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पद्य

बारिश के मौसम में
कविता

बारिश के मौसम में

नितिन राघव बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) ******************** बारिश के मौसम में, जब तेरी याद आवअ आंख भर जा मअ, दिल में बैचेनी छावअ बारिश के मौसम में, जब तेरी याद आवअ हमअ ना प्यास लगअ, ना रोटी ही भावअ बारिश के मौसम में, जब तेरी याद आवअ ना दिन में कतई चैन, ना रात में नींद आवअ बारिश के मौसम में, जब तेरी याद आवअ ना तू पास आवअ, ना हवा तेरा पता वताअ बारिश के मौसम में, जब तेरी याद आवअ मीठा दर्द दअवअ, पूराने घाव कूरेद जावअ परिचय :- नितिन राघव जन्म तिथि : ०१/०४/२००१ जन्म स्थान : गाँव-सलगवां, जिला- बुलन्दशहर पिता : श्री कैलाश राघव माता : श्रीमती मीना देवी शिक्षा : बी एस सी (बायो), आई०पी०पीजी० कॉलेज बुलन्दशहर, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से, कम्प्यूटर ओपरेटर एंड प्रोग्रामिंग असिस्टेंट डिप्लोमा, सागर ट्रेनिंग इन्स्टिट्यूट बुलन्दशहर से कार्य : अध्यापन और साहित्य लेखन पता : ...
आ उड़ चले
कविता

आ उड़ चले

मधु अरोड़ा शाहदरा (दिल्ली) ******************** पत्नी बोली पति से, सुन लो प्रीतम प्यारे। आओ उड़ चले हम दोनों, थोड़ै दिन कहीं अकेले। झमेले सारे खत्म हो जायें। सुबह शाम क्या बनाऊं, थोड़े दिन मन में चैन आ जाये। घूम ले फिर ले, मौज-मस्ती हम कर ले। नई ऊर्जा से हम भर लें, प्रीत प्यार की बाते कर ले, आ उड चले हम दोनों। दुनियादारी की ना हो बातें, प्रेम भरी बस चंद रातें, तू मुझे निहारे। मैं तुझे निहारूं। बांहों के बस घेरे हो प्रेम प्रीत पर ना पहले हो, आ उड चले हम दोनों। कहाँ जाये प्रिय तुम ये बताओ, थोड़ा पास हमारे आओ। यहीं तुम्हें हम सब घूमा दे। हो गई ‌तकरार फिर से, कंजूस हो तुम पति बड़े से।। परिचय :- मधु अरोड़ा पति : स्वर्गीय पंकज अरोड़ा निवासी : शाहदरा (दिल्ली) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
अनाथ बच्चों की व्यथा
कविता

अनाथ बच्चों की व्यथा

सुनील कुमार बहराइच (उत्तर-प्रदेश) ******************** सर से मासूम के हटा जब मां-बाप का साया मां-बाप की आंखों का तारा अनाथ कहलाया। माया ईश्वर की मासूम समझ न पाया आखिर क्यों उठ गया मां-बाप का साया मां-बाप के बिना मासूम अनाथ कहलाया। खेलने-खाने की उम्र में जिम्मेदारियों का बोझ उठाया कभी होटलों तो कभी भट्टों पर रात बिताया मां-बाप के बिना मासूम अनाथ कहलाया। कभी शोषण का हो शिकार बचपना गंवाया कभी बाल अपराधी बन जीवन नरक बनाया मां-बाप के बिना मासूम अनाथ कहलाया। दो जून की रोटी के खातिर दर-दर की ठोकरें खाया कभी रुखा-सूखा खाकर कभी भूखा ही रात बिताया मां-बाप के बिना मासूम अनाथ कहलाया। मां-बाप को याद कर छुप-छुप नीर बहाया पापी पेट के लिए कभी भिक्षावृत्ति अपनाया मां-बाप के बिना मासूम अनाथ कहलाया। परिचय :- सुनील कुमार निवासी : ग्राम फुटहा कुआं, बहराइच,उत्...
कोई लौटा दे !
कविता

कोई लौटा दे !

