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पद्य

अनुभव
कविता

अनुभव

प्रीति तिवारी "नमन" गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) ******************** किया जिन्दगी सुलूक तुमने, जिसके हम हकदार नहीं थे, मिले अश्रु मिले मुस्कान के बदले, यूँ तो हम उदार नहीं थे। सिखा गये कुछ अनुभव हमको, दिल को पत्थर बना लिया, जिसने जैसा समझा जाना, वैसा चेहरा दिखा दिया। राह चले फूलों की लेकिन, चुभे पांव में काँटे हैं, सीख मिली नित नूतन हमको, फिर भी फूल ही बांटे हैं। आदत से मजबूर "मलय" सम विष के सांझेदार नहीं थे, किया जिन्दगी सुलूक तुमने, जिसके हम हकदार नहीं थे। मिलन जुदाई मोह लोभ और द्वेष दंभ दानवता के, पाया प्रेम विराग भी है, और किस्से कुछ मानवता के। सब्र और साहस से तोड़े अहम भी, वो दमदार नहीं थे, किया जिन्दगी सुलूक तुमने, जिसके हम हकदार नहीं थे। हुये सफल भी और विफलता, यश अपयश सम्मान मिला, बिना बात रुसवाई पाई, रिश्तों में उन्मान मिला।। छी न रहे जो ह...
ईश्वर के रचना
कविता

ईश्वर के रचना

संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया भोपाल (मध्यप्रदेश) ******************** हाँ मैं ईश्वर की रचना हूँ। सोकोमलांगी नारी हूँ। परंतु आज के युग की नारी हूं। मैं आज पुरूषों के सभी। कठोर, कठिन कार्य। करने में सक्षम हूं। हां मैं ईश्वर की रचना हूं। मैं कार,स्कूटर,मोटरसाइकिल। ऑटोरिक्शा, जहाज, हवाई जहाज, रेल, बस सब कुछ। चला सकती हूँ, चलाती भी हूं। हां मैं ईश्वर की रचना। सुकोमलांगी नारी हूं। मैं आज एक डॉक्टर,वकील। इंजीनियर, ज्योतिष सभी। कुछ हूँ, मुझमें ईश्वर ने सारी। शक्तियां समाहित की है। हां, मैं आज की नारी। ईश्वर की सुंदर अदभुत रचना हूँ। परिचय :- श्रीमती संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया निवासी : भोपाल (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय ...
पतझड़ के मौसम
कविता

पतझड़ के मौसम

परमानंद सिवना "परमा" बलौद (छत्तीसगढ) ******************** पतझड़ के मौसम हे, वातावरण मे खुशीया छा हे, पेड-पौधा के परिवर्तन के बेरा हे नवा पत्ता के अगोरा हे.! सुख-शांति निर्मल हवा मिले जहां हरियर पेड-पौधा खिले, मनमोहन वातावरण दिखे, सुंदर दृश्य दिखे.! प्रकृति के सिंगार होये, ऋतु के राजा बसंत ऋतु के आगमन ले, आमा अमली मौउरावत हे, लइका मन चहरे मे मुस्कान आवत हे.! होली तिहार आवत हे, फागुन गीत गावत हे, प्रकृति के नवा रुप देख के सब खुशियां मानावत हे, पतझड़ के मौसम हे, वातावरण मे खुशीयां छा हे, पेड-पौधा के परिवर्तन के बेरा हे नवा पत्ता के अगोरा हे.!! परिचय :- परमानंद सिवना "परमा" निवासी - मडियाकट्टा डौन्डी लोहारा जिला- बालोद (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अ...
एक नारी
कविता

