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पद्य

दोष किसे दूँ
कविता

दोष किसे दूँ

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** वही ब्रह्मांड, वही दुनिया, वही मुल्क, वही प्रकृति, वही पर्यावरण, वही आबो-हवा, वही नैतिकता, वही संस्कार, वही जीव-जगत… फिर भी गिरते स्तर के लिए दोष किसे दूँ? मानव, अब मानव नहीं रहा दानव हो चुका है। संस्कार, अब संस्कार नहीं रहे सिर्फ़ दिखावे का आवरण बन चुके हैं। नैतिकता, अब आत्मबोध नहीं दूसरों से की जाने वाली उम्मीद बन गई है। इंसान ढीठ हो चला है, ढिठाई ऐसी कि हर जगह दिखता है “मैं… और सिर्फ़ मैं!” किसी के पास अब हृदय शेष नहीं, जिसे त्यागना चाहिए उसे कसकर पकड़ा जाता है। होड़ मची है- अपने स्तर को सबसे नीचे ले जाने की, और गर्व से दिखाने की। तो कहो… इस पतन के लिए दोष किसे दूँ? परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प...
माँ शारदा वंदन
स्तुति

माँ शारदा वंदन

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** हे शारदे करुणामयी माँ, भक्त को पहचान दो। श्वेतांबरा ममतामयी माँ, श्रीप्रदा हो ध्यान दो।। गूँजे मधुर वाणी जगत में, वल्लकी बजती रहे। कामायनी माँ चंद्रिका सुर, रागिनी सजती रहे।। वागीश्वरी है याचना भी, भक्त का उद्धार हो। विद्या मिले आनंद आए, प्रेम की रसधार हो।। आभार शुभदा है शरण लो, बुद्धि का वरदान दो। उल्लास दो नव आस दो प्रिय, ज्ञान की गंगा बहे। चिंतन मनन हो भारती का, लेखनी चलती रहे।। मैं छंद दोहे गीत लिख दूँ, नव सृजन भंडार हो। आकाश अनुपम गद्य का हो, प्रार्थना स्वीकार हो।। भवतारिणी तम दूर हो सब, नित नवल सम्मान हो। तुम प्रेरणा संवाहिका हो, चेतना संसार की। वासंतिका हो ज्ञान की माँ, पद्य के शृंगार की।। साहित्य में नवचेतना हो, कामना कल्याण भी। संजीवनी हिंदी सुजाता, श्रेष्ठ हो मम प्राण भी।। आलोक प्...
इंतजार
कविता

इंतजार

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** कोयल को इंतजार है सावन की हो फुहार, प्रेमी को इंतजार है प्रियतमा की चाह, एक भक्त को इंतजार है ईश्वर का सानिध्य, शिष्य को इंतजार है गुरु का मिले आशीष, धरती को इंतजार है कब बरसेंगे मेघ, सागर को इंतजार है नदियों का समावेश, एक मोरनी को इंतजार है स्वाति नक्षत्र की एक बूँद। निषाद को इंतजार है श्री राम सा मित्र, शबरी को इंतजार है गुरू का है उपदेश बैर खाये श्री राम प्रभु कई जन्मो का मेल। अहिल्या बैचैन है पाषाण का मिला अभिश्राप प्रभु राम की रज मिले होवे आज उद्वार। केवट को इंतजार है कब नाव चढ़े श्री राम, रावण को इंतजार है योद्धा कौशल राम। जटायू के पर कटे इंतजार हे राम बेटे का सा प्रेम मिला उद्वारक श्री राम, कोसल्या को इंतजार है कब आयेगे मेरे राम। सूनी अयोध्या मै खुशियाँ फिर लौट आयेगी आ...
निस्तब्धता
कविता

