बचपन की देहरी
मालती खलतकर
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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बचपन की देहरी
पार हो गई
जिंदगी के द्वार से
क्या खेले क्या पाए
कुछ याद नहीं
होता है क्षोभ, क्यों क्षणिक सा
बचपन बिदा हो गया
ना समझ पाए न अनभिज्ञता
मैं भोग पाये
घृणा, देव्ष से सरोकार न था
ना भेद था, ना मुखोटे ओढ़े
हंसने वाली हंसी थी
क्यों चला गया बिन बताए
पुनः वापस ना आने के लिए।
अतीत की स्मृतियों को जोड़ने के लिए
आती है याद आज पगडंडी बचपन की
भागते दौड़ते थे छत मुंडेल की
इमली, बेर याद आते हैं
आते हैं याद मिट्टी के घरोदे
रुठ गई हमसे वह पीपल नीम की छाया
देखो तो, लौटकर वह आज तक नहीं आया।
परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर ...






















