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पद्य

कन्हैया तुम्हारा सहारा न होता : सनातनी गज़ल
ग़ज़ल

कन्हैया तुम्हारा सहारा न होता : सनातनी गज़ल

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** सनातनी गज़ल कन्हैया तुम्हारा सहारा न होता। तो दुनिया में कोई हमारा न होता। जो पकड़ा न होता मेरा हाथ तुमने, तो ग़म की नदी का किनारा न होता। न होते लता, पुष्प, पर्वत ये झरने। तो जग में ये अनुपम नज़ारा न होता। दिया ज्ञान गीता का तुमने जहां को, बिना कर्म जग में गुज़ारा न होता। भरा स्वार्थ सारे ज़माने में दिखता बिना काम कोई भी प्यारा न होता। बनाते नहीं प्रेम की रीत जग में, तो इंसा किसी से भी हारा न होता। "प्रिया" मोह माया में सोई हुई थी, न जगती जो तुमने पुकारा न होता। परिचय :- श्रीमती शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" निवासी : ग्वालियर (मध्यप्रदेश) रुचि : गद्य/पद्म लेखन एवं गायन घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक ...
ख्बाव सा तुम्हारी आंख में
कविता

ख्बाव सा तुम्हारी आंख में

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ******************** ख्बाव सा तुम्हारी आंख में बसने लगा हूं फूल के सौंदर्य सा मुस्कराने लगा हूं तुम सुबह की पहली किरण सी उतरी हो जब से मेरे आंगन में मैं धूप में भी मुस्कराने लगा हूं। देखता हूं खाली आकाश को जब भी मैं बादल सा उमड़ने लगा हूं चाहता हूं कि बरसूं तुम्हारे गेसुओं पर मैं नटखट थोड़ा मुस्कराने लगा हूं तुम देखती हो मुझे छिपकर यह मैं जानता हूं तुम्हारी चाहते पा मन ही मन मुस्कराने लगा हूं। मेरे चेहरे पर खिली रहती है ताजगी अब मैं सबसे हंस हंस कर मिलने लगा हूं। दूर से ही देखकर तुम्हें एक नजर जैसे मैं जन्नत में रहने लगा हूं नहीं कोई कामना कि गलबहियां करुं बस तुझे मुस्कराता देखना चाहता हूं रहो हर वक्त सामने यह भी नहीं चाहता बस एक बार देख लूं चाहने लगा हूं ऐसा ही खूबसूरत सपना देखने लगा हूं। परिचय :- सुधा गोयल निवासी : ...
याराना
कविता

याराना

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हर लम्हा सुहाना होगा तेरा हंँसना और फिर देखकर तुम्हें मेरा मुस्कुराना होगा। माना कि हम कुछ भी नहीं मगर तुम्हारे सिर के ताज़ पर हर पल हमारा पहरा होगा। मैं हार भी जाऊं तुम्हें जीतने के लिए तो भी तेरे सपनों में एक अफसाना होगा। एक तलब है तुम्हें हर पल मुस्कुराते देखने की अगर मैं मिट भी जाऊं तो भी ये मेरा याराना होगा। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
इंडिया नहीं “भारत” कहें
कविता

इंडिया नहीं “भारत” कहें

मंजुला भूतड़ा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** इंडिया नहीं "भारत" कहें, गर्व से कहें, हम भारतीय हैं। शपथ हमें इस मिट्टी की, इसे चंदन-सा महकाएंगे। धूल नहीं है यह केवल, इसका माथे तिलक लगाएंगे। नए भारत के निर्माण में, फिर से अब जुट जाएंगे। विश्व के नये मानचित्र में, अब "पूरा भारत" दिखलाएंगे। राष्ट्रीय पक्षी इसका मोर, राष्ट्रीय पशु यहां बाघ है। पुष्प कमल है राष्ट्र गौरव, अशोक चक्र महान है। हिन्दी इसकी भाषा मीठी, अपनेपन की खुशबू है। राष्ट्र भाषा इसे बनाएं, यह दिल में अरमान है। इंडिया नहीं "भारत" कहें, गर्व से कहें, हम भारतीय हैं। परिचय :-  मंजुला भूतड़ा जन्म : २२ जुलाई निवास : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : कला स्नातक कार्यक्षेत्र : लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता रचना कर्म : साहित्यिक लेखन विधाएं : कविता, आलेख, ललित निबंध, लघुकथा, संस्मर...
रविदास ईश प्रभु धर्मा
चौपाई

