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दोहा

सच कहना है अब बुरा
दोहा

सच कहना है अब बुरा

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** (दोहा उर्दू छंद) सच कहना है अब बुरा, कहे यहाॅं सच कौन। सच के दुश्मन हैं सभी, अच्छा है जो मौन।। भूल गया है मौत को, लालच से मजबूर। तन्हा जाना क़ब्र में, फिर भी करे ग़ुरुर।। मेरी क्या पहचान है, ढूॅंड रहा मैं कौन। दिखता जो वो मैं नहीं, अंदर कुछ है मौन।। फ़ितरत है इंसान की, सबके अलग विचार। कुछ तो सच को सच कहें, कुछ करते इनकार जीते जी का साथ है, मरने पर है भार। चले सभी इस पार तक, चले नहीं उस पार।। साक़ी ऐसी मत पीला, चढ़कर उतरे यार। एक बार ऐसी पिला, भव-सागर हो पार।। कुछ दिन का बस खेल है, मौत हॅंसे इक ओर। बचना मुश्किल मौत से, लाख लगा ले जोर।। कीड़े खाऍं क़ब्र में, जब तक रहे शरीर। सोच वहाॅं तकलीफ़ में, कैसी होगी पीर।। जिसके दिल में प्यार है, सही वही इंसान। पत्थर दिल कुछ नफ़रती, घूम र...
कौन यहाॅं है साथ
छंद, दोहा

कौन यहाॅं है साथ

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** (दोहा उर्दू छंद) इतना ग़ुरुर मत करो, कौन यहाॅं है साथ। सब मरने के बाद में, छूकर धोते हाथ।। जीवन तो इक वहम है, कर्मों का है खेल। सच तो है बस मौत ये, दुनिया है इक जेल।। कर्म सही तो सब सही, पटरी पर है रेल। बुरा भला कोई नहीं, क़ुदरत का सब खेल।। वैद्य डॉक्टर को यहाॅं, सब कहते भगवान। कुछ सौदागर लाश के, बेच रहे ईमान।। हिम्मत सब में है नहीं, सच कहने की बात। सच को सच कहता वही, जो सच पर दिन रात।। आज यहाॅं तो कल वहाॅं, जग में फिरे फ़क़ीर।। अच्छे दिन के आस में, नैनन बरसे नीर।। सच से फ़ुर्सत है नहीं, कैसे बोले झूठ। उसकी दुकान झूठ की, धन्था है मत रूठ।। फ़रियादी अब कर रहे, क़ातिल से फ़रियाद। बुज़दिल इतना मत बनो, सब कुछ हो बर्बाद।। राजा अच्छा है वही, कर जो करे मुआफ़। भेद-भाव भी मत करे, सही ...
गुरुवर ऐ भगवान
दोहा

गुरुवर ऐ भगवान

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** तुमने दिया विवेक तो, हुआ सत्य का भान। करूँ शुक्रिया आपका, गुरुवर ऐ भगवान।। खिलता है जीवन तभी, जब गुरुवर हैं संग। करूँ शुक्रिया ज़िन्दगी, गुरु से जो नवरंग।। यदि गुरुवर हैं संग तो, मैं नित ही बलवान। करूँ शुक्रिया तात हे!, है जीना आसान।। नहीं ज्ञान बिन चेतना, जीवन जाता हार। प्रभुवर करता शुक्रिया, पाया मैं उजियार।। गुरु देते संस्कार नित, कर देते निर्माण। सदा शुक्रिया ज्ञान का, जिससे रक्षित प्राण।। हर दुर्गुण को दूर कर, गुरुवर लाते शान। करूँ शुक्रिया सूर्य का, मिलती जिससे आन।। गुरुवर का नित शुक्रिया, जिनका पावन काम। जिनको समझो शिष्य तुम, पूरे चारों धाम।। गुरुजी की महिमा बहुत, करो शुक्रिया खूब। जो देते हैं ज्ञान को, गहराई में डूब।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंड...
किस बात का ग़ुरूर है
दोहा

