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मां काश आप होती
संस्मरण

मां काश आप होती

अनुराधा बक्शी "अनु" दुर्ग, छत्तीसगढ़ ********************                 बचपन में मां को पिता से छोटी-छोटी बात पर झगड़ते और बहस करते देखा है। मां के प्रति उस वक़्त कभी-कभी गुस्सा और अनादर का भाव आ जाता था। जैसे-जैसे बड़ा हुआ तो उनके गुस्से को समझा कि वह पिता के लिए नहीं उन परिस्थितियों के लिए था जिसमें मां हमें जो देना चाहती थी और नहीं दे पाती थी। अभाव से भरे जीवन की मजबूरी ने मां को चिड़चिड़ा बना दिया था। बड़े होते हुए मां को बहुत सी बातों के साथ समझौता करते देखा। हमें बड़े स्कूल में पढ़ाने का सपना अक्सर मैं उनकी आंखों में देखता। वो हर संभव प्रयास किया करती कि एक स्तर बरकरार रख सकें ताकि हमारी परवरिश में कोई कमी ना हो। उनके प्रयास सफल भी होते। मां का जीवन हमारे लिए साधन जुटाते गुजरा। उन्होंने ये जिम्मेदारी स्वयं उठा की और पिता से अपेक्षाएं कम कर दी। मैंने भी उनके प्रयास में उनका साथ दिय...
अंतिम निर्णय
लघुकथा

अंतिम निर्णय

रश्मि श्रीवास्तव “सुकून” पदमनाभपुर दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** आज सपना के पापा की पहली बरसी थी मम्मी के कहने पर सपना वृध्दाश्रम में भोजन की व्यवस्था कराने पहुंची थी, प्रवेश करते समय सामने आफिस मे बैठे कबीर अंकल कीओर सपना की नजर पड़ी। सपना ने कहा अरे ! कबीर अंकल आप यहाँ? अंकल कहने लगे बिटिया अब तो यही अपना घर है बेटा मैं अब यहीं रहने लगा हूँ कहकर तेजी से उठकर चल दिए जैसे अपना दर्द छुपा रहे हो। सपना भी अपने काम में व्यस्त हो गयी। यहाँ की व्यस्तता के बीच सपना की नजरें लगातर कबीर अंकल पर थी जो लगातार सपना से छुपने की कोशिश में थे। वृध्दाश्रम के सभी सदस्यों के भोजन का कार्य अच्छे से सम्पन्न कराकर सपना समान गाड़ी में रखवाकर घर की ओर चल पड़ी। रास्ते में उन्हें कबीर अंकल की बात याद आ गयी अब तो यही अपना घर है। सपना ने सोचना शुरू किया कि कबीर अंकल के घर पर दो बेटे और एक बेटी का हँसता खेलता प...
मेरी बूढ़ी माँ
कविता

मेरी बूढ़ी माँ

बबली राठौर पृथ्वीपुर टीकमगढ़ (म.प्र.) ******************** कभी हँसता खेलता बचपन था उनका भी सखि हर विपता से दूर बिन चिंता के उनके थे लम्हें सखि समय होता है बहुत ही बलवान कभी-कभी सखि वक्त ने ली करवट व्याह हुआ दुल्हन बनी मेरी बूढ़ी माँ ससुराल में पाई गईं सबसे बड़ी छोटे थे देवर और ननदें सखि फिर भी नहीं घबराई घर को लेकर सास संग वो चली सखि फिर वो दिन भी आया उन्हें माँ बनने का सौभाग्य मिला सखि जिसमें उन्होंने ढूँढ़ा अपना बालपन जब माँ बनी मेरी बूढ़ी माँ जीवन के पन्ने पलटे और वो बन गईं चार बच्चों की माँ सखि पालन-पोषण किया सबके व्याह भी रचाए उन्होंने सखि उस पर विधाता को भी दया ना आई उनपर सखि सुहाग छूटा और पिता का साथ छूटा विधवा बनी मेरी बूढ़ी माँ जिन्दगी अब भी वही है नाती, पोते हैं पर कभी-पिता की कमी भी खलती है सखि पिता की पेंशन है हर सुख से लदी है पर तन्हाई उनके साथ है सखि कभी वो (पिता) याद आए तो...
भीख
लघुकथा

