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नशा मुक्त हो देश हमारा
कविता

नशा मुक्त हो देश हमारा

बिसे लाल खड़गवां (छत्तीसगढ़) ******************** सुन मेरे भाई अब समझ ले बेहतर समझ ले, नशा नाश की जड़ है नशे से तन होता खराब मन होता खराब। नशे से जब खराब होगी तेरी जिंदगी तो जिंदगी का बोझ उठाने के लिए दर-दर भटकेगा, कोई नहीं देगा तेरा साथ अकेले हो जाएगा इस जहां में। नशे में पड़ कर तू घर बेचेगा जमीन बेचेगा आखिर में घर की थाली तक बेच देगा, नशे से तुम्हारा परिवार बिखर जाएगा। नशे से तुम्हारी जिंदगी अंधकारमय हो जाएगी अपने आप को जिंदगी के अंधेरों में आखिर में खोजते रह जाओगे। तुम्हारे साथ तुम्हारे दोस्त सब आगे बढ़ जाएंगे, नशा में पड़कर अपना जीवन बर्बाद कर डालोग। ऐ इंसान अपने परिवार लिए जी नशा छोड़ दे अभी के अभी, तू नशा छोड़ेगा तेरा परिवार तुमको फिर मिल जाएगा। मान मेरा कहना नहीं तो पछतायेगा, सोने जैसे शरीर मिट्टी सामान बन जाएगा। आओ सब मिलकर हम कोशिश करें, हमारे आने वाली पीढ़ी कुछ कर सके। तो हम सब हम...
अक्षय तृतीया
आलेख

अक्षय तृतीया

श्रीमती शोभारानी तिवारी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** अक्षय तृतीया वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। इस दिन जो दान पुण्य किया जाता है, उसका फल अक्षय होता है, ऐसी मान्यता है, कि इस दिन को शुभ माना जाता है क्योंकि इस दिन मुहूर्त निकालने की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए गृह प्रवेश से लेकर शादी तक अक्षय तृतीया को करना चाहते हैं। अक्षय तृतीया के दिन आज भी गांव में बाल विवाह करने की प्रथा है। बाल विवाह करने और करवाने वालों को भले ही दंड मिलता है, परंतु इसके बावजूद भी अक्षय तृतीया के दिन बहुत सी शादियां होती हैं। यह एक कुरीति है, क्योंकि १८ वर्ष से कम उम्र के बच्चे नाबालिक समझे जाते हैं, और इस उम्र में लड़कियों की शादी के करने के किसकी पढ़ाई रुक जाती है और उसका शरीर भी गर्भधारण करने के लिए भी तैयार नहीं होता। कम उम्र में शादी होने से ना ही रुतबा होता है, न ही शक्ति ...
वो बच्चा
कविता

वो बच्चा

चंद्र शेखर लोहुमी जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** वो बच्चा न जाने कहाँ खो गया है कोई ढूंढ लाओ गले से लगा लूं जो रहता था हरदम थिरकता-फुदकता यहाँ से वहां तक न जाने कहाँ तक कहता था मामा जो चंदा को नभ के तारों को कहता था मोती प्रभु के तैराता था नावें कागज की अक्सर बरसते पानी में घर से निकल कर कभी गुल्ली डंडा कंचों की खन-खन बहुत खीजता था वो करने को मंजन वो बचपन न जाने कहाँ खो गया है ll साइकिल के टायर को लकड़ी से चलाना कपडे की गेंदों पर हॉकी जमाना कभी बंदरों सा पेड़ों पर चढ़ना उतरना चढ़ना और फिर कूद जाना लकड़ी की तखती पर कालिख लगाना दवात के पेंदे से जम के रगड़ना बड़े भैया की किताबों पे यूँ नाज करना जैसे हो गहना घर का पुराना धरोहर पर इतराना अब खो गया है ll नहीँ होता जूता तो चप्पल पहनना चप्पल हो टूटी तो यूँ ही दौड़ जाना घंटे की टन-टन जो स्कूल से आती सारी मस्ती न जाने कहाँ भाग जाती प्रार्थना क...
प्रताप की हुँकार
कविता