किस बात का ग़ुरूर है

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** (दोहा उर्दू छंद) किस बात का ग़ुरूर है, चले न कोई साथ। सब मरने के बाद में, छूकर धोते हाथ।। ज़िंदग़ी एक वहम है, कर्मों का है खेल। सच तो है बस मौत ये, दुनिया है इक जेल।। कर्म सही तो सब सही, पटरी पर है रेल। बुरा भला कोई नहीं, क़ुदरत का सब खेल।। डॉक्टर और वैद्य को, सब कहते हैं भगवान। कुछ सौदागर लाश के, बेच रहे ईमान।। हिम्मत सब में है नहीं, सच कहने की बात। सच को सच कहता वही, जो सच पर दिन रात।। आज यहाॅं तो कल वहाॅं, जग में फिरे फ़क़ीर।। अच्छे दिन के आस में, नैनन बरसे नीर।। सच से फ़ुर्सत है नहीं, कैसे बोले झूठ। दुकान उसकी झूठ की, धन्था है मत रूठ।। भाग गया सलवार में, डर की ऐसी पीर। सबको योग सीखा रहा, कहता खुद को वीर।। फ़रियादी अब कर रहे, क़ातिल से फ़रियाद। बुज़दिल इतना मत बनो, सब...
आशीष
दोहा

आशीष

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** आज कौन अब दे रहा, आप बताओ भाव। सबको अब आशीष भी, लगता जैसे घाव।। मातु-पिता आशीष लो, गुरुजनों के साथ। तभी हमारे शीश पर, समझो ईश्वर हाथ।। जैसी करनी हम करें, वैसा पाते रोज। कलयुग में आशीष की, करें स्वार्थ की खोज।। छलछंदो की आड़ में, आशीषों पर वार। समय साथ अब खो रहा, हम सबका संस्कार।। मीठे बोल की आड़ में, कपट छिपाकर लोग। देते हैं आशीष भी, मन में शापित रोग।। चाह रहे आशीष हैं, मम प्रियवर यमराज। कहते हैं प्रभु दीजिए, बने हमारा काज।। परिचय :- सुधीर श्रीवास्तव जन्मतिथि : ०१/०७/१९६९ शिक्षा : स्नातक, आई.टी.आई., पत्रकारिता प्रशिक्षण (पत्राचार) पिता : स्व.श्री ज्ञानप्रकाश श्रीवास्तव माता : स्व.विमला देवी धर्मपत्नी : अंजू श्रीवास्तव पुत्री : संस्कृति, गरिमा संप्रति : निजी कार्य विशेष : अधीक्षक (द...
मानव और दानव
दोहा

मानव और दानव

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मानव दानव क्यों बने, सोचें सब यह बात। जगमग दिन खिलता रहे, कभी न हो फिर रात।। मानव मानव ही रहे, रीति-नीति हों संग। क्योंकर दानव बन मनुज, करे स्वयं से जंग।। मानव के तो संग हों, मानव के गुणधर्म। सदा सोच पावन रहे, मानव से ही कर्म।। दानव बनना पाप है, बहुत बड़ा अभिशाप। मानव मानव बन गहे, सदा मनुज का ताप।। मानव मानव-सा रहा, किंचित बने न क्रूर। यही कामना हो मनुज, दानवता से दूर।। मानव दानव क्यों बने, क्योंकर हो अवसान।। मानव करुणा धार ले, तो निश्चित उत्थान।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय प्रकाशि...
सतगुरु चालीसा एवं आरती
चौपाई, दोहा

सतगुरु चालीसा एवं आरती

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** सतगुरु चालीसा -:दोहा:- गुरुवर की कर वंदना, नित्य झुकाऊँ माथ। प्रभु जी विनती आप से, रखना सिर पर हाथ।। -:चौपाई:- सतगुरु का जो वंदन करते। ज्ञान ज्योति निज जीवन भरते।।१ गुरू शिक्षा का तोड़ नहीं है। इससे सुंदर जोड़ नहीं है।।२ गुरु वंदन का शुभ दिन आया। सकल जगत का उर हर्षाया ।।३ गुरु चरणों में खुशियाँ बसतीं। सुरभित जीवन नदियाँ रसतीं।।४ गुरु दरिया में आप नहाओ। जीवन अपना स्वच्छ बनाओ।।५ गुरुवर जीवन साज सजाते। ठोंक-पीटकर ठोस बनाते।।६ पाठ पढ़ाते मर्यादा का। कष्ट मिटाते हर बाधा का।।७ गुरू कृपा सब पर बरसाते। समय-समय पर गले लगाते।।८ गुरुवर जीवन मर्म बताते। जीवन से अवरोध हटाते।।९ साहस शिक्षा गुरुवर देते। ज्ञान सीख उर में भर देते।।१० गुरू शिष्य का निर्मल नाता। जीवन को है सहज बनाता।।११ भेद-भा...
अपना अद्भुत योग
दोहा

