बेबसी
डॉ. जयलक्ष्मी विनायक
भोपाल (मध्य प्रदेश)
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मां से स्नेह पाया
पिता ने दुलार लुटाया,
मैं घड़ी की सुई की तरह
कभी इधर , कभी उधर
प्यार समेटती, सहेजती
दोनों में एक अनचाहा रिश्ता जोड़ती।
संपूर्ण प्यार की चाह
जीवन की इकलौती आस,
बंटी हुई ज़िंदगी के क्या मायने
जब माता पिता नदी के दो किनारे?
हॉस्टेल की खिड़की से
किसे देखती मेरी मायूस निगाहें
छन-छन कर सूर्य की किरणें
उदास करती मेरी राहें
मम्मी डैडी को लगाने गले
तड़पती मेरी छोटी छोटी बांहें।
गले लगती पिता से जब
मां याद आती हर पल,
मां के चरण जब छूती
पिता कैसे होंगे मैं सोचती,
क्या सोचा मेरे मां बाप ने कभी
बेटी किन दौरों से गुजरी?
होठों पर मुस्कान है फीकी
आंखें हैं उसकी गीली गीली,
अगर तुम ना बिछड़ते
रहते हमेशा साथ-साथ
तो क्या बेटी होती दुखी?
क्या बेटी होती दुखी?
यहीं है बेटी की बेबसी।
परिचय :- ...