भीख

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, जिला-गोण्डा, (उ.प्र.) ********************                          कहते हैं लाचारी इंसान को कितना बेबस बना देती है। कुछ ऐसा ही मि.शर्मा को अब महसूस हो रहा है। कहने को तो चार बेटे बहुएं नाती पोतों से भरा पूरा परिवार है। मगर सब अपने अपने में मस्त हैं। महल जैसे घर में मि.शर्मा अकेले तन्हाई में सिर्फ मौत की दुआ करते रहते हैं। शरीर कमजोर है, आँखों से कम दिखाई देता है। कानों से भी कम ही सुनाई देता है। भोजन पड़ोसी दीपक के यहां से आता है। दीपक एक बेटे की तरह ही उनका ध्यान रखते हैं। उनके बच्चे भी समयानुसार देखभाल कर ही देते हैं। पति-पत्नी तीज त्योहार पर आकर उनके पैर छूकर आशीर्वाद भी लेते हैं। ये सब किसी लालच में नहीं करते बल्कि अपने मां बाप की कमी के अहसास को महसूस कर मि.शर्मा में उनका अक्स दिखने और बुजुर्ग के आशीर्वाद की आकांक्षाओं के कारण करते हैं। आखिरकार मि.शर्मा...
ढिलाई बनी बुराई
कविता

ढिलाई बनी बुराई

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** बचपन की ढिलाई ने जीवन राह बताई सबको ही सिखलाई,कितनों ने अपनाई। समयचाल ने कर्म ज्ञान महिमा समझाई बेफिक्री लापरवाही ने निज सूरत दर्शाई परिणाम साक्षी खुद की कुशल चतुराई बचपन की ढिलाई ने जीवन राह बताई सबको ही सिखलाई कितनों ने अपनाई। समझदार को इशारा या चपत चिपकाई मानव चले यथेष्ट अथवा हार गई खुदाई भ्रमित परिवार चुकाता जिसकी भरपाई बचपन की ढिलाई ने जीवन राह बताई सबको ही सिखलाई कितनों ने अपनाई। बिन पैरों चलकर सच बन जाए वरदाई सच सुन पाने का साहस सत्व सुखदाई बुराई रूपी रावण का अंत करे अच्छाई बचपन की ढिलाई ने जीवन राह बताई सबको ही सिखलाई कितनों ने अपनाई। श्रेष्ठ मार्ग में निरंतर मिलती है कठिनाई प्रभु 'राम-कृष्ण' जीवन झलक प्रभुताई दर द्वार के दामन दहके दारुण हरजाई बचपन की ढिलाई ने जीवन राह बताई सबको ही सिखलाई कितनों ने अपनाई। कहा सुना 'समरथ क...
सच्चा साथी
लघुकथा

सच्चा साथी

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** "छोड़ेंगे ना हम तेरा साथ, ओ साथी मरते दम तक। रेडियो पर यह गीत सुनकर उमेश एकदम चौक गया। साथी मरते दम तक, खुद भी गुनगुनाने लगा। रीटा की आवाज सुनकर, वह थोड़ा हिचक गया और चुप हो गया। नहीं-नहीं गा लो गीत अच्छा है। आखिर मुझें आज भरोसा तो हुआ कि तुम मरते दम तक मेरा साथ नहीं छोड़ोगे, पर वह चुप था। ऑफिस पहुँचते ही, नमस्ते करने वालों की होड़ सी लग गई। लगती भी क्यूँ ना, वह अपने ऑफिस में उच्च पद पर आसीन जो था? वह अपनी कुर्सी पर लगभग पसर सा गया। उसे ऐसा लग रहा था, कुछ गीत हमारी जिंदगी में कितना ऊँचा स्थान रखते हैं। कुछ गीत हमारे लिए प्रेरणा स्रोत होते हैं, कुछ सिर्फ सुख-दुख व्यक्त करने का जरिया मात्र। रीटा आज मन ही मन चहक रही थी कि उमेश ने उसका महत्व समझा तो सही, चाहे उसने अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए एक गीत का ही सहारा लिया हो। पर क्या फर्क पड...
घर
कविता

