझे, फिर भी तेरे दरस की है इक्षा। पास होकर दिखाएंगे बाबा, चाहें जितने कठिन लो परीक्षा। तेरे ही अंश से हैं जो प्रकटे, उनने सेवक है हमको बनाया। कुछ न कुछ... जिनके सुमिरन में प्रतिपल रमे तुम, उनकी थोड़ी कृपा मैंने पाई, मेरे आराध्य हनुमान जी ने, नाम महिमा है मुझसे लिखाई। गीत हनुमत ने ऐसे लिखाये, श्रेष्ट भक्तों ने है झूम गाया। कुछ न कुछ... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा ...
निदान
लघुकथा

निदान

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** मम्मी, आप इतनी चिंता क्यों कर रही हो? बेटी चिंता क्यों ना करूँ? मम्मी क्या चिंता करने से मेरी शादी हो जाएगी? बेटी, कह तो तुम ठीक रही हो, पर क्या करूँ, माँ हूँ ना? माँ, हो तभी तो कह रही हूँ। तुम चिंता मत करो। जिया की माँ, कहाँ खोई हुई हो? आओ बहन, बैठो। बस बेटी की चिंता खाए जा रही हैं। क्या हुआ एकाएक जिया की चिंता? हाँ, बहन तुम्हारी बेटी नहीं है ना। तुम्हें क्या पता बेटी की चिंता क्या होती हैं? हाँ, बहन, तुम ठीक कह रही हो। बेटों की तो कोई चिंता ही नहीं होती। मैंने अपने बेटे को खूब पढ़ा-लिखा दिया हैं। पिछले दो साल से मेरा बेटा सरकारी नौकरी के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। हमारे पास जमीन-जायजाद भी नहीं है। मैंने तो सारी जिंदगी इस कच्चे मकान में निकाल दी। आगे वह कुछ ना कह सकी। बहन, चिंता ना करो, तुम्हारा बेटा सुमित,बहुत मेहनती हैं। उसे...
एकांतवास
लघुकथा

एकांतवास

डॉ. पवन मकवाना (हिंदी रक्षक)  इन्दौर (मध्य प्रदेश) ******************** वृद्धाश्रम में आज कोरोना की जांच करने के लिए सरकारी अस्पताल से डॉक्टर और नर्स आये हुए थे सभी वृद्धजन कतार में खड़े अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे ... बाबा आपका नाम क्या है ... नर्स सभी के नाम पूछती जाती... व आधार कार्ड देखने के बाद उन्हें सुई (कोरोना का टीका) लगा देती... दिन भर यही क्रम चलता रहा शाम के ५ बज चुके थे डॉक्टर और नर्स जाने के लिए सामान समेटने लगे.... तभी कमर झुकाये लाठी के सहारे चलते हुए एक बूढी अम्मा आई और नर्स से पूछा- मैंने सूना है की एकांतवास (कोरेन्टाइन) में रहने से कोरोना पास नहीं आता है... ? नर्स बोली- जी सही कहा आपने ... बूढी अम्मा पलटकर जाने लगी तभी नर्स ने कहा अम्मा सुई (टीका) तो लगवाती जाओ ...!! अम्मा ने पलटकर देखा और धीरे से बुदबुदाई ... मुझे नहीं लगवाना टीका वीका २० बरस से मैं अपने परिवा...
बाकी है
कविता

बाकी है

जयश्री सिंह बैसवारा सोनभद्र, (उत्तर प्रदेश) ******************** अभी तो कदमों को राहों पर लाया है उड़ान अभी बाकी है, इम्तिहान कहाँ खत्म हुआ है मेरा मंज़िल-ए-मुकाम अभी नहीं हासिल है, वक्त बेवक्त चल पड़ती हूँ उस ओर अभी तो सारा नजारा बाकी है, जिंदगी जो रूकी हुई थी मेरी कल तक उसे आगे बढ़ना बाकी है, पल भर की रौनक नहीं अब यहाँ माथे पर मेरे निशान बाकी है, रूकना अभी कहाँ मयस्सर है मेरे लिए अभी काफिलों का मेरे पिछे चलना बाकी है, रौनक तो है अभी भी महफ़िलो में मगर महफ़िल का मेरे नाम होना बाकी है, तुम्हारा इतराता भी ठीक है मगर मेरे गूरूर की आंधी का आना अभी बाकी है, शहर भले ही तुम्हारा क्यूँ न हो मगर भीड़ मेरे नाम की हो, ये नजारा भी बाकी है, चल देखते हैं कब तक खत्म नहीं होती ये जंग अभी वक्त का मेरी तरफ होना भी बाकी है। परिचय :- जयश्री सिंह बैसवारा निवासी : सोनभद्र, (उत्त...
खो देते है
कविता