अपना अद्भुत योग

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** ऋषि मुनियों की देन है, अपना अद्भुत योग। इसके नित व्यवहार से, तन- मन हो नीरोग।। नित अनुलोम-विलोम कर, करिए प्राणायाम। मिले आत्म परमात्म से, सफल सभी आयाम। योग करे हर अंग में, प्राणवायु संचार। करें निरोगी देह को, हरे समस्त विकार।। स्वस्थ सुभग काया सदा, देती सुखमय भोग। तन बलिष्ठ मन चुस्त हो, है प्राचीन प्रयोग।। तन के हरे विकार सब, योग दवा ही जान। प्राण शक्ति नित ही बढ़े, होता रोग निदान।। सबको करना चाहिए , प्रातः प्रतिदिन योग। मन को रखता शांत ये , रखे देह नीरोग।। मिट जाती है योग से, तन-मन की हर व्याधि। योग गुरू की साथ में, मिलती मुफ्त उपाधि।। ध्यान योग करिए सदा, तन- मन रहे निरोग। योग दिवस शुभकामना, स्वस्थ सुखी हो लोग। परिचय :- श्रीमती शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" निवासी : ग...
गधे बहुत नादान
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गधे बहुत नादान

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** कॉकरोच पार्टी बनी, बाॅंट रही है ज्ञान। ज्ञानी समझे ज्ञान को, गधे बहुत नादान।। बूढ़ा तो चालाक था, अनशन थी इक चाल। सभी फस गए चाल में, अब हैं सब बेहाल।। वह भी उल्लू बन गए, जिनको था सब ज्ञान। हम अज्ञानी क्या करें, हम तो थे नादान।। जंगल का राजा गधा, उल्लू बना वज़ीर। हंस मर रहे भूख से, कव्वा खाए खीर।। ताज हरदम रहा नहीं, सदा किसी के पास। झगड़े वाली चीज़ है, मत रख इसकी आस।। परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) भारत शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित हैं। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख...
कलम तोड़ना
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कलम तोड़ना

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** कलम तोड़ना हो सके, जब सच का आवेग। सच्चा ही तो दे सके, दुनिया को शुभ नेग।। कलम तोड़ना नित फले, जो जग को सौगात। जिससे शोभित दिन सदा, और दिव्य हो रात।। कलम तोड़ना हो सुखद, मंगलकारी गीत। आओ! हम गतिमय रहें, बनें धर्म के मीत।। कलम तोड़ना हित रचे, नष्ट करे जो पाप। ताक़त इतनी शब्द में, कौन सकेगा माप।। कलम तोड़ना कर्म है, पावन एक विधान। जो अँधियारा दूर कर, लाये नवल विहान।। कलम तोड़ना साधना, जिसकी हो जयकार। जिससे हो हर स्वप्न नित, जीवन में साकार।। कलम तोड़ना चेतना, जग का सुंदर रूप। जिससे कागज़ को मिले, सतत् निष्कलुष धूप।। कलम तोड़ना लेख को, देते हैं अमरत्व। पत्रकार कवि-लेखनी, रखे अगर सत्-तत्व।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) ...
लोहा ले लो शत्रु से …
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लोहा ले लो शत्रु से …

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** (भ्रमर दोहे) लोहा ले लो शत्रु से, जागो मेरे मीत। होगी तेरी जीत ही, त्यागो सारे भीत। त्यागो जिद्दी चाल को, मानो मेरी बात। छोड़ो सारी दुष्टता, देती जो आघात।। खाना खाओ शुद्ध ही, जो हो शाकाहार। हत्या जीवों की रुके, छोड़ो अत्याचार।। जीना सीखो शान से, गंदा धंधा छोड़। बेईमानी त्याग दो, नेकी से हो होड़।। आओ मेरे पास तू, सीखो प्रज्ञा गूढ़। दूँगा ऐसा ज्ञान मैं, मानो रे हे मूढ़।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (पी.एन.बी.) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 र...
रूप चाँदनी भा रही
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रूप चाँदनी भा रही

