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पद्य

धारण तो कीजिए
कविता

धारण तो कीजिए

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** नेक नीति नियति का हरेक युग में उपहास हुआ है, मगर धर्म अनुगामी आदर्श कर्म का क्या कीजिए। तोड़ा फोड़ा कलंक आचरण खूब विपर्यास हुआ है, हिरणकश्यप रावण कंस को पनपने क्यों दीजिए। आदर्श न्याय कर्म पालक से द्वेष एहसास हुआ है, आंख मिलान कन्नी काटने चंद्रहास मजा लीजिए। बरसों बाद श्रीराम लला का भव्य पुनर्वास हुआ है, बकवास निहित अट्टहास को वनवास करा दीजिए। पड़ोस पथ से राष्ट्र तलक नेकी का परिहास हुआ है, अब राष्ट्र विरोधी वक्तव्य का अनुप्रास भुला दीजिए। नेकी बदनियत दोनों का जगत में इतिहास हुआ है, बर्बाद मंजर देखने फिर वही केनवास टांग लीजिए। चाल चरित्र चक्र संवारने मौकों पर विश्वास हुआ है, कुटुंब संस्था समाज हित में ’मुन्ना’ अरदास कीजिए। न्यूज पेपर टीवी बदहवास आलम आसपास हुआ है, विकसित दिशा दशा सम्मान भी धारण तो कीजि...
सत का मान बढ़ाया
कविता

सत का मान बढ़ाया

प्रमेशदीप मानिकपुरी भोथीडीह, धमतरी (छतीसगढ़) ******************** सतनाम के ध्वज से सत का मान बढ़ाया जीवन को कैसे जीना है हमको सिखाया स्वयं शूल पर चल सत्य का राह अपनाया सत्य के राही बन सबको सत्मार्ग दिखाया जीव- जीव सब एक, एक ही सबके प्राण जीव में नहीं कोई भेद है, समझ ले इंसान जगत में एकता का जिसने भाव जगाया सत्य के राही बन सबको सत्मार्ग दिखाया चलो बने हम सब भी सत्य के अनुयायी जिसकी महिमा रहती है सदा आनंददायी सारे जग पर सत्यनाम को सहज फैलाया सत्य के राही बन सबको सत्मार्ग दिखाया जगत के मानव-मानव सबकी एक जात उड़े प्राण पखेरू तब, मिलेंगे एकहि घाट जात-पात का झूठे प्रपंच को भी मिटाया सत्य के राही बन सबको सत्मार्ग दिखाया संयमित हो जीवन, सत के साथ चलना छल कपट से दूर रहकर,आगे निकलना जीव की सदगति का नित उपाय बताया सत्य के राही बन सबको सत्मार्ग दिखाया परिचय :- प्रमेशदीप मा...
यादें
कविता

यादें

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** साल जा रहा देकर हमको न, याद में ठहरे लोग। भोले-भाले, साथ निभाते, भले-बुरे सब लोग।। स्मृतियाँ कुछ मीठी होतीं, तो कुछ कड़वी होतीं, समय बीतता, पर यादें में, अज़ब-निराले लोग। अरमानों में रंग भरे हैं, तो कुछ अति फीके, हाथ मिलाते, नेह निभाते, प्रीति जताते लोग। कर्म-भाग्य ने मिलकर के ही, परिणामों को सौंपा, मित्र बन गये अनजाने में, आगे बढ़कर लोग। भूल सकूँगा नहीं किसी को, जिन्हें विगत ने पाया, सदा ही ठहरे रहेंगे यूँ ही, सदा सुहाते लोग। जीवन की गाड़ी चलती है, मिलते लोग-बिछुड़ते, यादों में सब रहें सुरक्षित, प्रेम बहाते लोग। लौट नहीं आता है बीता, बीती बातें शेष, दूर हो गये,या बिछुड़े वे, याद समाते लोग। जीवन की रफ़्तार तेज है, भाग रहा है रोज़, अच्छी स्मृतियाँ का है वंदन, जिनमें ठहरे लोग।। परिचय :- प्रो. ...
अर्द्धनारीश्वर
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अर्द्धनारीश्वर

