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मीटर टेप के साये में – दो पहाड़ों का संवाद
व्यंग्य

मीटर टेप के साये में – दो पहाड़ों का संवाद

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** दो पहाड़ एक बड़का भैया, एक छुटका भैया बरसों से बगल-बगल खड़े थे। एक ही माँ, पृथ्वी, की संतान, क़द-काठी में फर्क, पर दायित्व में बराबरी। दोनों ने ही धरती को थामे रखा, हरियाली की चादर ओढ़ाए रखी। मगर इंसान की आदतें कहाँ बदलती हैं। उसने छुटके के कान भरने शुरू किए- तेरी जगह अब यहाँ नहीं; तुझे जान-बूझकर छोटा रखा गया; असली बेटा तो बड़का है। चल, तुझे शहर ले चलते हैं वहाँ नाम बदलेगा, पहचान बनेगी। छुटका बातों में आ गया। उसे भरोसा दिलाया गया कि “पहाड़” नाम का कलंक हटेगा। कहा गया तू नव-निर्माण की नींव है; तेरे ऊपर इमारतें उठेंगी; तू काम आएगा। पहली बार उसे लगा कि खड़ा रहना नहीं, उपयोगी होना ज़रूरी है। “बड़के भैया… सुना है हम दोनों का बिछोह होने वाला है,” छुटका चुप्पी तोड़ता है। आवाज़ में उत्सुकता है...
नई दृष्टि
आलेख

नई दृष्टि

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** जनरेशन जेड (जेन जी) वह पीढ़ी है जिसका जन्म लगभग १९९७ और २०१२ के बीच हुआ है। यह पीढ़ी डिजिटल नेटिव्स कहलाती है क्योंकि वे इंटरनेट और स्मार्टफोन के साथ बड़े हुए हैं और तकनीक के साथ सहज हैं। वे विविधता, सामाजिक न्याय और वर्क लाइफ बैलेंस को महत्व देते हैं। आज जेन जी शब्द हर चर्चा का केंद्र है - विज्ञापन से लेकर शिक्षा नीति तक, हर जगह इसका जिक्र होता है। प्रौद्योगिकी-प्रेमी: जेन ज़ेड के लोग स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन शॉपिंग जैसी तकनीक के साथ पूरी तरह से सहज हैं। हाल ही में यूट्यूब में एक नई रिपोर्ट पेश की है कि भारत में ६८ फ़ीसदी जेन जी वीडियो से सीखे हुए हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज का इस्तेमाल कर रहे हैं। यूट्यूब आप जेन जी के लिए सिर्फ वीडियो देखने का प्लेटफार्म नहीं बल्कि डिजिटल संस्कृति सीखने और सोशल कनेक्शन का केंद्र बन चुका है। ...
बदलते युग का शोर
कविता

बदलते युग का शोर

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** आधुनिक युग नया दौर चहुँऔर मचा खूब शोर, कहीं तारीफ का बजता ढोल बिगुल कहीं नजरअंदाज करने में है गुल, तकरार आमने आमने पुरजोर घमासान जंग में दुर्बल को मिटाने में प्रतियोगिता में मचा शोर, भारी भरकम मची दौड़ मेहनत पर फेरकर पानी करने को लगाते जोर मजबूत साख मिटाने में लगाए जोर करते कमजोर, बदलते आधुनिक युग में बस मचाते बस, यही शोर बदलते समय यही सोच में, बदले बोलने के व्यवहार संग इंसान अब इंसान से प्रश्न पूछने और सोचने को कहाँ है संस्कार संस्कृति उच्च विचार, सोचता इंसान क्या करूँ, कैसे करूँ नम नेत्र से एकांत बैठे बदलते आधुनिक युग में भीतरघात की वेदनाओं में, सच्चाई बताने में कमजोर सौहार्द समन्वय भाईचारे में पतन की डोर जाने कितनी हो रही बदलते युग मे कमजोर परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (अस...
जानकारी जरूरी है
कविता