निस्तब्धता

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** निस्तब्धता जब बोल न पाए, मन भीतर से टूट जाता है, शब्दों के अभाव में पीड़ा का शोर और गूंज जाता है। खामोशी की चादर ओढ़े, दर्द अकेला सोता है, भीड़ में रहकर भी इंसान खुद से ही रोता है। निस्तब्ध क्षणों में स्मृतियाँ तीखे तीर चलाती हैं, अनकहे सवाल बनकर रातों की नींद चुराती हैं। जहाँ संवाद थम जाए, वहाँ संबंध दम तोड़ते हैं, निस्तब्धता में ही कई अपने पराए हो जाते हैं। खामोशी का बोझ कभी-कभी शब्दों से भारी है, यह भीतर-भीतर जलाती है, पीड़ा इसकी न्यारी है। निस्तब्धता में मन खुद से ही लड़ जाता है, हर मौन क्षण एक नया घाव दे जाता है। बिना आवाज़ की पीड़ा भी गहरी चोट लगाती है, निस्तब्धता अक्सर आत्मा को चुपचाप रुलाती है। जब भावों को मार्ग न मिले, वे आँसू बन बहते हैं, निस्तब्धता में ही कई सपने दम तोड़ते रहते हैं। खा...
अरमानों की पतंगे
कविता

अरमानों की पतंगे

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** अरमानों की डोर से सपनों की पतंग उड़ा लेता हूं। मेरे सपनों की कई आकार, प्रकार की पतंगे। इनमें से अपनी हसरतों को हवा में लहरा लेता हूं। कभी-कभी अपनी मेहनत के कन्ने बांधकर सपनों की पतंग, उड़ा लेता हूं। कभी अरमानों की पतंग ऊपर उड़ती, कभी गोते लगती, कभी ढील पाकर, नीचे आ जाती। हार जीत खुशियों के आलम से, आसमां में उड़ती पतंगो से, एक ही संदेश पाता हूं। हर पतंग उलझी है, एक दूसरे की डोर से। फिर भी कुछ रिश्ते उलझे से, उड़कर भी खुशी से झूम रहे हैं। एक डोरी से इन पतंगों से दिल और नजरे, एक दूसरे पर लगाये बैठे है। आसमां में उड़ती पतंगों से, हर दिल भी पतंग सा बंधा, टक टकी लगाए बैठा है। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्व...
पिता-पुत्र
कविता

पिता-पुत्र

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक पिता अपने नन्हें से पुत्र का पालन पोषण करते उसे स्नान कराते, खाना खिलाते कितना खुश हो रहा है खिलखिलाहट से गूंज रहा है उसका घर-आंगन-आशियाना! नन्हें-नन्हें पांव शैतानियां करते कभी इधर तो कभी उधर इठलाते अद्भुत है प्रेम पिता का अपने पुत्र के प्रति समेटना चाहता है पिता इन अनमोल लम्हों को अपने सीने में ! समय मानो पंख पर लगा कर उड़ता जा रहा है, पिता के बाजुओं में ताकत है, नन्हा बच्चा अपने को सुरक्षित महसूस करता है। समय अपनी गति से चलायमान हो रहा है। वहीं आशियाना, वहीं घर-आंगन है, किन्तु आज पिता के कंधे झुके हुए से है हाथों में कंपकंपाहट है, आज वो पिता चलने से लाचार है, पिता की नजरे झुकी है मानो उनसे कोई गुनाह हुआ हो ! वही पुत्र आज पिता को खिला रहा है किन्तु कोई खिलखिलाहट नहीं, कोई खु...
औचित्य क्या?
कविता

औचित्य क्या?

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** यथार्थ को त्याग, सच्चाई को कुचल, कल्पनाओं को सच बता इतराऊं मचल-मचल, सारे संसार का ज्ञान ठूंस लूं अपने अंदर, पर यकीन करूं हो जाए कोई अलौकिक चमत्कार, तो फिर औचित्य क्या उस ठूंसे हुए ज्ञान का, लदे रहूं हीरे मोतियों से, ढका रहूं नवीन वसनाें से, और रखूं अस्वच्छ तन को, तो औचित्य क्या अथाह धन का, सबको पढ़ाता फिरूं विज्ञान, बटोरूं नित सम्मान, जा जा व्याख्यान दूं विद्यालयों में, महाविद्यालयों में, और अंधा यकीन करूं पाखंडों और अन्धविश्वास पर, तो औचित्य क्या अथाह ज्ञान का, प्रकृति से प्रेम करूं, हर जीव की उपयोगिता समझूं, सिर्फ अपनी सनक खातिर कैद में रखूं तोता, मैना, बुलबुल, तो औचित्य क्या खुले आसमान का, कामना है न बंधूं किसी ऐसे नियम से जो मुझे इंसान न रहने दे, और हां जिसे जो कहना है कहने ...
कलम का शहीद
कविता

