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पद्य

नित्य मन को मार कर के
कविता

नित्य मन को मार कर के

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** नित्य मन को मार कर के, और विष पी हम जिये हैं, शूल राहों में बिछे पर, घाव अपनों ने दिये हैं।। टूटती आशा कड़ी सब साँस भी बंधक बनी है। घुट रहा है दम धुँए से, मौत से अपनी ठनी है।। लीलता अजगर दुखों का, वेदना हिय में घनी है। टाट का बिस्तर जला सब, वारुणी जी भर पिये हैं।। उड़ गया है प्रीति-पंछी, छटपटाता है शिकारी। वासना का जाल जकड़ा, कर्म गीता देख हारी।। दाँव पर पत्नी लगाते, बैठ कर पागल जुआरी। है छलावा हर कदम पर, ओंठ दुष्टों ने सिये हैं।। दे रहा है जग चुनौती, रूठती भी है प्रभाती। है अँधेरा भी घनेरा, ये अमावश भी सताती।। तामसी हैं नृत्य करते, रोशनी आँखें चुराती। जूगनू भी करते शरारत, आस के बुझते दिये हैं। दोष किसका है कहें क्या, मौन बैठे हैं सितारे। आसुरी माया बढ़ी है, घात करते हैं सहारे।...
देव भूमि भारत
भजन

देव भूमि भारत

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** स्वर्ग सी सुंदर धरा भारत, अनेकों इसके प्रमाण है देव भूमि भारत माता पर, हम सब को अभिमान है स्वर्ग सी सुंदर … राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध के हुए यहाँ अवतार है सनातन की संस्कृति ही, इसका मुख्य आधार है सही राहों पर चले उसका, होता स्वप्न साकार है देव वाणी गीता का ज्ञान, सब धर्म ग्रंथ का सार है स्वर्ग सी सुंदर … पर्वत राज हिमालय, इस मात्र भूमि की शान है सन्त ,महात्मा तप कर, पाते आध्यात्मिक ज्ञान है हरी भरी वादियों में छुपा, औषधियों का विज्ञान है गंगा, यमुना, सरस्वती नदियों का उद्गम स्थान है स्वर्ग सी सुंदर … वीरों की जननी धरती, गाथा इतिहास में महान है मात्र भूमि की रक्षा में अपने, आहुति किए प्राण है अनेकों धर्म, अनेक भाषा, विशेषता की पहचान है भारत भूमि सारे जगत मे, यह सबसे पुण्य स्थान है स्वर्ग सी सुंद...
कब आओगे नरसिंह
कविता

कब आओगे नरसिंह

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** कब आओगे असुर मारने ऐ प्रभुवर नरसिंह। तुम तो हो इंसाँ के रक्षक नित्य प्रखर नरसिंह। पाप आज बढ़ता ही जाता, झूठ विहँसता है, कब दिखलाओके इन सबको तुम हनकर नरसिंह। अंधकार अब हरसाता है, गंदापन फैला, नहीं बैठना तुम रस्ते में ऐ थककर नरसिंह। आज नारियाँ सिसक रही हैं, पीड़ा बहुत बड़ी, कब दुष्टों को मारोगे तुम अब बढ़कर नरसिंह। दुराचार फैला है बेहद, रोक नहीं कोई, हन जाओ दुष्टों को अब तुम ऐ आकर नरसिंह। धर्म रो रहा, सत्य बिलखता, खंडित नीति यहाँ, बतला दो तुम कब आओगे ऐ प्रभुवर नरसिंह। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जे...
बरखा का उपहार
कविता

बरखा का उपहार

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** मेघों से फिर अंबार भरा, रिमझिम हो रही फुहार। सकल धारा को है मिला, बरखा का यह उपहार। सोंधी माटी की खुशबू, फैल रही है चहुं ओर। जंगल में मंगल हुआ, थिरक रहे अब मोर। सारे बंधन को तोड़कर, नदिया बह रही स्वतंत्र। जल का विराट स्वरूप, दिखता यत्र तत्र सर्वत्र। रीते रीते सब भर गए, खेत और खलिहान। धान बुआई का फिर, शुरू हुआ अभियान। वर्षा की नन्ही बूंदों से, चहुंओर छाई हरियाली, कृषकों के घर आंगन में, फिरसे आई खुशियाली। प्यासी धरती की देखो, अब बुझ गई है प्यास। कुम्हलाए हुए वृक्षों में, फिर आई अब श्वास। दादुर औ पपीहा ने किया, फिर बरखा का आगाज धानी चुनरिया ओढ़कर, निखरी है वसुंधरा आज। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हि...
सांझ
कविता