जानकारी जरूरी है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** किसी और शहर जाने के लिए एक खास नाम का बस विनय था, जिसके आने जाने का समय तय था, मुझे इंतजार में कुछ वक्त बिताना था, मैं सामने बैठे बुजुर्ग के पास आया, नमस्ते करते हुए बतियाया, अंकल जी अपना हालचाल बताइए, कुछ अच्छी बात सुनाइए, तब वह अनवरत बोलता रहा, बीच बीच कभी गुस्सा और प्यार से डोलता रहा, उन्होंने बुद्ध के बारे में विस्तार से सु ताया, ज्ञान विज्ञान के उनके मार्ग को बताया, कभी कबीर जी के बारे में, कभी रैदास जी के बारे में, कभी गुरू नानक देव जी के बारे में, कभी ज्योतिबा, सावित्रीबाई फुले के बारे में, कभी झलकारी बाईं के बारे में, कभी नारायणा गुरू के बारे में, कभी तिलका मांझी के बारे में, कभी बिरसा मुंडा जी के बारे में, कभी बाबा साहेब के बारे में, तो कभी कांशीराम जी के बारे में बताया, ये स...
बासंती दौर
मुक्तक

बासंती दौर

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** सखी ! आज तो भौंरे, कलियों को चूमे। है पराग की चाह, वनों-उपवन में घूमे। मन में लिए उमंग, बसंती हवा चल रही, जिसने पाया मीत, वहीं मस्ती में झूमे।। आया है ऋतुराज, गीत मौसम के गाता। सरसों का उल्लास, आज जन-जन को भाता। वन-उपवन हैं दिव्य, कछारों में है यौवन, मिलन-नेह का भाव, गीत अभिसारी गाता।। कामदेव का ताप, आज बौराया हर इक। अनुबंधों का दौर, पहुँच वासंती मन तक। टूटे संयम बंध, सभी तो हैं अब विचलित, है प्रियवर की चाह, सभी के दिल में धक-धक।। पीत वसन की आभ, सजी है अब अमराई। कोयल ने मादक होकर के, प्रीति जगाई। अब युवाओं की बात, अकेले मात्र नहीं है, ढूंढ रहे हैं मीत वृद्ध भी, हो हरजाई।। हुईं दूरियाँ ख़त्म, वसंती मौसम चहके। परिणय की है बात, मिलन के पल हैं महके। है गृहस्थ की बात, नहीं अब केवल जानो, तोड़ के संयम...
शांत चेहरा
कविता

शांत चेहरा

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शांत चेहरा कभी कमजोर नहीं होता स्थिर चेहरे के पीछे अनकहे तूफान छिपे होते है उनके चेहरों पर कल के संजोए स्वप्न नहीं होते समाज के थपेड़ों से चेहरे की लकीरें गहरी हो जाती हैं ! अश्रु उनके कभी दिखाई नहीं देते सबकी खुशी में वो बस मुस्करा देते हैं उनके खामोश झूले की पेंग बहुत ऊंची होती है दर्द का गीत उनकी धड़कनों में पिरोया होता है! उनकी जिंदगी की किताब का हर एक पन्ना किस्सा होता है किसी पन्ने पर चैन तो किसी पर कठिनाइयों का बसेरा होता है! शांत चेहरा उनकी कमजोरी नहीं होती उनकी ताकत, उनके संयम और दृढ़ता की परिभाषा होती है ऐसे व्यक्तित्व में कोई दिखावा नहीं होता इसीलिये उम्र भार ये चेहरा भीड़ में तन्हा होता है! उनके दिलों के टूटने की आवाज नहीं होती आग का एक दरिया बहता है जिसमें बहुत कु...
हिंदी आत्मा में बस्ती
कविता

हिंदी आत्मा में बस्ती

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** हिंदी आत्मा में बस्ती है, संस्कारों की उजली हस्ती है। माँ की लोरी, पिता का विश्वास, मिट्टी की सोंधी खुशबू-सी पास हर धड़कन में इसकी मस्ती है। यह भाषा केवल शब्द नहीं, यह भावों की निर्मल सरिता है। आँसू बनकर भी चुपके बहती, मुस्कान बन ओठों पर ठहरती हिंदी जीवन की स्वर गीत है। तुलसी की चौपाइयों में धर्म, मीरा के पदों में प्रेम पुकारे। रसखान की भक्ति में डूबी हुई, कबीर की वाणी में सत्य जली हिंदी युग-युग तक पथ रहे भली। यह खेतों की हरियाली बोले, यह श्रमिक के पसीने की गंध। यह पर्वों की थाली सजाए, यह त्याग, तपस्या का संदेश जन-जन की आशा की है कंध। जब तक आत्मा में प्राण बसे, हिंदी का दीप जलता रहेगा। समय बदले, दुनिया बदले, पर संस्कृति का यह अमिट स्वर हृदय-हृदय में पलता रहेगा। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म ...
रात्रि का दृश्य
कविता