घर

संजय जैन मुंबई ******************** न गम का अब साया है, न खुशी का माहौल है। चारो तरफ बस एक, घना सा सन्नाटा है। जो न कुछ कहता है, और न कुछ सुनता है। बस दूर रहने का, इशारा सबको करता है।। हुआ परिवर्तन जीवन में, इस कोरोना काल में। बदल दिए विचारों को, उन रूड़ी वादियों के। जो घरकी महिलाओं को, काम की मशीन समझते थे। और घरके कामो से सदा, अपना मुँह मोड़ते थे।। घर में इतने दिन रहकर, समझ आ गये घरके काम। घर की महिलाओं को कितना होता है काम। जो समयानुसार करती है, और सबको खुश रखती है। पुरुषवर्ग एकही काम करते है, और उसी पर अकड़ते है।। देखकर पत्नी की हालत, खुद शर्मिदा होने लगा। और बटाकर कामों में हाथ, पतिधर्म निभाना शुरू किया। और पत्नी का मुरझाया चेहरा, कमल जैसा खिल उठा। और मुझे सच्चे अर्थों में, घरगृहस्थी समझ आ गया।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं...
राष्ट्र के प्रति नकारात्मक धारणा को तोड़ती है पुस्तक “राष्ट्र चिंतन”
पुस्तक समीक्षा

राष्ट्र के प्रति नकारात्मक धारणा को तोड़ती है पुस्तक “राष्ट्र चिंतन”

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ********************  काव्य संग्रह का नाम- राष्ट्र चिंतन रचनाकार- उपेन्द्र कुमार द्विवेदी  प्रकाशक- रवीना प्रकाशक दिल्ली  कीमत- ३०० रुपये  समीक्षक- आशीष तिवारी निर्मल  राष्ट्र चेतना के मुखर कवि श्री उपेन्द्र कुमार द्विवेदी द्वारा विरचित उनका पहला काव्य संग्रह "राष्ट्र चिंतन" हाथ में आया। काव्य संग्रह की साज-सज्जा देश भक्ति की भावना से ओतप्रोत है। मुख पृष्ठ पर आजादी के दीवाने चंद्रशेखर आज़ाद की तस्वीर प्रमुखता के साथ छपी है। काव्य संग्रह "राष्ट्र चिंतन" में प्रकाशित कविताओं के माध्यम से रचनाकार ने राष्ट्रवाद के चिंतन, राष्ट्र के इतिहास और विकास को प्रस्तुत किया है। लेखक ने राष्ट्र चिंतन में भारत से संबंधित विविध विचारों को देश की संस्कृति, सामाजिक समरसता, वेदों, उपनिषदों, और आधुनिक समय में राष्ट्र की संकल्पना ने कैसे आकार लिया है, उसको व...
मां
कविता

मां

डॉ. भगवान सहाय मीना बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, (राजस्थान) ******************** मां की परिभाषा संसार। ममता ईश्वर का आकार। मां करती जीवन साकार। बिन तेरे यह जग बेकार। मां ईश्वर का अहसास, जन्नत होता मां का प्यार। मां..... मां बिन प्रभु भी लाचार। चुकता नहीं मां का उपकार। मां खुश होती है, जग में जीवन अपना वार। मां..... मां अनगिनत तेरे प्रकार। तूं ही दुनिया की सरकार। भिन्न नहीं ईश्वर से मां, बनता नहीं बिन मां संसार। मां..... संतान में मां होती संस्कार। मां ही जग की तारनहार। प्रकृति संवारने में होती, ईश्वर को मां की दरकार। मां की परिभाषा संसार। ममता ईश्वर का आकार। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौ...
आधुनिक मानव
कविता