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** रूप चाँदनी भा रही, रही आज मन मोह। अंतर्मन में नेह है, हर पल है आरोह।। सन्नाटा छाया हुआ, चुप है हर आवाज़। सुर भी सब मायूस हैं, खामोशी में साज़।। हर दिल को तो भा रही, तेरी मृदु मुस्कान । हर दिल में रहती सदा, इसकी पावन आन।। आँसू लगते नेक हैं, जब हो मन में प्यार। रिश्तों की संजीवनी, अपनेपन का सार।। भटक न जाना बंधुवर, प्रभु दिखलाते राह। रखो सत्य उर में सदा, निकलेगी तब वाह।। अंधकार को मारकर, धारण कर उजियार। तभी बनेगी ज़िन्दगी, फूलों का संसार।। प्रभु को मानो हर समय, तभी बनेगी बात। बन जाएगी ज़िंदगी, सुख की तो बारात।। कभी न करना लोभ तुम, कभी न करना पाप। वरना है यह ज़िन्दगी, केवल तो अभिशाप।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मे...
शांति का कोहराम
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शांति का कोहराम

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** दुकान किसान डेयरी, गत पीढ़ी के काम। फसी डोर सुलझी रहे, घर निवास सुखधाम।। अल्प इच्छा साधन सदा, रमती पीढ़ी थाह। बिन शोर ही बढ़ा बहुत, अदभुत थी परवाह।। खुद से ज्यादा और का, रखते थे जो ध्यान। ढ़ोल पीटकर ना दिए, वांछित था जो ज्ञान।। कम शब्द और मौन में, निहित रहा मंतव्य। अर्जित सार समेटकर, कोशिश पाने नव्य।। अनुशासन रचता रहा, मिलती वक्त भभूत। खतरों को जब भांपकर, चला चले जो दूत।। रहती आंखों में हया, सम्मान हद के पेंच। इसी डोर दोनों सिरे, बहुत संभलकर खेंच।। बुजुर्ग पीढ़ी देखता, वंश चरम बदलाव। यश दौलत से कम हुआ, केवल वक्त अभाव।। कमोबेश ही ये कथा, बनती ऐसी ढाल। कुछ बुजुर्ग बदहाल से, टाला करें बवाल ।। विवश युक्त ये दौर अब, करता है फरियाद। पूछ परख में झोल है, खुद सुनता वो नाद।। बच्चे सिर्फ दो या तीन, फिर दो...
आशा भोंसले जी को विनम्र श्रद्धांजलि
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आशा भोंसले जी को विनम्र श्रद्धांजलि

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** प्रखर सुरमयी गायिका, सचमुच दिव्य महान। आशा ताई का करें, दिशा-दिशा गुणगान।। आशा जी के सुर सजें, तो गूँजे ब्रम्हांड। महिमा में लिखते चलो, चाहें जितने कांड।। आशा जी संगीत थीं, सरस्वती का रूप। आठ दशक देती रहीं, सुखद सुरों की धूप।। आशा जी का यह गमन, हम सब हुए उदास। साज़ सिसकते आज तो, टूट गई है आस।। आशा जी जीवित सदा, जब तक है संगीत। हर साधक की चेतना, बनी रहेंगी मीत।। धूमिल हो सकता नहीं, आशा जी का नाम। वे तो थीं संगीत की, सच में पावन धाम।। गाते-गाते ही गईं, लिया न कभी विराम। आशा जी की वंदना, होगी सुबहोशाम।। आशा जी आवेग थीं, लिए हुए उल्लास। अब होगा बैकुंठ में, उनका पावन वास।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), ए...
करुणामयी माँ
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करुणामयी माँ

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** वसुधा-सी करुणामयी, माँ दृढ़ ज्यों आकाश। माँ शुभ का करती सृजन, करे अमंगल नाश।। माँ में सारी सृष्टि है, माँ लगती ब्रम्हांड। माँ को पढ़ लो पूर्ण हों, रामायण के कांड।। माँ रोटी, माँ दूध है, माँ लोरी, माँ गोद। माँ सुख का आधार है, माँ से ही आमोद ।। माँ सुर, लय, आलाप है, अधरों पर मुस्कान। माँ सम्बल, उत्साह है, है हर शय की शान।। माँ सचमुच में देव है, लगती है वह ईश। माँ के चरणों में झुकें, भगवानों के शीश।। माँ अवतारों में प्रथम, करती है कल्याण। माँ से ही उत्थान है, बल पाते हैं प्राण।। माँ है तो उजियार है, माँ है तो है हर्ष। माँ है तो हर जीत है, नहीं कठिन संघर्ष।। माँ जीजा, पुतली वही, नाम यशोदा जान। कौशल्या बन राम से, जनती पुत्र महान।। माँ है तो संपन्नता, संतति नित धनवान। माँ से ही तो स्वर्ग है, मा...
ट्रंप पुराण
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ट्रंप पुराण

