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पद्य

प्रभु राम से विनती…
भजन

प्रभु राम से विनती…

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** प्रभु राम से विनती......... और कुछ भी नहीं प्रिय लगे राम जी, बस तेरे नाम सुमिरन में है डूबना। कैसे हो पायेगा, ये कठिन कार्य है, इसकी युक्ति भी तुमसे ही है पूछना। और कुछ भी........ मैँ वही बस करूँ जो तुम्हे प्रिय लगे, जो नहीं प्रिय तुम्हे उसको है त्यागना। भूल से कुमारग पे पग में धरूँ, मेरे अंतर से तत्काल तुम टोकना। और कुछ भी....... प्रभु कृपा से है श्रेष्ठ योनि मिली प्रभु के सुमिरन में ही इसे है लगाना, वे दयालु हैं करुणा लुटाते सदा, डूब प्रभु में ही करुणा को है लूटना। और कुछ भी....... सारी सृष्टि प्रभु की वही पालते, बनके बच्चे प्रभु बाहों में झूलना, नाम सेवा में हर साँस मेरी लगे, ह्रे दयानिध है तुमसे यही याचना। और कुछ भी......... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मै...
स्त्री या वेदना
कविता

स्त्री या वेदना

अशोक शर्मा कुशीनगर, (उत्तर प्रदेश) ******************** तुम माँ बहन भार्या हो, जग में खूब सम्मान है। हाँ, तुम वही स्त्री हो, सृष्टिकर्ता तेरी पहचान है। तुमने पुरुषों को जन्म दिया, जो पौरुष दिख लाते है। कभी अदब कभी रौब से, तुम पर हुकुम चलते हैं। तुम अबला बन सहती हो, समाज के जुल्मों सितम। शिक्षा की देवी हो तुम, भावे न तुमको अहम। काली दुर्गा देवी बन, तिहु लोक में पूजी जाती। रणचंडी नारायणी बन, शक्ति स्वरूपा कहलाती। पर कहीं-कहीं भाग्य ने, बेरहम हाथों में थोप दिया। अनचाहे पौधे जैसे, दहेज मरु में रोप दिया। ना समझे जग तेरी पीड़ा, कोख में तू मेरी जाती। कहीं बेरहम कहीं कोठों पर, मर्यादा तार तारी जाती। बन लक्ष्मी मूरत तुम, ममता रूप दिखाती हो। जब बढ़ जाये पाप धरा पर, चामुंडा बन जाती हो। कहीं दरिंदों के हाथों, मर्यादा कुचली जाती है। बन स्त्री रूप जघन्य सहती,...
सुन ले पुकार
कविता

सुन ले पुकार

रुचिता नीमा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हे ईश्वर कहाँ है तू, कहते है कण कण में बसा तू, हर जीव के मन में बसा तू, फिर क्यों नहीं तुझको दिखता, इस जग में कितना आतंक मचा।। चारों और है विध्वंस मचा, मृत्यु का तांडव है रचा, मानवता को ताक में रख, लूटमारी का सब खेल रचा, जो कहलाते है जीवन रक्षक, अब धन के लिये बन रहे भक्षक।। क्या राजनेता सिर्फ अपनी रोटी सकेंगे, निर्धन फिर मृत्यु की बलि चढ़ेगे, कही भूख से, तो कही दुख से, तो कही बेरोजगारी की मार सहेंगे।। हे ईश्वर अब तो कुछ राह दिखा, इस काल को अपना ग्रास बना।। ले अवतार अब ओ तारण हार, इस महामारी से मुक्त करा।। अब बहुत हुआ इसका आतंक तू आकर इसको खत्म कर।। कितने अपनों को लील गया, जग में अनाथ कर छोड़ गया।। अब तू और न विलम्ब कर, सुन ले पुकार, और मदद कर।। जग में फिर से खुशहाली कर। आकर बन्द ये तबाही कर।। ए...
३७० का हटना
कविता