रामकेश यादव काजूपाड़ा, मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** तुझे ढूँढ रहा बचपन, तुझे ढूँढ रही मस्ती। कोई लाके मुझे दे दो, मेरे गाँव की वो कश्ती। बहकी -बहकी राहें, वो कलियों की बाँहें। लौटा दे कोई बचपन, लौटा दे मेरा सावन। वो फूल से भी नाजुक, वो बच्चों की बस्ती। कोई लाके मुझे दे दो, मेरे गाँव की वो कश्ती। वो बचपन के लम्हें, जीवन के खजाने थे। कब हार के फिर जीते, वो दिन अनजाने थे। वो धूल भरी सड़कें, मेरे होंठों पे सोती। कोई लाके मुझे दे दो, मेरे गाँव की वो कश्ती। वो माटी की खुशबू, वो फागुन की होली। जो बंद है मुट्ठी में, वो खुशियों की झोली। जो गाती माँ लोरी, वो थी कितनी सस्ती। कोई लाके मुझे दे दो, मेरे गाँव की वो कश्ती। गुम हो चुका वो मौसम, ठग ली मुझे जवानी। तुतलाती भाषा वो, लौटा दे मेरी कहानी। उन खेल -खिलौना की, है कितनी बड़ी हस्ती। कोई लाके मुझे ...
पुण्यतिथि पिता की
कविता, संस्मरण

पुण्यतिथि पिता की

सुरेश चन्द्र जोशी विनोद नगर (दिल्ली) ******************** अठतीसवीं पुण्यतिथि पिता की, गंगा तट पर याद की। आई थी इस जन्म जयंती वर्ष में, माताश्री भी शरण में आपकी।। संघर्ष किया जननी ने तो, तप- शक्ति थी आपकी। क्यों छोड़ गए थे उस देवी को, क्या इच्छा थी आपकी।। हम तो दण्डित होते रहे पर, सेवा न कर पाए आपकी। उनको दंडित कौन करेगा, जिसने सेवा करने दी आपकी।। मिटा न सका कोई सिद्धांत, सत्पथ पर चलने के आपकी। थी इच्छा प्रबल अति शिक्षा की, अवधारणा मन में आपकी।। सहन न कर पाया लंपट वह, संतति उन्नति को आपकी। किया प्रयोग तंत्र विद्या का, मनस्थिति कैसे बिगाड़ी आपकी।। किया कुछ भी हो धृष्ट ने फिर भी, वह बराबरी न कर पाया आपकी। थे परम शिव- शक्ति उपासक आप, वह छाया भी न था आपकी।। आई जुलाई की तीसरी तिथि, जो जीवन ले गई थी आपकी। करता सुरेश जगतारिणी बन्दन, संरक्षण हेतु माता और आपकी।। परिचय ...
आओ एक दीया जलाऐ
कविता

आओ एक दीया जलाऐ

डॉ. मोहन लाल अरोड़ा ऐलनाबाद सिरसा (हरियाणा) ******************** आओ एक दीया जलाऐ घुप अन्धेरे को दुर भगाऐ माँ की कोख से बेटी बचाये बेटी को पढाऐ लिखाऐ आओ एक दीया जलाऐ अपने बेटे को भी समझाये पढाये जन्म दिन का केक यूँ ना उड़ाये भूखे को खिला कर दुआ कमाये सब की इज्ज़त करना सिखाऐ आओ एक दीया जलाऐ मेहनत की कमाऐ ईमानदारी की खाऐ भ्रष्टाचार और कालाबाजारी को दुर भगाऐ बच्चों को अच्छे संस्कार सिखाऐ बुजुर्गो का आशीर्वाद और माँ बाप का मान बढाऐ आओ एक दीया जलाऐ क्यो दंगा क्यो मजहब करवाऐ सब धर्मो का मान बढाऐ दान पुण्य का पाठ पढाये निर्धन की मदद भूखे को रोटी खिलाऐ आओ एक दीया जलाऐ घुप अन्धेरा दुर भगाऐ...।। परिचय :- डॉ. मोहन लाल अरोड़ा कवि लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता निवासी : ऐलनाबाद सिरसा (हरियाणा) प्रकाशन : ३ उपन्यास, ७२ कविता, ७ लघु कथा १२ सांझा काव्य संग्रह प्रकाशित...
औरत- त्याग की मूर्ति
कविता