एक नारी

अविनाश यादव महू (मध्य प्रदेश) ******************** हे एक नारी, एक-एक नारी। एक नारी, एक-एक नारी। भाग्य रचिता है, मेरी क्या तुम्हारी। उसका करो सब सम्मान, वो ही मां का रूप है हमारी। हे एक नारी, एक एक नारी। वो ही बनातीं है, घर को प्यार का दर। कुछ नहीं चाहतीं वो, निस्वार्थ होकर। बुरे से बुरे वक्त में, वो ही साथ निभाए। हर परेशानी से वो ही, वो डटकर लड़ जाएं। उसके पास है इतनी शक्ति, वो शक्ति का रूप अवतारी। हे एक नारी, एक एक नारी। बनाने वाले ने भी, उसको सबसे अलग बनाया। वो हर नामुमकिन को मुमकिन, कर दें ऐसी वो काया। खुशियां लुटाती है वह, हर दुःख भी उसके हिस्से में ही आया। हर दुखों से लड़कर भी, उसका मन नहीं घबराया। वो सबसे कर सकतीं हैं संघर्ष, घर वालोें पे लुटाती जिंदगी सारी। हे एक नारी, एक एक नारी। भाग्य रचिता है, मेरी क्या तुम्हारी। उसका करो सब सम्मान, व...
यादों की जंजीर
कविता

यादों की जंजीर

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** फिर एक बार याद आ गया कोई यहां मैं हमसफर हजारों मिलते हैं बांटने दर्द ओ गम कोई नहीं होता गुल ही गुल चाहते हैं सब गुलिस्ता में खंजर से काटो को कोई नहीं छूता। कहें किसे हम अपना इस जमाने में हर कोई शख़्स अपना, अपना होता है फिजा में खुशबू का ही आलम हो ऐसा खुशनसीब हर कोई नहीं होता। पल में खड़े होते हैं यादों के महल पतझड़ के पत्तों से गिरते हैं पल में यादों की जंजीरों को तोड़ ना चाहा और ज़्यादा जकड़ने काशुबहा होता है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ीआप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से ...
आजादी की चाल
कविता

आजादी की चाल

माधवी तारे लंदन ******************** जागो! री सखी! दिनकर भी नभ में उन्नत है छाया छाने दो प्रियकर आज उसको कितना भी ऊपर चलूँगी मैं आज आजादी की "सेवाभावी चाल ॥ १ ॥ आज सारे विश्व में महिला का दिन है छाया चौका चूल्हा धंधा घर का है तुम्ही को ही संभाल चलूँगी में आज आजादी की सेवाभावी चाल ।।२।। मानव जगत से पीड़ा का संसार मिटाने दानव-मन में करुणा सागर फिर सँजाने पीना पड़ेगा मुझे आज गर विष-हलाहल फिर भी चलूँगी मैं आज आजादी की सेवा भावी चाल ॥३।। स्वार्थ-तुहिन हल जीवन बगियाँ की कलियों को हँसाने प्रणय सिंदूर से जन-मन का सँजाने भाल प्रदेश विशाल चलूँगी मैं आजादी की आज सेवा भावी चाल ॥४।। दुखियारी माताओं के आँचल में उल्लास भर देने नवजात शिशुओं को जीवन - मधुहास पिलाने सुरक्षा की बन के ढाल चलूँगी मैं आजादी की आज सेवाभावी चाल ।।५।। भूखे कंकाल में भरने दो दाने खेतों पर अमृ...
होली आई झूम के
दोहा

होली आई झूम के

रामसाय श्रीवास "राम" किरारी बाराद्वार (छत्तीसगढ़) ******************** होली आई झूम के, खेलें रंग गुलाल। मस्ती में सबका हुआ, हाल यहाॅ बेहाल।। धर पिचकारी मारते, भर भर सब पर रंग। बाल वृद्ध देखो चलें, लेकर सबको संग।। सब मिलकर के गा रहे, सुंदर होली गीत। छोड़ सभी शिकवा गिला, आज़ बने सब मीत।। ढ़ोलक की है थाप पर, नाचें सब हुरियार। देखो सारे आज़ हैं, खूब किये श्रृंगार।। कोयल मीठी गा रही , बैठ आम की डाल। अमराई की छांव में, खेल रहे सब बाल।। आज खुशी से नाचता, यह सारा संसार। फागुन लेकर आ गया, होली का त्यौहार।। टेसू फूले लाल है, सुंदर है वन बाग। होली खेलो प्रेम से, छेड़ बसंती राग।। परिचय :- रामसाय श्रीवास "राम" निवासी : किरारी बाराद्वार, त.- सक्ती, जिला- जांजगीर चाम्पा (छत्तीसगढ़) रूचि : गीत, कविता इत्यादि लेखन घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित ...
नारी कुल की इज्जत है
कविता