३७० का हटना

अखिलेश राव इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** राष्ट्र विजय पर राष्ट्रद्रोहियों का जहर रास नहीं आया घाटी का शांतिपूर्ण पहर बस करो देश के जयचंदो और गद्दारों कश्मीरी पंडित लौट रहे हैं अपने गांव शहर।। भूल गए ९० में हिंदू का खून बहाया था आशियाना छीन लिया मार मार भगाया था तब तो तुम सबके मुंह पर चुप्पी छायी थी तत्कालीन सरकार ने भी कहर ढाया था काश्मीर की क्यारी में क्यों बो रहे जहर रास नहीं आया घाटी का शांतिपूर्ण पहर।। वातावरण भाईचारे का हरपल तुम्हें खटकता है जिन्ना की औलादों सीने में पाकिस्तान धड़कता है दशकों में खुशियां लौटी है मिलजुल अब मौज करो धारा ३७० का हटना अब भी तुमको खलता है डलझील में उठने लगी है प्रेम की लहर कश्मीरी पंडित लौट रहे हैं अपने गांव शहर।। परिचय :- अखिलेश राव सम्प्रति : सहायक प्राध्यापक हिंदी साहित्य देवी अहिल्या कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय इंदौर...
रोटी के नाम
दोहा

रोटी के नाम

विकास सोलंकी खगड़िया (बिहार) ******************** डिजिटल के इस दौर में, लाख करें अपलोड । गूगल से होता नहीं, रोटी डाउनलोड ।। रोटी मिलती है नहीं, हम मुफलिस को एक । जनम दिवस के नाम पर, काट रहे वो केक ।। होते होते हो गई, रोटी ज्यों ही गोल । तपते ताबे पर चढ़ा, अनगढ़ सा भूगोल।। युद्ध अमन की कामना, जब भी करते खास । दुहराना पड़ता सदा, रोटी का इतिहास ।। देना पड़ता सूर्य को, सच में तब धिक्कार । पा लेता है चाँद जब, रोटी का आकार।। परिचय :-विकास सोलंकी निवासी : खगड़िया (बिहार)) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रक...
झूठ का बोलबाला
कविता

झूठ का बोलबाला

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** बस ये ही तो गड़बड़झाला है तुझे ये सब कहाँ समझ में आने वाला है। तुझे तो सत्यवादी बनने का भूत जो सवार है। अरे मूर्खों ! तुम सब क्यों नहीं समझते? आज के खूबसूरत परिवेश में सत्य का मुँह काला है। उसका कुर्ता मुझसे सफेद क्यों है? यार ! अब तो समझ लो ये सब झूठ का बोलबाला है। खबरदार, होशियार बहुत हो चुका झूठ की जी भरकर बेइज्जती अब और सहन नहीं करूंगा, झूठ का अपमान किया तो मानहानि का केस करूंगा। झूठ के गड़बड़झाले की तो बात भी मत करना, सत्य को तुम चाटते आ रहे हो बचपन से बुढ़ापे तक, क्या मिला तुम ही बता दो आखिर तुमको अब तक। झूठ का गुणगान किया मैने अब तक, तुम खुद ही तो कहते हो तू तो है सिंहासन वाला। परिचय :- सुधीर श्रीवास्तव जन्मतिथि : ०१/०७/१९६९ शिक्षा : स्नातक, आई.टी.आई., पत्रकारिता प...
ज्ञान प्रकाश
कविता

ज्ञान प्रकाश

अनन्या राय पराशर संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश) ******************** मद की ये जो भित्ति है है बान बहुत ख़राब बली के सत्व की बलि चढ़े होय सब कृत्य बर्बाद।। कर्म की कांति से कलि में तू हो जग में तरणि समान बिन आयास न कुल मिले भीति दे अवरोध हजार।। चित्र छोड़ चरित्र का कर तू अब बखान जिससे मानवता बढ़े होवे जग कल्याण ।।। चला गया जो उसे भुलाकर कर आगत सम्मान कर कार्य कटिबध्द हो निज क्षमता पहचान।। कर दुआ मानवता अनुदिन बढ़े हो अनुदिन दानवता नाश मिटे पिचाशी मान्यता फैले ज्ञान प्रकाश, फैले ज्ञान प्रकाश।। परिचय :- अनन्या राय पराशर निवासी : संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशि...
धरती माता
हाइकू