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** रूप लिया अर्द्धनारीश्वर का, शिव-शक्ति कहलाते, शिव प्रारम्भ शक्ति है ब्रह्मांड तभी तो अर्द्धनारीश्वर कहलाते!! आधा भाग नर का, आधा बना नारी का, शिव बिन शक्ति अधूरी- शक्ति बिन शिव अधूरे हो जाते!! प्रश्न एक कौंधा मन मे बार बार, पुरुष का रूप लेकर जो करते नारी सा शृंगार, कौन हैं ये लोग, क्यों दर दर पाते तिरस्कार!! घर घर आशीर्वाद पहुंचाते, बधाई के गीत गाते, फिर भी समाज से बहिष्कृत हो स्नेह को तरसते! आसान नहीं इनका जीवन, हर मोड़ पर चुनौतियां आती, तिल तिल दम तोड़ते, शिव शक्ति का सृजन ये, किन्नर कहलाते! अर्द्धनारीश्वर जब घर-घर पूजे जाते ईश्वर की ही रचना हैं ये, फिर क्यों अधूरे कहलाते?? प्रश्न बड़ा है समाज के ठेकेदारों से मेरा, क्यों नहीं इनको हम अपनों जैसा अपनाते??? प...
जीवन एक प्रश्न
कविता

जीवन एक प्रश्न

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* एक प्रश्न जो हर मोड़ पर नया हो जाता है कभी धूप में तप कर मजबूत कभी ओस बनकर पल में खो जाता है। हम चलते हैं मंज़िल की तलाश में पर रास्ते ही हमें पहचान देते हैं कभी हार में छिपा सबक कभी जीत में नम्रता सिखा देते हैं। सत्य यह है कि जीवन किसी ठहरे पानी जैसा नहीं यह बहती नदी है जो पत्थरों से टकराकर और भी निर्मल और भी प्रखर हो जाती है। हम जिस क्षण को पकड़ना चाहते हैं वह हवा बनकर फिसल जाता है और जो क्षण हमें तोड़ देता है वही हमें नया आकार दे जाता है। अंत में समझ आता है जीवन को समझना नहीं जीवन को जीना पड़ता है हर अनुभूति को स्वीकार कर खुद को धीरे-धीरे प्रकाश की ओर ले जाना पड़ता है। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी...
सरिता
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सरिता

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** सरिता शीतल बह रही, देती जीवन दान। नीर सुधा का सार है, दिव्य लोक पहचान।। शैल-खंड कितने ढहे, सम्मुख सरिता धार। कल-कल नदिया नाद का, करे नमन संसार।। नदी तीर्थ है जान लो, पूजन करो सुजान। प्यास बुझाती लोक की, सद्भावों की खान।। सींचे सब तृणमूल को, अनुपम सुंदर घाट। संचित रखते जल सदा, अद्भुत देखो पाट।। सुंदर है मनमोहिनी, अंतर सागर वास। धार-धार संचार में, सदा मिलन की आस।। युग-युग से है बह रही, संस्कृति की पहचान। गंगा जमुना का मिलन ,मोक्षदायिनी जान।। सारी बाधा तोड़ती, बहती निर्मल गात। जननी सी वत्सल रहे, करे प्रेम बरसात।। जीवन आलोकित करे, सरिता सूर्य समान। इसकी पावन धार में, बसे अलौकिक ज्ञान।। बाधा बंधन सह रही, नहीं मानती हार। इसका पूजन कीजिए, जग में बारंबार।। इसे प्रदूषित मत करो, करती यह...
अपनापन
कविता

अपनापन

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** ना दिल मै खुशी ना मन मै उमंग, अपनो का गम बस अपनो का गम, दिखावा बस दुनिया का, फोटो का और बस संकीर्ण विचारो का। परिवार एक दिखावा नही, दिल के एक तार का, हँसी के पात्र का नही, ससम्मान का। पात्र सोने चाँदी का बनो नही काँच के गिलास सा, कोई भी आये ठुकरा जाये धराशाही पल मे नाश सा। राज बनो ताज बनो, शान और अभिमान बनो, एकता की एक मिसाल बनो, कोई दुशमन घात ना डाले, ढाल बनो तलवार बनो, हर पग का तुम साथ बनो, प्यार करो सम्मान करो, और दिलो पर राज करो परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना ...
हां तुम
कविता