सांझ

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** इतनी न फूलो सन्ध्या रानी कि तम तुम्हारा ॴचल छीन ले इतना सुनहरापन न बिखेरो कि रात की काली चुनरी में किनारी लगो। इतना न मचलो की मनचलो के दिल मचले इतना न फूलो की अन्धकार घेर ले वो, देखो निलाभ गगन तुम्हे देख रहा है तुम्हारे सुनहरे रुप को पाखियो को लगा जैसे रवि गगन से उतरे हैं धरा पर। * मनचलो से अर्थ है पृकृति प्रेमी। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष...
नकहा इज़हार
कविता

नकहा इज़हार

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हां मैं लिखता हूं सिर्फ लिखने के लिए नहीं अपने जज्बातों के इज़हार के लिए भी हां मैं लिखता हूं हर अल्फ़ाज़ में तुमको मगर कहता नहीं कभी अपने लफ्जों में तुमको हां मैं लिखता हूं अपने हृदय की गहरी अनुभूति के साथ मगर जाता नहीं कभी अपने जज्बातों के आर पार। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें...
कलम न उठाने के कारण
कविता

कलम न उठाने के कारण

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** तुम्हारे सहे हुए उत्पीड़न का दर्द, जो तुमने कभी नहीं लिखा, उसकी सज़ा तुम्हारी औलादें क्यों और कब तक भुगतें? काश! तुमने उसे शब्दों में ढाला होता, दुनिया को उसका चेहरा दिखाया होता, तो शायद अत्याचारी सबक ले चुके होते, फिर बहती गंगा में हाथ न धोते। या तुम्हारी पीड़ा पढ़कर कोई अपना हाथ इतना मजबूत कर चुका होता, कि किसी की हिम्मत न पड़ती वही अत्याचार दोहराने की, जिन्हें न संविधान का भय है, न परवाह जमाने की। हाँ, यह भी संभव था कि तुम्हारे ही रक्त के लोग बदले की राह पर निकल पड़ते, पर तुमने संतोष कर लिया उन्हीं के दिए हुए नामों के आगे गिड़गिड़ाती प्रार्थनाओं से। यह कैसी नज़ीर गढ़ रहे हो इतने विशाल समाज के सामने, कि लोग डर-डरकर जीते रहें, कायर बनकर सब सहते रहें, और पुरखों की तरह अपन...
बेटा
कविता

बेटा

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** बहुत ही अद्भुत और अलौकिक शक्ति है, मन के‌ अनकहे भावों की। बेटा हो या बेटी स्वर की महिमा है, माता -पिता की पुकार बेटा ही कहती। फिर क्यूं बेटी पराई कहलाई, जिसने दोनों परिवारों की शान बढ़ाई। बेटा सदैव ही घर का उजाला रहा है, परवरिश में भी उसका प्रथम अधिकार रहा है। बड़े बुजुर्ग भी बेटे को वंश की बेल कहते हैं, हर जगह पर आगे रखते हैं। धूम-धाम से विवाह किया, गृह लक्ष्मी के रूप में, बहू का गृहप्रवेश किया चार बर्तन घर में हो तो बजते ही है। कुछ बात हो भी जाए, तो सहन करते भी हैं। बेटा जब सक्षम होकर रोब दिखाता है, आंखों में जल भर जाता है। चुपके-चुपके आंखों को पोंछ लेते हैं, पर सभी के सामने, हंसकर रहते हैं। एक दिन बेटा भी चुपके-चुपके ले जाता है, वृद्ध आश्रम में छोड़कर आ जाता है। आपको यहां अप...
सहयात्री
कविता