धरती माता

कु. आरती सिरसाट बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) ******************** सुनों धरती माता क्या है कहती आँसू बहाती.... लाशों का बोझ अब ना मैं सहती खफ़ा रहती.... सहनशील धरती माता मत कर प्रलय.... अब तो शवों को गोद में लेने से किया इंकार.... संतान हम तेरी ही है जननी सुरक्षा कर.... परिचय :- कु. आरती सुधाकर सिरसाट निवासी : ग्राम गुलई, बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने...
बाल श्रम
कविता

बाल श्रम

रश्मि लता मिश्रा बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ******************** आज के बालक ही तो हैं देश की कल पहचान। इसीलिए कर्तव्य बने इन पर दीजिए ध्यान। बारह जून को मना रहे दिवस विश्व बाल श्रम निषेध आभासी है रूप चूंकि कोरोना बदले नित वेश ऐसा श्रम जो उम्र से पहले शिक्षा में आड़े आये, या व्यवहारिक तौर पर नुकसान बच्चों का करवाये चौदह वर्ष से कम उम्र में शिक्षा से वंचित कराये या चौदह से अठारह के बीच खतरनाक व्यापार में लगाये सभी बाल संरक्षण अधिनियम के तहत अपराध कहाये। दो हजार दो में विश्व बाल श्रम निषेध दिवस की शुरुवात उद्देश्य अनिवार्य शिक्षा अभियान से बालकों को जोड़ने की बात विश्व मे १५२ करोड़ बच्चे बाल श्रम का शिकार, वैश्विक सरकारें चाहती हैं करना इनका उद्धार पर ये समस्या तो सामाजिक, मानवीय संवेदनाओं का है आधार, अतः गम्भीरतापूर्वक करिये विचार हम कैसे इसमें बन सकते हैं मददगार। ...
डूबते सूरज की रंगत
ग़ज़ल

डूबते सूरज की रंगत

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** डूबते सूरज की रंगत फिर से बहलाने लगी है, पास आकर फिर उदासी ज़ख्म सहलाने लगी है। जाने किनकी और किन गुस्ताखियों का कर्ज़ है, मुस्कुराती ज़िंदगी सब आज कुम्हलाने लगी है। यूं तो हसीं ख्वाब के गुंचे खिले हैं बाग में, देखता हूँ उन सभी की शाम ढल जाने लगी है। मुट्ठियों में तुम हवा को कैद करते रह गये, रूह की ताकत के आगे मौत शरमाने लगी है। फासले का फलसफा तुम मान भी जाओ ‘विवेक’, रफ्ता-रफ्ता ज़िंदगी अब राह पर आने लगी है। परिचय :- विवेक रंजन "विवेक" जन्म -१६ मई १९६३ जबलपुर शिक्षा- एम.एस-सी.रसायन शास्त्र लेखन - १९७९ से अनवरत.... दैनिक समय तथा दैनिक जागरण में रचनायें प्रकाशित होती रही हैं। अभी हाल ही में इनका पहला उपन्यास "गुलमोहर की छाँव" प्रकाशित हुआ है। सम्प्रति - सीमेंट क्वालिटी कंट्रोल कनसलटेंट के रूप में विभिन्न स...
जिंदगी
कविता

जिंदगी

मंजुषा कटलाना झाबुआ (मध्य प्रदेश) ******************** जिंदगी एक सफर, एक सफ़र हैं जिंदगी। कभी इधर, कभी उधर, कँहा जा रही हैं जिंदगी। खुशी ग़म का हेर फ़ेर है, हस्ती रोती है जिंदगी। कभी नोट के पीछे, तो कभी सांसो के लिए भागती है जिंदगी। कभी निडर सी हो जाती, तो कभी बहुत डराती है ये जिंदगी। कभी एक पल आसमान है दिखती, तो कभी जमीन से नाता करवाती है ये जिंदगी। बेगानो को अपना करती, अपनो को बेगाना कर जाती है ये जिंदगी। स्वर्ग के दर्शन है करवाती तो कभी दोजख़ बन जाती है जिंदगी। जिंदगी के रूप कई, कई रंगों की है ये जिंदगी। परिचय :- मंजुषा कटलाना निवासी : झाबुआ (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्र...
आत्म विश्वास
कविता