हां तुम

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** हां तुम ! मैंने चाहा है तुमको मेरी चाहतों में तुम I गुजरे कल में तुम उगते सूरज में तुम I बहती हवाओं में तुम बरसते बादलों में तुमI खिलते फूलों में तुम ढलती शामों में तुम I हां तुम ! मन की सुंदरता तन का सुंदर रूप I लब तेरे मधुशाला हर अंग पुष्प की माला स्वप्न की परी तुम हो यौवन रस का अमृत प्याला I तुम जीवन ज्योति तुम करुणा तुम भक्ति तुम ही मेरा बंधन I मेरा इश्क तुम मेरी जान तुम मेरा हर लम्हा तुमसे तुम ही मेरा दर्पण I बेचैन दिल तन्हा मन तस्वीर तेरी चूमते नयन I मिलकर तुमसे लिपटूंँ मैं ऐसे जैसे चंदन से लिपटे भुजंग I मेरा ख्वाब मेरी हकीकत मेरी चाहत मेरा जूनू हां तुम ! परिचय :- बाल कृष्ण मिश्रा निवासी : रोहिणी, (दिल्ली) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह ...
सियासत
कविता

सियासत

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** सियासत जाल है मकड़ी का साम-दाम-दंड-भेद आधार स्तंभों पर टिका महल सियासत का..... पहला और अंतिम लक्ष्य है पाना सत्ता येन केन प्रकारेण बचाना है अस्तित्व ले कर सहारा सत्ता का..... कहीं छुप कर कहीं खुल कर नदी के दो पाट यहाँ कौन किसका सियासत में रिश्तों का आधार जुर्म सदा सहभागी सत्ता का.... सिद्धांत सदा ताक पर सलामत रहे सदा सत्ता कत्ल कर देते बाप-भाई का मात्र पाने को सत्ता हम हैं आपके कौन यही है मूल मंत्र सत्ता का.... कर दी गई है तुलना गणिका से.... मगर गणिकाओं के भी उसूल होते हैं सिद्धांत हीन होते सत्ता लोभी पूर्ण हो महत्वाकांक्षा यही सिद्धांत होता है सत्ता का...! परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, दिल्ली विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में प...
ऐसी हवा चले की बदल जाये जमाना
कविता

ऐसी हवा चले की बदल जाये जमाना

विजय वर्धन भागलपुर (बिहार) ******************** हर लब पे सदा गूंजे खुशियों का तराना हो राम भरत जैसा अगर भाइयों में प्यार मिट जाएगी जहाँ चाहत का बहाना लक्षमन के जैसी सेवा और भरत के जैसा त्याग घर घर में पैठ जायेगा खुशियों का खजाना विभीषण की तरह मित्र और रिछ जैसा दोस्त फिर कहाँ रह पायेगा रावण का ठिकाना हनुमान की तरह सेवक गर हों सभी जगह सब भूल जायेंगे किसी सीता को चुराना हो जायेगा संसार में फिर व्याप्त रामराज्य खुशियों का राग गूंजेगा वंशी से सुहाना परिचय :-  विजय वर्धन पिता जी : स्व. हरिनंदन प्रसाद माता जी : स्व. सरोजिनी देवी निवासी : लहेरी टोला भागलपुर (बिहार) शिक्षा : एम.एससी.बी.एड. सम्प्रति : एस. बी. आई. से अवकाश प्राप्त प्रकाशन : मेरा भारत कहाँ खो गया (कविता संग्रह), विभिन्न पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेर...
नयी सी हवा है नया आसमां
कविता

