खुद से धोखा मत करना (ताटंक)
विजय गुप्ता "मुन्ना"
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
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लक्ष्य भेदना दुष्कर समझें, सब्र साधना ही धरना।
लक्ष्यों के जानो रूप हजार, मनचाहा पहले रखना।
पथ भ्रष्ट जन की अनदेखी, करके तुम आगे बढ़ना।
जब राह चुनी अंतर्मन से, खुद से धोखा मत करना।
सत्य राह में बाधा देने, समक्ष परोक्ष चले आते।
वो कभी आपको भटकाते, सहज रूप में बहकाते।
दिल दिमाग का गोबर होता, शंकाओं में घिर जाते।
लक्ष्य दाल संग भात बैठे, मुसरचंद दूर फेंकना।
पथ भ्रष्ट जन की अनदेखी, करके तुम आगे बढ़ना।
जब राह चुनी अंतर्मन से, खुद से धोखा मत करना।
लक्ष्य साधने की कला याद, छत पे थी घूमती मछली।
नीचे बहते जल में मछली, बिंब आंख में हां कर ली।
देश_देश के वीरों को सब, देख रहे आई मतली।
साध्य साधन साधक कहते, सीख सदा अर्जुन रखना।
पथ भ्रष्ट जन की अनदेखी, करके तुम आगे बढ़ना।
जब राह चुनी अंतर्मन से, खुद से धोखा मत करना।
द्वे...




