आत्म विश्वास

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** मुसीबत का पहाड़, कितना भी बड़ा हो। पर मन का यकीन, उसे भेद देता है। मुसीबतों के पहाड़ों को, ढह देता है। और अपने कर्म पर, जो भरोसा रखता है।। सांसारिक उलझनों में, उलझा रहने वाला इंसान। यदि कर्म प्रधान है तो, हर जंग जीत जायेगा। और हर परस्थितियों से बाहर निकल आएगा।। लिखता है कहानियाँ, सफलता की इंसान। गिरा देता है पहाड़ो को, अपने आत्म विश्वाव से। और यही से निकलता, बहुमूल्य हीरा को। और यह काम इंसान ही अपने बूते पर करता है।। रखो यकीन अपने, आत्मबल पर तुम। यकीन से में कहता हूं, बदल जाएगी तेरी किस्मत। न हो यकीन अगर तुमको, तो कुछ करके काम देखो, सफलता चूमेगी तेरे कदमो को।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मै...
कलम से प्रहार कर
कविता

कलम से प्रहार कर

राधेश्याम गोयल "श्याम" कोदरिया महू (म.प्र.) ******************** साहित्य के सम्रांगण में कलम से तू वार कर, भारत के नव प्रांगण में शिक्षा का तू प्रचार कर। हे चाणक्य के वंशज न डर कर न हार कर, देशद्रोही कंटको पर कलम से तू वार कर। सत्य की मशाल से अज्ञान तम को दे मिटा, तेज आंधी तूफ़ान में तू कदम न पीछे हटा चूम ही लेगी सफलता एक दिन तेरे कदम, स्वाभिमान को रख बचा व्यक्तित्व को संवार कर सीमा पर सैनिक अड़े है राष्ट्र रक्षा के लिए, दुश्मनों से हर पल लड़े है राष्ट्र रक्षा के लिए। ऐसे में गद्दार कोई गोपनीयता बेचकर, दो कलम से मौत उसको और चड़ा दो दार पर। कलम के सिफाही हो कलम कभी न बेचना, जुल्म के आगे झुके न, हो सर कलम न सोचना। बिक गई गर लेखनी, यदि चंद सिक्कों के लिए, तो रक्षक भी वतन के होंगे, पस्त एक दिन हारकर। जीती हे पहले भी हमने कितनी ही बाजी हार कर, कवि कलम से जीती बाजी पृ...
सिलसिला
कविता

सिलसिला

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मोहब्बत का सिलसिला थम सा गया है। नफरतों का सिलसिला बढ़ सा गया है। सोचा था जी नहीं सकेंगे तुम्हारे बिन। मगर जीवन का सिलसिला बढ़ सा गया। फिर सोचा चलो जीवन की एक नई शुरुआत करते। मगर बनावटी ख्वाबों का सिलसिला बढ़ सा गया। फिर सोचा चलो बनावटी ख्वाबों के सहारे ही जीवन जी लेते है मगर तन्हाई का सिलसिला फिर से बढ़ सा गया। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्र...
क्रांतिकारी कवि राम प्रसाद बिस्मिल
कविता