सहयात्री

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** बस, रेल, टेक्सी और हवाई जहाज गूंजती चहुंओर, यात्रियों की आवाज, हर तरफ खचाखच भीड़-भाड़, बेशुमार करते जल्दबाजी यात्री, हो जाते सवार स्टेशन, बस अड्डे, हल्ला-गुल्ला और शोर निर्धारित स्थान में पहुंचने की लगती होड़, हाथ में, तो कंधे में ले कीमती सामान दौड़-भाग में घिर, यात्रा बनाते आसान अकेले में, समूह में, सपरिवार संग, कोई बेसहारा, कोई असहाय निर्धन, यात्रा करते करते, जीत लेते यात्री मन मेल-मिलाप कर लेते यात्री खूब व्यापक दुःख-दर्द छँटकर खुशी बढ़ती व्यापक बातों ही बातों में दूर हो जाता, संकोच मनोबल बढ़ता शर्म खुलती निसंकोच बढ़ती यात्रियों में दुगनी नई उमंग सोच यात्री बन जाता घुलमिलकर सहयात्री लम्बी यात्रा का आनंद उठाते सहयात्री खुशनुमा आंनद भरा गहरा आनन्द पाते एक दूसरे बनते पूरक, घनिष्ठता बढ़ाते सहयात्री का सुहा...
मनखे हो के मनखे बर
आंचलिक बोली, कविता

मनखे हो के मनखे बर

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) मनखे हो के मनखे बर, तँय काबर मरत हस बिन तेल अउ बाती के, तँय काबर जरत हस हाँसत गावत बिता ले, तँय अपन जिंनगी ला पर के जिनगी मा, झोझा काबर परत हस !! कुछु खाय चाहे कुछु पहिरे, तोला का करना हे झूठ लबारी चारी चुगली, तोला दूरिहा रहना हे सुवारथ के चक्कर मा, तँय काबर फाँसत हस काकरो दुख दरद ल देख, काबर हाँसत हस !! मनखे जनम पाय हस, सुग्घर करम करना हे चार दिन के जिनगी, तहन सबो ला मरना हे दूसर के महल अटारी देख, काबर मरत हस मेहिनत बिना, फर के आस, काबर करत हस !! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर र...
योग अपनाओ, रोग भगाओ
गीत

योग अपनाओ, रोग भगाओ

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** योग अपनाओ, रोग भगाओ, जीवन को तुम महकाओ, तन को साजो, मन को माजो, खुशियाँ तुम अपनाओ। योग भगाए रोग... योग भगाए रोग... सुबह-सवेरे जब तुम उठना, ताजी हवा में श्वास तो भरना, 'सूर्य-नमस्कार' से दिन की शुरुआत तुम करना। आलस त्यागो, शक्ति जागो, योग पथ पर चल जाओ, योग भगाए रोग... प्राणायाम की शक्ति न्यारी, दूर हो व्याधि सारी, बीमारी अब हार मान ले, होगी जीत तुम्हारी। ध्यान लगाओ, मन को सजाओ, अंतर्मन में मुस्कुराओ, योग भगाए रोग... स्वस्थ काया, सात्विक माया, योग ही सबसे सच्चा, बुजुर्ग हो या युवा यहाँ पर, योग करे हर बच्चा। जग को जगाओ, सबको बताओ, योग की अलख जगाओ, योग भगाए रोग... योग भगाए रोग, जीवन को तुम महकाओ! परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "नोहरी" पिताजी का नाम : ...
दोस्ती
कविता

दोस्ती

कामता साहू भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** एक दोस्त है मेरा शांत, धीर, सिंधु सा व्यवहार में प्रखरता जैसे चमक हो किरणे पड़ती नीर की कर्तव्य, प्रेम, और परिश्रम के रस से भरा एक दोस्त है मेरा ।। प्यार से खुशियों की एक् कली खिलाता अपनी भरपुर मेहनत से भूमि को लहलहाता, हर्षाता एक दोस्त है मेरा ।। मीठी लगी जिसकी प्यारी दोस्ती चख के देखी अभी है वो मिसरी सी डली एक दोस्त है मेरा ।। परिचय :- कामता साहू (शिक्षक) निवासी : भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) सम्प्रति : शिक्षक घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी म...
आशीष
दोहा