रविदास ईश प्रभु धर्मा

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** माघ मास पूनम को जन्में। भक्ति भाव था खासा जिनमें।। पितु संतोष मातु हैं कर्मा। रविदास ईश प्रभु धर्मा।। कर्मशील प्राणी रविदासा। रखता सदा ईश विश्वासा।। समाजिक सुधार थे लाए। संत शिरोमणि आप कहाए।। सामाजिक सद्भाव दिखाया । जाति पाति का भेद मिटाया॥ निश्चल धारा भक्ति बहाया। जीवन का फिर सार बताया॥ कर्म निरंतर करते रहते। ध्यान मगन रह सदा विचरते।। गंगा मैय्या आप थीं आईं। लाज भक्त की मातु बचाईं।। कभी नहीं मन मैला राखा। ईश कृपा का फल था चाखा।। धर्म कर्म की ज्योति जगाए। योगी संत सुजान कहाए।। छोटा-बड़ा कर्म नहीं माना। ईश कृपा को सबमें माना।। भटक रहा क्यों प्राणी जग में। ईश्वर तो है तेरे मन में।। मीराबाई गुरु रैदासा। सतपथ पर उनका विश्वासा।। गुरु ग्रंथ में जगह हैं पाए। भक्ति भजन रसधार बहाए। सत्य...
मेरे जाने के बाद
कविता

मेरे जाने के बाद

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मेरे चले जाने के बाद, मेरा अस्तित्व भी मिट जाएगा, मेरा सबकुछ मेरे साथ चला जाएगा!! ये सफ़र यूँ ही चलता रहेगा, इस भीड़ में कोई हमारा नहीं रह जाएगा!! जीवन भर अपना व्यक्तित्व शून्य रखा था, वो शून्य भी शून्य में विलीन हो जाएगा! ना किसी के पास फैलेगा मेरी हंसी का धुंआ, ना मेरी याद में कोई एक दीपक जलायेगा!! वो आंगन, वो किवाड़, वो चूल्हा चौका जिनमे हम प्यार परोसा करते थे, उनकी सिसकियाँ घर मे सुनाई देंगी!! वो चूडी वो बिंदी, कतार में सजी साडियाँ उनके आँसू मेरी अलमारी में दिखाई देंगे!! प्रकृति को संजोया था हमने जीवों की मुस्कराहट में, वो अपने आसपास हमें ढूंढा करेंगे!! इनकी आवाज मुझ तक भी पहुंच जाएगी, जब हम इस दुनिया से बहुत दूर निकल जाएगें!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा...
बारूदी बस्ती
कविता

बारूदी बस्ती

भीमराव 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** अरमानों की मौन अर्थियाँ, रोज निकलती हैं। इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।। हिंसा ने खुशियों को खाई, जब त्योहारों की। अलगू जुम्मन पूजा करते, बस हथियारों की।। समरसता से डरी पुस्तकें, आहें भरती हैं।। इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।। क्षुद्र स्वार्थ में इस माली ने, पूँजी कुछ जोड़ी। हरे-भरे सम्पन्न बाग की, मेड़ें सब तोड़ी।। कलियाँ बासंती मौसम को, देख सिहरती हैं।। इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।। डरी अल्पनाएँ आँगन से, अब मुँह मोड़ रही। हँसिया लेकर बगिया विष की, फसलें गोड़ रही।। गर्वित-गढ़ में न्याय-कुर्सियाँ, पल-पल मरती हैं।। इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।। परिचय :- भीमराव 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक ...
सरोद
दोहा