आधुनिक मानव

विरेन्द्र कुमार यादव गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) ******************** पूर्व मानव समाज में एकता गाव-गाव घर-घर रहे भाय, दादा बाबा के समय में पिता जी अकेले कमाय। एक बड़ा परिवार का खर्चा पिता जी के कमाने से चल जय। एक दूसरे के दुख-सुख को रहे मिल-जुल बटाय। दस पंद्रह सदस्यों का भोजन एक जगह रहे पकवाय। कृषन सुदामा के बचपन के मित्रता को कभी नहीं दिये भुलाय। द्वारिकाधीश होने पर भी सुदामा को लिए गले लगाय। आधुनिक मानव तुने ये मानव समाज दिये कैसा बनाय। आधुनिक मानव कितना मतलबी हुआ जाय। अपने बड़े-बड़े घर को दिये तुने चिड़िया का घोसला बनाय। बिन स्वार्थ के कोई किसी का हाल-चाल भी न पुछे भाय। आधुनिक मानव तू कितना मतलबी हुआ जाय। माँ-बाप को तूने क्यो दिया भूलाय। जो माँ-बाप तुम्हे बड़ी मेहनत से पढ़ाय। पल भर में तुमने क्यो दिये भूलाय। मानव तुने आधुनिक मानव समाज ये कैसे दिये बनाय। एक-दूसरे मित्र की मित्रता को दिये...
जाता लम्हा
कविता

जाता लम्हा

मनमोहन पालीवाल कांकरोली, (राजस्थान) ******************** जाता लम्हा मेरे लिये रूक जा कुछ बात मेरे से भी कर जा सदियों से इंतजार किया जिसका चांदनी रात मे अमृत बरसा कर जा दिल का इरादा चाॅद भी जान रहा सितारो की बारात ले कर जा समुद्र की लहरे शहनाई बजा रही मौजे अपनी जगह नृत्य कर जा साहिल ने भी देखो करवट बदली ए पलों आज उनको मिला कर जा कभी के बे कशी में जीये जा रहे है बारात फूलों की मोहन सजाकर जा परिचय :- मनमोहन पालीवाल पिता : नारायण लालजी जन्म : २७ मई १९६५ निवासी : कांकरोली, तह.- राजसमंद राजस्थान सम्प्रति : प्राध्यापक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीयहिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं,...
गाँव की खुशबू
कविता

गाँव की खुशबू

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** गांँव: सोंधी-सोंधी माटी की खुशबू! सुरम्य हरियाली बिखरी चहुँओर भू!! भोर की लाली क फैला है वितान! कंधे पर हल रखकर चल पड़ा किसान!! शीतल सुरभित मंद पवन मन हरसाय! प्रदूषण मुक्त वातावरण अति भाय!! अमराई में कूके विकल कोयलिया ! कामदेव-बाण-सी आम्र मंजरियांँ !! अनगिन सरसिज विहंँस रहे हैं ताल में!! सारा गांँव गुँथा सौहार्द्र-माल में!! खेतों-झूमे शस्य-श्यामल बालियाँ ! खगकुल-कलरव से गुंजित तरु डालियाँ!! पक्षियों का कूजन हर्षित करता हृदय! बैलों की घंटियों की रुनझुन सुखमय!! नाद पर सहलाता होरी बैलों को! चाट रही धेनु मुनिया के पैरों को!! चूल्हे पर पकती रोटियों की महक! सबके मुखड़े पर पुते हर्ष की चमक!! यहांँ सभी उलझन सुलझाती चौपाल! हर बाला राधा हर बालक गोपाल!! मर्द गाँव का सिर पर पगड़ी सजाए! और आंँचल में हर धानी मुस्काए!! लज्जा की लुनाई में नारी लि...
रंगों से रंगी दुनिया
गीत