आशीष

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** आज कौन अब दे रहा, आप बताओ भाव। सबको अब आशीष भी, लगता जैसे घाव।। मातु-पिता आशीष लो, गुरुजनों के साथ। तभी हमारे शीश पर, समझो ईश्वर हाथ।। जैसी करनी हम करें, वैसा पाते रोज। कलयुग में आशीष की, करें स्वार्थ की खोज।। छलछंदो की आड़ में, आशीषों पर वार। समय साथ अब खो रहा, हम सबका संस्कार।। मीठे बोल की आड़ में, कपट छिपाकर लोग। देते हैं आशीष भी, मन में शापित रोग।। चाह रहे आशीष हैं, मम प्रियवर यमराज। कहते हैं प्रभु दीजिए, बने हमारा काज।। परिचय :- सुधीर श्रीवास्तव जन्मतिथि : ०१/०७/१९६९ शिक्षा : स्नातक, आई.टी.आई., पत्रकारिता प्रशिक्षण (पत्राचार) पिता : स्व.श्री ज्ञानप्रकाश श्रीवास्तव माता : स्व.विमला देवी धर्मपत्नी : अंजू श्रीवास्तव पुत्री : संस्कृति, गरिमा संप्रति : निजी कार्य विशेष : अधीक्षक (द...
दिव्या अनुराग
कविता

दिव्या अनुराग

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** जन्म जमांतर की मेरी अतृप्त इच्छाएं मुझे छूने लगी है। देख कर तुमको मुझ में प्रेम जिज्ञासा फिर उत्पन्न होने लगी है। तुम्हारे अस्पर्श अहसास मेरे सहस्रार को जागृत करने लगे है। न चाहते हुए भी मेरे अनाहत में तुम्हारे स्वर को गूंजने लगे हैं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak1...
जवाब एक विकृत मानसिकता को
कविता

जवाब एक विकृत मानसिकता को

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मत भूल, नारी केवल घर की नहीं, समाज और सभ्यता के सम्मान की पहचान होती है, संस्कारों की धड़कन, परिवार की मुस्कान होती है। पर तू तो जाति के मद में डूबा हुआ, अपने ही बनाए दायरों में कैद खड़ा है, मानवता से कोसों दूर, अहंकार के शिखर पर चढ़ा है। सोचता हूं, तू अपनी माँ, बहन, बेटियों को किस दृष्टि से देखता होगा, क्या अब भी उन्हें पुरानी जंजीरों में ही बांधता होगा? तेरी पीड़ा का कारण यही है कि जिन्हें तुमने सदियों तक पायदान से अधिक नहीं समझा, उन्हीं में से एक बेटी ने जन-जन के विश्वास का मुकाम रचा। संविधान की राह पर चलकर न्याय और प्रशासन का मान बढ़ाया, समाज के हर वर्ग को साथ लेकर समानता का दीप जलाया। लेकिन जाति के संकरे नालों में पलने वाले खुले आकाश का अर्थ कहाँ जानेंगे, स्वयं को विश्लेषक क...
एक भूखा प्यासा मजदूर
कविता

एक भूखा प्यासा मजदूर

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** कामकाज में चतुर दक्ष एक भूखा प्यासा मजदूर निकला उपार्जन की तलाश में, सुबह से शाम तक घूमता फिरता रोजगार और काम की तलाश में, बस खड़ा चौराहे पर अपने औजार हथियार संग निरखकर कह रहा अंर्तमन में भूख से कराहता, बोला खुद से, भूखे पेट निकला हूँ मजदूरी करूं, उपार्जन करूँ बैचैन भूख से हूँ, सिर में चक्कर फिर भी काम के चक्कर में विश्राम कैसे करूँ, काम के तलाश में अडिग खड़ा हूँ, मिल जाये मेहनत की मजदूरी बस निकला हूँ भुख मिटा दूं,सबकी निकला हूँ काम से,घर घर काम करूं उपार्जन करूँ परिवार का पेट भरूँ खून पसीना बहाकर, दिनभर की थकावट में काम करूँ, भूखे बिलखते पीड़ित बच्चों का दुःख दर्द बस, दूर करूँ अचानक मजदूर की, दुर्दशा को देख स्वार्थी पूछकर, कहने लगा आधे पैसे ले लो, मजदूरी आधी ले लो निबटा दो समूचा काम, भूख त...
चलने को चलता हूँ
कविता

