भुखमरी
डॉ. किरन अवस्थी
मिनियापोलिसम (अमेरिका)
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चरम पर कलियुग है
भावनाओं की भुखमरी है
पुरुषार्थ बदल रहा है
ह्रदय की आराजकता,
बिखरी हुई मानसिकता
मानवता को
खाया जा रहा है
लोलुपता की
दृष्टि भी लोलुप है
उदात्तभाव
की भुखमरी है
जिधर देखो उधर
खाया ही जा रहा है
रिश्वत तो आराम से
खाया जा रहा है।
वस्त्र, राशन,
अखबार, इंसान
सबको मिलावट का
रंग खाएं जा रहा है
वासना स्वच्छंद है
पुरुषार्थ निर्बाध, निर्द्वंद्व है
उठते थे हाथ असहाय, दीन,
मातृशक्ति की रक्षा पर
वहीं हाथ उनके भक्षक
नजर ही नजर में गिर गई
मर चुकी है आत्मा
स्त्रीत्व को खाया जा रहा है
पुरुषार्थ का अर्थ बदल रहा है ।
किताबें तो अब पढी नही जातीं
वो भी दीमक खाए जा रहा है
कामना नहीं है वश में
भौतिकता पूर्णतः हावी है
आध्यात्मिकता की भुखमरी है
इंसान इंसान को, इंसान को
घुन खाए जा रहा है
इ...





