कलम का शहीद

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** वो शख्स शब्द बहुत सुंदर लिखता था तन नंगा था ढूंढने कपड़े सड़को पर निकला था लेखनी उसकी चलती तो ज्वाला उगला करती थी आग भूख से पेट में उसकी सदा जला करती थी शब्दों में उसके भावनाएं बारिश की बूंदों सी बहती थी आंखों से अश्रु की धारा कहानी जुदा जुदा कहती थी दुनिया की चकाचौंध के अद्भुत सुख सदा लिखता था बिन छत की कुटिया से उन्मुख मुख लदा दिखता था शहरों की सड़कों सी सर्पिल कलम नहीं रुकती थी घिसती हाथों की लकीरें होनी में उसके भी चुभती थी भूमिहर भी बरसातों में बो बीज फसल उगाया करता था कागज के खेतों में बो शब्दों को अलख जगाया करता था देश की खातिर सीमाओं पर सैनिक जान दिया करता था वो फकीर समाज में अपनी स्याही से ज्ञान दिया भरता था भूमि न बंदूक रही हाथों में उसके शब्द प्रहार करता था पाखंड आडम्बर से लड़कर रिवाज ...
इस चांदनी रात की चादर में
कविता

इस चांदनी रात की चादर में

शोभा रानी खूंटी, रांची (झारखंड) ******************** कुछ बर्फ सी बिखरने लगती है... इस चांदनी रात की चादर में.... एक ख्वाब सा लगने लगता है.. यह लाल रंग सा इश्क लिए... मन शोर शराबा करता है ... फिर एक खामोशी सी छा जाती है... कैसे बताऊं ए ग़ालिब तुझे मैं... तन्हाइयो मैं खामोशी जान ले जाती है.... कुछ बर्फ सी बिखरने लगती है... इस चांदनी रात की चादर में... वह मेरा ख्वाब उलझता जाता है.. फिर यह इश्क बिखर सा जाता है... ओस की इन बूंदों के तले ....... वह पत्थर सा जम जाता है .... फिर से पिघल के बहने को..... उस भोर की सुनहरी रोशनी में... कुछ बर्फ सी बिखरने लगती है... इस चांदनी रात की चादर में... फिर खामोशी से निंदिया में ... तेरा अक्स कुछ कह जाता है... चुरा के फिर मेरी नींदों को... पलकों को सहलाता है... दर्द भी यही मेरा मर्ज भी यह... कुछ बर्फ सी बिखरने लगती है... इस चांद...
भारत मां से पंचतत्व ले
कविता

भारत मां से पंचतत्व ले

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** भारत मां से पंचतत्व ले, ईश्वर ने है हमें बनाया। इसीलिए भारत मां है, सब संतों ने है यही बताया। भारत मां से... मां की सेवा, रक्षा करना, सर्वोत्तम कर्तव्य हमारा। भारत भूमि ने ही अबतक, सात्विक पोषण किया हमारा। जो दायित्व दिया ईश्वर ने, उसने ही है पूर्ण कराया। भारत मां से... जो अर्पित सीमा रक्षा को, उनको प्रति पल नमन हमारा। उनको भी है नमन, जिन्होंने, राष्ट्र पे अपना सब कुछ वारा। जो विकास का लक्ष्य ले चले, अखिल विश्व में मान बढ़ाया। भारत मां से ... जो भी जहां दे रहा सेवा, सर्वोत्तम का लक्ष्य बना ले। सब कुछ दिया देश ने हमको, निष्ठा से वो कर्ज चुका ले। जो निष्काम लगा सेवा में, उसने सबका प्यार है पाया। भारत मां से... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमा...
धन्य धरा ये भारती
दोहा