प्रताप की हुँकार

चन्दन केशरी झाझा, जमुई (बिहार) ******************** जो कहलाए थे महाराणा, उस प्रताप की हुँकार सुनो। आज इस "चन्दन" की ज़ुबानी, तुम दास्तान-ए-मेवाड़ सुनो। पिता उदय सिंह द्वितीय, और माँ जयवंताबाई थी। कुम्भलगढ़ के किले में जन्में, तब माटी भी मुस्काई थी। अधीनता न है स्वीकार, महाराणा ने ये ठाना था। वो थे साहसी, कर्मवीर, ये अकबर ने भी जाना था। हुआ युद्ध प्रचंड और लहू से सन गई माटी थी। जहाँ मुगल भी काँप उठे, वह भूमि हल्दीघाटी थी। भील थे इनके साथ और शत्रु सेना विशाल थी। इस परमप्रतापी राणा की, सेना नहीं, मशाल थी। बहलोल खान को इन्होनें, बीच से ही चीर दिया। धन्य है वो माता भी जिसने, देश को ऐसा वीर दिया। जब राणा शत्रुओं से घिरे, चेतक ने उन्हें बचाया था। २८ फीट का नाला भी तब, कटी टांग से पार लगाया था। राणा को बचाने में उसने, अपना दे दिया प्राण था। वो चेतक, केवल अश्व नहीं, राणा का मित्र महान था। आए ...
पौष्टिक आहार पर कोरोना की मार
व्यंग्य

पौष्टिक आहार पर कोरोना की मार

विष्णु दत्त भट्ट नई दिल्ली ******************** कोरोना क्या आया दुनिया की सूरत बदल गई। प्राणवान तो इस महामारी से त्रस्त हैं ही लेकिन प्राणहीन भी कम त्रस्त नहीं हैं। मेरे घर में अनवरत रूप से एक अखबार आता है। कोरोना से पहले बड़ा हृष्ट-पुष्ट था। किसी अच्छे खाते-पीते घर का लगता था। काफ़ी वजनी होता था। पेजों की भरमार होती थी। हालांकि उनमें वजन ही होता था पढ़ने लायक समाचार तो एक-आध पेज पर ही होते थे। बलात्कार की चटपटी खबर, हत्याओं की सनसनीखेज खबरों को देखकर ऐसा अनुभव होता था जैसे ये सारी बारदातें इसी अखबार ने की हैं? इतना बारीक विश्लेषण तो खुद बलात्कारी और हत्यारा भी नहीं कर पाता जितना बारीक़ विश्लेषण अखबार करता है। कोरोना से पहले अख़बार बहुत ऊर्जावान लगता था। विज्ञापनों की पौष्टिक ख़ुराक़ जमकर मिलती थी। कभी-कभी तो ख़ुराक़ इतनी अधिक होती थी कि पढनेवालों को अपच के कारण दस्त लग जाते थे लेकिन अखबार की ...
बाकी है
कविता

बाकी है

जयश्री सिंह बैसवारा सोनभद्र, (उत्तर प्रदेश) ******************** अभी तो कदमों को राहों पर लाया है उड़ान अभी बाकी है, इम्तिहान कहाँ खत्म हुआ है मेरा मंज़िल-ए-मुकाम अभी नहीं हासिल है, वक्त बेवक्त चल पड़ती हूँ उस ओर अभी तो सारा नजारा बाकी है, जिंदगी जो रूकी हुई थी मेरी कल तक उसे आगे बढ़ना बाकी है, पल भर की रौनक नहीं अब यहाँ माथे पर मेरे निशान बाकी है, रूकना अभी कहाँ मयस्सर है मेरे लिए अभी काफिलों का मेरे पिछे चलना बाकी है, रौनक तो है अभी भी महफ़िलो में मगर महफ़िल का मेरे नाम होना बाकी है, तुम्हारा इतराता भी ठीक है मगर मेरे गूरूर की आंधी का आना अभी बाकी है, शहर भले ही तुम्हारा क्यूँ न हो मगर भीड़ मेरे नाम की हो, ये नजारा भी बाकी है, चल देखते हैं कब तक खत्म नहीं होती ये जंग अभी वक्त का मेरी तरफ होना भी बाकी है....।। परिचय :- जयश्री सिंह बैसवारा निवासी : सोनभद्र, (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : ...
प्यार
कविता