औरत- त्याग की मूर्ति

श्वेता अरोड़ा शाहदरा (दिल्ली) ******************** मन को अपने मार के, दूसरो की खुशियो के लिए जीना उसे आता है, त्याग और समर्पण से गहरा उसका नाता है! त्याग की मूर्ति औरत ऐसे ही नही कहलाती है, बचपन से ही त्याग करना सीखती जाती है! राखी बांधती है भाई की रक्षा के लिए, करवा चौथ भी करती है पति की लंबी उम्र के लिए! खुशी के लिए दूसरो की, खुद को मिटाती जाती है! मां, बेटी का हो या बहन का हो, हर फर्ज निभाना उसे आता है! खुद की ख्वाहिशो को कैद कर आशियाने को अपने सजाती है, एक बच्चे की किलकारी के लिए, असहनीय दर्द वो सह जाती है! खुद की जान को ताक पर रखकर, नई जान को दुनिया मे लाना उसको भाता है! मन को अपने मार के, दूसरो की खुशियो के लिए जीना उसे आता है! परिचय :-  श्‍वेता अरोड़ा निवासी : शाहदरा दिल्ली घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक...
थे सभी जितने भुलाए सिलसिले
ग़ज़ल

थे सभी जितने भुलाए सिलसिले

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** थे सभी जितने भुलाए सिलसिले। आज फिर से साथ अपने आ मिले। था हमारा भी सफ़र उस ओर का, जिस तरफ़ से आ रहे थे काफ़िले। जो छुपे थे बादलों की ओट में, वो सितारें आसमाँ पर आ खिले। सब परिंदे दूर तक उड़ते रहे, पेड़ लेक़िन इस जमीं से न हिले। हमने उनका रास्ता अपना लिया, जिनसे हम रख्खा करे शिकवे गिले। हरकतों से बाज़ अपनी आएंगे, तब तलक होते रहेंगे ज़लज़ले। हैं हमारी ओर के रिश्ते - भले, पाएंगे उनसे सभी वैसे सिले। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया ज...
बदला-बदला मौसम का मन
ग़ज़ल

बदला-बदला मौसम का मन

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** बदला-बदला मौसम का मन, बादल घिर-घिर आते हैं। विरही नैना मन आंगन में, अंगारे बरसाते हैं।। ***** नींदे रातों की रूठी है, रूठे हैं सपने सारे। काले बादल बरसे हैं, बैरन काली रातें हैं।। ***** चुभन बड़ी बेदर्दी से तब, दर्द बढ़ा देती तन का। गीली नर्म हवा के झोंके, जब-जब शूल चुभाते हैं।। **** कितनी पीड़ा होती होगी, आंखों से निकले आँसू। मौन लबों के रहते भी सब, राज उगलते जाते हैं।। ****** पानी आग बुझाने वाला, जब शोले भड़कता है। सिर्फ तपस्वी तन ही उसको, काबू में कर पाते हैं।। ***** मदिरा ऊपर से जब बरसे, पवन नशीला बन जाए। पीने वाले क्यों चूकेगें, अपनी प्यास बुझाते हैं।। ***** गीली राते हों साथी हों, "अनंत" जिनके पहलू में। रोज दिवाली होती उनकी, हर दिन ईद मनाते हैं।। **** परिचय :- अ...
हां मैं बेटी हूं
कविता

हां मैं बेटी हूं

मुस्कान कुमारी गोपालगंज (बिहार) ******************** हां मैं बेटी हूं जिससे ये दुनिया चलती है मुझसे है सभी को नफरत जिससे उनकी पीढ़ी चलती है। जब छोटी थी तो हर ख्वाब दिखाया गया थोड़ी सी बड़ी हुई तो हर ख्वाब अधूरा सा रह गया जब जिद्द की पूरा करने की तो घर में मुझे बिठाया गया अभी उलझने बहुत है किसी तरह जिंदगी चलती है हां मैं बेटी हूं जिससे ये दुनिया चलती है। पापा कहते समाज को देखकर चलना है मैंने कहा हमे ही तो समाज को बदलना है पापा ने कहा समाज को तुम नहीं समाज को देखकर तुम्हे बदलना है। मैंने कहा पापा मुझे कुछ करने दो पढ़ लिख कर कुछ बनने दो पापा ने कहा तुम बेटी हो रहने दो मैंने कहा पापा अभी रहने दो मुझे अभी रहना है सबकी निगाहों में पापा ने फिर वही कहा, तुम बेटी हो तुम्हे जाना है ससुराल में फिर मैं इस घर को छोड़ दूसरे घर को चलती हूं वहां प...
मां और पत्नी
कविता

