सपने संगम जैसे
आनंद कुमार पांडेय
बलिया (उत्तर प्रदेश)
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सपने संगम जैसे लगते,
दूर हमारे दुखड़े भगते।
छु हीं लेंगे अपनी मंजिल,
विघ्नों से ना पीछे हटते।।
सपने संगम जैसे लगते,
दूर हमारे दुखड़े भगते।।
जीवन के हर विकट समय को,
हंसते-हंसते दूर भगाना।
हम भी हैं इक अद्भूत मानव,
सपना आया एक सुहाना।।
हम हैं निडर पथिक उस पथ के,
पार करेंगे हम भी डटके।
सपने संगम जैसे लगते,
दूर हमारे दुखड़े भगते।।
कभी पंख लग जाते हमको,
पक्षी बन उड़ जाते हैं।
आसमान के खुले सफर में,
उड़ने में सुख पाते हैं।।
इन विचित्र सपनो की दुनिया,
में हम कभी नहीं हैं थकते।
सपने संगम जैसे लगते,
दूर हमारे दुखड़े भगते।।
वो बचपन के सपने भी तो,
आ जाते हैं कभी-कभी।
खेल-खेल में रोज झगड़ना,
फिर मिल जाना अपना भी।।
सपनो के इस सुंदर वन में,
मन आनंद के रोज भटकते।
सपने संगम जैसे लगते,
दूर हमारे दुखड़े भगते।...
























