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क्या भूला क्या याद

संजय जैन
मुंबई (महाराष्ट्र)
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हम जिन्हें चाहते है वो
अक्सर हमसे दूर होते है।
जिंदगी याद करें उन्हें जब
वो हकीकत में करीब होते है।।

मोहब्बत कितनी रंगीन है
अपनी आँखो से देखिये।
मोहब्बत कितनी संगीन है
खुद साथ रहकर के देखिये।।

है कोई अपना इस जमाने में
जिसे अपना कह सके हम।
और दर्द जो छुपा है दिलमें
उसे किसी से व्यां कर सके।।

दिलका दर्द छुपाये नहीं छुपता है
आज नहीं तो ये कल दिखता है।
इसलिए आजकल मोहब्बत का भी
जमाने के बाजार में दाम लगता है।।

अब तक यही करता आ रहा था
पर अब उन्होंने साथ छोड़ दिया।
चारो तरफ अंधेरा सा छा गया
जहाँ मैं हूँ वहाँ थोड़ा उजाला है।।

तरस है जब काली घटाये
चारो ओर छा जाती है।
तब अंधेरे में अपनी प्यारी
मेहबूबा चाँद सी दिखती है।।

जब तक चाहत थी उन्हें
तब तक दिल जबा था।
उम्र के डालाव पर आके
वो न जाने क्यों कतराते है।।

दिल तो जबा रहता नहीं
आँख कान और जुबान।
सब बेवफा हो जाते है
और एक दूसरे से भागते है।।

तब वो और उनकी मोहब्बत
हमें एक नई राह दिखती है।
और बीती हुई यादों को
बहती नदी की राह दिखती है।।

जब से इश्क का बुखार चढ़ा है।
तब से किनारे पर जाने का
बिल्कुल मन नहीं करता है।
बस प्यार के सागर में डूबे
रहने का ही दिल करता है।।

न दिल लगता है
न मन लगता है।
बस हर दम तू ही
तू हमें दिखता है।।

परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच (hindirakshak.com) सहित बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती हैं। ये अपनी लेखनी का जौहर कई मंचों पर भी दिखा चुके हैं। इसी के चलते कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा इन्हें सम्मानित किया जा चुका है। आप मुम्बई के नवभारत टाईम्स में ब्लॉग भी लिखने के साथ-साथ मास्टर ऑफ़ कॉमर्स की शैक्षणिक योग्यता रखने वाले संजय जैन कॊ लेख,कविताएं और गीत आदि लिखने का बहुत शौक है, आप लिखने-पढ़ने के ज़रिए सामाजिक गतिविधियों में भी हमेशा सक्रिय रहते हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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