क्रांतिकारी कवि राम प्रसाद बिस्मिल

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** मूलमती-मुरलीधर की बगिया खिला फूल इक राम! आजादी इतिहास में तरुण क्रांतिकारी सरनाम!! बिस्मिल तेजस्वी कवि, शायर औ क्रांतिकारी प्रखर! हा अमर बलिदानी विस्मृत! कृतज्ञ बनो राष्ट्र दो स्वर!! जन्म शाहजहांपुर, गोरखपुर जेल में अंत जीवन! जर्जर संरक्षित बिस्मिल कक्ष! करो धरोहर संरक्षण!! आर्य समाज से जुड़े सत्यार्थ प्रकाश का किया मनन! स्वाध्याय नियमित व्यायाम संग सुबह शाम हवन!! बिस्मिल की थी इकहि चाह हर जन्म भारत में पाऊंँ! प्रेम हिंदी से हो अतुल! ओढूँ हिंदी औ बिछाऊँ...!! उर में नहीं भड़कते थे सिर्फ आजादी के शोले! कविता और शायरी की भाषा कलम उनकी बोले!! चौरा-चौरी कांड बाद कांँग्रेस ली वापस असहयोग आंदोलन! तो जुड़े राम हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन!! चंद्रशेखर आजाद नेतृत्व यहांँ सशस्त्र क्रांति! हुआ बिस्मिल का मोह भंग कांँग्रे...
सफर
कविता

सफर

अमिता मराठे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जिन्दगी के सफर में, समानांतर चलते जाना, एक सुहावना अवसर है। जो संकटों से टकराते, जीवन यात्रा के, सुगन्धित पुष्प महकाते हैं। कैसी भी हवा हो, तेज आंधी-तूफान हो, अचल अडोल रहना है। गतिशीलता ही रफ्तार है, नये उत्साह से जुड़ना है। पुरूषार्थ भाव निर्मल हो, कुछ करने की दृढ़ता से, लक्ष्य तक पहुंचना है। प्रतियोगी देखकर, द्वेष, क्लेश में ना फंसना है। ये सफर है मौज में, सूरज चांद सा चमकना है। मुसीबतों का आना, तय है इस जीवन में, सामना किए बिना, मंजिल पा नहीं सकते। इस अविनाशी सफर में, डेरा कहीं भी डालें, अदृश्य शक्ति के बल पे, मार्ग प्रशस्त करना है। जिन्दगी के सफर में, समानांतर चलते जाना, एक सुहावना अवसर है। परिचय :- अमिता मराठे निवासी : इन्दौर, मध्यप्रदेश शिक्षण : प्रशिक्षण एम.ए. एल. एल. बी., पी जी डिप्लोमा इन वेल्...
करते करते क़िस्सागोई
ग़ज़ल

करते करते क़िस्सागोई

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** करते करते क़िस्सागोई। हमनें सच्ची बात डुबोई। मन ने धीरज रख्खा लेक़िन, आँख हमारी झर-झर रोई। जाग रहे थे हम ही तन्हा, जब थी सारी दुनियाँ सोई। आज वही हम काट रहें हैं, फ़सल वही जो हमनें बोई। भूल गए अब वो ही हमको, हमने जिनकी याद सँजोई। कान सुनी या आँखों देखी, बात हमारी माने कोई। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं...
कल्पनाओं में
कविता

कल्पनाओं में

जयप्रकाश शर्मा जोधपुर (राजस्थान) ******************** कल्पनाओं में जीना संभव है परंतु हकीकत में जीना कठिन है जीवन एक नदी है इसे पार सबको करना है परंतु माझी के भरोसे भी नहीं रहना है अगर जीवन की नदी पार करनी हो तो स्वाबलंबी बनना जरूरी है कब तक माझी के भरोसे नैया पार करेंगे खुद को भी तो पुरुषार्थ करना है कल्पना करना अच्छी बात है परंतु पुरुषार्थ खुद को करना है परिचय :- जयप्रकाश शर्मा निवासी : जोधपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप...
जीवन साथी
ग़ज़ल

जीवन साथी

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** सब का तन जीवन साथी है, सब का मन जीवन साथी है। होता परिवर्तन पल-पल पर, परिवर्तन जीवन साथी है।। जिस पर खेला बचपन मेरा, सर्दी गर्मी बरसात सही। ना भूला हूँ उस आंगन को, वो आंगन जीवन साथी है।। पानी से दूर रहा कब मैं, पानी है मेरे जीवन में। जल जीवन है सब देख रहे, जल का धन जीवन साथी है।। सांसो की सारी माया है, आती जाती हर सांस कहे। वायू का जीवन मैं होता, जो नर्तन जीवन साथी है।। गर्मी जीवन का लक्षण है, ठंडा होना मर जाना है। अग्नि का दामन छूटा कब, ये दामन जीवन साथी है।। है गगन नहीं कुछ भी लेकिन, ये अंश मगर मानव का है। संतुलित रखें जो अंशों को, वो पावन जीवन साथी है।। हम सफर रहा वो बनकर के, पग-पग पर साथ दिया मेरा। वो भी जीवन साथी, उसका, अपनापन जीवन साथी है।। परिचय :- अख्तर अली श...
घमंड
कविता