रात्रि का दृश्य

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** ओढ़ निशा को चपल चांदनी मन को आकर विचलित करती नीरवता की ध्वनि विकट है दृश्य गगन का अतुल मनोरम तारों की झिलमिल सेना के बीच खड़ा है ये मेरा मन शीतलता सी लिए हवाएं आएं जाएं जुगनू आकर आस-पास राहें चमकाएं तमस ने रंग के नील गगन को श्याम रंग कर डाला और गले में डाल सितारों की उज्जवल सी माला दुग्धमेखला बेणि बनकर नागिन सी लहराए चंद्रकिरण अपनी किरणों से और अधिक चमकाएं जगह जगह पे उमड़े घुमड़े बनकर मानो प्रहरी ये घन तारों की झिलमिल सेना के बीच खड़ा है ये मेरा मन परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया ल...
स्त्री की आवाज
कविता

स्त्री की आवाज

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* तुम पुकारे जा रहे हो और मुझसे पूछते हो कि अजनबी सी ख्वाहिशें क्यों पाल बैठी हूँ? मैं उसी आदमी से चाहत कर बैठी हूँ जो अपने ही शोर में खुद को खो चुका है। न तुम इत्मिनान से बैठ पाते हो, न नींद तुम्हें पूरा अपना मानती है और फिर भी पूछते हो मुझसे कि इस मुख़्तसर सी ज़िंदगी से मैं क्या चाहती हूँ? मैं तो बस इतना चाहती थी कि तुम थक कर किसी शाम मेरे पास बैठ सको, बिना कुछ साबित किए, बिना खुद से लड़े। पर तुम तो अपनी तन्हाई की शाम का भी चराग़ नहीं जला पाए… और अब मुझसे पूछते हो कि मैं हवा जैसी चाहत क्यों लेकर आई हूँ? शायद मेरी गलती यही थी कि मैंने उस आदमी से दिल लगा लिया जो खुद से ही दोस्ती निभा नहीं पाया. परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे ज...
वीर जवान
दोहा

वीर जवान

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** खूनी होली खेलते, भारत के ये लाल। लाल रक्त का है तिलक, चमक रहा हर भाल।। पालो मत आतंक को, करे शांति वह भंग। वार कराता पीठ पर, कुटिल शत्रु का ढंग।। आग जले प्रतिशोध की, उर में मेरे राम। नोंचे बोटी शत्रु की, करते काम तमाम।। सूनी माँ की गोद की, आतंकी शैतान । रहना अब तैयार तुम, होना लहू-लुहान।। रूठ गया सिंदूर है, चूड़ी टूटी हाथ । क्रूर युद्ध परिणाम है, बच्चे हुये अनाथ।। खोलो आज त्रिनेत्र तो, दुखी शंभु संसार । भस्म करो अब शत्रु को, हैं धरती पर भार । भारत का कश्मीर है, बदलो अपने ढंग। मृतक अनगिनत देख कर, काँप रहा है अंग।। भारत प्राण प्रतीक है, आजादी का गान। ध्वजा तिरंगा का करें, भारतवासी मान।। गौरव गाथा गाइए, करते हैं कल्याण। भारत माँ के वीर सब, तजें देश हित प्राण।। परिचय :- मीना...
कभी कभी सोचती हूँ मैं
कविता

कभी कभी सोचती हूँ मैं

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** कभी कभी सोचती हूँ मैं कौन हैं हम, खुद को साबित करने के लिए क्यों बनना चाहते हैं कुछ हम। बाहर से रंगों से भरे हुए तन की सजावट को प्राथमिकता देते हैं हम भले ही भीतर से खोखले हों मगर रंगीन आवरण से ढके हैं हम। शांत चेहरे की मुस्कान काफी नहीं लगती खुद को ओहदे की चमक से संवारना चाहते हैं हम सूकून हमारा क्यों पर्याप्त नहीं सब कुछ पाने की होड़ में लगे हैं हम। मन की शांति कोई धन नहीं प्रकृति ने जो दिया उसका का कोई मोल नहीं अर्थिक धन से तौल रहे रिश्ते क्यों राजगद्दी की दौड़ में शामिल हैं हम। परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार) निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ...
हुक्का-वार्ता
व्यंग्य