मां और पत्नी

सुखप्रीत सिंह "सुखी" शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** ना कभी लिखा ना कभी लिख पाया है ना कभी लिखा ना कभी लिख पाया है तुम्हें मां से ज्यादा तो नहीं पर मां से कम भी नहीं पाया है ये बात सच है कि मां ने मेरी जिंदगी सवारी थी पर यह भी सच है कि तूने मेरी दुनिया सवारी है मुझे मां भी प्यारी थी मुझे तू भी प्यारी है हां मां ने मुझे चलना सिखाया था हां मां ने मुझे चलना सिखाया था और तूने साथ चलना सिखाया है सर पे मेरे तब मां का साया था अब साथ मेरे तेरा साया है ना कभी लिखा ना कभी पाया है मां मेरे खाने, पीने, पहनने का ख्याल रखती थी और तू भी मेरे खाने पीने और सोने जागने का ख्याल रखती है मां भी मेरी देर रात तक राह तकती थी तू भी मेरी देर रात तक राह तकती है मां ने मेरा परिचय मेरे पिता से करवाया था तूने मुझे पिता होने का गर्व कराया है औ...
मेरी महफिल में फिर आप…
ग़ज़ल

मेरी महफिल में फिर आप…

निरूपमा त्रिवेदी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मेरी महफिल में फिर आप आ जाइए दर्द का गीत कोई सुना जाइये इस मुकद्दर का कुछ भी भरोसा नहीं आप खुद ही इसे आजमा जाइए इश्क मेरा समंदर की लहरों सा है डूब कर इसमें मुझको डूबा जाइये जब तलक आप मुझसे मिलोगे नहीं कुछ तसल्ली तो मुझको दिला जाइए मैं मोहब्बत का मारा मुसाफिर हूं अब रास्ता कुछ नया तो बता जाइए मुस्कुरा कर मुझे देखिए आप फिर आप मुझको गले से लगा जाइए प्यार के रास्ते तो कठिन है मगर सिलसिला ऐसा कुछ तो चला आ जाइए परिचय :-  निरूपमा त्रिवेदी निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित ...
मानवता केवल मानवता
कविता

मानवता केवल मानवता

डॉ. सत्यनारायण चौधरी "सत्या" जयपुर, (राजस्थान) ******************** जाति धर्म के क्यों पीछे है पड़ता इसमे केवल नेता ही जमता उसी को शोभित है दानवता मेरे लिए तो एक ही धर्म है... मानवता...केवल मानवता। अंत समय आता है तब नही रह पाती पशुता चाहे कहे लोग भला बुरा मुझे मुझको जो जचता वो मैं करता जिसके कर्मों में हो खोट वही किसी से है डरता मेरे लिए तो एक ही कर्म है मानवता...केवल मानवता। बहुत हुए ऋषि मुनि ज्ञाता लेकिन आज तक समझ न आया ये इन्सान कहाँ से आता और कहाँ है जाता ना मैं सोचूँ, ना मैं जानू, मेरे लिए तो एक ही मर्म है मानवता...केवल मानवता। अपना लो जो तुम सभी मानवता खत्म हो जाएगी दुनिया से दानवता कहते हैं हर घट-घट में है ईश्वर बसता मिट जाए सारे द्वंद फसाद जो अपना लें सभी मानवता। जो अपना लें सभी मानवता। मानवता...केवल मानवता।। परिचय :- डॉ....
मुझे अफसोस है
कविता

मुझे अफसोस है

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** अब ना जवानी ना जोश है, राक्षसों के प्रति नहीं रोष है, सच कहना खुद में दोष है, देख देख बड़ा अफसोस है। देशभक्त अनेकों मिलते थे, अब ना वो नेताजी बोस है, देशद्रोही जगत में अब बढ़े, इसका अधिक अफसोस है। अब नहीं रहे देश में बच्चे, मात, पिता, गुरु से डरते है, दर्द दे रहे दिन रात अब तो, इस पर अफसोस करते है। चरित्रवान मिलते थे बहुत, अब मिलता चरित्र दोष है, अत्याचार बढ़ा गली गली, मुझे इस पर अफसोस है। मेहनत एक नारा होता था, अब मेहनत ही एक दोष है, निठल्ले मिले हर गली गली, मुझको इस पर अफसोस है। मुफ्तखोर जगत में बढ़ गये, बढ़ता ही जाये यही दोष है, सुर बदल जाते हैं पलभर में, इसका तो मुझे अफसोस है। अत्याचार बढ़े महिला पर, समाज आज भी खामोश है, सदियां बीती कष्ट सहती है, इसका मुझको अफसोस है। पुस्तकों से र...
इंदौर लगाएगा स्वच्छता में पंच
कविता

