नित प्रवाहिनी माँ नर्मदे
प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
मंडला, (मध्य प्रदेश)
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नित प्रवाहिनी नर्मदे, तेरा ताप अपार।
देती है तू जीव को, पुण्यों का उपहार।।
रेवा मैया तू सदा, करती है उपकार।
बनकर के वरदान तू, कर देती भवपार।।
दर्शन तेरे उच्चतम, नीर सुधा का रूप।
शिवतनया हे ! नर्मदे, तू नित खिलती धूप।।
रेवा माता मेकला, पापहारिणी ख़ूब।
नाश करे दुष्कर्म का, बन पूजा की दूब।।
कंकर को शंकर करे, वंदनीय हे! मात।
गहन तिमिर को मारने, लाती रोज़ प्रभात।।
रेवा तेरी वंदना, करता सकल समाज।
जीवनरेखा बन करे, जनजीवन का काज।।
मेकल से उद्भूत हो, बहती सागर-ओर।
तेरी महिमा का कभी, किंचित है नहिं छोर।।
रेवा तू प्राचीनतम्, जग को दे आशीष।
करुणामय तेरी दया, करता उन्नत शीश।।
प्रकट हुई तू इस धरा, हरने हर संताप।
तेरी महिमा को भला, कौन सकेगा माप।।
चुनरी का अर्पण तुझे, करे पाप-संहार।
सतत् बहे रेवा ...

