प्यार

अनिल कुमार मिश्र राँची (झारखंड) ******************** खुले संदूक में फरेबी रिश्तों का झूठा प्यार भर रखा है मैंने जो समय-असमय मिलते रहे थे ठगने के लिए पूरी तरह से ठगा गया था मैं इसलिए कि भावना के वेग में झट बह जाया करता था मैं 'इस्तेमाल'होता रहा उनके द्वारा जिनका कोई वजूद ही नहीं था एक चेहरे पर टिमटिमाते सौ-सौ चेहरे। खुले संदूक में पड़े नकली 'दुलार' को कोई नहीं पूछता चाहता हूँ उसे देकर एक रोटी ले लूँ कोई नहीं चाहता वो स्वार्थ के दलदल में धंसा प्यार सब भाग जाते हैं फिर बचता हूँ मैं ही अकेला नक़ली प्यार पर बिकता हुआ लुटता हुआ सा हाँ, मैं ही सिर्फ मैं ही लुटता हुआ, बिकता हुआ सा अपनों के हाथों। परिचय :-अनिल कुमार मिश्र शिक्षा : एम.ए अंग्रेज़ी, एम.ए संस्कृत, बी.एड जन्म : ९/६/१९७५ निवासी : राँची, झारखंड सम्प्रति : प्राचार्य, सी.बी.एस.ई. स्कूल प्रकाशन : काव्य संकलन’अब दिल्ली में डर लगता है' (अमेज़न, फ्...
बंधक तन में टहल रही है
गीत, छंद

बंधक तन में टहल रही है

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** आधार छंद- विष्णुपद बंधक तन में टहल रही है, श्वासें बन उलझन। घर के बाहर पग रखने में, डरती है धड़कन।। डाल दिया आ खुशियों के घर, राहू ने डेरा। दुख की संगीनों ने तनकर, उजला दिन घेरा।। जगी आस का कर देता है, चाँद रोज खंडन।। घर के बाहर पग रखने में, डरती है धड़कन।।१ अस्पताल के विक्षत तन में, श्वासों का टोटा। गरियाता पर अटल प्रबंधन, बिल देकर मोटा।। दैत्य वेंटिलेटर नित तोड़े, भव का अनुशासन। घर के बाहर पग रखने में, डरती है धड़कन।।२ एंबुलेंस की चीखें भरती, बेचैनी मन में। भूल गयी अब लाशें काँधे, चलती वाहन में।। बदल दिया है इस मौसम ने, मानस का चिंतन। घर के बाहर पग रखने में, डरती है धड़कन।।३ परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी ...
सहिष्णुता
कविता

सहिष्णुता

मंजिरी "निधि" बडौदा (गुजरात) ******************** देखो आज खड़ा है भारत अविचल अखंड, सभी धर्मों का यह कहलाता सुंदर खंड। मुश्किल जब आये धड़ी देते सभी मिलकर साथ, गीता कुरान बाइबिल को सभी लगाते माथ। भक्ति रंग में रंगा हुआ है सुखों का सार, सभी मदद करते रहें यहीँ सकल आधार। धर्म सभी सिखा रहे मानवता उत्थान, राष्ट्र प्रेम हम सभी करें बुराई का अवसान ल चलें सत्य की राह में पाप कपट सब छोड़, करते कर्म हम हैं सदा नात प्रेम का जोड़ ल सभी धर्मों को लेकर चलना यही हमारी शान, देश एकता और सहिष्णुता है सब एक समान ल सर्व धर्म समभाव है लोकतंत्र का मूल, मूल मंत्र को धारिये सुमन बनें हर शूल। हरा रंग अरु केसरी ओतप्रोत यह देश, हर धर्म का यहाँ भिन्न है परिवेश ल आज हमारे देश में कोरोना की मार, सभी एक जुट हो गये निकले कोई सार l सच बात मैं यहीँ कहूं रहना दो गज दूर, हम सब एक साथ है मिले सफलता जरूर l परिचय :- मं...
धरती-अंबर पर बिखरा प्रेम रंग
कविता