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** जो दशकों बनता रहा, सकल विश्व सिरमौर। शौर्य शस्त्रागार का, ठहरेगा किस ठौर।।। दुनिया के लघु देश फिर, जकड़न से आजाद। कम ज्यादा सामान का, खुशी कभी अवसाद।। विकास के सोपान की, जकड़ रखे कुछ देश। एटम बॉम्ब निर्माण से, बदल लिया परिवेश।। टैरिफ खौफ बढ़ा गया, छीना जग का चैन। उधर मुनाफा ही बढ़ा, तकते सारे नैन।। हमला भी ईरान पे, सतत चले जब बात। अकड़ ठसन में ट्रंप था, उल्टी पड़ गई लात।। काला सफेद झूठ सब, ट्रंप सोच के तर्क। केंद्र ही व्यापार है, साफ झलकता फर्क।। जब तक डॉन गिरी चली, खूब लिया आनंद। सहनशक्ति अब अन्य की, गले पड़ा है फंद।। जीवन डॉन उमर सदा, कुछ कड़ियों का तोड़। आस पास के देश भी, कभी नहीं रणछोड़।। धरा तुला कमजोर को, खूब दिखाई आंख। अस्त्र शस्त्र गिरवा दिए, दाबे उनको कांख।। भारत देश गिरफ्त में, आए कब...
नवदुर्गा तुम आ गईं
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नवदुर्गा तुम आ गईं

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** नवदुर्गा तुम आ गईं, हरने को हर पाप। संभव सब कुछ आपको, तेरा अतुलित ताप।। सद्चिंतन तजकर हुआ, मानव गरिमाहीन। जगजननी माँ दुख हरो, सचमुच मानव दीन।। ममता है तुझ में भरी, तू सचमुच अभिराम। माता जी तेरे सदा, हैं नित नव आयाम।। तू करुणा करती सदा, तेरा पावन नाम। यह जग तेरा है सदा, दुर्गा पावन धाम।। माँ तेरी आराधना, करे सदा कल्याण। नौ रूपों में तुम रहो, पापी खाते बाण।। करते हैं सब साधना, हम सब तेरे लाल। दर्शन दो, हमको करो, हे माँ ! आज निहाल।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय प्रकाशित रचनाएं व गतिविधि...
नवरात्रि
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नवरात्रि

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** आई माँ विश्वंभरी, आज तुम्हारे धाम। भटक गए हम राह हैं, बाँह लीजिए थाम।। नौ दुर्गा माँ को नमन, करते बारंबार। जोडे दोनों हाथ हम, खड़े तुम्हारे द्वार।। प्रथम शैलपुत्री तुम्हें, करते नित्य प्रणाम। जगत नियन्त्री शक्ति का, हम रटते हैं नाम।। ब्रह्मचारिणी शक्ति हे, सविनय तुम्हें प्रणाम। मन में जलता भक्ति का, दीपक आठों याम।। करो चंद्रघंटा सदा, प्रेम-भक्ति संचार। द्वेष-भाव को दूर कर, दो पावन संस्कार।। माँ कूष्माण्डा त्याग का, मन में हो विस्तार। मानवता के द्वार से, रहे बरसता प्यार।। करो स्कंदमाता सदा, दोष हृदय के दूर। जनहित की शुभ भावना, मन में हो भरपूर।। हे माता कात्यायनी, सबकी पालनहार। पाप मिटाकर जीव का, शीघ्र करो उद्धार।। कालरात्रि माता करो, दुष्टों का संहार। हे जगदंबा शक्ति तुम, हो सबका आधार।। शि...
आज की विभिषिका
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आज की विभिषिका