हुक्का-वार्ता

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** चौपाल पर दो हुक्के पड़े थे। दोनों पुराने थे इतने पुराने कि इतिहास उन्हें पहचानता था, पर वर्तमान उनसे कतराता था। एक की चिलम में बीते ज़माने की राख जमी थी, दूसरे की नली में राजनीति की नमी। हवा ठंडी थी, पर माहौल में गरमाहट थी वो गरमाहट जो सिर्फ जाति और सत्ता के मेल से पैदा होती है। हुक्का नंबर एक ने गला साफ़ किया- “सुना है भाई, सरकार फिर से लोगों को उनकी जाति याद दिलाने में लगी है।” हुक्का नंबर दो ने गुड़गुड़ाहट भरी- “तो इसमें नई बात क्या है? भूल गए थे क्या लोग?” हुक्का नंबर एक भावुक हो उठा- “हाँ यार, लगता है हमारे दिन फिरेंगे। एक ज़माना था जब हमारी कितनी पूछ थी! हर जाति का अलग हुक्का, अलग शान। ऊँची जात वालों के हुक्के तो जैसे राजमहल की शोभा मीनाकारी, फुँदे, चाँदी की नली। जमींदार जब म...
बच्चों को चाइल्ड हेल्पलाइन एवं बाल विवाह निषेध अधिनियम के बारें में किया जागरूक
देश/विदेश/प्रदेश

बच्चों को चाइल्ड हेल्पलाइन एवं बाल विवाह निषेध अधिनियम के बारें में किया जागरूक

* चाइल्ड हेल्पलाइन कांगड़ा ने राजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गाहलियां में बाल अधिकारों के साथ चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 की कार्यप्रणाली के बारें में किया जागरूक। * बाल विवाह मुक्त भारत अभियान क़े अंतर्गत उपस्थित प्रतिभागियों कों "बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006" की जानकारी साँझा की। चाइल्ड हेल्पलाइन कांगड़ा ने राजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गाहलियां के बच्चों, अध्यापकों ब अन्य स्टॉफ के लिए एक जागरूकता कैंप का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता स्कूल के प्रधानाचार्य अजय कुमार ने की व शिविर मे उपस्थित प्रतिभागियों का स्वागत किया। आज क़े जागरूकता कार्यक्रम मे जिला कार्यक्रम अधिकारी अशोक कुमार शर्मा ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की और शिविर मे मौजूद प्रतिभागियों कों बाल शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं संरक्षण पर जागरूक किया और बाल कल्याण क़े लिए महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा चलाई ज...
राणा सांगा
कविता

राणा सांगा

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** वीरता की सीढ़ियों पर जन्म से जो चढ़ गए खेलने की उम्र में जो शत्रुओं से भिड़ गए मातृभूमि को जो अपनी लहू से ही सींचते आंख से ही सत्रुओं के प्राण आधे खींचते रक्तरंजित भाल जिसके, कंठ सबके सोखते नख प्रखर वीर महाराणा सांगा वीरता की सीढ़ियों पर जन्म से जो चढ़ गए खेलने की उम्र में जो शत्रुओं से भिड़ गए मातृभूमि को जो अपनी लहू से ही सींचते आंख से ही सत्रुओं के प्राण आधे खींचते रक्तरंजित भाल जिसके, कंठ सबके सोखते प्रखर नख से दुश्मनों कि छातियों को नोंचते जिनके वंशज शोर्य गाथा रक्त से ही गढ़ गए जो झुके नहीं सर भला कटे, धर ही जिनके लड गए बो वीर मेवाडी की जिसने युद्ध सो सो जय किए जिनका हर कण कण धरा का, शोर्य का गायन करे जिनकी गर्जना सुन भागते, दुश्मन भी उल्टे पाव लिए वो राणा सांगा चलते थे, छाती पर अ...
प्रभु कृपा
स्तुति