नारी कुल की इज्जत है

सीताराम पवार धवली, बड़वानी (मध्य प्रदेश) ******************** "नारी मर्यादा छोड़े फिर भगवान की भी नहीं सुनती" मोहब्बत की शमा नफरत के तूफानों में नहीं जलती मदमस्त बहार कभी भी खिजा में नहीं खिलती। नारी को तू खेलने का खिलौना समझने वाले बेपनाह मोहब्बत मांगने से कभी भी नहीं मिलती। नारी कुल की इज्जत है इज्जत करना सीख ले नारी मर्यादा छोडे फिर भगवान की भी नहीं सुनती। नारी में नर होता है नर से ही तो नारायण बनता है नारी शक्ति बिना हमसे परछाई भी नही हिलती। गंगा की धारा है ये नारी सागर में इसको मिलने दो इसका साथ नहीं मिलता तो जिंदगी नहीं बनती। नारी गर नहीं होती तो धरती पर जीवन नहीं होता इसने हमको जन्म दिया नही तो दुनिया नहीं चलती। आधा नर आधा नारी से अर्धनारीश्वर बन जाता है अर्धनारीश्वर के सामने किस्मत भी जाल नहीं बुनती। परिचय :- सीताराम पवार निवासी : धवली जिला ...
दिखावा
कविता

दिखावा

साक्षी उपाध्याय इन्दौर (मध्य प्रदेश) ******************** जीतते तो हौसलों से है, यह हथियार तो सिर्फ दिखावा है।। मगर यह मत समझ लेना कि सिर्फ हम गद्दार हैं, जानते हैं हम, कि तुम भी हमसे दुश्मनी निभाने आए हो, यह दोस्ती का इज़हार तो सिर्फ दिखावा है।। हम जानते हैं तुम्हारा असल चेहरा कुछ और है , यह श्रंगार तो सिर्फ दिखावा है।। जिंदगी गमों का दरिया है जो नहीं है कम, अंदर से टूटे से हैं अश्कों से आंखें हैं नम, फिर भी यह जो मुस्कुराहट है ना बरकरार यह तो सिर्फ दिखावा है।। परिचय :- साक्षी उपाध्याय आयु : १५ वर्ष निवास : इन्दौर (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के स...
बिल्व-वृक्ष
भजन, स्तुति

बिल्व-वृक्ष

सुरेश चन्द्र जोशी विनोद नगर (दिल्ली) ******************** बिल्व-वृक्ष शिव का रूप, पिता ने एक लगाया था | देवालय निकट शिव स्वरूप, परमेश्वर ने एक लगाया था || बिल्व-वृक्ष...... मैंने भी निज गृह में एक, सदाफल वृक्ष लगाया था | सेवा करके उसकी भक्तिपरक, मैंने स्वयं से बड़ा बनाया था || बिल्व-वृक्ष....... टूटी शाखा तब कलेश हुआ था, गृहस्थ सुखार्थ वृक्ष लगाया था | करता था प्रतिदिन अभिषेक, बिल्वपत्रार्पणार्थ वृक्ष लगाया था || बिल्व-वृक्ष..... आज कहाँ बिल्व-वृक्ष गया, अष्टोत्तरी पूर्त्यर्थ जो लगाया था | आज तन ओ असहाय हुए, वृक्ष नष्टार्थ हाथ जो लगाया था || बिल्व-वृक्ष....... निम्बुक वृक्षार्थ आतुर हो क्यों? शिव बिल्व-वृक्ष नहीं बढ़ाया था | आत्म- सुखार्थ मन भयातुर क्यों? मान त्रिदेवों का नहीं रख पाया था || बिल्व-वृक्ष..... परिचय :- सुरेश चन्द्र जोशी शिक्षा : आचार्य, बीएड ...
आई होली चढ़ा भंग
छंद, धनाक्षरी