इंदौर लगाएगा स्वच्छता में पंच

अरविन्द सिंह गौर इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** इंदौरीयो को स्वच्छता की आदत हो गई है।। स्वच्छ रहना अब तो एक इबादत हो गई है।। इंदौरीयो को स्वच्छता की आदत हो गई है।। स्वच्छता में पंच लगाने की शुरुआत हो गई है।। सब ने निभाई अपनी भूमिका अपना इंदौर हुआ स्वच्छ पूरे विश्व को यह कहने की आदत हो गई है।। इंदौरीयो को स्वच्छता की आदत हो गई है।। अरविंद कहे मैं भी हूं इंदौरी स्वच्छता में अब हमारी महारत हो गई है।। इंदौरीयो को स्वच्छता की आदत हो गई है।। परिचय :- अरविन्द सिंह गौर जन्म तिथि : १७ सितम्बर १९७९ निवासी : इंदौर (मध्यप्रदेश) लेखन विधा : कविता, शायरी व समसामयिक सम्प्रति : वाणिज्य कर इंदौर संभाग सहायक ग्रेड तीन के पद में कार्यरत घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी ...
चिरैया की प्यास
कविता

चिरैया की प्यास

संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया भोपाल (मध्यप्रदेश) ******************** कैसो कलयुग आयो। मानव दुष्कर्म सजा। आज पक्षी भुगत रहा। नदी,ताल,तलैया,पोखर। धरातल पर हुए नष्ट। चिरैया स्व प्यास बुझाने। भटके दर-दर सूखे कंठ संग। अति प्यास से व्याकुल हो। नल की बंद टोंटी में इक। जल बूँद स्व मुख ले कंठ। तर करने की आस लिए। जुगत लगाने जुट कर। बारम्बार श्रम कर सोचे। कब मेरे मुख जल बूँद टपके। मेरो सूखो कंठ कब तर हो जाए। परिचय :- श्रीमती संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया निवासी : भोपाल (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेत...
मैं बहती नदी हूं
कविता

मैं बहती नदी हूं

अर्चना तिवारी वड़ोदरा (गुजरात) ******************** मैं बहती नदी हूं मुझे बहने दो न..... अपूर्णता ही मेरी पहचान है पहाड़ों से जल भर सागर तक मुझे बहने दो न..... पूर्ण होते ही रुक जाऊंगी कईयों की निर्भरता है मुझ पर उनकी तृष्णा बुझाने दो न .... पूर्ण होते ही सिमट जाऊंगी मुझे अपनी अपूर्णता पर मिलती खुशियां है..... हां कुछ कमियां है मुझ में पर यह कमियां मेरी पहचान बने ..... ये खुशियां बरकरार रहने दो न मैं बहती नदी हूं मुझे बहने दो न.... परिचय :- अर्चना तिवारी निवासी : वड़ोदरा (गुजरात) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवान...
बढ़ती आबादी
कविता

बढ़ती आबादी

सुनील कुमार बहराइच (उत्तर-प्रदेश) ******************** बढ़ती आबादी देखकर धरा ये थर-थर कांप रही देखो-देखो आबादी ये तेज कितना भाग रही। सोच रही है धरा ये बात दुनिया क्यों न मान रही तेजी से बढ़ती आबादी को दुनिया क्यों न थाम रही। सोचो-सोचो कुछ तो सोचों तेजी से बढ़ती आबादी का कुछ तो हल खोजो। दिन ब दिन ऐसे ही आबादी जो बढ़ती जाएगी पेट भरने को दुनिया अन्न कहां उगाएगी जीवित रहने को ये प्राणवायु कहां से लाएगी। चेतो-चेतो अब तो चेतो नहीं देर बहुत हो जाएगी यही हाल रहा जो बढ़ती आबादी का स्वर्ग से सुंदर धरा ये मिट जाएगी। परिचय :- सुनील कुमार निवासी : ग्राम फुटहा कुआं, बहराइच,उत्तर-प्रदेश घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपन...
ईश्वर तेरे नाम पर
कविता