सरोद

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** वादन सुनो सरोद का, सँग है सरगम ताल। मन मयूर जब नाचता, समय बदलता चाल।। वीणा और सरोद सँग, बजता मधुर मृदंग। बजती है जब भैरवी, बिखरें अनुपम रंग।। मंगल काज सँवारते, मधुर सरोद सितार। तोरण सजते द्वार पर, होता मनु सत्कार।। कृपा करें माँ शारदे, हो सरोद की तान। करता कवि फिर है सृजन, गढ़े नये प्रतिमान।। बजने लगता जब मधुर, मन का प्रेम सरोद। छंद गीत कविवर रचे, करता हिय आमोद।। नयनों में रस घोलती, मन में भरे हिलोर। धुन सरोद की भावनी, उर हरती चितचोर।। अनुपम वाद्य सरोद है, छेड़े उर के तार। अति मधुरिम संगीत से, बहे अमिय रसधार।। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : ...
महासंत रविदास
दोहा

महासंत रविदास

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** महासंत रविदास जी, मानवता के सार। फैलाकर के जो गए, एक नया उजियार।। महासंत रविदास जी, थे समता के रूप। अपने युग को दे गए, जो सूरज की धूप।। हरिपूजा की श्रेष्ठता, धारण करके खूब। रीति-नीति की दे गए, हमको पावन दूब।। महासंत रविदास जी, गाकर के मृदुगीत। बने मनुज की चेतना, के सच्चे मनमीत।। महासंत रविदास जी, कहते थे जयराम। सत्य, कर्म का रच गए, एक नवल आयाम।। महासंत निश्छल रहे, करनी रही विशिष्ट। जीवन सादा, निष्कलुष, सच्चाई थी इष्ट।। दूर रहो हर ढोंग से, दिया हमें संदेश। महासंत ने थे हरे, सबके सब ही क्लेश।। महासंत रविदास जी, थे सच्चे युगबोध। उनकी मानवता बनी, हर युग को नव शोध।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी...
चाहतों का क्या है
कविता

चाहतों का क्या है

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* चाहतों का क्या है!1030 चाहतें तो पागल होती हैं। जैसे अक्सर मैं चाहती हूँ कि नंगे धूसर पहाड़ों को बसंत के हरेपन से ढँक दूँ, नदियों को प्रदूषणमुक्त पानी से लबालब भर दूँ, घाटी के सूख चुके सोतों को फिर से जीवित कर दूँ। चाहती हूँ कि उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले क़ाबिज़ हों और फ़ैसले की पूरी ताक़त उनके हाथों में हो। चाहती हूँ बराबरी और आपसी सम्मान से भरा ऐसा प्यार जो मुक्ति का पर्याय हो और जिसकी मौन उपस्थिति में आत्माएँ संवाद करें कविता की भाषा में। जो नहीं है और जिसे होना ही चाहिए उसकी कामना में खरचती हूँ जीवन और सोचती हूँ कि दुनिया में अगर नहीं हुआ करतीं कुछ पागलपन भरी चाहतें तो मनुष्यता का भविष्य क्या होता! लेकिन सिर्फ़ चाहने से क्या होता है! इसलिए...
सिर्फ सोलह लाइन में
कविता

सिर्फ सोलह लाइन में

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** उसने सुझाव दिया कि अपने दिल का अरमान लिखो, अपनी चाहत, शत्रु, दिलोजान लिखो, मैंने कहा यार सिर्फ सोलह लाइन में आप ही बताओ क्या-क्या लिखूं, अपनी मर्ज लिखूं या दवा लिखूं, अपने दोस्त लिखूं या दुश्मन लिखूं, या दोस्त के खोल में छुपे स्वजन लिखूं, मेरी उन्नति के लिए उनका ढिंढोरा लिखूं, या सच में उनका बहलाता मन छिछोरा लिखूं, अपनी आन बान या शान लिखूं, या मुझे बर्बाद करने का उनका अरमां लिखूं, समाज के लिए जां लुटाना लिखूं, या उनका स्वार्थ और बरगलाना लिखूं, अब दिल चीर कर और कितना बताऊं, सोलह लाइन में क्या दिखाऊं क्या छुपाऊं। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
अवनी… अम्बर…
कविता