प्रभु कृपा

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** श्रेष्ठ योनी में भेजा है प्रभु ने तुझे, नाम सुमिरन से सार्थक बनाते चलो। जग के कार्यों के संग, नाम जपते रहो, प्रभु की किरपा का नित लाभ पाते चलो। श्रेष्ठ योनी में ... है मनुजतन तुझे मुक्ति हेतू मिला, जो भी दे शीश धर, कर न कोई गिला। राम का नाम जप, मुक्ति साधन सरल, बस इसे तुम सदा गुनगुनाते चलो। श्रेष्ठ योनी में ... सृष्टि के सृजनकर्ता का बालक है तू, उसने सृष्टि रची, उसका पालक है वो। श्रेष्ठ अवसर मिला, मुक्ति पाने के मित, पग इसी मार्ग पर, नित बढ़ाते चलो। श्रेष्ठ योनी में ... भक्त हनुमानजी राम जप में रमे, करके सेवा बने, रामजी के सगे। तुझको भी मुक्ति पानी इसी जन्म,तो नाम में डूब सबको डुबाते चलो। श्रेष्ठ योनी में ... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित क...
सतरंगी दुनिया- १६
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- १६

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  आप गलती करके सुन रहे हैं तो आप ऑफिस में हैं, और अगर आप बिना गलती के सुन रहे हैं तो आप निश्चय ही घर पर हैं। दुनिया की हर चीज ठोकर लगने से टूट जाती है, लेकिन कामयाबी एक ऐसी चीज है जो कि ठोकर खाकर ही मिलती है। गरीब मांगे तो भीख, अमीर मांगे तो चंदा, करोड़पति मांगे तो डोनेशन और अरबपति मांगे तो सब्सिडी। यहाँ सभी लोग अपने हिसाब से भीख मांगते हैं। मुहुर्त के चक्कर में मत पड़िए, बिना मुहुर्त के पैदा होकर जीवनभर 'शुभ मुहुर्त' के चक्कर में फंसा इंसान एक दिन बिना मुहुर्त के प्राण त्याग देता है। पुरूष की आदत होती है हमेशा महिलाओं के बीच घुसने की, इसलिए शायद 'फीमेल' शब्द में 'मेल' आता है और 'वुमेन' में 'मेन' आता है। झूठ बोलने से पाप लगता है और सच बोलने से आग। अब आप ही बताइए, आप क्या बोलेंगे ? जिसका कोई नहीं होता, उसका खुदा होता ह...
बिखर सा गया हूं मैं…
कविता

बिखर सा गया हूं मैं…

शोभा रानी खूंटी, रांची (झारखंड) ******************** ऐ वक्त तेरी अदाओं को देख... बिखर सा गया हूं मैं.... बहुत याद आती है मुझे.... खुद की.... मुनासिब होगा अगर तू मुझे पहले जैसा कर दे..!! बहुत याद आती है मुझे... वो बचपन के ख्याली पुलाव... वो लड़कपन के हजारों खिलौने... वो अल्हड़ आजादी... वो निश्चल हृदय... वो बेख्याल सा मन... वो सुकून भरी नींद... वो सुनहरी खुशनुमा सुबह... भरी दोपहरी में दोस्तों संग... कच्ची अंबिया चुराना... यारों संग बर्फ के गोलो को... मां से छुपा कर खाना.. वो बारिश के पानी मे... कागज की कश्ती चलाना... वो पूस की ठिठरन में .... अपनो संग आग सेकना... वो सावन के झूले मे... गूंजती हंसी और ठिठोलियां.... वो ख्वाबो का जहँ।... और मुट्ठी भर आसमा... वो बचपन के दिन.... वो इंद्रधनुषी सा सतरंगी समा.... बदलते वक्त के साथ .... खोता हुआ झिलमिलाता सा.... व...
दोष किसे दूँ
कविता

दोष किसे दूँ

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** वही ब्रह्मांड, वही दुनिया, वही मुल्क, वही प्रकृति, वही पर्यावरण, वही आबो-हवा, वही नैतिकता, वही संस्कार, वही जीव-जगत… फिर भी गिरते स्तर के लिए दोष किसे दूँ? मानव, अब मानव नहीं रहा दानव हो चुका है। संस्कार, अब संस्कार नहीं रहे सिर्फ़ दिखावे का आवरण बन चुके हैं। नैतिकता, अब आत्मबोध नहीं दूसरों से की जाने वाली उम्मीद बन गई है। इंसान ढीठ हो चला है, ढिठाई ऐसी कि हर जगह दिखता है “मैं… और सिर्फ़ मैं!” किसी के पास अब हृदय शेष नहीं, जिसे त्यागना चाहिए उसे कसकर पकड़ा जाता है। होड़ मची है- अपने स्तर को सबसे नीचे ले जाने की, और गर्व से दिखाने की। तो कहो… इस पतन के लिए दोष किसे दूँ? परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प...
माँ शारदा वंदन
स्तुति