नयी सी हवा है नया आसमां

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** नयी सी हवा है नया आसमां ठंडी हवा का दौर चल रहा है। मन तुमसे मिलने को मचल रहा है। ******** नयी सी हवा है नया आसमां। तुम आ जाओगे तो बदलेगा समां। ******** मौसम सुहाना है हमने ये माना है। सब कुछ छोड़कर तुम्हे चले आना है। ******** आसमां में बादल छाये है हम तुमपे नजरे विछाये है। अपना लो मुझको इसके पहले कि कहीं मौसम बदल न जाये। ********* इस समय जरुरत है धुप की जो कुछ गर्मी दे जाय। कड़कड़ाती ठंडी से कुछ रहत दे जाये। ******** मौसम बदल रहा है तुम मत बदल जाना। रोज की तरह जरूर मिलने आना। ********* हवाएं भले नयी है हमारे संबंध पुराने है। तुमसे से तो रोज मिलता हूँ बाक़ी लोग अनजाने है। ******** नयी हवा तुम्हारे आगमन का संकेत दे रही है पल-पल मुझे बैचैन कर रही है। ********* परिचय : डॉ. प्रताप म...
पराभौतिक
कविता

पराभौतिक

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मृत्यु तुम करो न भक्षण मेरा मैंना भी देखना है काल बड़ा है या काली। भाग्यविधाता लिखो ना भाग्य मैंना भी देखना है कर्म बड़ा है या कर्मदाता। समय बदलो न अपना पहिया मैंना भी देखना है भविष्यवक्ता बड़ा है या भविष्यकर्ता। प्रेतराज चलो न करोड़ों प्रेतो के साथ मैंना भी देखना है तंत्र बड़ा है या प्रेम मंत्र। देवराज इंद्र करो तप जरा भंग मैंने भी देखना है योगाग्नि बड़ी है या कामाग्नि। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।  ...
दिल्ली कारोबारी
गीत

दिल्ली कारोबारी

भीमराव 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** नफ़ा देखकर सौदा करती, दिल्ली कारोबारी। दस हजार में बिका आज फिर, अपना चमन बिहारी।। आसमान में धूल धुएँ ने, चहुँदिक पैर पसारे। अर्थ समझने में शब्दों के, चश्में भी सब हारे।। लालच के सिर चढ़ कर बैठी, फिर से नई उधारी।। दस हजार में बिका आज फिर, अपना चमन बिहारी आजादी के अमृत काल में, छल ने किए धिंगाने। छीन निवाले हाथों से फिर, पकड़ा दिए फुटाने।। ली समेट फिर बहुरे बल की, हरी-भरी फुलवारी।। दस हजार में बिका आज फिर, अपना चमन बिहारी।। प्यास हुई बेकाबू, जल के, झरने सूखे सारे। आश्वासन की ड्योढ़ी से हम, आस लगाकर हारे।। ज्ञान कोठरी पर ताले जड़, छलता रहा लबारी।। दस हजार में बिका आज फिर, अपना चमन बिहारी।। आँतों की हड़ताल हुई ज्यों, दौड़े भूखे बंदे। बीज बताकर छलनाओं ने, रोप दिए थे फंदे।। देख छटपटाते जीवन को, खुश...
९० के दशक का प्रेम
कविता

९० के दशक का प्रेम

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* ९० का प्रेम भी अजीब था किसी को देखने के लिए जाने कितने प्रेमियों की साइकिल की चेन हमेशा ही उतरा करती थी. कितनी खिड़कियों को आँखें मिलती थी किस टाइम पर उन्हें खुलने का अधिकार मिला था सिर्फ वही समझती थी. रंगबिरंगे कागज़ पर कितने जवां दिलों ने कांपते हाथों से प्रेम की दास्तान लिखी. कितने प्रेमियों ने नोटबुक के आखरी पृष्ठ पर अनजान सी आँखें बनायी होगी तो किसी ने मेहंदी की डिजाइन पर अपने महबूब का नाम छुपा कर लिखा होगा. अगर प्रेम गीत नहीं लिखे गए तो मोहब्बत अंदर ही अंदर घुटती रहती फिर एक दिन टेंट हाउस का सामान डाले टेंपो आता तो पता चलता अपना चांद किसी दूसरी की छत की चांदनी बन चुका. कितनी अच्छी मोहब्बत थी बिल्कुल "उसने कहा था" ये कहानी हर किसी ने पढ़ी थी कितने...
भोर सुहानी
गीत