अवनी… अम्बर…

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** तुंग श्रृंग शिखर वृक्ष का सन्देश सुनाता अम्बर को कहता अवनि आश्वस्त है तप्त रवि जब किरणे फैलाता। पसरे वृक्ष छाया करते अवनी पर गोला ई, चौडा ई, चतुर्भुज, लम्बाई मे गणित बैठाती है शाखा ऐ। झुम कर दे ठण्डी पवन तपती दुपहरी मे पर्णो पर संगीत सुनाती आडी, तिरछी शाखा ऐ वृक्षो की आलिंगन करती अवनी का। मानो वृक्षशाखा ऐ कह रही है हे अवनी हन तुम्हे संभाल लेगी क्योकि नीचे की जडो का तुमही तो आधार हो वृक्षो के क ई आकार छोटे, बडे, लम्बाकार देते सदैव अम्बर को अवनि का अस्तित्वभास। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ स...
जड़कला
आंचलिक बोली, कविता

जड़कला

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) किसान मन के सोनहा धान लुआँ मिंजा के घर आगे मेहिनत के फल मिलगे कोठी डोली म धान धरा गे।। अग्घन, पूस के महीना म संगी लद-लद जाड़ जनाए कथरी, कमरा, अउ साल ओढ़े गोरसी म आगी सुलगाए।। कतको कपड़ा पुर नई आवय जड़कला हर जब आथे ताते कपड़ा अउ ताते जिनिस सबों के मन ल भाथे।। नोनी, बाबू अउ, लइका सियान जाड़ म ठिठुरत काँपय संझा बिहनिया जम्मो जुरमिल भुर्री बार के तापय।। कुहरा निकलय मुहुँ डहर ले, नहाय बर मन ढेरियाय उठत बिहनियाँ सुरुज के अगोरा घाम ह बने सुहाय।। तिवरा भाजी, राहेर के बटकर सबो के मन ल भाय चिरपोटी पताल के चटनी संग अंगाकर गजब मिठाय।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित क...
बदलते युग का शोर
कविता

बदलते युग का शोर

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** आधुनिक युग नया दौर चहुँऔर मचा खूब शोर, कहीं तारीफ का बजता ढोल बिगुल कहीं नजरअंदाज करने में है गुल, तकरार आमने आमने पुरजोर घमासान जंग में दुर्बल को मिटाने में प्रतियोगिता में मचा शोर, भारी भरकम मची दौड़ मेहनत पर फेरकर पानी करने को लगाते जोर मजबूत साख मिटाने में लगाए जोर करते कमजोर, बदलते आधुनिक युग में बस मचाते बस, यही शोर बदलते समय यही सोच में, बदले बोलने के व्यवहार संग इंसान अब इंसान से प्रश्न पूछने और सोचने को कहाँ है संस्कार संस्कृति उच्च विचार, सोचता इंसान क्या करूँ, कैसे करूँ नम नेत्र से एकांत बैठे बदलते आधुनिक युग में भीतरघात की वेदनाओं में, सच्चाई बताने में कमजोर सौहार्द समन्वय भाईचारे में पतन की डोर जाने कितनी हो रही बदलते युग मे कमजोर परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (अस...
जानकारी जरूरी है
कविता

जानकारी जरूरी है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** किसी और शहर जाने के लिए एक खास नाम का बस विनय था, जिसके आने जाने का समय तय था, मुझे इंतजार में कुछ वक्त बिताना था, मैं सामने बैठे बुजुर्ग के पास आया, नमस्ते करते हुए बतियाया, अंकल जी अपना हालचाल बताइए, कुछ अच्छी बात सुनाइए, तब वह अनवरत बोलता रहा, बीच बीच कभी गुस्सा और प्यार से डोलता रहा, उन्होंने बुद्ध के बारे में विस्तार से सु ताया, ज्ञान विज्ञान के उनके मार्ग को बताया, कभी कबीर जी के बारे में, कभी रैदास जी के बारे में, कभी गुरू नानक देव जी के बारे में, कभी ज्योतिबा, सावित्रीबाई फुले के बारे में, कभी झलकारी बाईं के बारे में, कभी नारायणा गुरू के बारे में, कभी तिलका मांझी के बारे में, कभी बिरसा मुंडा जी के बारे में, कभी बाबा साहेब के बारे में, तो कभी कांशीराम जी के बारे में बताया, ये स...
बासंती दौर
मुक्तक