खो देते है

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** मत पिलाओं अपने आँखों से इतना की हम उठा न सके। मत दिखाओ अपने हुस्न को कि हम नजर हटा न सके। जब भी होते है दीदार तुम्हारे खो देते है अपना सुध-बुध। और तुम्हें ही अपनी नजरो से देखते रहते है।। खोलकर उलझे हुए काले बालों को जब तुम सुलझती हो। ऐसा लगता है जैसे काली घटायें घिर आई हो आंगन में। अपने हाथो से जब तुम बालों को सहलती हो। तब कभी-कभी चाँद सा सुंदर चेहरा दिख जाता है।। भले क्यों न हो अमावस्या की रात पर उसमें भी पूनम का चाँद दिखते हो। जो देखने वालो की दिलकी धड़कनो को बड़ा देती है। और अंधेरी रात में भी तुम चाँद सी खिल जाती हो। और चाहने वालो के दिल में मोहब्बत के दीप जला देते हो।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कं...
कुंडल छंद “ताँडव नृत्य”
छंद

कुंडल छंद “ताँडव नृत्य”

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' तिनसुकिया (असम) ******************** कुंडल छंद विधान यह २२ मात्रा का सम पद मात्रिक छंद है जिसमें १२,१० मात्रा पर यति है। अंत में दो गुरु आवश्यक; यति से पहले त्रिकल आवश्यक। मात्रा बाँट :- ६+३+३, ६+SS चार चरण का छंद। दो दो चरण समतुकांत या चारों चरण समतुकांत। नर्तत त्रिपुरारि नाथ, रौद्र रूप धारे। डगमग कैलाश आज, काँप रहे सारे।। बाघम्बर को लपेट, प्रलय-नेत्र खोले। डमरू का कर निनाद, शिव शंकर डोले।। लपटों सी लपक रहीं, ज्वाल सम जटाएँ। वक्र व्याल कंठ हार, जीभ लपलपाएँ।। ठाडे हैं हाथ जोड़, कार्तिकेय नंदी। काँपे गौरा गणेश, गण सब ज्यों बंदी।। दिग्गज चिंघाड़ रहें, सागर उफनाये। नदियाँ सब मंद पड़ीं, पर्वत थर्राये।। चंद्र भानु क्षीण हुये, प्रखर प्रभा छोड़े। उच्छृंखल प्रकृति हुई, मर्यादा तोड़े।। सुर मुनि सब हाथ जोड़, शीश को झुकाएँ। शिव-शिव वे बोल रहें,...
मोहब्बत
कविता

मोहब्बत

ममता रथ रायपुर (छत्तीसगढ़) ******************** श्रद्धा का दूसरा नाम है मोहब्बत दो दिलों का पावन एहसास है मोहब्बत किसी के दर्द से किसी का रोम-रोम कांपने लगे उसी चाहत का नाम है मोहब्बत जिसको हृदय दुआओं में मांगे रब से उसी इबादत का नाम है मोहब्बत जिसकों आँखों में छुपाकर रखा जाए उसी ख्वाब का नाम है मोहब्बत जो नफ़रत की गर्म धूप से बचाए उसी प्यार की छाँव का नाम है मोहब्बत परिचय :-  ममता रथ पिता : विद्या भूषण मिश्रा पति : प्रकाश रथ निवासी : रायपुर (छत्तीसगढ़) जन्म तिथि : १२-०६-१९७५ शिक्षा : एम ए हिंदी साहित्य सम्मान व पुरस्कार : लायंस क्लब बिलासपुर मे सम्मानित, श्री रामचन्द्र साहित्य समिति ककाली पारा रायपुर २००३ में सांत्वना पुरस्कार, लोक राग मे प्रकाशित, रचनाकार में प्रकाशित घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचि...
स्त्रियां
कविता