माँ शारदा वंदन

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** हे शारदे करुणामयी माँ, भक्त को पहचान दो। श्वेतांबरा ममतामयी माँ, श्रीप्रदा हो ध्यान दो।। गूँजे मधुर वाणी जगत में, वल्लकी बजती रहे। कामायनी माँ चंद्रिका सुर, रागिनी सजती रहे।। वागीश्वरी है याचना भी, भक्त का उद्धार हो। विद्या मिले आनंद आए, प्रेम की रसधार हो।। आभार शुभदा है शरण लो, बुद्धि का वरदान दो। उल्लास दो नव आस दो प्रिय, ज्ञान की गंगा बहे। चिंतन मनन हो भारती का, लेखनी चलती रहे।। मैं छंद दोहे गीत लिख दूँ, नव सृजन भंडार हो। आकाश अनुपम गद्य का हो, प्रार्थना स्वीकार हो।। भवतारिणी तम दूर हो सब, नित नवल सम्मान हो। तुम प्रेरणा संवाहिका हो, चेतना संसार की। वासंतिका हो ज्ञान की माँ, पद्य के शृंगार की।। साहित्य में नवचेतना हो, कामना कल्याण भी। संजीवनी हिंदी सुजाता, श्रेष्ठ हो मम प्राण भी।। आलोक प्...
इंतजार
कविता

इंतजार

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** कोयल को इंतजार है सावन की हो फुहार, प्रेमी को इंतजार है प्रियतमा की चाह, एक भक्त को इंतजार है ईश्वर का सानिध्य, शिष्य को इंतजार है गुरु का मिले आशीष, धरती को इंतजार है कब बरसेंगे मेघ, सागर को इंतजार है नदियों का समावेश, एक मोरनी को इंतजार है स्वाति नक्षत्र की एक बूँद। निषाद को इंतजार है श्री राम सा मित्र, शबरी को इंतजार है गुरू का है उपदेश बैर खाये श्री राम प्रभु कई जन्मो का मेल। अहिल्या बैचैन है पाषाण का मिला अभिश्राप प्रभु राम की रज मिले होवे आज उद्वार। केवट को इंतजार है कब नाव चढ़े श्री राम, रावण को इंतजार है योद्धा कौशल राम। जटायू के पर कटे इंतजार हे राम बेटे का सा प्रेम मिला उद्वारक श्री राम, कोसल्या को इंतजार है कब आयेगे मेरे राम। सूनी अयोध्या मै खुशियाँ फिर लौट आयेगी आ...
निस्तब्धता
कविता

निस्तब्धता

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** निस्तब्धता जब बोल न पाए, मन भीतर से टूट जाता है, शब्दों के अभाव में पीड़ा का शोर और गूंज जाता है। खामोशी की चादर ओढ़े, दर्द अकेला सोता है, भीड़ में रहकर भी इंसान खुद से ही रोता है। निस्तब्ध क्षणों में स्मृतियाँ तीखे तीर चलाती हैं, अनकहे सवाल बनकर रातों की नींद चुराती हैं। जहाँ संवाद थम जाए, वहाँ संबंध दम तोड़ते हैं, निस्तब्धता में ही कई अपने पराए हो जाते हैं। खामोशी का बोझ कभी-कभी शब्दों से भारी है, यह भीतर-भीतर जलाती है, पीड़ा इसकी न्यारी है। निस्तब्धता में मन खुद से ही लड़ जाता है, हर मौन क्षण एक नया घाव दे जाता है। बिना आवाज़ की पीड़ा भी गहरी चोट लगाती है, निस्तब्धता अक्सर आत्मा को चुपचाप रुलाती है। जब भावों को मार्ग न मिले, वे आँसू बन बहते हैं, निस्तब्धता में ही कई सपने दम तोड़ते रहते हैं। खा...
खेल शुरू बजाओ ताली, खेल ख़त्म बजाओ ताली
व्यंग्य