बासंती दौर

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** सखी ! आज तो भौंरे, कलियों को चूमे। है पराग की चाह, वनों-उपवन में घूमे। मन में लिए उमंग, बसंती हवा चल रही, जिसने पाया मीत, वहीं मस्ती में झूमे।। आया है ऋतुराज, गीत मौसम के गाता। सरसों का उल्लास, आज जन-जन को भाता। वन-उपवन हैं दिव्य, कछारों में है यौवन, मिलन-नेह का भाव, गीत अभिसारी गाता।। कामदेव का ताप, आज बौराया हर इक। अनुबंधों का दौर, पहुँच वासंती मन तक। टूटे संयम बंध, सभी तो हैं अब विचलित, है प्रियवर की चाह, सभी के दिल में धक-धक।। पीत वसन की आभ, सजी है अब अमराई। कोयल ने मादक होकर के, प्रीति जगाई। अब युवाओं की बात, अकेले मात्र नहीं है, ढूंढ रहे हैं मीत वृद्ध भी, हो हरजाई।। हुईं दूरियाँ ख़त्म, वसंती मौसम चहके। परिणय की है बात, मिलन के पल हैं महके। है गृहस्थ की बात, नहीं अब केवल जानो, तोड़ के संयम...
शांत चेहरा
कविता

शांत चेहरा

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शांत चेहरा कभी कमजोर नहीं होता स्थिर चेहरे के पीछे अनकहे तूफान छिपे होते है उनके चेहरों पर कल के संजोए स्वप्न नहीं होते समाज के थपेड़ों से चेहरे की लकीरें गहरी हो जाती हैं ! अश्रु उनके कभी दिखाई नहीं देते सबकी खुशी में वो बस मुस्करा देते हैं उनके खामोश झूले की पेंग बहुत ऊंची होती है दर्द का गीत उनकी धड़कनों में पिरोया होता है! उनकी जिंदगी की किताब का हर एक पन्ना किस्सा होता है किसी पन्ने पर चैन तो किसी पर कठिनाइयों का बसेरा होता है! शांत चेहरा उनकी कमजोरी नहीं होती उनकी ताकत, उनके संयम और दृढ़ता की परिभाषा होती है ऐसे व्यक्तित्व में कोई दिखावा नहीं होता इसीलिये उम्र भार ये चेहरा भीड़ में तन्हा होता है! उनके दिलों के टूटने की आवाज नहीं होती आग का एक दरिया बहता है जिसमें बहुत कु...
हिंदी आत्मा में बस्ती
कविता

हिंदी आत्मा में बस्ती

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** हिंदी आत्मा में बस्ती है, संस्कारों की उजली हस्ती है। माँ की लोरी, पिता का विश्वास, मिट्टी की सोंधी खुशबू-सी पास हर धड़कन में इसकी मस्ती है। यह भाषा केवल शब्द नहीं, यह भावों की निर्मल सरिता है। आँसू बनकर भी चुपके बहती, मुस्कान बन ओठों पर ठहरती हिंदी जीवन की स्वर गीत है। तुलसी की चौपाइयों में धर्म, मीरा के पदों में प्रेम पुकारे। रसखान की भक्ति में डूबी हुई, कबीर की वाणी में सत्य जली हिंदी युग-युग तक पथ रहे भली। यह खेतों की हरियाली बोले, यह श्रमिक के पसीने की गंध। यह पर्वों की थाली सजाए, यह त्याग, तपस्या का संदेश जन-जन की आशा की है कंध। जब तक आत्मा में प्राण बसे, हिंदी का दीप जलता रहेगा। समय बदले, दुनिया बदले, पर संस्कृति का यह अमिट स्वर हृदय-हृदय में पलता रहेगा। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म ...
रात्रि का दृश्य
कविता