स्त्रियां

अर्चना लवानिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** स्त्रियां समाहित होती हैं घर के कोने कोने में अखबार की घड़ी से चाय की चुस्की में सलीके से बिली गोल रोटी और सोंधी-सोंधी खुशबू में आंगन में दाना चुगते चह-चहाते पंछियों के सुर में गमलो और बैलों में निकली नव कलियों में स्त्रियां समाहित है ... तुलसी चौबारे पर जलते दिए में सुघडता से चमकते घर और लीपे पुते आंगन में स्त्रियां समाहित होती है... अभावों को खूंटी टांग चेहरे की सहज मुस्कान में दुख दर्द की विभीषिका में सुख का आंचल बंन कर स्त्रियां समाहित होती हैं... पेपर की संभाली कतरन ओ पन्नों में पुरानी चीजों से फिर नई साज सवार का कौशल बनकर स्त्रियाँ समाहित है .... पेंसिल से लिखें नए नवेले कच्चे अक्षरों में जीवन सुख दुख का सहज गान और लोरी बनकर स्त्रियां समाहित है... संध्या दीपक आरती और घंटी के सुर में...
हुस्न देखा तेरा
ग़ज़ल

हुस्न देखा तेरा

रजनी गुप्ता 'पूनम चंद्रिका' लखनऊ ******************** बहर - २१२ २१२ २१२ २१२ हुस्न देखा तेरा तो ठगा रह गया चाँद अपनी जगह पर खड़ा रह गया क़ह्र अँगड़ाइयाँ ख़ूब ढाती रहीं पास मेरे न कुछ भी बचा रह गया ज़ुल्फ़ तेरी घटा बन गई रात को दिल का आँगन यहाँ भीगता रह गया गिरह अनकही सी अधर ने कही बात जब आपको देखकर देखता रह गया कर रही आँख से जो इशारे सनम मैं तो तेरी अदा पर लुटा रह गया खिल रही है ये 'रजनी' सितारे लिए आसमां का भी दामन भरा रह गया परिचय : रजनी गुप्ता 'पूनम चंद्रिका' उपनाम :- 'चंद्रिका' पिता :- श्री रामचंद्र गुप्ता माता - श्रीमती रामदुलारी गुप्ता पति :- श्री संजय गुप्ता जन्मतिथि व निवास स्थान :- १६ जुलाई १९६७, तहज़ीब व नवाबों का शहर लखनऊ की सरज़मीं शिक्षा :- एम.ए.- (राजनीति शास्त्र) बीएड व्यवसाय :- गृहणी प्रकाशन :- राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर म.प्र. के  hindi...
अटरिया
कविता

अटरिया

डॉ. गुलाबचंद पटेल अहमदाबाद (गुजरात) ******************** कारे-कारे बदरा रे, तुम मत आना मेरी अटरिया पर मे नीद मे सोया था सपना मे खोया था कारे कारे बदरा रे, हमे नीद से क्यू जगाया रे? हमने सुन्दर सपना देखा था तुमने सपना क्यू तोड़ दिया रे? आकर मेरी अटरिया पर तुमने हमे क्यू जगाया रे? सपने में वो आई थी, क्यू तुमने भगा दिया रे? बदरा तुम पापी हे आंखो से नीद भगा दी रे कभी तुम पवन संग आया रे प्रीत का संदेश तुम लाया रे पवन संग हमे भगा ले गया रे बारिश के संग प्रिया को पाया रे कारे कारे बदरा तुम मेरी अटरिया पर जरूर आना. प्रिया का संदेश तुम जरूर लाना परिचय :-  डॉ. गुलाबचंद पटेल निवासी : अहमदाबाद (गुजरात) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
माल पराया
ग़ज़ल