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** चलें मिसाइल ध्वंस है, बम की है भरमार। जानें कैसा हो गया, अब तो यह संसार।। आग लगी धनहानि है, बरबादी का दौर। घातक सबके मन हुए, नहीं शांति पर गौर।। अहंकार में विश्व है, भाईचारा लुप्त। दिन पर दिन होने लगा, नेहभाव सब सुप्त।। अमरीका इजरायला, और आज ईरान। नहीं नियंत्रित आज ये, धारें मिथ्या मान।। मध्य-पूर्व में आग है, जीना हुआ मुहाल। जानें क्योंकर विश्व में, होता रोज़ बवाल।। घातक सबके मन हुए, ख़ूनी हैं अंदाज़। कपटी सब ही लग रहे, आवेशित आवाज़।। रोक नहीं सकता इन्हें, सारे धारें क्रोध। नहीं आज इनको रहा, मानवता का बोध।। हिंसा से मिलता नहीं, कुछ भी जग में सोच। धन-जन की बर्बादियां, करुणा के पग मोच।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) ...
दिल में फगुनाहट हुई
दोहा

दिल में फगुनाहट हुई

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** दिल में फगुनाहट हुई, मनवा चंचल आज। अभिलाषा यह पल रही, करूँ प्रेम का काज।। रंग घुल गए प्रीति में, मौसम है रंगीन। दिल सजनी को खोजता, है प्रकरण संगीन।। यौवन है जज़्बात पर, बहकी-बहकी चाल। मधुमासी आवेश है, हर प्रेमी बेहाल।। साजन को तिरछी नज़र, देख रही भरपूर। सजनी के मुख पर खिला, आफ़ताब का नूर।। शीतल चलती है हवा, फागुन का अंदाज़। सकल उदासी दूर अब, प्रेम बना अधिराज।। अब अबीर इठला रहा, लिए सरस पैग़ाम। मीत याद आने लगा, सबको सुबहोशाम।। फागुन में है चेतना, गाता स्नेहिल गीत। मिलन-विरह का दौर है, प्रेम गया है जीत।। यौवन है आवेग में, बाँहों में आकाश। सिकुची धरती लाज से, अवसादों का नाश।। होली आशा को वरे, विश्वासों का काल। रंग घुल गए सोच में,प्यार हुआ बेहाल।। पुरवैया ज़ालिम हुई,मारे दिल पर तीर। होली ...
मृत्यु से दो-दो हाथ
दोहा, मुक्तक

मृत्यु से दो-दो हाथ

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** चलो मृत्यु से हम करें, मिलकर दो-दो हाथ। आपस में सब दीजिए, इक दूजे का साथ। मुश्किल में मत डालिए, नाहक अपनी जान, वरना सबका एक दिन, घायल होगा माथ।। दिल्ली में विस्फोट से, दुनिया है हैरान। इसके पीछे कौन है, सभी रहे हैं जान। मोदी जी अब कीजिए, आर-पार इस बार, नाम मिटाओ दुष्ट का, चाहे जो हो तान।। वो भिखमंगा देश जो, बजा रहा है गाल। शर्म हया उसको नहीं, भूखे मरते लाल। युद्ध सिवा उसको‌ नहीं, आता कोई काम, गलती उसकी है नहीं, पका रहा जो दाल।। हम तो हारे हैं नहीं, कैसे कहते आप। सीट भले आई नहीं, मानें क्यों हम शाप। अभी टला खतरा नहीं, लोकतंत्र से यार, हम भी कहते गर्व से, हुआ चुनावी पाप।। मोदी आँधी में उड़े, खर-पतवारी रंग। सोच-सोच सब हो रहे, गप्पू पप्पू संग। जनता ने ऐसा दिया, चला बिहारी दाँव, जीते-हारे जो सभी, ...
ताला
दोहा

ताला

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** अधरों पर ताले लगे, विवश रहें करतार। टूटे जाने मौन कब, पीड़ा बढ़ी अपार।। मौन करें धारण सभी, बनकर मानस-दास। कैसी प्रभु यह चाकरी, ताले में सब आस।। कैसे प्रिय से हो मिलन, ताले लगे निवास। पता नहीं कुछ दे गए, सजनी सतत उदास।। झूठा ही वाचाल है, करे कौन प्रतिकार। मौन खड़ा प्रभु सत्य है, होकर बहु लाचार।। लोकतंत्र बेबस हुआ, संसद बैठी मौन। कर्म सभी अवरुद्ध हैं, खोले उनको कौन।। जीवन सम विश्राम है, वाणी बैठी शांत। मौन स्वरों में बोलता, मनुज हृदय आक्रांत।। कुछ कहना अपराध है, आया संकट काल। बंधक बनी स्वतंत्रता, जलती क्रांति मशाल।। बोलो सदा विचार कर, करते हैं अनुरोध। आकर्षित करती सदा, वाणी सरस अबोध।। नारी शक्ति स्वरूप है, अधर-अधर प्रतिमान। ताले में भी बन्द है, लगती मुक्त विधान।। मौनावस्था भंग कर,...
मीराबाई
दोहा

