दिल की गहराइयों में
कीर्ति मेहता "कोमल"
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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दिल की गहराइयों में दर्द तेरा शामिल है
मेरे अश्क़ों का समंदर ही मेरा साहिल है
ऐसे पीछे से चलाया गया खंजर मुझ पर
हर तरफ़ जैसे लबे-बाम मेरा क़ातिल है
मन की बातों को मसोसे हुए मैं बैठ गई
आरजू़ कैसे बयाँ हो जो खडा़ जाहिल है
मर तो जाऊंगी पर हिम्मत नहीं हारूँगी मैं
मेरी रग-रग में मेरी माँ की दुआ शामिल है
कब से बैचैन हूँ तन्हाइयों में रोती हूँ दोस्त
क्या मेरी जिस्त में पैवस्ता यही हासिल है
सुर्ख़ कदमों में लिये फिरती हूँ गाहे-गाहे
आबले कौन भला समझे कहाँ आकिल है
खू़ब मालूम है तूफ़ां है ये साहिल तो नहीं
तू ही कहदे इसे 'कोमल' तो यही साहिल है
गाहे-गाहे (जगह/जगह)
आबले (फफोले/छाले)
परिचय :- कीर्ति मेहता "कोमल"
निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
शिक्षा : बीए संस्कृत, एम ए हिंदी साहित्य
लेखन विधा : गद्य और पद्य की सभी...

