धरती-अंबर पर बिखरा प्रेम रंग

श्रीमती विभा पांडेय पुणे, (महाराष्ट्र) ******************** आज रक्ताभ लाल अंबर को देख मन ने कुछ अलंकार ओढ़े। उस सुंदरता में डूब हृदय ने आराध्य से उसके कुछ अनुपम दृश्य जोड़े। धरती और आकाश लगते जैसे सिया-राम की अनुपम जोड़ी। रंगों का सजा ऐसा ताना-बाना जैसे प्रकृति ने प्रेम की चादर ओढ़ी। लाल रंग का वितान ताने रवि ने श्रेष्ठ मंडप सजाया। अपनी रश्मियों से सुरभित कर फूलों से रंगोली बनाया। नील गगन का अलौकिक सौंदर्य जैसे श्रीराम का रूप नयनाभिराम। श्याम रंग पर लाल वसन को निरख अपलक तकते सब, जैसे आ गए राम। इस रूप पर सम्मोहित होकर रवि ने मन भर किया नभश्रृंगार। अपने रश्मिकोश को लुटा-लुटा। राम के प्रतिरुप को दिखलाया प्यार। धरती जैसे माँ सीता की स्वच्छ, पवित्र, सात्विक, धवल मूर्ति हरसिंगार, टेसू, कमल, गुलाब, जासवंत के लाल जोड़े में खूब शोभती। लगता जैसे माँ सीता ही फिर धरा रूप में आईं हैं। श्री राम के अनुरूप...
जिंदगी का फलसफा
ग़ज़ल

जिंदगी का फलसफा

धीरेन्द्र कुमार जोशी कोदरिया, महू जिला इंदौर म.प्र. ******************** जी ले इन लम्हों को, शाम ना हो जाए। ख्वाहिशों की सांसें तमाम ना हो जाएं। क्या हुआ वो जो, चिलमन में छुपे बैठे हैं? नजर मत हटा ,जब तक सलाम न हो जाए। खुद की कमजोरी की बेड़ियों को तोड़ दे, आदतों का तू कहीं गुलाम न हो जाए। सपनों को देखने का जुनू छोड़ना नहीं, हसरतों के पैर , कहीं जाम ना हो जाएं । भीड़ से अलग चल, बना अपनी पगडंडी, हर एक अदा जुदा रहे, आम ना हो जाए। कोशिशों में दम भर ,हार को भी जीत ले, जब तलक दुनिया में तेरा नाम न हो जाए। रुक मत, तू रुक मत, तू रुक मत "धीरज, जब तलक तेरा कोई मक़ाम ना हो जाए। परिचय :- धीरेन्द्र कुमार जोशी जन्मतिथि ~ १५/०७/१९६२ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म.प्र.) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम. एससी.एम. एड. कार्यक्षेत्र ~ व्याख्याता सामाजिक गतिवि...
मौका तुझे मिला है अर्जुन
कविता

मौका तुझे मिला है अर्जुन

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** वर्तमान में फैल रही महामारी को समाप्त करने की जंग में जितने भी सहयोगी किरदार हैं, चाहे डॉक्टर हों, चाहे नर्स हों, चाहे पुलिसकर्मी हों, चाहे सफाईकर्मी हों,चाहे वार्ड बाय हों, चाहे वैज्ञानिक हों चाहे अंतिम संस्कार करने वाले हों चाहे सर्वेयर हों या अन्य कोई दायित्व स्वेच्छा से या शासन के आदेशानुसार निर्वहन करने वाले हों, सभी योद्धा हैं और आज के अर्जुन हैं उन्हीं से भगवान श्रीकृष्ण गीता में कह रहे हैं.... कहा कृष्ण ने अर्जुन से ये, तेरा ये कर्तव्य है सुनले। धर्मयुद्ध से बढ़कर कोई , काम कहां है जो तू चुनले।। धर्मयुद्ध है द्वार स्वर्ग का, भाग्यवान इसमें जाते हैं। खोकर के स्वधर्म लोग यश, खोते पापी कहलाते हैं।। तू योद्धा है पापी मत बन, अपकीर्ति में लिपटा मत तन। भाग गया है डर कर अर्जुन, क्या सुन पाएगा तेरा मन।। अगर मरा तो स्वर्ग...
मैं एक नारी हूँ
कविता