रात्रि का दृश्य

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** ओढ़ निशा को चपल चांदनी मन को आकर विचलित करती नीरवता की ध्वनि विकट है दृश्य गगन का अतुल मनोरम तारों की झिलमिल सेना के बीच खड़ा है ये मेरा मन शीतलता सी लिए हवाएं आएं जाएं जुगनू आकर आस-पास राहें चमकाएं तमस ने रंग के नील गगन को श्याम रंग कर डाला और गले में डाल सितारों की उज्जवल सी माला दुग्धमेखला बेणि बनकर नागिन सी लहराए चंद्रकिरण अपनी किरणों से और अधिक चमकाएं जगह जगह पे उमड़े घुमड़े बनकर मानो प्रहरी ये घन तारों की झिलमिल सेना के बीच खड़ा है ये मेरा मन परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया ल...
स्त्री की आवाज
कविता

स्त्री की आवाज

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* तुम पुकारे जा रहे हो और मुझसे पूछते हो कि अजनबी सी ख्वाहिशें क्यों पाल बैठी हूँ? मैं उसी आदमी से चाहत कर बैठी हूँ जो अपने ही शोर में खुद को खो चुका है। न तुम इत्मिनान से बैठ पाते हो, न नींद तुम्हें पूरा अपना मानती है और फिर भी पूछते हो मुझसे कि इस मुख़्तसर सी ज़िंदगी से मैं क्या चाहती हूँ? मैं तो बस इतना चाहती थी कि तुम थक कर किसी शाम मेरे पास बैठ सको, बिना कुछ साबित किए, बिना खुद से लड़े। पर तुम तो अपनी तन्हाई की शाम का भी चराग़ नहीं जला पाए… और अब मुझसे पूछते हो कि मैं हवा जैसी चाहत क्यों लेकर आई हूँ? शायद मेरी गलती यही थी कि मैंने उस आदमी से दिल लगा लिया जो खुद से ही दोस्ती निभा नहीं पाया. परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे ज...
वीर जवान
दोहा

वीर जवान

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** खूनी होली खेलते, भारत के ये लाल। लाल रक्त का है तिलक, चमक रहा हर भाल।। पालो मत आतंक को, करे शांति वह भंग। वार कराता पीठ पर, कुटिल शत्रु का ढंग।। आग जले प्रतिशोध की, उर में मेरे राम। नोंचे बोटी शत्रु की, करते काम तमाम।। सूनी माँ की गोद की, आतंकी शैतान । रहना अब तैयार तुम, होना लहू-लुहान।। रूठ गया सिंदूर है, चूड़ी टूटी हाथ । क्रूर युद्ध परिणाम है, बच्चे हुये अनाथ।। खोलो आज त्रिनेत्र तो, दुखी शंभु संसार । भस्म करो अब शत्रु को, हैं धरती पर भार । भारत का कश्मीर है, बदलो अपने ढंग। मृतक अनगिनत देख कर, काँप रहा है अंग।। भारत प्राण प्रतीक है, आजादी का गान। ध्वजा तिरंगा का करें, भारतवासी मान।। गौरव गाथा गाइए, करते हैं कल्याण। भारत माँ के वीर सब, तजें देश हित प्राण।। परिचय :- मीना...
कभी कभी सोचती हूँ मैं
कविता

कभी कभी सोचती हूँ मैं

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** कभी कभी सोचती हूँ मैं कौन हैं हम, खुद को साबित करने के लिए क्यों बनना चाहते हैं कुछ हम। बाहर से रंगों से भरे हुए तन की सजावट को प्राथमिकता देते हैं हम भले ही भीतर से खोखले हों मगर रंगीन आवरण से ढके हैं हम। शांत चेहरे की मुस्कान काफी नहीं लगती खुद को ओहदे की चमक से संवारना चाहते हैं हम सूकून हमारा क्यों पर्याप्त नहीं सब कुछ पाने की होड़ में लगे हैं हम। मन की शांति कोई धन नहीं प्रकृति ने जो दिया उसका का कोई मोल नहीं अर्थिक धन से तौल रहे रिश्ते क्यों राजगद्दी की दौड़ में शामिल हैं हम। परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार) निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ...
राणा सांगा
कविता

