विधाता मेरे
गोविन्द सरावत मीणा "गोविमी"
बमोरी, गुना (मध्यप्रदेश)
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तू ही बता विधाता मेरे,
क्या ऐंसा ही जीवन होगा।।
कुंठित कोख़ आई की होगी
व्यथित बाप का मन होगा।
सोचा नही होगा ख्यालों में,
कि-बेइज्जत यूं ये तन होगा।।
नीर भरे निर्मल नयनों से,
कैसे वो उऋण होगा।
तुही बता विधाता मेरे,
क्या ऐंसा ही जीवन होगा।।
हस-हस सही असह पीड़ा,
संतति सुख की चाह लिए।
सुरभित हों सपनों के सुमन,
लाखों जुवा की वाह लिए।।
दुखा ह्रदय 'मापा' का,
नही पूरा कोई प्रण होगा।
तुही बता विधाता मेरे,
क्या ऐंसा ही जीवन होगा।।
ग़जभर माटी के बंटबारे को,
मापा मुश्किल में डाल दिए।
छीन कमाई खून-पसीने की,
निज, घर से तूने निकाल दिए।।
तेरा भी होगा हस्र बुरा,
तेरे हिस्से भी कफ़न होगा।
तुही बता विधाता मेरे,
क्या ऐंसा ही जीवन होगा।।
मात-पिता से बढ़के भू पर,
नही मूरत भी भगवान की।
जिसने ...



