घमंड

संध्या नेमा बालाघाट (मध्य प्रदेश) ******************** किस बात का घमंड मेरा घमंड बार-बार मुझे ललकारता हैं। तेरा हैं क्या जो घमंड कर सकती हैं। जन्म मरण भगवान के हाथ फिर तेरा है क्या, किस बात का घमंड... मेरा घमंड बार... मां-पिता के संस्कार भाग्य किस्मत का लिखा जोक फिर तेरा है क्या, किस बात का घमंड... मेरा घमंड बार... विद्या-धन और मान-सम्मान दूसरो से प्राप्त फिर तेरा है क्या, किस बात का घमंड... मेरा घमंड बार... ये शरीर भी मिट्टी का और एक दिन मिट्टी में समा जाएगा फिर तेरा है क्या किस बात का घमंड... मेरा घमंड बार... मेरा घमंड बार-बार मुझे ललकारता हैं। तेरा हैं क्या जो घमंड कर सकती हैं। राधे राधे... परिचय : संध्या नेमा निवासी : बालाघाट (मध्य प्रदेश) घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करती हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी...
स्त्री चिंतन
कविता

स्त्री चिंतन

डॉ. मोहन लाल अरोड़ा ऐलनाबाद सिरसा (हरियाणा) ******************** स्त्री का अस्तित्व है महान माँ बनना भी है सम्मान सब जगत पर है अहसान कब हटेंगे यह इश्तहार बड़े अस्पतालों से यहाँ लिंग परीक्षण नहीं किया जाता सालो से पुत्र जन्म पर दी जाने वाली बधाईयाँ बेटी जन्म पर मिलने वाली रूसवाईयाँ कोई बात नहीं आजकल बेटा-बेटी एक जैसे है यह कहना आसान परंतु मन से सब वैसे है फिर ना नोच कर फेंक दी जाए गटर मे कोई बच्ची जो नवरात्रो में पुजी गई थी देवी सच्ची दोहरी हुई पीठ पर बच्चा बाँध कर इंटो और सीमेंट को कंधे पर लाद कर चढती हुई गरीब औरत ना तौली जाए ठेकेदार की नजरो में ना बोली जाए फिर से ना किसी अबला पर गोली चलाई जाए ना तेजाब से राह चलती खुबसुरत शक्ल जलाई जाए नहीं कर सकते किसी स्त्री का सत्कार बड़ा ही घिनौना और आपराधिक है बलात्कार घर से बाहर निकलने पर घुरती गंदी निगाहे बेच...
साहित्य के धरातल पर
कविता

साहित्य के धरातल पर

गगन खरे क्षितिज कोदरिया मंहू (मध्य प्रदेश) ******************** साहित्य के धरातल पर भावनाएं ही सुन्दर प्रेरणा बनकर जन्म लेती हैं। दिल को छूले मन को सुकून मिलता हैं और जनमानस की प्रेरणा बन जाती हैं मेरी कलम। सृजनकार हर परिस्थितियों में अपनी पहचान बना लेता है। जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि, जहां चाह नहीं वहां जीने की राह निकल लेता कवि और प्रेरणा बन जाती हैं मेरी कलम। चमत्कार तो नहीं करतीं जिम्मेदारी का एहसास कराती, बहुत नाज़ है उस पर अद्भुत हैं कलम मेरे लिए भगवान बन गई हैं मेरे लिए मेरी कलम। मां बहन बेटी की तरह वह एक पिता की जिम्मेदारी का अहसास कराती सांसारिक धरातल पर प्रेरणा स्वरूप हैं मेरी कलम। विपत्तियों से घिर गई है ज़िन्दगी, हैवानियत का शिकार हो गई मासूम जिन्दगी, और तो और महामारी करोना से लाशों का ढेर बन गई हैं जिन्दगी व बेबस हो गई ...
दीप अभी तुम जलते रहना
कविता