मैं एक नारी हूँ

मंजू लोढ़ा परेल मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** मैं एक नारी हूँ। सदियों से अपनी परंपराओं को निभाया हैं, उसके बोझ को अकेले ढोया हैं, इस पुरूष प्रधान समाज ने हरदम हमको दौयम दर्जे पर रखा है, अपनी ताकत को हम पर आजमाया है। पर अब मुझे दुसरा दर्जा पसंद नहीं मैं अपनी शर्तों पर जीना चाहती हूँ। हक और सन्मान के साथ रहना चाहती हूँ। मेरी सहृदयता को मेरी कमजोरी मत समझो। मैं परिवार को न संभालती, बच्चों की परवरिश न करती, बुर्जुंगो की सेवा न करती, पति को स्नेहही प्रेम न देती, तो क्या यह समाज जिंदा रहता? मै कोमल हूँ, पर कमजोर नहीं, अगर कमजोर होती तो क्या यह नाजुक कंधे हल चला पाते? पहाड़ों की उतार-चढा़व पर काम कर पाते? घर और बाहर की दोनों दुनिया क्या यह संभाल पाते? मेरे त्याग को तुमने मेरी कमजोरी समझ लिया, घर-परिवार बचाने की भावना को मेरी मजबुरी समझ लिया। अगर नारी पुरूष के अहंम को न पोषती, तो पुरूष आ...
कर भला तो हो भला
जीवनी

कर भला तो हो भला

डॉ. भोला दत्त जोशी पुणे (महाराष्ट्र) ********************                 मनुष्य में परोपकार, दया, उदारता, क्षमा, समानता, धैर्य, सृजनशीलता, खोजी दिमाग आदि अनेक सद्गुण हैं जिनकी बदौलत वह ईश्वर की उत्कृष्ट रचना कहलाता है| बीसवीं सदी के उत्तरार्ध की बात है | उत्तराखंड के सुदूर में स्थित चीन की सीमा से लगे तत्कालीन जनपद पिथौरागढ़ जिससे अलग हुआ इलाका अब चंपावत के नाम से जाना जाता है, में एक साधारण किसान परिवार में २० दिसंबर १९५३ को अद्भुत प्रतिभावान बालक का जन्म हुआ था | बालक का नाम भवानी दत्त रखा गया | कहते हैं कि जन्म के ग्यारहवे दिन नामकरण के उपरांत शिशु के हाथों में कलम आदि पकड़वाने की परंपरा के निर्वहन के समय बालक ने कलम और काठी का घोड़ा दोनों को स्पर्श किया | संकेत के रूप में यह माना गया कि बड़ा होकर बालक तकनीकी क्षेत्र में अच्छी पढ़ाई करेगा | बालक के पिता श्री दयाराम जोशी और माता श्र...
ईद मुबारक
कविता

ईद मुबारक

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** ईद मुबारक कह रहे, कोरोना के काल, महामारी फैला रही, जन पर मक्कडज़ाल, गले मिलना तो दूर है, दूर दूर करे बात, ज्यादा गले मिले तो, आ सकती वो रात। ईद मुबारक मत कहो, महामारी भगाओ, हँसी खुशी हो चेहरे पर, खुशहाली लाओ, हाथ धोकर पीछे पड़ा, पहले जान बचाओ, ईद मुबारक फिर कहो, हँसों और हँसाओ। एक साल बीत गया, भेंट चढ़ गये त्योहार, हुक्का, पानी छूट गया, पर ना मानी है हार, कमजोर पड़ रहा अब, महामारी का रूप, अंधेरा जल्द मिट जाए, आएगी फिर धूप। कैसी ईद मुबारक है, कैसा अजब संसार, धीरे-धीरे लुप्त हुआ, भाई-भाई का प्यार, हँसना भी अब मुमकिन है, कैसा यह वक्त, त्योहार मनाने पर भी, प्रशासन हुआ सख्त। पहले जिंदा रहना है, फिर मनेगी वो ईद, जल्द से महामारी भागेगी, ऐसी है उम्मीद, हँसी खुशी से मिलकर गाएं, वक्त आएगा, ऐसी मार मारेंगे, कोरोना की निकले लीद। ईद मुबार...
बादल और नदी
कविता