आई होली चढ़ा भंग

सरिता सिंह गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** आई होली चढ़ा भंग, सतरंगी चढ़ा रंग। गले मिल मिल कर, हर्ष खूब लीजिये गुजिया मिठाई खाए, पापड़ कचौड़ी खाए। पकवान चख चख, पेट भरे लीजिये जीजा और साली संग, देवर और भाभी संग। अबीर गुलाल मले, मजा खूब लीजिये लिए रंग पिचकारी, भरे सभी किलकारी। खेल रंग बच्चों संग, बच्चा बन लीजिये लाल,पीले रंग डाल, रंगे आज मुख गाल। अपना पराया भूल, होली आज लीजिये। जात पात रंग भूल, रंग की उड़ाई धूल। भाई-भाई बनकर, बैर मिटा लीजिये। भूलकर बैर भाव, अच्छा करके स्वभाव। एक दूजे घर जाके, रिश्ता निभा लीजिये। परिचय : सरिता सिंह निवासी : गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने पर...
छत्तीसगढ़ी दोहे
आंचलिक बोली, दोहा

छत्तीसगढ़ी दोहे

रामकुमार पटेल 'सोनादुला' जाँजगीर चांपा (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी दोहे) होरी हे के कहत मा, मन म गुदगुदी छाय। गोरी गुलाल गाल के, सुरता कर मुसकाय।। एक हाँथ गुलाल धरे, दुसर हाँथ पिचकारि। बने रंग गुलाल लगा, गोरी ला पुचकारि।। रंग रसायन जब लगे, होही खजरी रोग। परत रंग तन मन जरय, नहीं प्रेम के जोग।। चिखला गोबर केंरवँछ, जबरन के चुपराय। खेलत होरी मन फटे, तन मईल भर जाय।। परकिरती के रंग ले, रंग बड़े नहि कोय। डारत मन पिरीत बढ़े, खरचा न‌इ तो होय।। परसा लाली फूल ला, पानी मा डबकाय। डारव कतको अंग मा, कभु न जरय खजवाय।। परसा फूले लाल रे, पिंवँरा सरसों फूल। गोरी होरी याद रख, कभु झन जाबे भूल।। होरी अइसन खेल तैं, सब दिन सुरता आय। अवगुन के होरी जरे, कभु गुन जरे न पाय।। तन के भुइयाँ अगुन के, लकरी लाय कुढ़ोय। अगिन लगा ले ग्यान के, हिरदे उज्जर होय।। लाल ...
मेहमान
धनाक्षरी, हास्य

मेहमान

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मनहरण घनाक्षरी (हास्य) थोड़ी सी ही पहचान, ये होते मेह समान, बिन बादल बरसे, घर अपना माने। बेचारा ये मेजबान, हो जाता है परेशान, पूरे करे ये आदेश, कौन दुखड़ा जाने। करें ये फ़रमाइश, पूरी करना ख्वाइश, कर देंगे बदनाम, होटल चलो खाने। अतिथि कब जाओगे, क्या अब हमें खाओगे, हुई पगार खतम, नहीं बचे बहाने। परिचय : सरला मेहता निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindiraksh...
उनकी तो कहने भर की
ग़ज़ल

उनकी तो कहने भर की

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** उनकी तो कहने भर की। है रखवाली ऊपर की। बाहर का सब दिखलावा, है सच्चाई भीतर की। अगला, अगले पर भारी, जीत यहाँ है अवसर की। आँखों से समझी हमनें, सब गहराई सागर की। ग़म में भी वो न पिघली, आँखें जो है पत्थर की। आपस के रगड़े - झगड़े, राम-कहानी घर-घर की। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करव...
बदलते रंग
कविता

बदलते रंग

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** बदलते हुए रंगों के साथ बदलते हुए अपने लोग देखे हैं। चेहरे पर नकाब ओढ़े सीने पर वार करते अपने ही लोग देखे हैं। हरे रंगों जैसी अब लोगों के दिलों में हरियाली कहाँ ? अपने ही लोग खंजर फेर ह्रदय तल को बंजर करते देखे हैं। रंगों की बौछार फैली है हर जगह फिर भी गिरगिट की तरह रंग बदलते अपने रिश्तेदार देखे हैं। करते होंगे मोहब्बत वो शायद किसी और से, हमने अपने लिए तो उनके चेहरे पर नफ़रत के बदलते नए-नए रंग देखे हैं। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि रा...
लो आ गई होली
कविता