रंगों से रंगी दुनिया

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** मैने देखी ही नहीं रंगों से रंगी दुनिया को मेरी आँखें ही नहीं ख्वाबों के रंग सजाने को। कौन आएगाआँखों में समाएगा रंगों के रूप को जब दिखायेगा रंगों पे इठलाने वालों डगर मुझे दिखाओं जरा चल सकूँ मै भी अपने पग से रोशनी मुझे दिलाओं जरा ये हकीकत है कि क्यों दुनिया है खफा मुझसे मैने देखी ही नहीं .... याद आएगा, दिलों मे समाएगा मन के मित को पास पाएगा आँखों से देखने वालों नयन मुझे दिलों जरा देख सकूँ मै भी भेदकर इन्द्रधनुष के तीर दिलाओं जरा ये हकीकत है कि क्यों दुनिया है खफा मुझसे मैने देखी ही नहीं .... जान जायेगा, वो दिन आएगा आँखों से बोल के कोई समझाएगा रंगों को खेलने वालों रोशनी मुझे दिलाओं जरा देख सकूँ मै भी खुशियों को आँखों मे रोशनी दे जाओ जरा ये हकीकत है कि क्यों दुनिया है खफा मुझसे मैने देखी ही नहीं .... परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पित...
स्त्री….. तुम हो
कविता

स्त्री….. तुम हो

सुनीता पंचारिया गुलाबपुरा (भीलवाड़ा) ******************** घर आंगन की दहलीज में, पूजा घर की महक में, तुम हो ....... रसोईघर के स्वाद में, बर्तनों की खन -खनाहट में, तुम हो.... भोर का सूर्य, सांझ का तारा, तुम हो ...... बगिया का महकता फूल, और फूल की खुशबू, तुम हो......... निर्झर झरनों में, नदियों की कल -कल में तुम हो.... बाल मन की किलकारियो में, बुजुर्गों के अंतर्मन में तुम हो .... बहनों का दुलार, भाइयों का रक्षा सूत्र, तुम हो...... ममता की छाँव, और प्यार की आस में तुम हो....... मान मर्यादाओं में, विचारों व संस्कारों में, तुम हो ....... संगीत के सुरों में, वायु के झोंकों में, तुम हो........ होली के रंगों में, विजय की लक्ष्मी, तुम हो..... गौतम की यशोधरा, और राम की सीता, तुम हो...... क्योंकि ....................... मां में ............ बहन में ...... बेटी में ....... बहू में ......... पत्नी में ....
कर्मो का हिसाब है जिदंगी
कविता

कर्मो का हिसाब है जिदंगी

मनीषा जोशी खोपोली (महाराष्ट्र) ******************** कभी-कभी उदासी की, आग है जिदंगी। कभी-कभी खुशियों का, बाग है जिदंगी । हँसता और रूलाता, राग है जिदंगी। खट्टे-मीठे अनुभवों, का स्वाद है जिदंगी। चंद लम्हों को पाने की होड़ है जिदंगी। रिश्तों में, एक खूबसूरत मोड़ है जिदंगी। कोरे कागज पर लिखी, किताब है जिदंगी। प्यार का एक महकता गुलाब है जिंदगी। जागी आंखों का एक ख्वाब है जिंदगी। अपने किऐ हुए, कर्मो का हिसाब है जिदंगी। परिचय : मनीषा जोशी निवासी : खोपोली (महाराष्ट्र) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंद...
मायाजाल
कविता

मायाजाल

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** सूरज आहिस्ता आहिस्ता धरती के आगोश में समा जाता है, हम जमीन से पत्थर उठा कर बेवजह दरिया के सीने पे मारते है देखते है उठती हुई तरंगे जो साहिल से टकराती है तरंगे दिल पर चोट करती है हमआँखों का बांध टूटा पाते है सन्नाटे की बज़्म में न जाने कब तक अपने गीत सुनाते है और न जाने कब तक स्याह आसमा में सितारों के पैबंद लगाते है रात की सिसकियों की महफ़िल शुरू होती है हर निगाह में सवाल होता है हम गुमसुम से क्यो बैठते है मुसलसल कदमो की आहट आती है कोई नज़र नही आता ये कोई राह का जादू है या हमआगत को देख नही पाते है ये हवा का शोर रक्स करते पत्ते ये रात बड़ी अजीब है कोई जरूर हमारे करीब आता है हम है कि उससे दूर भाग जाते है हर रोज सूरज डूबते ही शुरू होती है ये वारदातें हम अपना जिस्म छोड़ कर न जाने क्या क्या खोजते है। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३...
प्रश्न पूछती धरती
कविता