माल पराया

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** माल पराया खाने वाले, जो धन जोड़ रहे हत्यारे। कितने पागल हैं अपनी ही, किस्मत फोड़ रहे हत्यारे।। जैसे गीद्धों की बन आती, झपट रहे देखो ये हरसूं। अवसर खोज रहे अवसर में, कैसे दौड़ रहे हत्यारे।। कोरोना में जिंदा लाशों, के अंबार अस्पतालों में। मौका पाते ही ताकत से, खूब झंझोड़ रहे हत्यारे।। जिनका फर्ज रहा है आंसू, इस विपदा के वक्त में पोंछें। बेशर्मी से देखा वो ही, खून निचोड रहे हत्यारे।। हमदर्दी के पथ को थामे, लोग यहां कम ही दिखते हैं। दुनिया में जो डूब गए हैं, रिश्ते तोड़ रहे हत्यारे।। कैसे हैं नालायक वे जो, फूलों कांटो को ना जानें। कांटो पर ही चलने की जो, करते होड़ रहे हत्यारे।। सेवा का अवसर सम्मुख हैं, ऐसे जैसे घट पीयुष का। तज कर ऐसा अवसर लगता, घट वो फोड़ रहे हत्यारे।। पर...
पद्मावत छंद
छंद

पद्मावत छंद

बलबीर सिंह वर्मा "वागीश" सिरसा (हरियाणा) ******************** पद्मावती छ्न्द १०, ८, १४ की यति से ३२ मात्रा का सम मात्रिक छ्न्द, अंत में दो गुरु मात्रा अनिवार्य, जगण नहीं आना चाहिए। दो-दो चरण तुकान्त। (१) कंचन सी काया, मन भरमाया, बिखरी मुख पर ज्यों लाली। हैं अधर गुलाबी, बनी नवाबी, लगती कितनी मतवाली। ये नैन नशीले, लगें सजीले, सूरत नारी की प्यारी। ईश्वर की माया, पार न पाया, सम्मोहित दुनिया सारी। (२) नारी थी अबला, अब है सबला, जग पालक है यह नारी। आँगन की छाया, घर की माया, फिर भी रहती दुखियारी। नारी की पूजा, ईश्वर दूजा, सबने महिमा है गाई। दुर्गा ये काली, ममता वाली, है यही भवानी माई। (३) हे नंद दुलारे, यशुमति प्यारे, राधिका पुकारे आओ। करो नहीं देरी, सुन लो मेरी, मुरली की तान सुनाओ। दर्शन की प्यासी, कान्हा दासी, आकर अब गले लगाओ। छोड़ों मनमानी, शाम सुह...
एक बहु
कविता

एक बहु

मुस्कान कुमारी गोपालगंज (बिहार) ******************** हर रोज सहती डाट सबकी बस इतना ही बोलती है गलती नही होगी अबकी रात को जब सोती है घर की याद उसे आती है बहु भी किसी की बेटी है लोगो को ये बात समझ क्यों नही आती है। रोज सुबह जल्दी उठती है सुबह से काम कर करके रात को थक कर सो जाती है काम कर के हो जाती उससे गलती है तुम्हारी मां ने यही सिखाया यही बात सबसे सुनती है बहु भी किसी की बेटी है ये बात समझ क्यों नही आती है। अपने सपने को छोड़ कर दूसरे के सपनो को पिरोती है किसी और के सपने को लेकर वो खुद परेशान रह जाती है कभी हिम्मत नही करती है अपने सपनो को कहने की कह देती तो, हमारे घर की बहुएं ये काम नही करती है यही उसे सुनने को मिलती है बहु भी किसी की बेटी है ये बात समझ क्यों नही आती है। सासु मां की ताने सुनती है वो भी कुछ नहीं बोलते जिनके लिए वो सब छोड़ आई है आखिरकार रोकर वो मां को याद करती है बहु भी ...
“राष्ट्रीय आंचलिक संस्था” मे श्रीमती कमला सिन्हा सम्मान-२०२१ संपन्न हुआ”
साहित्य समाचार

“राष्ट्रीय आंचलिक संस्था” मे श्रीमती कमला सिन्हा सम्मान-२०२१ संपन्न हुआ”

