मन की पीड़ा
आलोक रंजन त्रिपाठी "इंदौरवी"
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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जब मन की पीड़ा उभरी तो मैंने उसे लगाम दिया है
कठिन पलों में मैंने खुद को एक नई पहचान दिया है
पीकर के अपमान घूंट का मैंने संयम पाला है
दूर दर्शिता के आंगन में स्वयं हृदय को ढाला है
विचलित होकर जब दुनिया के लोग यहां घबराते हैं
तब हम अपनी जीवन की गाथा लिखकर उन्हें सुनाते हैं
जीवन मुल्यों की धूरी पर जब जब भी आघात हुआ है
और निखरकर जीनें के साहस भी एहसास हुआ है
रिश्तों के ब्वहारिकता में मौकों को सम्मान दिया है
जब मन....
जब तुम मुझे समझ पाओगे और अधिक इतराओगे
मेरे भावों की सरिता में तब तुम और नहाओगे
प्रेम नहीं ये नैतिकता है इसका मूल्य समझना होगा
उछली उछली भावुकता से तुमको आज उभरना होगा
गहन विचारों में डूबी जब सोच निकलकर आयेगी
तब इस प्रेम कहानी की सच्चाई तुमको भायेगी
समझ सकोगे शायद मैंने तुमको क्या संधा...






