बादल और नदी

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** इतनी चुप क्यों हो जैसे रीति नदियाँ तुम्हारी खिलखिलाहट होती थी कभी झरनों जैसी कलकल। रूठना तो कोई तुमसे सीखे जैसे नदियाँ रूठती बादलों से मै बादल तुम बनी स्वप्न में नदी सूरज की किरणें झांक रही बादलों के पर्दे से संग इंद्रधनुष का तोहफा लिए सात रंगों में खिलकर मृगतृष्णा दिखाता नदियों को रीति नदियों में पानी भरने को बेताब बादल सौतन हवाओं से होता परेशान। नदी से प्रेम है तो बरसेगा जरूर नही बरसेगा तो नदियां कहाँ से कलकल के गीत गुनगुनाए। औऱ बादल सौतन हवाओं के चक्कर मे फिजूल गर्जन के गीत क्यों गाए। जो गरजते क्या वो बरसते नही यदि प्यार सच्चा हो तो बरसते जरूर। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन :- देश - विदेश की विभिन्न पत्र - प...
संपादकीय

कृपया प्रतीक्षा करे, आप कतार में हैं….???

प्रो. डॉ. दीपमाला गुप्ता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आज सुबह जब किसी के स्टेट्स पर ये लाइन पढ़ी, पहले तो थोड़ी हँसी आई, फिर एकदम हँसी और मन दोनों सहम गए। हम हर रोज मन को सकारात्मक सोचने और खुद को खुश रखने की कोशिश करते हैं। रोज सुबह एक प्रेरणा, प्रार्थना, उत्साह, जोश, जुनून, सकारात्मकता, खुशी, भविष्य की तैयारी की एक पोटली बनाकर दिन की शुरूआत करते है, और चाहे अनचाहे ऐसी खबरों और मौत की खबरों को सुनना पड़ता हैं, हम सुनना भी नही चाहते है, और हमारी तैयार खुशियों की पोटली में प्रेरणा, प्रार्थना, उत्साह, जोश, जुनून, सकारात्मकता, खुशी, भविष्य की सोच, एक मिनट में डर, परिवर्तित होकर इन सब सकरात्मक शब्दो और भावो को कोने में बिठा देते है, और हम महामारी के संकट की सोच को दिमाग से बाहर ही नही निकाल पाते। अब समय हैं, अपने परिवार को समय देने का, वर्चुअल दुनिया से बाहर आने का और वास्तविक दुन...
हम सब झगड़ेगे
कविता

हम सब झगड़ेगे

जयप्रकाश शर्मा जोधपुर (राजस्थान) ******************** हम सब झगड़ेंगे मित्रों हम सब झगड़ेंगे कि झगड़ेंगे बग़ैर कुछ नहीं मिलता हम सब झगड़ेंगे कि अब तक झगड़े क्यों नहीं हम झगडेगे अपनी सज़ा ग्रहण करने के लिए झगड़ते हुए मर जाने वाले की याद ज़िन्दा रखने के लिए हम सब झगड़ेंगे परिचय :- जयप्रकाश शर्मा निवासी : जोधपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 ...
रंग रसिया
कविता