धन्य धरा ये भारती

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** धन्य धरा ये भारती, भारत देश महान। स्वर्गिक सुख की खान है, करे विश्व सम्मान।। मुकुट हिमालय देश का, सागर छूता पाँव। पावन गंगा बह रही, है खुशियों की मृदु छाँव।। माटी चंदन देश की, रत्नों की है खान। बरसे कंचन मेघ से, हिन्द है कृषि प्रधान।। मानवता ही धर्म है, समरसता पहचान। सत्य अहिंसा हिन्द की, सकल विश्व प्रतिमान।। राम श्याम से बहुगुणा, अवतारित बलवीर गौरव गाथा गा रहे, मोहक है तस्वीर।। लक्ष्मी अरु दुर्गावती, शासक हुईं महान। दीप शिखा बन देश पर, प्राण किये बलिदान।। गाते गाथा शौर्य की, फौलादी है शान। करते जय वीरांगना, देश करे अभिमान। वीर शहीदों की धरा, गौरवमय इतिहास। बोस तिलक की भूमि का, होता नित्य विकास।। प्रहरी सीमा पर खड़े, रक्षक हैं वो वीर। रखवाली करते सदा, होते नहीं अधीर।। संस्कृति...
सरस्वती वन्दना : पञ्चचामर छ्न्द
छंद

सरस्वती वन्दना : पञ्चचामर छ्न्द

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** पञ्चचामर छ्न्द तुम्हें करूँ प्रणाम आठ याम मैं सुहासिनी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी। विमोहिनी सुतान छेड़ दो कि जो सुधा बने। नया-भावयुक्त गीत, छन्द प्रेम से सने ।। हरो समाज के विकार, शीघ्र कष्ट नाशिनी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी।। रुके न लेखनी कभी कृपा मनाक कीजिए। समाज में सप्रेम मान हो प्रसाद दीजिए। मिले अपार प्यार नित्य वेदहस्त- धारिणी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी । सरस्वती, कृपा सदैव दिव्य ज्ञान की करो।। तुम्हीं दयालु कोष, वर्ण, शब्द, भाव से भरो। उबार दीजिए हमें सनेह नाव-तारिणी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी।। अपार शक्ति दो समाज के विकास के लिए। दरिद्र-दीन के सहाय के लिए सदा जिए। रखो विशुद्ध भाव युक्त मर्म ज्ञान दायिनी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी।। प...
गणतंत्र का नया व्याकरण
कविता

गणतंत्र का नया व्याकरण

अभिषेक मिश्रा चकिया, बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** न मैं शब्दों का सौदागर, न मैं कोई नेता हूँ, मैं सदियों की ख़ामोशी का, गहरा सन्नाटा हूँ। मैं वो पन्ना हूँ संविधान का, जो अब तक अधूरा है, मैं वो सपना हूँ आज़ादी का, जो न आधा न पूरा है। तुम जश्न मनाते ऊँचाई पर, मैं नींव की ईंटें ढोता हूँ, तुम फहराते हो झंडा, मैं उम्मीदें लेकर बोता हूँ। गणतंत्र तभी गरजेगा जब, कोई द्वार अंधेरे में न हो, इन्साफ़ की पावन राहों में, कोई रुकावट घेरे में न हो। अब इतिहास के बासी पन्नों पर, मैं स्याही नहीं बहाऊँगा, मैं वर्तमान की मुट्ठी में, अपना भविष्य सजाऊँगा। यही भविष्य अब भारत की, नई परिभाषा लिखेगा, नभ की हर एक ऊँचाई पर, अब मेरा तिरंगा दिखेगा! मेरा तिरंगा अब सिर्फ़ अम्बर का, शृंगार नहीं कहलाता, ये महाशक्ति बन चुके भारत का, 'विजय-पत्र' है कहलाता। केसरिया अब शौर्य की सीमा, तोड़ आगे बढ़ ...
रवि किरण
कविता

रवि किरण

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कोहरे की धुंध मे अलसाई रवि किरण खोज रही धरा पर टिकने के लिए ठौर तभी, हां, तभी उसकी चमक से ओस बून्द दुर्वाकुंर पर चमक उठी ओस बून्द बोली आओ सखी हम साथ, साथ खेले। दुर्वाकुर कुछ कहता उसके पूर्व ओस बून्द लुढक गई धरा पर और, हा, रविकिरण ने अपना ठौर पा लिया घना कोहरा, और घना हो रवि को ढंक रहा था। तभी, मकर राशि मे रवि के प्रवेश पर कोहरे ने करवट ली वह रवि का ताप सहन करने का साहस नही कर पाया जगत मे जीवन अस्त-व्यस्त था रवि के प्रकाश ने सर्वस्व को जीवन दान देकर अपना कर्तव्य जन कल्याण के लिए पूर्ण किया परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आ...
रिश्तों की अहमियत क्या है
कविता

