फागुन ने आलाप भर …
भीमराव झरबड़े 'जीवन'
बैतूल (मध्य प्रदेश)
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फागुन ने आलाप भर, पढ़े प्रीति के छंद।
बढ़ा समीरण में नशा, पुष्प-पुष्प मकरंद।।१
मन्मथ पर मधुमास का, ज्यों ही पड़ा प्रभाव।
खारिज यौवन ने किया, पतझड़ का प्रस्ताव।।२
तन कान्हा की बाँसुरी, मन राधिका मृदंग।
बजा स्वयं नित झूमता, 'जीवन'हुआ मलंग।।३
मन के गमले में खिला, दुर्लभ प्रीति गुलाब।
झुककर स्वागत में खड़ा, इस तन का महताब।।४
देख रहा है स्वर्ग से, जब से मरा कबीर।
भेदभाव की हो रही, गहरी और लकीर।।५
सड़कों पर आएँ निकल, घर के पूजन-पाठ।
शिक्षित हो कर बन गया, हृदय हिन्द का काठ।।६
शकुनि चित्त जब-जब चले, छल चौसर के दाँव।
दुख का आतप जीतता, हारे सुख की छाँव।।७
परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन'
निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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