चलने को चलता हूँ

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** चलने को चलता हूँ, मगर धीरे-धीरे चलता हूँ। मंजिल की जल्दी नहीं मुझे, रास्तों को पढ़ता चलता हूँ। हर मोड़ पर रुक कर मैं, खुशबू को महसूस करता हूँ। पत्थरों की खुरदरी सतह को, छूकर मैं मुस्कुराता हूँ। दुनिया की इस दौड़-धूप में, मैं अपनी लय में जीता हूँ। थकान के गहरे साये में भी, सुख की बूँदें पीता हूँ। तेज़ चलने वाले निकल गए आगे, मैं पीछे रहकर ही सही, हर पल की सुंदरता को, अपनी आँखों में भरता हूँ। चलने को चलता हूँ, मगर धीरे-धीरे चलता हूँ। परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "नोहरी" पिताजी का नाम : श्री भानीराम सिहाग माताजी का नाम : कांता देवी अर्धांगिनी का नाम : माया देवी जन्म दिनांक : १३/०७/१९९१ सम्प्रति : शिक्षक शिक्षा : दो बार स्नातकोत्तर, बीएड निवासी : गोरखाना तहस...
बात थोड़ी आपकी
ग़ज़ल

बात थोड़ी आपकी

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** बात थोड़ी आपकी भाती तो है। कुछ कवायद सच नज़र आती तो है। क्या हुआ वो पेड़ जिस पर फल नहीं, बैठकर कोयल वहाँ गाती तो है। इस शहर से उस शहर को जोड़ने, गाँव से होकर सड़क जाती तो है। चाहतों का हो न हो चाहे असर, देर मेंहदी रंग दिखलाती तो है। हो भले ही चाँद बादल में छुपा, आसमाँ पर रोशनी छाती तो है। लाख उसको भूलने की सोच लें, वो अदा फिर सामने आती तो है। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास : अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति : शिक्षक प्रकाशन : देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान : साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपन...
मानव और दानव
दोहा

मानव और दानव

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मानव दानव क्यों बने, सोचें सब यह बात। जगमग दिन खिलता रहे, कभी न हो फिर रात।। मानव मानव ही रहे, रीति-नीति हों संग। क्योंकर दानव बन मनुज, करे स्वयं से जंग।। मानव के तो संग हों, मानव के गुणधर्म। सदा सोच पावन रहे, मानव से ही कर्म।। दानव बनना पाप है, बहुत बड़ा अभिशाप। मानव मानव बन गहे, सदा मनुज का ताप।। मानव मानव-सा रहा, किंचित बने न क्रूर। यही कामना हो मनुज, दानवता से दूर।। मानव दानव क्यों बने, क्योंकर हो अवसान।। मानव करुणा धार ले, तो निश्चित उत्थान।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय प्रकाशि...
एक सैनिक का प्रेम
कविता

एक सैनिक का प्रेम

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* हाथों में यह कलम ना होती, निकलते न ये भाव, आंखें कभी ना रोती तन्हाई हमें यूं न चुभती यदि तुम मेरे पास होती आने वाला पल याद तुम्हारी लाता है जाने वाला पर टीस पीछे छोड़ जाता है जितना चाहा तुम्हें भूलना उतना ही तुम याद आती हो तुम्हें याद करने की जरूरत ना होती यदि तुम मेरे पास होती तुम्हें कुछ लिखना चाहा, जब भी मैंने भावों को शब्दों में ना बांध पाया दिल की आवाज सुन लेती आंखों की जुबान समझ लेती यदि तुम मेरे पास होती बाहों में तुझे ले लूँ, चाह ये बार-बार होती दामन में तेरे, सर रख रोता सिंदूर मांग में तेरी भर देता सोचते-सोचते दिन कितने गुजर गए हालत हमारी यूं ना होती यदि तुम मेरे पास होती।। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी ...
मिला दो राम से हनुमत
भजन

मिला दो राम से हनुमत

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** मिला दो राम से हनुमत, तेरा गुणगान गाएंगे। बताओगे जो भी युक्ति, उसे करके दिखाएंगे। मिला दो राम से हनुमत... प्रभु आराध्य है तेरे, मेरे आराध्य तो तुम हो। कृपा जो राम की पाए, उसे क्या कर दुष्कर हो। तेरी भक्ति फलित होगी, तो प्रभु भक्ति को पाएंगे। मिला दो राम से हनुमत... तुम्ही ने की कृपा सुग्रीव पर, तो राम को पाया। दिया सेवा का अवसर, और उसे भय मुक्त करवाया। तेरी करुणा कृपा से ही, तो दिल मेरा राम आएंगे। मिला दो राम से हनुमत... तेरे स्वामी की सेवा का, जो अवसर मैंने पाया है। तुम्ही से शक्ति लेकर के, उसे मैंने निभाया है। हैं जब तक प्राण तन में, हम तो यह सेवा निभाएंगे। मिला दो राम से हनुमत... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रच...
कंचन मृग छलता है अब भी
गीत