रिश्तों की अहमियत क्या है

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** रिश्ते क्या है...? और, इनकी अहमियत क्या है..? रिश्तों में अहसास होता है यथार्थ का अनुभूति होती है अनुभव की प्रतीति होती है प्रेम की संवेदन होते हैं सेवा के.... रिश्तों में आवेग होता है प्रीत का उन्माद होता है सुश्रुषा का आशा होती है कर्म की अभिलाषा होती है अपनत्व की.. मगर.... रिश्ते खड़े हैं निजी महत्वाकांक्षा के सहारे आधार होता है अर्थ का सोच मिली होती है स्वार्थ की आवरण अवश्य है अपनेपन का... रिश्तों में तपिश है ईर्ष्या की ज्वालामुखी है प्रतिशोध का प्रकंपन है अविश्वास का संवाद है वर्चस्व का..... रिश्तों में रिसता है छद्म अपनेपन का विरोध खड़ा अपनों से अपनों का अजीब सा अंत होता है सपनों का अनुबंध है मिथ्या कथनों का.. ऐसे में.. अतीत भूल रहे हैं वर्तमान भटक रहा है भविष्य अ...
तुम जरूर आओगी
कविता

तुम जरूर आओगी

आनन्द कुमार "आनन्दम्" कुशहर, शिवहर, (बिहार) ******************** तुम आओगी जरूर आओगी थोड़ी देर ही सही मगर आओगी आकर मेरे पास बैठोगी बैठ कर वेवज़ह की बातें करोगी जो होना था हो गया यह सब ईश्वर की ईच्छा हैं मानकर जल्दी से लौटकर अपने कार्यों में व्यस्त हो जाओगी तुम आओगी जरूर आओगी थोड़ी देर ही सही मगर आओगी मेरे गुज़र जाने के बाद! परिचय :- आनन्द कुमार "आनन्दम्" निवासी : कुशहर, शिवहर, (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
रानी पद्मनी
कविता

रानी पद्मनी

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** सजी रानियां दुल्हन सी, मृत्यु को अमर बनाने गुहिल वंश की आभा से, खिलजी के होश उड़ाने राजपूतानी तेवर ले, अंबर को आंख दिखाने बढ़ चलीं रानियां एक साथ, मिट्टी का कर्ज चुकाने मातृभूमि के जयकारे के, साथ किया उदघोष बढ़ीं गर्व से आगे को, भरकर छत्राणी जोश चलीं सिंहनी गाते गाते, जय-जय मात भवानी और धधकते अग्नि कुंड में, कूद पड़ी क्षत्राणि किया समर्पित अग्निदेव को, कंचन रूप निराला नतमस्तक धरती का कण-कण, नतमस्तक अग्नि ज्वाला इतिहास अमर कर माताएं, बलिदानी गाथा बना गईं सोलह हजार चित्तौड़ की सतियां, अग्नि कुंड में समां गईं उड़ी महकती भस्म कुंड से, चित्तौड़ी मिट्टी चमकाने बलिदानों की पावन भूमि को, राजस्थान बताने परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती...
सुरता करन वीर जवान ल
आंचलिक बोली

सुरता करन वीर जवान ल

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) आजादी के खातिर जेन, दे दीस अपन पऱान ल.! आवव संगी सुरता करन, ऐसन वीर जवान ल..!! घर दुवार ला छोड़, भारत भुइयाँ के गुन गाथे..! सरदी, गरमी, बरसा सहिके, दुसमन ल मार भगाथे..!! भारत भुइयाँ के माटी म, आँच नइ आंवन देवय! गोली खाथे छाती म, तिरंगा ल झुकन नइ देवय!! दाई ददा के इकलौता बेटा, देस के काम आइस हे.! आजादी बर लड़िस लड़ाई, अपन लहूँ बोहाइस हे!! लहूँ देके जेन हर अपन, भुइयाँ के मान बढ़ाइस हे! अंग्रेज मन ल धुररा चटाके, देस आजाद कराइस हे! आजादी के लड़ाई म संगी, कतको मुढ़ी कटाइस हे तभे जाके भारत भुइयां, आजाद भारत कहलाइस हे परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है क...
सज रही अवध नगरी
कविता

