मुट्ठी भर धूप
माधवी मिश्रा (वली)
लखनऊ
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किसने कहा तुमसे
अपराध मेरे रगों मे बहता है
मेरे खून का रंग सफेद है
तुम्हारे आन्तरिक दुर्बलता को
महिमा मंडित करती हैं
ये संकीर्ण भावनाएं
अपने स्वयं के
कल्मशो से प्रेरित
तुम चच्छुहीन चिंतन
करने के अभ्यस्त हो
अत:सोच भी नही सकते की
मेरे भी खून का रंग लाल है
मेरी भी अस्थियां तुम जैसी हैं
फिर भी मैं तुम्हारी
संवेदनाओं का
अभिनंदन करता हूँ ,
जिसमे मेरे लिये
अपावन ही सही स्थान तो है
हमारे बीच विभाजक हैं
अन्शुमाली की दस्यू किरणें
जो तुम्हारे जन्म के साथ
संचित हो जाती हैं
तुम्हारे खातों मे
किन्तु मेरे जन्म पर
गुमनाम पिता की याद मे
आँसू बहाती माँ,
तड़प उठती है और
मुझे पहचान नही देती
गौरव से शीष उठाने का
अधिकार नही देती
धरती मुझे बिछौना देती है
परन्तु संदेहों के शहर मे
रोटी नही देती।
दुनियाँ के कोलाहल मे
'मुट्ठी भर...

