प्रश्न पूछती धरती

डॉ. कामता नाथ सिंह बेवल, रायबरेली ******************** बहुत दिनों से बन्जर, परती, काई पडी़ हुई | प्रश्न पूछती धरती, ले अँगडा़ई खडी़ हुई || तुम्हीं बताओ कब तक हमें रुखाई टोंकेगी, मिलने से कब तक हमको परछाईं रोकेगी; कब तक पीछा छोडे़गी, रुसवाई अडी़ हुई || प्रश्न पूछती धरती, ले अँगडा़ई खडी़ हुई||१|| कभी अँटरिया चूम-चूम बदरा झूमे, बरसे , आखिर कब तक बूँद-बूँद को,प्यासा मन तरसे ; सपने अँखुवायें, अब तो अँगनाई बड़ी हुई || प्रश्न पूछती धरती, ले अँगडा़ई खडी़ हुई||२|| सुधियों की बैसाखी लेकर जब मिलते हो तुम, सोनजुही की कलियों जैसे, कब खिलते हो तुम; बीच हमारे सौतन-सी तनहाई अडी़ हुई || प्रश्न पूछती धरती, ले अँगडा़ई खडी़ हुई||३|| तिल-तिल मर-मरके, जीवन दे देके ऊब गई, सागर तक क्या पहुँचे नदिया खु़द में डूब गई; खु़द की, खु़द से कितनी बार लडा़ई बडी़ हुई || प्रश्न पूछती धरती, ले अँगडा़ई खडी़ हुई||४|| ...
ये जो मेरी हिंदी है
कविता

ये जो मेरी हिंदी है

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** ये जो मेरी हिंदी है कितनी प्यारी हिंदी है सजी राष्ट्र के माथे पर, जैसे कोई बिंदी है।। हजार वर्ष में युवा हुई गई षोड़शी सत्रह में पहले पन्ने मुखर हुई, जलती रही विरह में।। बनी विधान में रानी है अलंकृता हुई नागरी है धाराएँ तीन सौ निकली, ४३ से ५१ तक सारी है। पंचमुखी,दस में भाषें है दक्षिण पथ प्रतिगामी है अश्व वेग से दौड़ रही, दुनिया देती सलामी है। मान मिला तो खड़ी हुई सत्रह बोलियाँ जड़ी हुई रही कौरवी अधर अधीरा, राष्ट्र भाव में बढ़ी हुई।। शोभा इसकी बढ़ती है जन आशा में चढ़ती है कुछ दुष्टों की खातिर, इसकी आन बिगड़ती है। साहित्यभूमि में ढली हुई मानक पोषित पली हुई विश्व सोचता सीखे हम, यहाँ दुराशा मिली हुई। ये जो मेरी हिंदी है कितनी प्यारी हिंदी है सजी राष्ट्र के माथे पर, जैसे कोई बिंदी है।। परिचय :-  सुरेखा "सुनील "दत्त शर्मा उपनाम ...
नई पहल
लघुकथा

नई पहल

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** आशा : माँ जी- आपको और पिताजी को तो मेरे काम में कोई ना कोई कमी हमेशा नजर आती है। आखिर क्या गलती है मेरी, जो आप हमेशा नाराज रहते हो? कभी तो मेरा उत्साह बढ़ाया करो। आपसे तो किसी तरह की उम्मीद रखना अपने आप को धोखा देने जैसा है।रोज-रोज की कहासुनी से, राजेश भी बहुत परेशान था। पत्नी की सुनता तो, जोरू का गुलाम कहलाता और माँ की सुनता तो, पत्नी कहती माँ के पल्लू से बंधे रहना जीवन भर। कभी मन में आता छोड़कर भाग जाऊं सब कुछ। ये खुद ही काम-धाम संभाल लेंगे। शादी से पहले सब कुछ ठीक चल रहा था। माँ कहती थी मेरी बहूँ आएगी तो मैं उसे बहूँ नहीं बेटी की तरह रखूंगी। सास को बहूँ को बेटी ही मानना चाहिए। उस समय मैं सोचा करता था, मेरे घर में आने वाली लड़की बड़ी ही भाग्यवान होगी। जो उसे ऐसा परिवार मिलेंगा।आशा का स्वभाव थोड़ा सा तुनक-मिजाज था। वह छोटी-छोटी बातों प...
हाल, वक़्त की
ग़ज़ल