सज रही अवध नगरी

मोहिनी गुप्ता राजगढ़, ब्यावरा (मध्य प्रदेश) ******************** सज रही अवध नगरी, झिलमिलाती सरयू तीर। आ रही अब शुभ घड़ी, नैना बहाये अब नीर। उत्सुकता अपार हुई, चंचल मन धरे न धीर। स्वागत को रह- रह हुआ, जाए तन-मन अधीर। घर-आँगन, हर चौखट पर, प्रज्जवलित मन के दीप। भक्ति की रंगोली संग, सजे आम्र-पत्र द्वार। चुन-चुन पुष्प इन हाथों से, बनाऊँ सुन्दर पुष्पन हार। मेरे आराध्य के स्वागत को, बिसराऊँ मैं तो तन मन। सबके राम सब में राम, राम समाये सभी के मन। परिचय :- मोहिनी गुप्ता माता : पुष्पा गुप्ता पिता : पूनम चन्द गुप्ता जन्म स्थान : कोटा (राजस्थान) निवास : राजगढ़, ब्यावरा (मध्य प्रदेश) शिक्षा : सम्पूर्ण शिक्षा महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर और कोटा विश्वविद्यालय से प्राप्त की। एम.ए. (राजनीति शास्त्र), बी.एड . कोटा विश्वविद्यालय स...
अनकहा इश्क़
कविता

अनकहा इश्क़

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं जानती हूं तुम सब जानते हो फिर ये भ्रम की माया क्यों नहीं पहचानते हो ? जानते हो तुम मेरी मुस्कुराहट की वजह फिर मुस्कुरा औरो से मेरे सीने को क्यों छली करते हो। मैं जानती हूं तुम मेरी फिक्र बहुत करते हो छू न जाए हवा भी मुझे इस बात से भी डरते हो। सुना है तुम जीत लेते हो सब का हृदय फिर मेरी एक मुस्कुराहट के आगे क्यों ख़ुद को हारे हुए बैठे हो ? लिखते हो तुम अपनी गजलों में मेरे बारे में फिर मेरा नाम सरेआम लेने से क्यों डरते हो। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
आओ सिर्फ भारतीय बनें
कविता

आओ सिर्फ भारतीय बनें

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हर तरफ नजर आ रही व्यवस्था चौबंद चाक, अपने ही शहीदों के बलिदान रहे हैं क्यों नाप, बताओ जरा क्या उन सबने दी थी कुर्बानी अपनी जाति, धर्म या सम्प्रदाय के उत्थान खातिर, फिर क्यों बन रहे इन सबके नाम पर शातिर, आत्मबलिदान था केवल अपने देश के लिए, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता और परिवेश के लिए, विदेशों में जा क्या देते हो परिचय अपनी जाति का, अपने मशहूर खानदान और ख्याति का, नहीं वहां कहना पड़ता है खुद को भारतीय, समता,समानता होता है जहां न पूजा न आरती, सम होने के प्रतीक बन हाथ मिलाते हो, रंग रूप को भूलकर सबको गले लगाते हो, फिर लौटकर अपने ही वतन में, भूल वही सभ्यता क्यों आग लगाते हैं चमन में, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, ले विश्वबंधुत्व का मूलमंत्र, कहते हैं कि चलना है केवल शांति की राह, आंतरिक सा...
दृष्टि-दंश
कविता