भारत की साहित्यिक संस्था "राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान" द्वारा श्रीमती कमला सिन्हा जी के स्मृति मे आयोजित अखिल भारतीय साहित्यिक प्रतियोगिता संपन्न हुआ! इस कार्यक्रम को संस्था के राष्ट्रीय महासचिव रूपेश कुमार द्वारा आयोजित किया गया "श्रीमती कमला सिन्हा" के प्रथम स्मृति दिवस पर आयोजित कार्यक्रम मे कमला जी के भतीजे रूपेश कुमार ने कहा की श्रीमती कमला सिन्हा एक धार्मिक, धर्मप्रयाण, एव समाजिक सरोकार से परिपूर्ण महिला थी! इनके पति सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया के अति महत्वपूर्ण पद आंतरिक लेखा निरीक्षक के पद से सेवा मुक्त हुए थे ! इनका पुरा जीवन आध्यात्मिकता मे गुजरा था ! लेकिन ईश्वर के आगे किसी की नही चलती है ! काल की कपाल ने एक झोखे मे नश्वर शरीर से अमर आत्मा को हम सभी से दूर कर दिया ! इस विशाल प्रतियोगिता मे पूरे भारत के सभी प्रांतों के एक से बढ़कर एक साहित्यकारों ने भाग लिया! सभी की रचनाएँ काबिले...
सब खत्म…?
कविता

सब खत्म…?

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ****************** कई बार दरवाजे पर ही अड़ जाता हैं मन मेरा मुझसे पूछता हैं सब कुछ खत्म ? अब कुछ नहीं बचा ? मै घबरा जाता हूँ हाथ पांव कंपकंपाने लगते है मेरा मन मेरा बदन सुन्न हो जाता है और सवाल अनाथ दरवाजे पर ही चस्पा हो जाता है !! घबरा कर मैं अपने गुरु के यहाँ दौड पड़ता हूँ सर्वनाश का भय दिखाकर पीठ पर गुरु दक्षिणा का बोझ लादकर गुरु मुझे उपदेश देता है इस जीवन में कुछ भी खत्म नहीं होता अंत से ही तो सब शुरु होता हैं !! यह समझना जरुरी है कि क्या तो अन्त हैं और क्या तो शुरुवात हैं ? बावरा मन अन्त को ही शुरुवात समझ लेता हैं पागल मन शुरुवात को ही अन्त समझ लेता हैं अस्थिर मन समाप्ति के बाद शुरुवात की कामना करता हैं शुरू में समझता नहीं मन कोई संकेत अंत दफ़ना जाते जाने कितने रहस्यों के संकेत फिर भटकन भरा जिंदगा...
किसान देश का है
कविता

किसान देश का है

श्‍वेता अरोड़ाशाहदरा दिल्ली****************** हमारी एक एक रोटी केनिवाले पर नाम उसका है,धधकती गरमी मे,ककडती सर्दी मे,करता है वोखून पसीना एक,ये अहसान उसका है,ना रह जाए भूखे हम,मेहनत दिनरात वो करता है,ये तो देश काकिसान है जनाब,अनाज के एक-एकदाने को सोने कीतरह संजोता है!गर्म लू के थपेडे खाकरयो भूख हमारी मिटाता है,करो कुछ कोशिशे ऐसी किना रह जाए बेटीउसकी बिन ब्याही,बेटा उसका पढ जाए,कर्ज के बोझ मेआकर ना वोमौत को गले लगाए,अगर हम कुछ कर पाएऐसा तो अहसान नही,बस ये तो हमारीतरफ से ब्याज उसका है,क्योकिहमारी एक एक रोटी केनिवाले पर नाम उसका है! परिचय : श्‍वेता अरोड़ानिवासी : शाहदरा दिल्लीघोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा ...
माँ को खोजता हूँ
कविता

माँ को खोजता हूँ

धैर्यशील येवले इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जब मैं निराशा से भर जाता हूँ माँ को खोजता हूँ माँ, माँ तुम कहा हो, माँ मैं माँ को चहु और खोजते, माँ कहि नही पा कर हताश हो घर के एक कोने में चुपचाप बैठ जाता हूँ। अपने ही भीतर से मुझे एक स्नेह भरी आवाज़ सुनाई देती है, क्यो उदास हो रहे हो मैं सदा ही तुम्हारे साथ हूँ तुम्हारे भीतर ही हूँ मैं मैं चौकन्ना हो जाता हूँ। खुशी से बुदबुदाता माँ माँ क्या तुम सचमुच मेरे भीतर हो फिर वही स्नेहसिक्त आवाज आती है हा बेटे हा मैं सचमुच तुम्हारे भीतर हूँ मैं खुशी से झूम जाता हूँ। मुझे फिर सुनाई देता है जब तुम प्रेम व स्नेह से सदव्यवहार करते हो मैं ही तो होती हूँ जब तुम्हारा ह्रदय परपीड़ा से भर जाता है मैं ही तो होती हूँ तुम दुसरो की चिंता कर उन्हें मदद करते हो वो चिंता वो मदद मैं ही तो होती हूँ, प्रेम व दया से भर जब तुम अश्रु बहाते हो तुम्हारे वो अश्रु...
सिसकियां
कविता