लो आ गई होली

प्रभात कुमार "प्रभात" हापुड़ (उत्तर प्रदेश) ******************** लो आ गई होली मन में है उल्लास दिलों मे भरा उत्साह आओ हम सब खेलें होली। लो आ गई होली हर घर-आँगन गाँव-मढैया होली गावें हर गाँव गवैया वृंदावन की कुंज गलिन में प्रेम रंग में रंगकर होली खेलें रास रचैया भक्ति रस में डूब-डूबकर आओ हम सब खेलें होली। लो आ गई होली गाँव-नगर चौपाल-क्लब आ गए बालम और कुमार भांग खुमार, रंग, गुलाल बोला सबके सर चढ़कर होली के रंगों में रंग कर आओ हम सब खेलें होली। लो आ गई होली क्या हिन्दू क्या मुस्लिम क्या सिख-इसाई मनमुटाव द्वेष बुराई भुला कर दुनिया को भाईचारे की राह दिखा कर मानवता के रंग में रंगकर आओ हम सब खेलें होली। लो आ गई होली बच्चों की पिचकारी रंगों से भरे गुब्बारे जीवन में भर रहे रंग बारम्बार विविध रंगों से विद्यमान आओ हम सब खेलें होली। लो आ गई होली एक अनोखा...
तेरे लिए…
कविता

तेरे लिए…

राजेन्द्र कुमार पाण्डेय 'राज' बागबाहरा (छत्तीसगढ़) ******************** राज! कैसे उन्हें बताएं कि हमें उनसे मोहब्बत है। हमारी खामोशियाँ सिर्फ उनका इंतजार करती हैं। कभी वो हमें मिलें तो उन्हें दिल के सारे राज बताएंगे। हमारी मोहब्बतें तो सिर्फ मोहब्बत नही इबादत है। डरते हैं उनके बेदाग दामन कही रुसवा न हो जाये। इस खातिर उन्हें मन मंदिर की देवी जैसे पूजते हैं। हमारी चाहत में गर पाकीजगी है वो आएंगी जरूर। ऐ सोनू ! राज को उन खुशनुमा लम्हों का इंतजार है। हमें भी मालूम वो भी हमें दिल ही दिल मे चाहते हैं। मगर मोहब्बत कहीं बदनाम न हो जाय चुप रहते हैं। आँखें उनकी हमारी मोहब्बतें नजाकत बयाँ करती है। लगता है अपने दिल में दर्द का सैलाब छुपाए बैठे हैं। कहते हैं सच्ची मोहब्बत हमेशा ही इम्तिहान लेती हैं। उनसे मिलने की उम्मीद से ही राज की साँसे टिकी हैं। परिच...
होली पर हुड़दंग
कविता, हास्य

होली पर हुड़दंग

अनुराधा प्रियदर्शिनी प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** मोदी चाचा आए हैं सतरंगी रंगों को लाए हैं योगी भैया देखो आए हैं केशरिया चटख रंग लाए हैं अखिलेश भैया ने बैंड बजाया मायावती जी चली हैं घर को सबने होली पर हुड़दंग मचाया एक दुजे को रंग लगाया मोदी चाचा आए हैं सतरंगी रंगों को लाए हैं होली के रंग बिरंगे रंग हैं भैया बुरा न मानो होली है आओ मिलकर हम सब होली खेलें जश्न मनाने का पल सुनहरा है स्नेह प्रेम का रंग लगाकर सबको गले लगाना है देखो होली की हुड़दंग मची है रंग बिरंगी होली है हंसी खुशी से होली मना लो एक दूजे को रंग लगा लो प्रेम से गले लगाकर भेदभाव को मिटा दो परिचय :- अनुराधा प्रियदर्शिनी निवासी : प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानिय...
धरती का श्रृंगार
कविता