मीराबाई

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** रत्नसिंह की थी सुता, मीराबाई नाम। भोजराज पति नाम था, कृष्ण भक्ति था काम।। मीरा जब विधवा हुई, थामा गिरधर हाथ। मीरा माला जप रहीं, जुड़ीं कृष्ण के साथ।। नैन साँवरे हैं बसे, देखो निश्छल प्रीत। श्याम दर्श की धुन बनी, ढूँढे कान्हा मीत।। प्रभु चरणों में नाचती, गाती मधुरिम गीत। भक्ति बनी पहचान जब, लिया जगत को जीत। मीरा जोगन श्याम की, तजी लोक की लाज। सतत उपासक कृष्ण की, भूल गयी सब काज।। प्रेम डोर मीरा बँधीं, नेह जगत आधार। मीरा के कान्हा सदा, दिव्य लोक उपहार।। पति गिरिधर को मानती, मीरा पावन प्रेम। कृष्ण रंग चुनरी रँगी, भूले सारे नेम।। इकतारा ले हाथ में, धर जोगन का वेश। कृष्णमयी मीरा हुई, भूली अपना देश।। मीरा से अब हो रही ,भक्तिकाल पहचान । प्रेम भक्ति को राह दी,सब करते गुणगान।। गरल सुधा ...
फागुन आया देह में
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फागुन आया देह में

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** फागुन आया देह में, जागी आज उमंग। मन उल्लासित हो गया, फड़क उठा हर अंग।। फागुन लेकर आ गया, प्रीति भरा संदेश। जियरा को जो दे रहा, मिलने का आवेश।। फागुन की अठखेलियाँ, होली का पैग़ाम। हर कोई लिखने लगा, चिठिया प्रिय के नाम।। फागुन की मदहोशियाँ, छेड़ें मीठी तान। हल्का जाड़ा कर रहा, अनुबंधों का मान।। सरसों में आकर्ष है, महुये में है काम। पवन नेह ले कर रहा, कर्म आज अविराम।। फागुन लिए तरंग है, सबकी बदली चाल। मौसम ने ऐसा किया, कुछ तो आज कमाल।। बहके-बहके लोग हैं, संयम रहा न आज। फागुन करने लग गया, हर दिल पर तो राज।। फागुन रंगारंग है, बजें आज तो चंग। संतों के मन भी चढ़ा, साहचर्य का रंग।। यौवन है हर भाव पर, टूटे सारे बंध। है स्वच्छंद मधुमास अब, अवमानित सौगंध।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : ...
मुलाकात तुझसे हुई
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मुलाकात तुझसे हुई

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मुलाकात तुझसे हुई, मुझको दिन याद। तेरे मिलने ने किया, मुझे सदा आबाद।। करो इरादा प्रेम का, तो मिलता है मीत। जिससे अधरों पर सजे, खुशहाली का गीत।। वादा करना सोचकर, फिर मत देना तोड़। जिसको अपनाना उसे, देना कभी न छोड़।। करो अगर इकरार तुम, फिर मत कर इनकार। यही प्रेम की चेतना, यही प्रेम-आधार।। सोच-समझ ही दो सदा, दिल का तो प्रस्ताव। बात तभी जब अंत तक, रहे प्रेम का ताव।। बंधन हो मजबूत जब, तभी बढ़ेगी शान। करना नित ही प्रेम का, दिल से सब सम्मान।। आया है देखो 'शरद', निकट आज मधुमास। हर दिल में तो पर रहा आज प्रखर विश्वास।। अंधकार को मारकर, देता जो उजियार। कहता है सारा जगत, उसको ही तो प्यार।। प्रेम ईश का रूप है, लगता है दिनमान। जो भावों की श्रेष्ठता, शुभ-मंगल का गान।। रखो हृदय को निष्कलुष, करो सदा नि...