खेल शुरू बजाओ ताली, खेल ख़त्म बजाओ ताली

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** एक कवि सम्मेलन में हमें आगे की पंक्ति में बैठा दिया गया। यह आयोजकों की कृपा कम और हमारी जुगाड़-साधना का प्रतिफल अधिक था। वीआईपी दीर्घा का टिकट हमने कबाड़ से खोज निकाला था, पर मंच पर बैठे कवि महोदय ने हमारे भीतर का सारा वीआईपी-पन झाड़कर बाहर कर दिया। इतनी तालियाँ बजवाई गईं कि क्षण भर को आत्मा कांप उठी कहीं पिछले जन्म में हम पेशेवर तालीबाज़ तो नहीं थे? फिर सांत्वना मिली नहीं, वीआईपी दीर्घा में वही बैठ सकता है जो समय-असमय ताली बजाने में पारंगत हो। मन में यह भी संतोष रहा कि यदि इस जन्म में ठीक से तालियाँ बजा दीं, तो शायद अगले जन्म में घर-घर ताले बजाने वाली योनि में जन्म न लेना पड़े। कवि ने इशारों-इशारों में यह आश्वासन भी दिया था। नेता और कवि में एक अद्भुत समानता है दोनों तालियों के भूखे होते...
अरमानों की पतंगे
कविता

अरमानों की पतंगे

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** अरमानों की डोर से सपनों की पतंग उड़ा लेता हूं। मेरे सपनों की कई आकार, प्रकार की पतंगे। इनमें से अपनी हसरतों को हवा में लहरा लेता हूं। कभी-कभी अपनी मेहनत के कन्ने बांधकर सपनों की पतंग, उड़ा लेता हूं। कभी अरमानों की पतंग ऊपर उड़ती, कभी गोते लगती, कभी ढील पाकर, नीचे आ जाती। हार जीत खुशियों के आलम से, आसमां में उड़ती पतंगो से, एक ही संदेश पाता हूं। हर पतंग उलझी है, एक दूसरे की डोर से। फिर भी कुछ रिश्ते उलझे से, उड़कर भी खुशी से झूम रहे हैं। एक डोरी से इन पतंगों से दिल और नजरे, एक दूसरे पर लगाये बैठे है। आसमां में उड़ती पतंगों से, हर दिल भी पतंग सा बंधा, टक टकी लगाए बैठा है। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्व...
पिता-पुत्र
कविता

पिता-पुत्र

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक पिता अपने नन्हें से पुत्र का पालन पोषण करते उसे स्नान कराते, खाना खिलाते कितना खुश हो रहा है खिलखिलाहट से गूंज रहा है उसका घर-आंगन-आशियाना! नन्हें-नन्हें पांव शैतानियां करते कभी इधर तो कभी उधर इठलाते अद्भुत है प्रेम पिता का अपने पुत्र के प्रति समेटना चाहता है पिता इन अनमोल लम्हों को अपने सीने में ! समय मानो पंख पर लगा कर उड़ता जा रहा है, पिता के बाजुओं में ताकत है, नन्हा बच्चा अपने को सुरक्षित महसूस करता है। समय अपनी गति से चलायमान हो रहा है। वहीं आशियाना, वहीं घर-आंगन है, किन्तु आज पिता के कंधे झुके हुए से है हाथों में कंपकंपाहट है, आज वो पिता चलने से लाचार है, पिता की नजरे झुकी है मानो उनसे कोई गुनाह हुआ हो ! वही पुत्र आज पिता को खिला रहा है किन्तु कोई खिलखिलाहट नहीं, कोई खु...
औचित्य क्या?
कविता

औचित्य क्या?

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** यथार्थ को त्याग, सच्चाई को कुचल, कल्पनाओं को सच बता इतराऊं मचल-मचल, सारे संसार का ज्ञान ठूंस लूं अपने अंदर, पर यकीन करूं हो जाए कोई अलौकिक चमत्कार, तो फिर औचित्य क्या उस ठूंसे हुए ज्ञान का, लदे रहूं हीरे मोतियों से, ढका रहूं नवीन वसनाें से, और रखूं अस्वच्छ तन को, तो औचित्य क्या अथाह धन का, सबको पढ़ाता फिरूं विज्ञान, बटोरूं नित सम्मान, जा जा व्याख्यान दूं विद्यालयों में, महाविद्यालयों में, और अंधा यकीन करूं पाखंडों और अन्धविश्वास पर, तो औचित्य क्या अथाह ज्ञान का, प्रकृति से प्रेम करूं, हर जीव की उपयोगिता समझूं, सिर्फ अपनी सनक खातिर कैद में रखूं तोता, मैना, बुलबुल, तो औचित्य क्या खुले आसमान का, कामना है न बंधूं किसी ऐसे नियम से जो मुझे इंसान न रहने दे, और हां जिसे जो कहना है कहने ...