धरती का श्रृंगार

शत्रुहन सिंह कंवर चिसदा (जोंधरा) मस्तुरी ******************** पेड़ पौधा है जिन्दगी का आधार जल वायु से मानव जगत उजियार वनों में है अपना जहान जिसमे है लाख, तेंदू, महुआ, चार होता है इससे अपना गुजार हम भी करे इस धरती का श्रृंगार लगाके वृक्ष एक वरदान हो एक नए भारत का उत्थान जो हो जग में विस्तार वृक्ष लगाओ जिंदगी बचाओ। परिचय :-  शत्रुहन सिंह कंवर निवासी :  चिसदा (जोंधरा) मस्तुरी घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com...
नित नित शीश झुकाऊँ
भजन, स्तुति

नित नित शीश झुकाऊँ

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** अष्टभुजी हैं दुर्गा माता, तू सहस्त्र भुज धारी। तेरी गाथा लिखना मुश्किल, तू पृथ्वी से भारी। तू जीवन आधार सभी का, तू है सबसे प्यारी। हर युग से तू रही सीखती, तेरी महिमा न्यारी। शिव शंकर से सीखा उसने, गरल कंठ में धरना। सीखा माता पार्वती से, कठिन तपस्या करना। दशरथ नंदन से सीखा है, सुख दुख में सम रहना। सीखा भूमि सुता से उसने, लिखा भाग्य में सहना। नटनगर से सीखा उसने, कर्म करें बस अपना। केवल प्रभु की शरण सत्य है, और जगत है सपना। बरसाने वाली से सीखा, खुद बन जाना राधा। राधा में है कृष्ण समाया, और कृष्ण में राधा। लक्ष्मीनारायण से सीखा, बहु अवतारी होना। तज बैकुंठ, धरा पर जाकर, नर संसारी होना। हनुमान से सीखा उसने, काम प्रभु के आना। ऊँचा लक्ष्य रखें जीवन का, प्रभु पद प्रीति लगाना। सीता उ...
महिला दिवस का पाखंड
कविता

महिला दिवस का पाखंड

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** आइए! एक बार फिर महिला दिवस का पाखंड करते हैं, महिला दिवस के नाम पर औपचारिकता का प्रपंच करते हैं। रोज रोज महिलाओं का अपमान करते हैं, नीचा दिखाने का एक भी मौका नहीं गँवाते हैं, उनकी हर राह में कांटे बिछाते हैं। महिलाओं को बराबरी का दर्जा देते हैं पर सच तो यह है कि हम सब अपनी माँ बहन बेटियों को भी ठेंगा दिखाते हैं। नारी तू नारायणी है का जितना गान करते हैं, उससे अधिक हम उनका अपमान करते हैं। नारी के प्रति श्रद्धा के दिखावे खूब करते हैं बड़े बड़े भाषण, गोष्ठियां, दिखावा करते हैं पत्र पत्रिकाओं में असंख्य लेख कविता, कहानियां भी लिखते हैं, परिचर्चा, वैचारिक चिंतन महिला हितों के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाते हैं, महिलाओं को साल में इस एक दिन महिला दिवस के नाम पर सबसे ज्यादा बरगल...
खिलखिलाती धूप हूँ
कविता

खिलखिलाती धूप हूँ

प्रीति तिवारी "नमन" गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) ******************** खिलखिलाती धूप हूँ, सुबह की बयार हूँ, गुलशन सी महकती, नित नई बहार हूँ। मन्दिर का एक दीप भी हूँ, और एक धधकती आग भी हूँ।। साज और शृंगार भी हूँ, सुन्दर सा एक राग भी हूँ।। धैर्य हूँ धरा बन सब कुछ सह लेती हूँ। सब की खुशी में भी, मैं भी हँस लेती हूँ।। घर घर का मान हूँ, और अभिमान हूँ। जीवन में चेतना हूं और संचार हूँ।। व्यक्ति हूँ, अभिव्यक्ति हूँ, स्वरूपा हूँ शक्ति हूँ। पावन हूँ प्रीति हूँ, निश्छल हूँ, नूतन हूँ।। साथी हूँ, सन्गनी हूँ, माँ और बहन हूँ। हाँ मैं एक स्त्री हूँ ... नहीं चाहिये मुझे व्याख्या और बखान आंचल में समेटना चाहती बस, प्यार और सम्मान, प्यार और सम्मान ... परिचय :- प्रीति तिवारी "नमन" निवासी : गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती...
महिला प्रबंधक
कविता

