मैं तो चला सफर पर
डॉ. कामता नाथ सिंह
बेवल, रायबरेली
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अनदेखी, अनजान डगर पर,
तुमसे बिना बताये, बोले,
मैं तो चला सफर पर अपने
मेरे यार! सदा खुश रहना...
ध्यान रहे कितनी सर्दी, गर्मी
झेली गुलशन लहकाया,
खून-पसीने से, मिलजुलकर
कलियों का आँचल महकाया;
कभी न मेरी याद, उदासी
का साया इनको छू पाये,
इन पर इतना प्यार लुटाना,
मेरे प्यार! सदा खुश रहना...
एक दूसरे में घुलमिलकर
कितने सपन सलोने सींचे,
आसमान के तारे तोड़े,
कितने चाँद उतारे नीचे;
इन्हें कभी एहसास न होने
पाये कोई चाँद सपन है,
अब सब भार तुम्हारे काँधे,
मेरे यार! सदा खुश रहना....
कितनी मुसकानें मुसकाईं,
कितना हँसे हँसी के मेले,
इतराते, इठलाते गुजरे
कितनी मनुहारों के रेले;
अब मुझको भी खुद में पाना,
खुद से ही हँसना, बतियाना,
पूरनकाम समझना खुद को,
मेरे यार! सदा खुश रहना....
यद्यपि अपने वादे थे
हम साथ जियेंगे, साथ मरेंगे,
सदा सामना हर मुश्कि...