सिसकियां

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** हर ओर अफरातफरी है हर चेहरे पर खौफ है, दहशत है। घर, परिवार का ही नहीं बाहर तक फिज़ा में भी अजीब सी बेचैनी है। माना सिसकियां भी सिसकने से अब डर रहीं। आज सिसकियां भी मानव की विवशता देख सिसक रहीं। सिसकियों में भी संवेदनाओं के स्वर जैसे फूट पड़े है, मानवों के दुःख को करीब से महसूस कर रहे हैं। पर ये भी तो देखो सिसकियां भी मानवीय संवेदनाओं से जुड़ रहीं, हमें नसीहत और हौसला दोनों दे रहीं, अपनी हिचकियों के बहाने से हमें खतरे से आगाह भी कर रहीं। अक्षर ज्ञान नहीं सिसकियों को इसीलिए अपने आप में ही सिसक रहीं अपनी हिचकियों से संवेदनाओं को व्यक्त कर रहीं। सुन सको तो सुन लो, सिसकियां तुमसे क्या कह रहीं? न हार मानों तुम शत्रु से न उसे अजेय मानों। रख मन में पूरी आशा करो खुद पर भरोसा कस कर कमर अपनी प्रयास करो जोर से, दूर होगी सारी दुश्वा...
खोज रही है पलकें
कविता

खोज रही है पलकें

मनोरमा जोशी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** राहें नयी दिखा जाता जो, दुखः से भरे जहाँन को। ढूंढ रही है कब से दुनियां, ऐसे वीर जवान को। अंगारों पर चलने वाला दीपशिखा सा जलने वाला, जिसनें पिया जहर का प्याला पर बांटा जग को उजियारा। आंच नहीं आने दी जिसने संकट में भी आन को। ढूंढ रहीं है कब से दुनियां, ऐसे वीर जवान को। जिसने सुख की बात न जानी तूफानों से हार न मानी, अंगत सा निशछल अभिमानी, निर्धन किन्तु कर्ण सा दानी। तैरा कर जिसनें दिखलाया जल में भी पाषाण को। ढूंढ रही है कब से दुनियां ऐसे वीर जवान को। जीवन जो कर्मो में बीता, नहीं प्यार का पनघट रीता जिनका जीवन तप की गीता, लोभ मोह को जिसने जीता। कर साकार दिखाया जिसने तन में ही भगवान को। ढूंढ रही है कब से दुनियां ऐसे वीर जवान को। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्...
सनक हिम्मत और अनुभव
आलेख

सनक हिम्मत और अनुभव

सुरेश चन्द्र जोशी विनोद नगर दिल्ली ******************** सनक-हिम्मतऔर अनुभव ये जीवन की तरक्की के तीन महत्वपूर्ण सूत्र हैं। सनक आपसे वो भी करवा लेता है, जो आप नहीं कर सकते थे। अथवा ये मानते थे कि ये काम मेरी क्षमता से बाहर है और मुझसे कभी नहीं होगा। असंभव को भी संभव कर के दिखाना ये जुनून का काम है। एक विश्वविजयी सम्राट ने कभी अगर ये कहा है था कि मेरे शब्दकोष में असंभव जैसा कोई शब्द ही नहीं तो ये उसका जुनून ही था जो उसे भीतर से दुनिया को मुठ्ठी में करने का आत्मबल प्रदान कर रहा था। हिम्मत आपसे वो करवाती है, जो आप करना चाहते हैं। जीवन में कुछ बड़ा करने का अथवा कुछ अलग करने का स्वप्न लगभग हर कोई देखता है मगर हौसले के अभाव में उनका वह महान स्वप्न भी केवल दिवास्वप्न बनकर रह जाता है। जीवन में कुछ बड़ा करने के सपने देखना भी अच्छी बात है मगर उन सपनों को साकार करने के लिए सदा प्रयत्नशील रहना उससे भी अ...