महिला प्रबंधक

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** बिना वेतन जो काम करे न कोई छुट्टी न कोई गम। बस समय पर काम करे और लोगों को खुश रखे। बता सकते हो ये कौन है जो निस्वार्थ भाव से करती है। ये और कोई नहीं घर की एक महिला हो सकती है।। हर मौसम की ये आदि है सबसे बाद में सोती है। पर सबसे पहले उठती है और सबका ख्याल रखती है। नित्य क्रियाओं से निवृत होकर दिया भोग प्रभु को लगती है। जिसे घर में सुख शांति और बरकत बहुत होती है।। यह सब अकेली महिला हर दिन नियम से करती है। खुद की चिन्ता कम पर सब का ख्याल रखती है। घर की कारंदा होकर अपना फर्ज निभाती है। बिना प्रबंधन की शिक्षा के भी प्रबंध अच्छे से करती है।। ये सब एक महिला ही कर सकती है. . . ।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड ...
बंसत का अभिवादन
कविता

बंसत का अभिवादन

गगन खरे क्षितिज कोदरिया मंहू (मध्य प्रदेश) ******************** मन प्रभात करता प्रफुल्लित ह्रदयवाटिका में पुष्प सुमन की भांति जब बंसतरूपी आंगन में खिलकर आता है हर दुःख दर्द जमींदोज होकर खुशहाली चारों दिशाओं में विराजमान हो जाती हैं। खूबसूरत धरा पर ऋतु राज़ बंसत हो जाता हैं कुन्दन सा निखार हर जीवनशैली के मधुमास पर छाकर इन्द्रधनुष की तरह ऊंचाई पर विराजमान हो जाता हैं । हर सुबह महकती है गुलज़ार होता गुलशन, फूलों की खूबसूरती लिए बहारों का अभिनन्दन करते हुए गगन सृष्टि को मुस्कुराने का एक निश्चित मौसम परिवर्तन का सुन्दर सा बंसत करता अभिवादन हैं। परिचय :- गगन खरे क्षितिज निवासी : कोदरिया मंहू इन्दौर मध्य प्रदेश उम्र : ६६वर्ष शिक्षा : हायर सेकंडरी मध्य प्रदेश आर्ट से सम्प्रति : नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण भोपाल मध्यप्रदेश सेवानिवृत्त २०१४ साहित्य में कद...
मन की पीड़ा
कविता

मन की पीड़ा

आलोक रंजन त्रिपाठी "इंदौरवी" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जब मन की पीड़ा उभरी तो मैंने उसे लगाम दिया है कठिन पलों में मैंने खुद को एक नई पहचान दिया है पीकर के अपमान घूंट का मैंने संयम पाला है दूर दर्शिता के आंगन में स्वयं हृदय को ढाला है विचलित होकर जब दुनिया के लोग यहां घबराते हैं तब हम अपनी जीवन की गाथा लिखकर उन्हें सुनाते हैं जीवन मुल्यों की धूरी पर जब जब भी आघात हुआ है और निखरकर जीनें के साहस भी एहसास हुआ है रिश्तों के ब्वहारिकता में मौकों को सम्मान दिया है जब मन.... जब तुम मुझे समझ पाओगे और अधिक इतराओगे मेरे भावों की सरिता में तब तुम और नहाओगे प्रेम नहीं ये नैतिकता है इसका मूल्य समझना होगा उछली उछली भावुकता से तुमको आज उभरना होगा गहन विचारों में डूबी जब सोच निकलकर आयेगी तब इस प्रेम कहानी की सच्चाई तुमको भायेगी समझ सकोगे शायद मैंने तुमको क्या संधा...