राणा सांगा

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** वीरता की सीढ़ियों पर जन्म से जो चढ़ गए खेलने की उम्र में जो शत्रुओं से भिड़ गए मातृभूमि को जो अपनी लहू से ही सींचते आंख से ही सत्रुओं के प्राण आधे खींचते रक्तरंजित भाल जिसके, कंठ सबके सोखते नख प्रखर वीर महाराणा सांगा वीरता की सीढ़ियों पर जन्म से जो चढ़ गए खेलने की उम्र में जो शत्रुओं से भिड़ गए मातृभूमि को जो अपनी लहू से ही सींचते आंख से ही सत्रुओं के प्राण आधे खींचते रक्तरंजित भाल जिसके, कंठ सबके सोखते प्रखर नख से दुश्मनों कि छातियों को नोंचते जिनके वंशज शोर्य गाथा रक्त से ही गढ़ गए जो झुके नहीं सर भला कटे, धर ही जिनके लड गए बो वीर मेवाडी की जिसने युद्ध सो सो जय किए जिनका हर कण कण धरा का, शोर्य का गायन करे जिनकी गर्जना सुन भागते, दुश्मन भी उल्टे पाव लिए वो राणा सांगा चलते थे, छाती पर अ...
प्रभु कृपा
स्तुति

प्रभु कृपा

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** श्रेष्ठ योनी में भेजा है प्रभु ने तुझे, नाम सुमिरन से सार्थक बनाते चलो। जग के कार्यों के संग, नाम जपते रहो, प्रभु की किरपा का नित लाभ पाते चलो। श्रेष्ठ योनी में ... है मनुजतन तुझे मुक्ति हेतू मिला, जो भी दे शीश धर, कर न कोई गिला। राम का नाम जप, मुक्ति साधन सरल, बस इसे तुम सदा गुनगुनाते चलो। श्रेष्ठ योनी में ... सृष्टि के सृजनकर्ता का बालक है तू, उसने सृष्टि रची, उसका पालक है वो। श्रेष्ठ अवसर मिला, मुक्ति पाने के मित, पग इसी मार्ग पर, नित बढ़ाते चलो। श्रेष्ठ योनी में ... भक्त हनुमानजी राम जप में रमे, करके सेवा बने, रामजी के सगे। तुझको भी मुक्ति पानी इसी जन्म,तो नाम में डूब सबको डुबाते चलो। श्रेष्ठ योनी में ... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित क...
बिखर सा गया हूं मैं…
कविता

बिखर सा गया हूं मैं…

शोभा रानी खूंटी, रांची (झारखंड) ******************** ऐ वक्त तेरी अदाओं को देख... बिखर सा गया हूं मैं.... बहुत याद आती है मुझे.... खुद की.... मुनासिब होगा अगर तू मुझे पहले जैसा कर दे..!! बहुत याद आती है मुझे... वो बचपन के ख्याली पुलाव... वो लड़कपन के हजारों खिलौने... वो अल्हड़ आजादी... वो निश्चल हृदय... वो बेख्याल सा मन... वो सुकून भरी नींद... वो सुनहरी खुशनुमा सुबह... भरी दोपहरी में दोस्तों संग... कच्ची अंबिया चुराना... यारों संग बर्फ के गोलो को... मां से छुपा कर खाना.. वो बारिश के पानी मे... कागज की कश्ती चलाना... वो पूस की ठिठरन में .... अपनो संग आग सेकना... वो सावन के झूले मे... गूंजती हंसी और ठिठोलियां.... वो ख्वाबो का जहँ।... और मुट्ठी भर आसमा... वो बचपन के दिन.... वो इंद्रधनुषी सा सतरंगी समा.... बदलते वक्त के साथ .... खोता हुआ झिलमिलाता सा.... व...