दीप अभी तुम जलते रहना

मंजुला भूतड़ा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** विश्वास के पात्र में स्नेह शेष है, मन की बाती में अपनत्व विशेष है, प्रफुल्लित होंगे सब जन-मन, निखर उठेगा अंधियारा आँगन। विचारों के झंझावात हैं, उद्वेगों के तूफान हैं, पर शीतल झोंकों के रहते, पल रहा विश्वास है। अदृश्य कालिमा को दूर भगाने, मन के आक्रोशों को हटाने, जनमानस में आस जगाने, दीप अभी तुम जलते रहना। महामारी विकराल है, कोरोना का बवाल है, अदृश्य आपदा से मुक्ति दिलाने, दीप अभी तुम जलते रहना। परिचय :-  मंजुला भूतड़ा जन्म : २२ जुलाई शिक्षा : कला स्नातक कार्यक्षेत्र : लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता रचना कर्म : साहित्यिक लेखन विधाएं : कविता, आलेख, ललित निबंध, लघुकथा, संस्मरण, व्यंग्य आदि सामयिक, सृजनात्मक एवं जागरूकतापूर्ण विषय, विशेष रहे। अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक समाचार पत्...
वक्त
कविता

वक्त

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** वक्त चलता है दौड़ता है भागता है पर वक्त की परछाई तनहाई नहीं होती क्योंकि तनहाई में वक्त डरावना लगता है सदा मुस्कुराता हुआ आगे निकल जाता है कोई पकड़ पाता है और कोई नहीं पकड़ पाता इस वक्त हंसता हुआ आगे निकल जाता है पर वक्त तंहा नहीं होता कहीं करुणा रस बरसाता कहीं विभत्स तो कहीं आज आश्चर्य तो कहीं वक्त वीर रस में नहाया। मन दौड़ता है मनु को पीछे छोड़ने के लिए। परंतु विवेकी वक्त का मूल्य समझ ने वाले समय को अपनी मुट्ठी में बंद कर नीत नए अनवेषण कर आगे बढ़ता है वह वक्त को पकड़ने का प्रयास करता है की फिर कुछ नया कर सके तंहा ही वक्त का मुंह चिढ़ाती है सरिता सार के किनारे का वक्त भागते मैं गुनगुनाते हुए दुखी मन को आश्वस्त करता है वक्त कब रात की काली चादर होता है पता नहीं चल पाता दौड़ो भागो वक्त के ...
मेरी पसंद
कविता

मेरी पसंद

रश्मि लता मिश्रा बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ******************** मुझे बातें पसंद हैं इंसान की न हिंदू की न मुसलमान की। कहो, रोटी, कपड़ा और मकान से क्या कभी कोई अलग है या पेट से पहले किसी की अन्य तलब है। खून का रंग भी तो लाल ही है फिर भी रात दिन भेद का ख्याल ही है। ये हरकत है किस नादान की मुझे बातें पसंद... न हवा बदलती,न सूर्य न चन्द्रमा फिर न जाने खुद को अलग मानने का है क्यों गुमां। भेद तो कभी धरती ने भी नही किया। वही एक भंडार भोजन सबको दिया। फिर बुद्धि क्यो फिरी बुद्धिमान की मुझे बातें पसन्द है,,,, न धर्म बुरा न मजहब बस भाषा का ही भेद है। अब तक भी न समझ सके यही तो खेद है। कहाँ ग्रन्थों ने करी है अनैतिकता की प्रशंशा किस धर्म ने जाहिर की भेद भाव की मंशा। धर्म के ठेकेदार करते क्यों बातें अंजान सी मुझे बातें पसंद है। परिचय :- रश्मि लता मिश्रा निवासी : बिलासप...