दृष्टि-दंश

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** प्रश्न कौन करे..? प्रश्नवाचक तो होती हैं इंसानी दृष्टियां किसमें साहस है सत्य सुनने का और... कौन धुरंधर है जो मिथ्या भाषण कर न सके मित्रों..., कुछ तो होते हैं जन्म से दृष्टिहीन संभव है न देख पाते हों वे बाहरी दुनिया मगर... सजग होता है अंतर्मन पूरी समझ होती है अपने निजी स्वार्थ की जैसे थी ऐतिहासिक किरदार धृतराष्ट्र को ... कुछ होते हैं दृष्टिहीन आँखों के होते हुये भी जैस होते हैं वर्तमान में नेता ... पर... प्रलयंकारी होती है वेदनापूर्ण और मर्मांतक आम आदमी के लिए जिसके पास होती है कहने को दृष्टि मगर मूकदृष्टि केवल क्योंकि मुखर होता है अन्याय को सहना हनन होता है नीतियों का चयन होता है अयोग्य का चाहे बहाना कुछ भी हो आरक्षण या फिर सिफारिश ... संस्कार, परंपरा, अनुशासन पथ-प्रदर्...
हरिगीतिका छंद
गीतिका, छंद

हरिगीतिका छंद

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** हरिगीतिका छंद गीतिका छंद मापनी - २२१२ २२१२, २२१२ २२१२ ब्रह्मा सुता मॉं शारदे मम, स्वर सुवासित कीजिए। हिय भाव -पंकज हों सदा मन, प्राण भाषित कीजिए।। संचार आशा का करो हो, दूर पीड़ा अंक से। शुचि शिष्टता ही शीर्ष पर हों, दुष्ट दुर्जन रंक से।। शब्दावली हो भाव भूषित, लेखनी में बास हो। रचती रहूॅं नित छंद नूतन, मातु उर आवास हो। द्युतिमान दे संज्ञान दे हम, मान के पालक बनें। आए शरण में मॉं भवानी, ज्ञान के याचक बनें।। पुष्पित सुमन अलि डोलते हैं, सुभग पीले रंग में। आई धरा मॉं शारदे शुचि, भारती की गंग में।। विनती करूँ कर जोड़ कर माँ, शब्द का शृंगार दे। तेजस्विनी आभामयी मॉं, नित प्रभा संसार दे।। पावन हृदय कमलासिनी मन, भाव निर्मल कीजिए। आनंद हिय बरसे सदा मॉं, वेदना हर लीजिए।। तेजस्विनी, राजेश्वरी माँ,...
वंदे मातरम्
गीत

वंदे मातरम्

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** वंदे मातरम् आज कह दो शान से है जान वंदे मातरम् देश के हर लक्ष्य का संधान वंदे मातरम् देश की मिट्टी है चंदन शीश तुम धारो इसे हमसे जो करवा दे सब बलिदान वंदे मातरम चीर दो दुश्मन को और ग़द्दार को तुम दो सज़ा आज कर दो जंग का ऐलान वंदे मातरम् बाल गंगाधर तिलक का स्वप्न है साकार सब अब हमारे देश का अभिमान वंदेमातरम् याद कर लो तुम शहीदों ने किया उत्सर्ग जो अपनी आज़ादी की है पहचान वंदे मातरम् आप फहराएँ तिरंगा पर्व में गणतंत्र के आइए मिल कर करें जयगान वन्देमातरम् विश्व नतमस्तक हुआ सम्मुख हमारे देश के दे रहा है शक्ति हमको गान वंदेमातरम् परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भ...
बसंत पंचमी
कविता

बसंत पंचमी

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** पीताम्बर ओढ़े धरा आज मुस्काई है, आँगन-आँगन में बसंत की छवि छाई है। कोपलों की हँसी, पत्तों की हरियाली, ऋतुओं की रानी बन आई खुशहाली। वीणा की झंकार में सरस्वती आईं, ज्ञान, कला, वाणी को संग लाईं। अक्षर-अक्षर में दीपक सा उजियारा, अज्ञान तमस से जग को उबारा। सरसों के खेतों में सोना लहराए, भौंरे, तितलियाँ राग नए गुनगुनाएँ। मंद पवन की चंचल-सी तान, जीवन में भर दे नव आशा, नव प्राण। मन के आकाश में रंग घुले पीले, स्वप्न नए हों, संकल्प हों नुकीले। सृजन की धारा बहे अविराम, हर हृदय गाए बसंत का गान। बसंत पंचमी, नव आरंभ की बेला, श्रद्धा, सौंदर्य का मधुर मेला। ज्ञान-पथ पर बढ़ें, लेकर उजास, जीवन बने सुरभित, सार्थक, उल्लास। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य...