ईश्वर तेरे नाम पर

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** ईश्वर तेरे नाम पर, कितना व्यापार चलता है। सुख की आस में, हर इंसान दुःख के मझधार में पलता है। ईश्वर तेरे नाम पर, कितना व्यापार चलता है। कौन ......सुखी हैं? इस प्रश्न का उत्तर ही नहीं मिलता है। यह कौन-से कर्मों का फल है। जिसका लेखा-जोखा फलता है। ईश्वर तेरे नाम पर, कितना व्यापार चलता है। दुनिया भी तूने बनाई। इंसान भी तेरे सभी। फिर कहां से बुरे कर्मों की, पहेलियाँ तुमने घड़ी। हर इंसान जिंदगी भर नर्क की आग में जलता है। कहाँ..... कौन सा स्वर्ग है। जो दुख-दर्द मिटाने के लिए, सुख की झूठी आस पर चलचित्र -सा चलता है। परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अप...
जनसंख्या नियंत्रण
कविता

जनसंख्या नियंत्रण

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** सुनो सुनाता हूँ देश की कहानी। जिस में सबसे बड़ी समस्या है जनसंख्या बृध्दि। जिसके कारण देश की व्यवस्था लड़ खड़ा जाती है। बचानी है अर्थ व्यवस्था तो जनसंख्या पर नियंत्रण करना पड़ेगा।। करो पालन परिवार नियोजन के तरीको का। और पहला बच्चा लोगो जल्दी नहीं। और दूसरे में अंतर रखो तीन साल का। इस मंत्रको अपनाओगें तो जनसंख्या पर नियंत्रण पाओगें।। जिस तरह से हुआ देश का विकास। रुक गई अकाल मृत्युएं इसे कहते है देश की प्रगति। पर इसके कारण ही बड़ गई देश की जनसंख्या बृध्दि। तो परिवार नियोजन को जीवन में अपनाना पड़ेगा।। साथ एक और सुझाव जनसंख्या नियंत्रण का है। करो निर्माण देश में एक शिक्षित समाज का। जो देश की प्रगति में भी अपनी भूमिका निभायेगा। और शिक्षित होने के कारण स्वयं इस पर नियंत्रण हो जायेगा।। परिचय...
आज के युवा और आज के वृद्ध
कविता

आज के युवा और आज के वृद्ध

डॉ. कोशी सिन्हा अलीगंज (लखनऊ) ******************** युवा सुबह में भी सोये हैं चादर तान पार्क में, वृद्धों की स्फूर्ति देख हूँ हैरान ।।१।। सुबह जागते जल्दी, लगाते दण्ड व बैठक ऊर्जा ओज दिखाते और लगाते ध्यान।।२।। जाग कर जगाते सबको, ललक दिखाते सारे कर्म झट करते, इनकी पुलक महान।।३।। सोकर आँख मलते, उठते घिसटाते बढते ब्रश मंजन करते ये, युवा हैं बड़े खिसियान।।४।। आलस में डूबे, उनींदे देख युवा को लगता युवा हो गये हैं बूढ़े और बूढ़े हुये हैं जवान।।५।। परिचय :- डॉ. कोशी सिन्हा पूरा नाम : डॉ. कौशलेश कुमारी सिन्हा निवासी : अलीगंज लखनऊ शिक्षा : एम.ए.,पी एच डी, बी.एड., स्नातक कक्षा और उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं में अध्यापन साहित्य सेवा : दूरदर्शन एवं आकाशवाणी में काव्य पाठ, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में गद्य, पद्य विधा में लेखन, प्रकाशित पुस्तक : "अस्माकं संस्कृति," (संस्कृत भा...
एक चिकित्सक की कहानी उनकी जुबानी
कविता