हाल, वक़्त की

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** हाल, वक़्त की हर तैयारी रखते हैं। लोग वही जो ज़िम्मेदारी रखते हैं। रस्ता, दूरी, मुश्किल, मंज़िल सोच-समझ, साथ सफ़र के वो हुशियारी रखते हैं। सुनकर, पढ़कर लोग उन्हें समझें-बूझें, बातें ऐसी अपनी सारी रखते हैं। आते-जाते जीवन के जितने लम्हें, यादें उनकी मीठी-खारी रखते हैं। काम कोई, कब आ जाये तंग मौके पर, सबसे अपनी दुनियादारी रखते हैं। कहते तो हैं वो सब अपने मन की, लेक़िन जैसे बात हमारी रखते हैं। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है...
हिंदी है हम
लघुकथा

हिंदी है हम

हिमानी भट्ट इंदौर म.प्र. ******************** रानी किसी काम के लिए पोस्ट ऑफ़िस गई। उसने देखा एक महिला वहां की कर्मचारी से इंग्लिश में बात कर रही थी। दूसरी तरफ रानी सोच रही थी। अपने ही देश भारत में रहकर भी कुछ लोगों को हिंदी बोलने में शर्म आती है। उस महिला को कोई फॉर्म भरना था लेकिन वह भर नहीं पा रही थी। वह रानी के पास आई और इंग्लिश में बोली, कैन यू फील माय फॉर्म...? रानी को भी अच्छी इंग्लिश आती थी लेकिन वह विनम्रता से बोली, जी जरूर भर दूंगी लेकिन मैं हिंदी में भरना पसंद करूंगी। वह महिला बोली जैसा आप चाहें। रानी ने लोग क्या कहेंगे इस बात की परवाह नहीं करते हुए गर्व से अपनी मातृभाषा में फार्म भरकर उस महिला को थमा दिया। परिचय :- हिमानी भट्ट ब्रांड एंबेसडर स्वच्छता अभियान, इंदौर निवासी : इंदौर म.प्र. आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय...
मैं हूँ अपनी हिन्दी भाषा
कविता

मैं हूँ अपनी हिन्दी भाषा

माधुरी व्यास "नवपमा" इंदौर (म.प्र.) ******************** अपने मन के उद्गारों को, भावों और अभावों को, पावन कर अपने विचारों को, देकर मेरी अविरल धारा। पूरी कर लो अभिलाषा, मैं हूँ सरल सबल परिभाषा, मैं हूँ अपनी हिंदी भाषा। अपने बौद्धिक विकास में, मेरे आदान-प्रदान से, अज्ञान-अंधकार को मेटो, मेरा प्रकाश पुंज है सारा। मिटा लो पूरी ज्ञान पिपासा, मैं हूँ सरल सबल परिभाषा, मैं हूँ अपनी हिंदी भाषा। जब करोगे मेरा सम्म्मन, जितना दोगे मुझको मान। अम्बर सा प्रसारित होगा, जग में अपने देश का ज्ञान। पूरण करूँ सारी आकांक्षा, मैं हूँ सरल सबल परिभाषा, मैं हूँ अपनी हिंदी भाषा। बंगाली,पंजाबी हो या सिंधी, सबके भाल की मैं हूँ बिंदी। संस्कृत सब बोलियों की माता, मैं बनी सबकी भाग्य विधाता। अब ना करो मेरी उपेक्षा, मैं हूँ सरल सबल परिभाषा, मैं हूँ अपनी हिंदी भाषा। परिचय :- माधुरी व्यास "नवपमा" निवासी - इंदौर म.प्र. सम...
सखी
कहानी

