चाहते हैं सब हल निकले
विष्णु दत्त भट्ट
नई दिल्ली
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चाहते हैं सब हल निकले
आज नहीं तो कल निकले।
अहंकार की माया है,
युद्ध भयंकर छाया है।
स्वार्थ साधने की ख़ातिर,
आतंकी अब दल निकले।
हाहाकर है चारों ओर
मारो -मारो का है शोर।
इस खूनी मार-काट का
ना जाने क्या फल निकले?
बच्चे-बूढ़े नर और नारी
संकट सब पर है ये भारी।
जान निरीहों की बन्धु,
ना जाने किस पल निकले?
चारों तरफ़ बस डर ही डर
जीवन काँपे थर, थर, थर।
जान बचाने को अपनी
भागे रक्षक दल निकले।
युद्ध भला किसका करता,
बस जीवन तिल-तिल मरता।
अहंकार तुष्टि की खातिर,
लाशें अब हर पल निकले।
दुष्ट दुष्टता छोड़े ना
मुँह हिंसा से मोड़े ना।
लाशों के बाजार में चाहे
हर हाल दुकां ये चल निकले।
सुनो सत्य ओ तालिबानी!
धरती किस के संग न जानी।
सत्य छोड़ फिर खून बहाने,
बेहूदों के दल निकले।
वैमनस्य अब छोड़ो भी,
स्नेह सूत्र को जोड़ो जी।
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