भोर सुहानी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** भोर सुहानी आ गयी, पंछी करते शोर। कैसी अनुपम छवि प्रकृति, मनवा भाव विभोर।। बूँद ओस की गिर रही, शीतल बहे समीर। भोर सदा देखो हरे, अँधियारे की पीर।। आभा लाया है नई, सुंदर नवल प्रभात। सुखदायक यह भोर है, बीती काली रात।। जीवन सारा खिल उठा, महक रहा हर अंग। कान्हा की बंशी बजे, नाचें राधा संग।। जपो नाम भगवान का, बेडा होगा पार। पूरे होंगे स्वप्न सब, खुशियाँ मिले अपार।। स्वागत करिए भोर का, लेकर नव विश्वास। चमकी किरणें हैं धरा, कर लो योगाभ्यास।। वंदन करिये भोर का, ईश नवाओ शीश। मात-पिता चरनन रहो, नाम जपो जगदीश।। ताल देख पंकज खिले, फूल महकते बाग। भोर सुनाता आज है, नव जीवन का राग।। मानव करता कर्म है, भोर मचाता शोर। निकले तम को चीरती, किरणें ये चहुँओर।। जागा नव उल्लास है, आया नया उमंग। गोरी न...
नये साल में
कविता

नये साल में

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** सभी अधूरे सपने मेरे, पूरे होंगे नये साल में। अरमानों में रंग भरेंगे, नहीं फंसेंगे मकड़ जाल में।। अब तक जो भी रहे अधूरे, सपने वे मुस्काएंगे। हमको देकर के खुशियाँ वे, मंज़िल आज सजाएंगे।। नहीं निराशा संग रहेगी, मातम को दफनाएंगे। कर्म करेंगे नये साल में, मंगल गीत सुनायेंगे।। जाने वाले का वंदन कर, आगत को घर लाएँगे। रहे अधूरे सपने अब तक, उनको अब महकाएँगे।। जीवन में अब नव गति होगी, और सुहानी बातें। सब कुछ अब मंगलमय होगा, सुखमय अब दिन-रातें।। नहीं संग अवसाद रहेगा, नया वेग अब तन-मन में। आने वाला काल सँजोये, नया नेग अब आँगन में।। जीवन संकल्पित होकर के, नव अध्याय लिखेगा। मुस्कानों का मौसम होगा, मातम नहीं दिखेगा।। सभी अधूरे सपने आकर, वंदन नमन करेंगे। पूरे करके "शरद" उन्हें हम, आगत चमन करेंगे।। परिचय :- ...
ओस बून्द
कविता

ओस बून्द

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** धरती की दहलीज पर कदम रखती रवि किरणो से ओस बून्दो ने पूछा क्या तुम हमे चमकाने आई हो या गिराने। किरणे बोली कुछ देर विश्राम करेंगी तुम प्रेम फिर तुम्हारी ठंडक लेकर फैल जावेगी धरा पर। मृदुल-दुकुल मे समाने के लिए। जिससे किसी वृक्ष को जीवन मिलेगा हम तुम प्रकृति की नियति है कभी भी समाप्त हो जाने के लिए कटिबद्ध है। एक प्रखरता, एक की कमनीयता क्षणिक है क्या यह सच नही पुछे हम रवि किरण और, हाँ और औस बून्द से। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से ध...
मेरी माँ
कविता

मेरी माँ

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** आशा और विश्वास की, गहराई और उडा़न की, सोच और विचार की, अच्छे और बुरे की एक शुभ चिंतक होती है माँ। खुशी और गम की, आव और भाव की, दर्शन और विज्ञान की एक कला होती है माँ। पथ और संचलन की, निर्जन मन मै ज्ञान की, अंधकार में प्रकाश की, भटके को राह की एक पथिक होती है माँ। डुबते को सहारे की, मेहनत और उत्साह की, खुशियो के खजाने की, आँसू को पी जाने की, जीवन मे एक तरंग सी, लहर होती है माँ, नीरस मै रस की, अमृत सा पान की, एकान्त मै ध्यान की, भक्ति और शक्ति की, संस्कार और संस्कृति की जननी होती है माँ। समय के ज्ञान की, साहस और विश्वास की, साथ और विकास की शक्ति होती है माँ । शान्ति और मंगल की, प्रेम के प्रसाद की, आनन्द और उमंग की दरिया होती है माँ। परिचय : किरण विजय पोरवाल पत...
दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए
कविता

दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** बीते लम्हों का सूनापन तेरी यादों का महकता चंदन आंखें में थमी तेरी परछाई, रोशनी बनकर बूंदों में घुल जाए। दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए। कहां मुमकिन है मोहब्बत को लफ्ज़ों में बयां कर पाना। आसान नहीं भुला, यादें सुकून की नींद में सो जाना। ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए। दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए। जीवन के पावन ‘निर्झर’ को, तुम यूँ ही बह जाने दो। एक पल, बस एक पल, नीले अँधेरे में गुम हो जाने दो। तारों की चादर ओढ़, चाँद की रोशनी में खो जाऊं। तेरी मोहब्बत की खुशबू में, खुद को फिर से पा जाऊं। ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए। दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए। तेरे बिना सारा जहाँ, सूना सा लगता है, जैसे एक सिसकी.… जैसे एक सिसकी। ये कैसा अधूरापन? ये कैसा सूनापन? शायद यही है इश्क़...
कैसा वो दिन था
कविता

कैसा वो दिन था

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** कैसा वो दिन था, प्रारम्भ का अंत था, प्रचंड पराक्रम था, कर्म अखंड था। सनातन की रक्षा हेतु चढ़ा वो धर्म की सूली पर प्राण दिए अपने, स्वाभिमानी बलिदानी था! ना स्वयं की चिंता ना घर-बार की खबर कोई, दृढ़ संकल्प लिए गा रहा पवित्र राम नाम था। नमन है, प्रणाम है, कोटि कोटि वंदन है युवक था, बालक था, बुजुर्ग भी पर भगवा था। शौर्य- वीरता, पराक्रम का अद्भुत वो पल था, ना भुला सके इतिहास कभी, वो ज्वलंत क्षण था। ६ दिसंबर १९९२ का दिन था धर्म के दाग को सेवकों ने स्वयं के रक्त से धोया था। नमन तुम्हें हे बालक यशवर्धन तू यज्ञ था, कितनों की आहुतियों से खड़ा हुआ ये आज का मंदिर है। अवध था, अवध है, जय श्री राम का ब्रम्हांड में जय घोष था। भारत के लाल थे कैसा वो जोश था। अमर हुए, इतिहास ब...
न जाने क्या बदला है
कविता

न जाने क्या बदला है

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** वो बदल गये समझ नहीं आया। न जाने क्या बदला है। ******** वक्त के साथ हर चीज बदलती है। पर तुम न बदल जाना वक्त के साथ। ******** कली बदलकर फूल बनती है। बच्चा युवा बन जाता है। ******* बदलना प्रगति की निशानी है। जिंदगी के आगे बढ़ने की कहानी है। ******** मौसम भी बदलता है ख्याल भी बदलते है। चुनाव जीतने के बाद नेता भी बदलता है। ******** बहुत दुख होता है जब अपना कोई बदल जाता है। हमें छोड़कर किसी दूसरे की बाहों में समा जाता है। ********* केवल वक्त को बदलने दीजिए। अपना स्वभाव और संस्कार मत बदलिए। ******** कोई दल बदलता है कोई शहर बदलता है। होता हैं जिसमें फायदा आदमी वह चीज बदलता है। ******** बदलो जरूर बदलो मगर इतना मत बदलो। कि तुमसे बदला लेने की इच्छा हो। ********* परिचय : डॉ. प्रत...
बुरा इंसान
कविता

बुरा इंसान

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हां मैं बुरा हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम हमेशा खुश रहो। हां मैं बुरा हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम बुरे लोगों से सदा दूर रहो। हां मैं बुरा हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम सदा मुस्कुराते रहो। हां मैं बुरा हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम्हारे जीवन में दुख न आए। हां मैं बुरा हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम मेरे बाद भी खुश रहो। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।  ...
साक्षरता का दीप जलाइए
कविता