सखी

डॉ. सर्वेश व्यास इंदौर (मध्य प्रदेश) ********************** कहते हैं तीन चीजें ईश्वर एक साथ कभी नहीं देता- १ सुंदरता/ रूप- रंग २ सादगी/ सरलता/सहजता/विनम्रता और ३ तीव्र मस्तिष्क/ मति/ पढ़ने में तेज। अगर किसी के जीवन में यह तीन चीजें हो तो उस पर तथा उससे जुड़े हुए लोगों पर ईश्वर की असीम कृपा होती है। आज की कहानी ऐसी ही एक लड़की की है, जिसका नाम है- सखी। सखी एक छोटे से शहर में रहने वाली एक सुंदर, सुशील और विनम्र लड़की है। उसकी सुंदरता की बात करें तो चंद्रमा के समान मुख वाली एवं शीतलता लिए हुए, हिरनी सी आंखों वाली एवं चंचलता लिए हुए, गज गामिनी एवं हथिनी सी गंभीरता लिए हुए। सादगी की प्रतिमूर्ति, अहंकार रहित, लेश मात्र भी घमंड नहीं, ना पढ़ाई का और न ही अपने रूप रंग का। मानो विनम्रता शब्द उसके लिए ही बना हो, वाणी शहद सी मीठी और मुस्कान जीवन रस का संचार कर दे। अत्यंत संकोची एवं शर्मिली, लेकि...
हिंदी भाषा
कविता

हिंदी भाषा

संजय जैन मुंबई ******************** हिंदी ने बदल दी, प्यार की परिभाषा। सब कहने लगे मुझे प्यार हो गया। कहना भूल गए, आई लव यू। अब कहते है मुझसे प्यार करोगी। कितना कुछ बदल दिया, हिंदी की शब्दावली ने। और कितना बदलोगें, अपने आप को तुम। हिंदी से सोहरत मिली, मिला हिंदी से ज्ञान। तभी बन पाया, एक लेखक महान। अब कैसे छोड़ दू, इस प्यारी भाषा को। ह्रदय स्पर्श कर लेती, जब कहते है आप शब्द। हर शब्द अगल अलग, अर्थ निकलता है। इसलिए साहित्यकारों को, हिंदी भाषा बहुत भाती है। हर तरह के गीत छंद, और लेख लिखे जाते है। जो लोगो के दिल को छूकर, हृदय में बस जाते है। और हिंदी गीतों को, मन ही मन गुन गुनते है। और हिंदी को अपनी, मातृभाषा कहते है। इसलिए हिंदी को राष्ट्रभाषा भी कहते है।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी ...
कन्या भ्रूण हत्या
कविता

कन्या भ्रूण हत्या

अर्चना अनुपम जबलपुर मध्यप्रदेश ******************** कन्या भ्रूण के हत्यारे नरपिशाचों के विरुद्ध धिक्कारती स्वरचित रचना गायत्री, सावित्री, दारा, गार्गी, उपाला कन्या थीं। गंगा, गौरा, सिया-जानकी वंश वृद्धिका कन्या थीं। प्रजापति की वीर पुत्रियाँ प्रकटे जिनसे अस्त्र सहस्त्र। रण में विजयी राम बने वो शस्त्र जननी भी कन्या थीं। शक्ति के मंदिर में जाकर शक्ति को दुत्कार रहा। मानव चाहे पुत्र जन्म नित स्वारथ यूँ चित्कार रहा। जिससे चाहे जने पुत्र ही वह माता भी कन्या है। गर्भ में कन्या मार रही जो वह 'दुष्टा' भी कन्या है। दानव बनता मानव देखो निरत अजन्मी मार रहा। वधु चाहिए बेटे ख़ातिर इतना जबकि जान रहा। एक दिन वधु भी नहीं मिलेगी गर तेरी यह नीति रही। विधुर सरीखे जीवन होगा सुनले मेरी खरी-खरी। ढूढ़ने जाता जिस कन्या को मैया के नवरातों। उन दुर्गा का दोषी है जगता जिनके जगरातों में। न...