ओंस सदृश है जीवन
अंजनी कुमार चतुर्वेदी
निवाड़ी (मध्य प्रदेश)
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पत्तों और घास के ऊपर,
स्वर्णिम आभा पाता।
बनकर बूँद कनक सा दमके,
पानी ओंस कहाता।
जब जल वाष्प संघनित होती,
तभी ओंस बन जाती।
कभी बर्फ में यही बदलती,
तब पाला कहलाती।
घास पत्तियों रेलिंग छत पर,
ओस दिखाई देती।
सूर्य रश्मियाँ इस पर पड़तीं,
मोती आभा लेती।
सूरज से आभा पाती है,
नष्ट उसी से होती।
तेज धूप पड़ने के कारण,
अपना जीवन खोती।
ड्रोसोमीटर मापन इसका,
सही माप बतलाता।
अधिक शीत से बर्फ बने यह,
तब पाला कहलाता।
होती है भयभीत ओंस जब,
सूर्य रश्मियाँ आतीं।
बनकर बूँद बिखर जाती है,
ताप नहीं सहपाती।
दमक रही पत्तों के तन पर,
कुछ तारों पर झूले।
मोती की लडियों से दिखती,
पारिजात जयों फूले।
ओंस बूँद सा सबका जीवन,
लंबा कभी ना होता।
अल्प समय बर्बाद करे जो,
अपना जीवन खोता।
कभी प्यास ना बुझी किसी क...






