साक्षरता का दीप जलाइए

डॉ. राजेश कुमार शर्मा "पुरोहित" भवानीमंडी (राजस्थान) ******************** साक्षरता का दीप घर-घर जलाइए अनपढ़ भाई बहनों को पढ़ाइये शिक्षा का उजाला हर झोंपड़ी में हो आप पढ़े लिखे हो अपना फर्ज निभाइए केवल हस्ताक्षर करना ही साक्षर नहीं डिजिटल साक्षरता वित्तीय साक्षरता जीवन मूल्यों की शिक्षा भी अवश्य दीजिए अपने गली मोहल्लों में सबको साक्षर कीजिए बरसों से जो बैठे अनपढ़ अपने घरों में उन असाक्षरों को चिन्हित कर पढ़ाइये एक व्यक्ति दस को साखर करने का काम करे आओ यह पुनीत संकल्प कर आगे बढिए शिक्षा का उजाला अब घर-घर होना चाहिए डिजिटल दुनिया में डिजिटल ज्ञान होना चाहिए मिटे अज्ञान का तिमिर सारा ज्ञान का उजाला फैले हर नागरिक हो पढ़ा लिखा साक्षरता का दीप जले उल्लास ऐप जीवन को रोशन करने आ गई है उल्लास ऐप पर रजिस्ट्रेशन अवश्य करवा लें शिक्षित हो देश विकास में हाथ जरूर बंटाइये ...
डाम
आंचलिक बोली, कविता

डाम

सौ. निशा बुधे झा "निशामन" जयपुर (राजस्थान) ******************** (राजस्थानी बोली) बचपन मै म्हे खेल खेलता रह्या पछाड़ी, देता डाम। पिदतां पिदतां होठ सूखता नरच्यूं न करता आराम। मायड़ कहती खाणो खा ले देख ऊपरां ढळगी शाम। दोस्त बोलता कोनी आसी बिना दियां यो अपणो डाम। आ जातो जद नयो खिलाड़ी म्हारो पिण्ड छुड़ाता राम। सगळा बींकै लूम'र कहता नयी छै घोड़ी नयो नयो डाम। परिचय :- सौ. निशा बुधे झा "निशामन" पति : श्री अमन झा पिता : श्री मधुकर दी बुधे जन्म स्थान : इंदौर जन्म तिथि : १३ मार्च १९७७ निवासी : जयपुर (राजस्थान) शिक्षा : बी. ए. इंदौर/बी. जे. मास कम्यूनिकेशन, भोपाल व्यवसाय : एनलाइन सेलर असेंबली /फ़िलिप कार्ड /अन्य प्रकाशित पुस्तक : स्वयं की मराठी संकलन लघुकथा (मधुआशा 2024) एवं विभिन्न पटल पर पुरस्कार एवं समाचारपत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित स्वरचित कविता/कहा...
इत्तेफाक
कविता

इत्तेफाक

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** आज हमारा समाज जिस जगह खड़ा है मैं नहीं समझता कि यह इत्तेफाक है, लाखों करोड़ों जुल्म ज्यादतियां सह कर मुस्कुराने में कोई तो बात है, शांत स्वभाव में हरदम रहना, लेकिन अत्याचार को नहीं कभी सहना, लेकर शांत पड़े रहे दिल में ज्वालामुखी की धधक, जब चाहे प्रतिक्रिया दे दे नहीं ऐसी सनक, भविष्य की स्वाभाविक चिंताएं लेकर, करते हर काम अपनों की बलाएं लेकर, अच्छे कामों की सराहना भी की उज्जवल भविष्य की दुआएं देकर, खौलते खून की उबाल दिखाये हैं शस्त्र से लैस भीमा कोरेगांव में, जब तक अत्याचारियों को समूल नष्ट न कर दिए सुस्ताये नहीं किसी पेड़ की छांव में, हमने लड़े और जीते भी कई युद्ध, मगर हमने जग को दिये भी हैं दैदीप्यमान बुद्ध, अस्पृश्यता की बात कर बैठाया गया समतायुक्त शिक्षालय से निश दिन बाहर, भावना...