कंचन मृग छलता है अब भी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** कंचन मृग छलता है अब भी, जीवन है संग्राम। उथल-पुथल आती जीवन में, डसती काली रात। जाल फेंकते नित्य शिकारी, देते अपनी घात।। चहक रहे बेताल असुर सब, संकट आठों याम। बजता डंका स्वार्थ निरंतर, महँगा है हर माल। असली बन नकली है बिकता, होता निष्ठुर काल।। पीर हृदय की बढ़ती जाती, तन होता नीलाम। आदमीयत की लाश ढो रहे, अपने काँधे लाद। झूठ बिके बाजारों में अब, छल दम्भी आबाद।। खाल ओढ़ते बेशर्मी की, विद्रोही बदनाम। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सत...
मेरे पिता
कविता

मेरे पिता

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** मेरे लिए आन बान, शान है पिता धरती का साक्षात भगवान है पिता..!! सब रिश्तों का एक मिसाल है पिता अपनों के लिए बनते ढाल है पिता..!! छाले हो पांव में नहीं दिखाते है पिता कंधे पर बैठाकर भी घुमाते है पिता..!! पैरो पर खड़ा होना सिखाते है पिता सही, गलत का राह दिखाते है पिता..!! जिम्मेदारियों का बोझ उठाते है पिता गम सहकर खुद मुसकुराते है पिता..!! अपनो कि हर चाह पूरी करते है पिता दो में से दो रोटी देना जानते है पिता..!! भूखा रहकर बच्चों को खिलाते है पिता जिंदगी जीना बच्चों को सिखाते है पिता..!! डगमगाते कश्ती का खेवनहार है पिता बच्चों के लिए मानो पूरा संसार है पिता..!!! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा य...
डिजिटल रिश्ते
कविता

डिजिटल रिश्ते

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सोशल मीडिया पर आकर रख जाते दिल का हाल, पर जब कोई पूछे रिश्तों का सच, तो चुप हो जाते तत्काल। डिजिटल रिश्तेदार हजारों-लाखों में मिल जाएंगे, मगर अपने ही घर के रिश्ते अक्सर भूखे रह जाएंगे। मन हुआ तो स्टेटस देखा, लाइक किया, इमोजी भेज दिया, औपचारिकता की चादर ओढ़ स्नेह का कर्तव्य पूरा कर लिया। लगाव कब का खत्म हो चुका, बाकी नहीं बचा एक प्रतिशत, भावनाएं अब फाइलों जैसी, रिश्ते बन बैठे हैं डेटा-संचित। घर में कोई शुभ आयोजन हो, निमंत्रण जाए हर द्वार, कुछ लोग बेमन से आएंगे, निभाने भर को व्यवहार। खाया-पीया, सलाहें दीं, व्यवस्था पर टिप्पणी सुनाई, फिर यह कहकर चल देंगे- "घर में बहुत व्यस्तता भाई।" और जो कल तक निखट्टू थे, बदनाम थे जिनके नाम, वही शायद सबसे ज्यादा बताये घर में है अपना काम। रि...
पतझड़ जरूरी हैं
कविता

पतझड़ जरूरी हैं

प्रतिभा दुबे "आशी" ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** नई शाख़ों को आने के लिए, बसंत की बहार में नवीन, कोंपलों को खिलने के लिए...।। पतझड़ अंत नहीं मुक्ति है नवीन संचार के माध्यम से, प्रकृति की संरचना के फिर जीवंत हो उठने के लिए...।। पतझड़ भी ज़रूरी है फिर से बसंत आने के लिए क्योंकि चक्र यही चलता रहेगा मुरझाए मन को खिलाने के लिए...।। रौशनी जरूरी है... अंधकार को मिटाने के लिए जीवन यह क्षण भंगुर मात्र संतुष्टि जरूरी है यहाँ से जाने के लिए...।। तलाश करते रहे सुकून हम तलाशते रहे खुशियाँ मुस्कुराने के लिए ये पतझड़ एहसास दिलाता है एक जिंदगी काफी है मुस्कुराने के लिए...।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे "आशी" (स्वतंत्र लेखिका) निवासी : ग्वालियर (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना...