भीति … मराठी कविता
माधवी तारे
लंदन
********************
मला वाटते ही कसली भीति,
ना चोरा ची न अंधारा ची,
अथाह साहित्य सागरातूनी
गवसेल कसा मज
सुषमानुकूल शब्द मोती?
वालुकामयी समुद्र किनारी
पाहुनी वेगमयी लाट उसळती,
भय पतनाचे मम नेत्र मिटती.
दुर्गम असे मज
सादा शिंपला नी मोती.
कुशल अशा रचनाकारांना
नवे आव्हान मायमावशी देती
होतं शब्दांची साहित्य निर्मिती
त्यात कशी टिकावी हीच भीति
पणती माझी मिणमिणती…
परिचय :- माधवी तारे
वर्तमान निवास : लंदन
मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु ...






