एक चिकित्सक की कहानी उनकी जुबानी

माधवी तारे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** एक मामूली सा डॉक्टर हूं बेशक कोई भगवान नही डॉक्टर का डॉक्टर होना मगर इतना भी आसान नहीं इस दर्जे की खातिर मैने बचपन खोया हैं मैं वो हूं जो एक एक मार्क्स को रोया हूं सुकून की जिंदगी को कुर्बान करता हैं डॉक्टर कभी किताब तो कभी, इमरजेंसी टेबल पे सोया है जाने कब होली बीती, जाने कब दिवाली गई जाने कितने रक्षाबंधन, मेरी कलाई खाली गई परीक्षाओं की लड़ी ने, नही छोड़ा साथ अब तक मेरे हजारों दिन खा गई उतनी ही राते काली गई फिर भी तुम्हे हर वक्त जो खुश दिखे परेशान नहीं उस डॉक्टर का डॉक्टर होना इतना भी आसान नहीं मैंने क्रिकेट का बैट छोड़ा, टीवी का रिमोट छोड़ा सफेद एप्रन की खातिर मैंने जैकेट कोट छोड़ा स्कूल का टॉपर मेडिकल में आने पर फेल होने से डरा हैं जब भी कोई शॉर्ट नोट छोड़ा मेरी कोई संडे नही छुट्टी की गुजारिश ...
कोहिनूर सी चमक है मेरी बेटी में।
कविता

कोहिनूर सी चमक है मेरी बेटी में।

गगन खरे क्षितिज कोदरिया मंहू (मध्य प्रदेश) ******************** कोहिनूर सी चमक है मेरी बेटी में की दर्पण भी देख आश्चर्य चकित हो जाता हैं। मन मेरा उसे देख व दिल मेरा ख़ुशी से बाग़ बाग़ हो जाता हैं। मधुबन की बेला भी शर्मा जाती हैं। मौसम भी सुहाना होकर उसका अभिनन्दन करता है। प्रभाकर अपनी प्रभात किरणों से कोहिनूर सी अभा देकर उसे देख मुस्कुराती शबनम भी पीघल जाती हैं। अठखेलियां खेलती हवाओं और कोयल, मोर, पपीह भी झुमने लगते हैं। खुशहाली मन की मेरी नूरे नज़र कोहिनूर सी चमक मेरी बेटी हैं। दर्पण भी दैख आश्चर्य चकित हो जाता हैं तोहफा है, मेरे लिए वह कोहिनूर सा, दिल मेरा ख़ुशी से बाग़ बाग़ हो जाता हैं। परिचय :- गगन खरे क्षितिज निवासी : कोदरिया मंहू इन्दौर मध्य प्रदेश उम्र : ६६वर्ष शिक्षा : हायर सेकंडरी मध्य प्रदेश आर्ट से सम्प्रति : नर्मदा घाटी ...
सजल
कविता

सजल

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** वसुन्धरा के हर कोने में होता इसका मान है। कहीं नहीं दुनिया में अपने जैसा हिन्दुस्तान है। अखिल विश्व में भारत की महिलाओं का सम्मान है। महा पुरुष भी जो जन्मे होता उनका गुणगान है। नहीं युद्ध हो अब धरती पर सब मानव यह ठान लें सकल जगत में भारत ही ने छेड़ा यह अभियान है। सभी युगों में हमने अविरल रचा नया इतिहास शुभ जहाँ कहीं भी जाएँ अपने भारत की पहचान है। महा शक्तियों ने भी माना भारत के अवदान को गर्व हमारे अंतर में है अधरों पर मुस्कान है। बहुत हुई है अपनी भू पर गतिविधियाँ विज्ञान की, नहीं शत्रुओं को भारत की क्षमता का अनुमान है। 'रशीद' ऐसे यत्न करें हम देश अधिक बलवान हो, धरा हमारी प्रतिक्षण अपनी आन बान है शान है। परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ...
तन्हाइयों देखकर
कविता

तन्हाइयों देखकर

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** तन्हाइयों देखकर जी ने वाले क्यों गिला करते हैं अपनों से मासूम तबस्सुम से आपके राजे दिल बयां होता है जुनून में बसे हुए का कोई इंतिहान भी लेता है क्या सोच लिया दिल ने खुदा इन्तिहाईहै कसमें वादेू से इंतिहान नहीं होते इंतिहान होते हैं दिलों जान से जुनून में बसी तस्वीर गर बदल दे तक़दीर तो मैं खुदा को भी दे दूं जा अपनी वक्त होता समा होता ना छोड़ते दामन बांध लेते साथ तकदीर कुछ न कुछ तजबिर कर परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ीआप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के स...