बचपन की यादें
भूपेंद्र साहू
रमतरा, बालोद (छत्तीसगढ़)
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बस यही
अपनी कहानी थी
न घर की चिंता
न रोटी की परेशानी थी
होंठों में मुस्कान थी
हाथों में बस्ता था
सूकुन के मामले में
वो ज़माना सस्ता था।
समझ न आती थी
हमको दुनिया-दारी
एक तरफ़ थी सारे
संसार की खुशियां
दुसरी तरफ थी
अपनी यारी
मंजिल का कोई
ठिकाना न था
लेकिन सफर बड़ा
आसान था
हम अपनी जिंदगी के
खुद ही मालिक थे,
शाम को सूरज हमारी
इजाज़त से ढलता था
मौसम भी हमारी
मर्ज़ी से अपना
मिजाज़ बदलता था
शर्दियों में गांव के
टीले पर निकलती
धूप सूहानी
या गर्मी में आम के
बगीचे की शैतानी
सावन का महीना भी
हमसे पूछ के बरसता था
सुकुन के मामले में
वो ज़माना सस्ता था
परिचय :- भूपेंद्र साहू
पिता : श्री मोहन सिंह
निवासी : रमतरा, बालोद (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी य...
























