नित्य मन को मार कर के
मीना भट्ट "सिद्धार्थ"
जबलपुर (मध्य प्रदेश)
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नित्य मन को मार कर के,
और विष पी हम जिये हैं,
शूल राहों में बिछे पर,
घाव अपनों ने दिये हैं।।
टूटती आशा कड़ी सब
साँस भी बंधक बनी है।
घुट रहा है दम धुँए से,
मौत से अपनी ठनी है।।
लीलता अजगर दुखों का,
वेदना हिय में घनी है।
टाट का बिस्तर जला सब,
वारुणी जी भर पिये हैं।।
उड़ गया है प्रीति-पंछी,
छटपटाता है शिकारी।
वासना का जाल जकड़ा,
कर्म गीता देख हारी।।
दाँव पर पत्नी लगाते,
बैठ कर पागल जुआरी।
है छलावा हर कदम पर,
ओंठ दुष्टों ने सिये हैं।।
दे रहा है जग चुनौती,
रूठती भी है प्रभाती।
है अँधेरा भी घनेरा,
ये अमावश भी सताती।।
तामसी हैं नृत्य करते,
रोशनी आँखें चुराती।
जूगनू भी करते शरारत,
आस के बुझते दिये हैं।
दोष किसका है कहें क्या,
मौन बैठे हैं सितारे।
आसुरी माया बढ़ी है,
घात करते हैं सहारे।...

