रंग रसिया

मधु अरोड़ा शाहदरा (दिल्ली) ******************** तुमसे प्यार किया रंग रसिया बसे हो मेरे मन बसिया दिल, धड़कन, आत्मा में तुम हो जित देखूं ‌उत ओर तुम हो ओ मुरारी ओ त्रिपुरारी तुम बिन सुनी सुनी गलियां, कहां छुपे हो आओ मोहन, नजरों से अपना बना लो मोहन तुमसे प्यार किया रंग रसिया, तेरी मुरलिया की धुन खींचे। अपने प्यार में पागल कर दे, मैं बावरिया घर छोड़ के आई दूध उफनता छोड़ के आई, रंगरसिया तू न समझे तेरी छवि मोहे पागल कर दे, मन में मेरे आकर्षण भर दे। खींची आऊं मैं ‌दर पर तेरे, प्यार का मीठा रंग‌‌ वो भर दे रंग रसिया मेरे मन बसिया, तेरी छवि मोहे दीवाना कर दे।। परिचय :- मधु अरोड़ा पति : स्वर्गीय पंकज अरोड़ा निवासी : शाहदरा (दिल्ली) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मं...
बीत गया बचपन
कविता

बीत गया बचपन

शिव कुमार रजक बनारस (काशी) ******************** यादों के सागर में खोकर दिल मन ही मन हर्षाये चेहरा रह रहकर मुस्काये आया प्यारा सा यौवन देखो बीत गया बचपन ! छूट गए वो खेल पुराने गुड्डे गुड़ियों वाले रंग लेते मुँह अपना खाकर चूरन पुड़ियों वाले यारों से हम झूठ बोलकर खाएं झूठी विद्या कसम देखो बीत गया बचपन ! मीना की दुनिया के किस्से राजा के रानी के चिमनी से पढ़कर गुजरे हैं दिन वो नादानी के देहरी पर जलते दीपक से रोशन घर द्वार आँगन देखो बीत गया बचपन ! सरपट-सरपट चली ज़िंदगी मोड़ अनोखा आये पिचकारी के रंग सभी स्याही में घुल जाए आये जीवन में बसंत कोयल कूके नीलगगन देखो बीत गया बचपन ! परिचय :- शिव कुमार रजक निवासी : बनारस (काशी) शिक्षा : बी.ए. द्वितीय वर्ष काशी हिंदू विश्वविद्यालय घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताए...
गगन के किनारे
कविता

गगन के किनारे

पारस परिहार मेडक कल्ला ******************** मैने देखा उसे गगन के किनारे बहती पवन के सहारे शाम की संध्या का रूप निखारे उतरती किरणों के इशारे। डुब रहा था आग का महाराजा कर रहा था इशारे साथ आने का आजा मेरी गोद मे समाजा मै हूँ इस जगत का राजा। दुनियाँ को जगाने निकला था पुरा करके सफर अपना, घर अपनें जा रहा था ओट में बादलों की, छिपा जा रहा था इशारों ही इशारों मे वापस आने का वादा कर रहा था। सुधा अपने अंचल में, समेट उसे रहीं थी किरणों की महक दूर-दूर तक फैली थी चारों और हँसती-हँसाती हरियाली थी प्रकृती को सौ रंगो से सजा रही थी। मै विदा लेने ही वाला था... किसामने काली घटा का घूमड़ आ निकला था इन्द्र ने पवन को भी न्योता दिया था पवन देवता भी झल्लाते पीछे-पीछे आ रहे थे किसानो की मेहनत को मिटाते जा रहे थे। इतने मे आवाज आयी... रुक जाओ, रुक जाओ, महाशय...! जरा रुक जाओ इतना क्रोध हम पर ना दिखाओ ऐसा क्या कर...
कोरोना काल की व्यथा
कविता

कोरोना काल की व्यथा

डॉ. राजीव पाण्डेय गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) ******************** घिरी अमंगल घोर घटाएं। अपना कहर रही बरपाएँ। यही निवेदन प्रभुजी करता जग पर कृपा रस बरसाएं। सहमी सहमी गुलशन क्यारी उसके गन्धित पुष्प बचाएं। जहर घुला है प्राणवायु में, सबसे पहले शुद्ध बनाएं। घुसे गुफा में हम बैठे हैं बाहर जाने के दिन आएं। पंख हमारे सिकुड़ गए हैं, नभ में कैसे भी फैलाएं। क्रूर काल के वैश्विक पंजे, काटे छाँटे चक्र चलाएं। मुँह को बांधे क्या जीना है, जीते हैं पहचान छिपाएं । घर घर के विस्तर हैं पीड़ित, सोच रहे हैं कब मुस्काएं। युवा दिलों की धड़कनसोचें बैंड हमारे कब बज पाएं। बस्ते लेकर बच्चे गुमसुम कब से हम फिर शालाआएं। पार्को में पसरे सन्नाटे, भूले कैसे सैर कराएं। मेहनतकश के बच्चे भूखे खाली थाली रोज बजाएं। सुबह साँझ में कैसा अंतर, सन्नाटों को क्या समझाएं। सुंदरतम कवितायें भी अब ताली से वंचित रह जाएं। ग...
सीढ़ियां
कविता

सीढ़ियां

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** अपने ख्वाब पूरे करने हों तो शाम, दाम, द़ंड, भेद के साथ हर हथकंडे भी स्थिति के अनुसार अपनाने में कोई हर्ज नहीं है, ख्वाब साकार हो रहा हो तो किसी भी हद तक गुजर जाना या यूँ भी कह लें किसी की लाश पर तम्बू लगाने में तनिक भी गुरेज नहीं है। आपकी तरह मैं बेवकूफ नहीं हूँ, अपना जमीर जिंदा है मात्र दिखाने के लिए अपनी कामयाबी को पीछे ढकेल दूँ मुझे मंजूर नहीं है। मेरे ख्वाब जितने ऊँचे मेरा जमीर उतना ही नीचे है, आप भी ये जान लें अपने ख्वाबों को मैंने खून से सींचे हैं, अपना तो जमीर जिंदा नहीं है यारों तभी तो कामयाबी की सीढ़ियां चढ़कर यहां तक आखिरकार पहुंचे हैं। परिचय :- सुधीर श्रीवास्तव जन्मतिथि : ०१/०७/१९६९ शिक्षा : स्नातक, आई.टी.आई., पत्रकारिता प्रशिक्षण (पत्राचार) पिता : स्व.श्री ज्ञानप्रकाश श्रीवास्तव माता : स्व.विमला देवी धर...
इंसाफ
कविता

इंसाफ

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** काल कहीं दूर नहीं है आसपास ही घूम रहा है, देख रहा है सबकी भावनाओं को, परख रहा है सब की डगमगाती आस्थाओं को, देख रहा है मानव से दानव बने इंसान की चलाकियों को। काल झांक रहा है खिड़कियों से दरवाजों से उसी तरह जिस तरह तुम झांकते हो दूसरों की बहू बेटियों को। बस फर्क इतना है काल झांक रहा है तुम्हारे किए गए गुनाहों को। और तुम आज भी छिपा रहें हो अपनी गंदी निगाहों को। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी र...
नन्हा दीया
कविता

नन्हा दीया

प्रभा लोढ़ा मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** सहमी सहमी प्रकृति थी, पक्षी लौट रहे थे क़तार में, सूरज झांक रहा था, बादलों की ओट से, नभ में रंग उड़ेल दिया चित्रकार ने, पवन की गति थी घीमी, स्थिर थे वृक्ष के पत्ते, साँस की गति हो गई घीमी, छा गई उदासी मन में जीवन में न थी कोई ख़ुशी भरी थी नमी आँखों में, आँसू बैचेन थे लुढ़कने को, अमावस्या ने चुरा लिया था चाँद को, तभी नन्हे दीये ने सिर उठाया, आशा की लौ जलाई प्रकाशित हुआ कोना यह देख अनगिनत दीयों ने हाथ मिला सब हुये साथ एक एक दीया प्रज्वलित हुआ, जगमगा उठी सृष्टि सारी मानवता जाग उठी दिया सबने सहयोग अपना प्रकृति ने सँभाली अपनी कमान आज की विषम परिस्थिति का मुक़ाबला किया सबने मिलकर नन्हे दीये का प्रयास हुआ सार्थक, ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ छाई चारों और। परिचय :- प्रभा लोढ़ा निवासी : मुंबई (महाराष्ट्र) आपके बारे में : आपको गद्य काव्य लेखन और प...